29/10/2022
इस मलयालम फ़िल्म पर लिखने से पहले बात दूं कि इसके प्रोड्यूसर फहाद फासिल हैं. मेरी मलयालम फिल्मों में जिज्ञासा बढ़ने की वजह वही हैं. लेकिन ईमानदारी से बताऊं तो इस फ़िल्म को शुरू करने से पहले मुझे जानकारी नहीं थी कि इसका फहाद से कुछ लेना देना है. कहीं किसी से इस फ़िल्म का जिक्र सुना था तो कल रात ऑफिस खत्म करने के बाद देख लिया.
खैर! अब फ़िल्म पर आते हैं फ़िल्म का नाम 'पालतू जानवर' है. फ़िल्म की कहानी प्रसून (बेसिल जोसेफ) नाम के ऐसे लड़के की है जो अपनी जॉब मजबूरी में कर रहा है. वो एक गांव में लाइवस्टॉक इंस्पेक्टर (पशु निरीक्षक) है वो अपने काम ने एकदम कच्चा है, उसका मन नहीं लगता इस काम में जिस वजह से उससे बार-बार गलतियां होती रहती हैं. उसकी एक गलती की वजह से उस इलाके के पुलिस इंस्पेक्टर का खोजी कुत्ता मर जाता है. इस घटना के बाद उस पर दबाव आता है सब उसे गैरजिम्मेदार बताते हैं, एक्शन होने का डर भी होता है आखिर में वो जॉब छोड़कर जाने का फैसला करता है जैसे ही वो गांव से निकल रहा होता है तभी गांव का एक व्यक्ति उससे मदद मांगने आता है जिसकी गाय दूर पहाड़ी पर बेहोश हो गई होती है. उसे मजबूरी में उस व्यक्ति के साथ उसकी गाय को देखने जाना पड़ता है, जो कुछ भी उस पहाड़ी पर उस गाय के ईलाज के दौरान होता है वो ही इस फिल्म की असली आत्मा है. वहां पर फिल्माया एक-एक सीन जितना साधारण है उससे पनपा भाव उतना ही मजबूत.
ये फ़िल्म ऐसी नहीं कि आपको रोने पर मजबूर कर दे या आपका खूब मनोरंजन करे, ये फ़िल्म बस आपको एक खूबसूरत एहसास देगी. एक फ़िल्म साधारण होते हुए भी कैसे खास लग सकती है वो इस फ़िल्म को देखते हुए आपको पता चलेगा. जिस गांव को चुना गया है वो भी तारीफ के काबिल है, लोकेशन बहुत शानदार हैं. इस फ़िल्म के क्लाइमेक्स के बारे में बहुत बात नहीं करूंगा क्योंकि शायद स्पॉइलर हो जाए लेकिन मैं उसके कुछ खूबसूरत हिस्सों के बारे में जरूर बात करना चाहूंगा. ये स्पॉइलर ऐसा भी नहीं कि इससे आपका मजा खराब होगा ये फ़िल्म शुद्ध ड्रामा है.
फ़िल्म के दूसरे हिस्से में जब गाय अचानक दूर पहाड़ में बेहोश हो जाती है तब उसे ठीक करने की जद्दोजहद शुरू होती है. वो गाय गर्भवती भी रहती है. उसके पेट में बच्चा अटक जाता है, प्रसून जो इस काम में बिल्कुल जीरो है वो इस काम में अपनी पूरी ताकत लगा देता है वो कुछ ऐसा नहीं करता जो चमत्कार जैसा लगे वो इस दौरान एकदम स्वाभाविक बना रहता है, सबकी मदद लेता है. पर्दे पर गाय की प्रसव पीड़ा और उसके बछड़े के पैदा होने की प्रक्रिया को भी संक्षिप्त में दिखाया गया है. ये फ़िल्म इसलिए मुझे पसंद आई क्योंकि ये कहीं भी असाधारण होने की कोशिश नहीं करती, इसके किरदार भी एकदम स्वाभाविक हैं. पशुओं को लेकर गांव के लोगों में कितना लगाव होता है ये गांव में रहने वाला समझता होगा. इस फ़िल्म का सबसे बेस्ट पार्ट गाय के साथ फिल्माया हुआ क्लाइमेक्स का सीन ही है.
मलयालम सिनेमा की खास बात यही है कि वो ये बताते हैं कि कैसे साधारण कहानियों को दिलचस्प तरीके से दर्शकों के बीच लाया जा सकता है. मिन्नल मुरली के डायरेक्टर बेसिल जोसेफ इस फ़िल्म में प्रसून की भूमिका में नजर आए हैं. उन्होंने सिर्फ एक्टिंग की है इसमें और डायरेक्शन की जिम्मेदारी संगीत पी रंजन ने निभाई है. एक डायरेक्टर के तौर पर ये उनकी पहली फ़िल्म है.
ये फिल्म हिंदी में भी हॉटस्टार पर उपलब्ध है. गांव की कहानियां और शुद्ध ड्रामा पसंद है तो ये फ़िल्म देख सकते हैं.
- yati