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संतुक पिंपरी से अभिजीत दिपके ने शुरू किया ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान, सरकारी स्कूलों की बदहाली पर उठाए सवालमहाराष्ट्र के हिं...
15/08/2026

संतुक पिंपरी से अभिजीत दिपके ने शुरू किया ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान, सरकारी स्कूलों की बदहाली पर उठाए सवाल

महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के संतुक पिंपरी गांव में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर CJP संस्थापक अभिजीत दिपके ने तिरंगा फहराकर ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान की शुरुआत की। दिपके ने अपने पैतृक गांव की जिला परिषद स्कूल का निरीक्षण करते हुए ग्रामीण सरकारी स्कूलों में उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं और शिक्षा व्यवस्था की स्थिति को लेकर सवाल उठाए। विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक, इस अभियान का उद्देश्य केवल एक स्कूल तक सीमित न रहकर ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने लाना और स्थानीय स्तर पर जरूरी सुधार के लिए लोगों, सरपंचों तथा जनप्रतिनिधियों को जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित करना है। अभियान की शुरुआत से पहले CJP की ओर से बताया गया था कि उसकी टीमें अलग-अलग गांवों में जाकर सरकारी स्कूलों की स्थिति का जायजा लेंगी और स्थानीय लोगों व सरपंचों के साथ मिलकर जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में काम करने की अपील करेंगी। संतुक पिंपरी में स्कूल के निरीक्षण के दौरान दिपके ने स्कूल में पर्याप्त बेंच, पीने के पानी, खिड़कियों और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया। कुछ रिपोर्टों में स्कूल की टूटी खिड़कियों और खराब शौचालय की स्थिति का भी उल्लेख किया गया है। दिपके ने शिक्षा को ग्रामीण बच्चों के भविष्य से जोड़ते हुए कहा कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी बेहतर और सम्मानजनक शैक्षणिक वातावरण मिलना चाहिए। उन्होंने स्थानीय सरपंच से स्कूल की आवश्यक सुविधाओं में सुधार कराने की अपील की और बताया कि सरपंच ने जरूरी व्यवस्थाएं जल्द उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है। इस अभियान के जरिए CJP ने सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर सामाजिक भागीदारी और जवाबदेही पर जोर देने की बात कही है। दिपके का कहना है कि किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो, ग्रामीण सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी का मुद्दा गंभीरता से उठाया जाना चाहिए और अब स्थानीय स्तर पर सवाल पूछकर तथा सामूहिक भागीदारी के जरिए सुधार की कोशिश होनी चाहिए। स्वतंत्रता दिवस के दिन शुरू किए गए इस अभियान को शिक्षा और सरकारी स्कूलों की सुविधाओं को लेकर जनजागरूकता बढ़ाने की पहल के रूप में पेश किया गया है। अभियान के तहत लोगों से अपने आसपास के सरकारी स्कूलों की स्थिति देखने, कमियों की जानकारी साझा करने और स्थानीय स्तर पर सुधार के लिए आवाज उठाने की अपील की गई है।

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इजरायल ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सुरक्षा को लेकर ईरान से जुड़े कई कथित हत्या के खतरों की जानकारी अमेरिका के...
15/08/2026

इजरायल ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सुरक्षा को लेकर ईरान से जुड़े कई कथित हत्या के खतरों की जानकारी अमेरिका के साथ साझा की थी, लेकिन अमेरिकी खुफिया एजेंसियां इन विशिष्ट साजिशों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सकीं। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा और पूर्व अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि पिछले करीब एक वर्ष में इजरायली खुफिया तंत्र ने वॉशिंगटन को कई बार चेताया कि ईरान ट्रंप को निशाना बनाने की कोशिश कर सकता है। इन चेतावनियों में अलग-अलग संभावित तरीकों का उल्लेख किया गया था, जिनमें किसी सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान स्नाइपर से हमला, चाकू से हमला और विमान को कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल से निशाना बनाने जैसी आशंकाएं शामिल थीं। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, कुछ चेतावनियां सीधे इजरायली अधिकारियों के माध्यम से व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों तक भी पहुंचाई गईं। यह सिलसिला वर्ष 2025 से जारी बताया गया है और अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के साथ ऐसी चेतावनियों की संख्या तथा गंभीरता में भी इजाफा हुआ। सबसे गंभीर घटनाओं में से एक जुलाई 2026 में तुर्की में NATO शिखर सम्मेलन के दौरान सामने आई, जब ट्रंप की विमान यात्रा को लेकर संभावित मिसाइल खतरे की सूचना मिली। रिपोर्टों के मुताबिक, इस खतरे के बाद अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों ने अत्यधिक गोपनीय तरीके से ट्रंप को उनके निर्धारित विमान से अलग विमान में स्थानांतरित किया, ताकि संभावित हमले की स्थिति में उनकी सुरक्षा बढ़ाई जा सके। अमेरिकी खुफिया अधिकारियों को हालांकि इजरायल से मिली कुछ विशिष्ट सूचनाओं की विश्वसनीयता को लेकर पर्याप्त स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिली। तुर्की की खुफिया एजेंसियों ने भी कथित मिसाइल खतरे के संबंध में ऐसा कोई स्वतंत्र प्रमाण नहीं पाया, जो इजरायल के दावे की पुष्टि करता हो। इसके बावजूद अमेरिकी सीक्रेट सर्विस और व्हाइट हाउस ने खतरे को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया और राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए एहतियाती कदम उठाए। इससे अमेरिका और इजरायल के बीच खुफिया सूचनाओं के आकलन को लेकर मतभेद भी सामने आए हैं। इसी बीच, जुलाई में अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों में यह भी सामने आया था कि इजरायल ने अमेरिका को ईरान द्वारा ट्रंप की हत्या की एक नई और कथित रूप से अधिक विशिष्ट योजना के बारे में जानकारी दी थी, लेकिन उस समय भी अमेरिकी एजेंसियां उस सूचना को स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं कर पाई थीं। ट्रंप लंबे समय से ईरान के संभावित प्रतिशोध का प्रमुख लक्ष्य माने जाते रहे हैं, खासकर 2020 में ईरानी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की अमेरिकी कार्रवाई में मौत के बाद। अमेरिकी अधिकारियों ने पहले भी ईरान से जुड़े संभावित खतरों को लेकर चेतावनियां जारी की हैं। वर्तमान घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य एवं राजनीतिक तनाव बेहद गंभीर बना हुआ है और दोनों देशों के बीच किसी भी संभावित टकराव से पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति प्रभावित हो सकती है। हालांकि, उपलब्ध अमेरिकी खुफिया आकलनों के आधार पर यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि इजरायल द्वारा बताए गए सभी कथित हत्या प्रयास वास्तव में ईरान द्वारा संचालित योजनाएं थीं, क्योंकि अमेरिकी एजेंसियां उनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं कर सकीं। इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि खतरे की पुष्टि सीमित होने के बावजूद अमेरिकी सुरक्षा तंत्र ने संभावित जोखिम को गंभीरता से लिया और राष्ट्रपति की सुरक्षा व्यवस्था में असाधारण सावधानियां बरतीं।

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ईरान का दावा: स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ पर हमारा नियंत्रण, अमेरिका के दावे को चुनौतीस्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ को लेकर ईरान और अमेरिक...
15/08/2026

ईरान का दावा: स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ पर हमारा नियंत्रण, अमेरिका के दावे को चुनौती

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बेहद गंभीर स्तर पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी Fars के अनुसार, ईरान की बसीज अर्धसैनिक इकाई के प्रमुख होसैन ताएब ने गुरुवार को दावा किया कि रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ फिलहाल ईरान के “नियंत्रण और प्रबंधन” में है। ताएब ने कहा कि अमेरिका ने क्षेत्रीय मामलों में ईरान के प्रभाव को कमजोर करने और जलडमरूमध्य में चुनौती पेश करने की कोशिश की, लेकिन ईरान ने इन प्रयासों को विफल कर दिया है और समुद्री मार्ग में अपनी स्थिति बनाए रखी है। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक दिन पहले इसके उलट दावा करते हुए कहा था कि अमेरिका के पास स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ पर “पूर्ण नियंत्रण” है। इस तरह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल इस जलडमरूमध्य को लेकर दोनों देशों के दावे सीधे आमने-सामने आ गए हैं। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला बेहद संकरा समुद्री मार्ग है और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) इसे दुनिया के प्रमुख तेल-परिवहन chokepoints में शामिल करता है। मौजूदा संकट के दौरान इस मार्ग से तेल और गैस की आवाजाही में भारी व्यवधान आया है और इसके कारण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर दबाव बढ़ा है। Reuters की 13 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने दावा किया कि हॉर्मुज़ से लगभग 90 लाख बैरल प्रतिदिन तेल बाहर निकल रहा है, जबकि जहाजों की आवाजाही पर नजर रखने वाली कंपनियों के आंकड़े इससे काफी कम प्रवाह का संकेत देते हैं। इससे साफ है कि जलडमरूमध्य की वास्तविक स्थिति को लेकर भी अलग-अलग पक्षों के दावे सामने आ रहे हैं। ईरान पहले ही संकेत दे चुका है कि अमेरिका की नीतियों और सैन्य गतिविधियों में बदलाव तथा उसकी शर्तें पूरी होने तक हॉर्मुज़ को सामान्य रूप से खोलने का फैसला नहीं किया जाएगा। Reuters की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या भी सामान्य स्तर की तुलना में काफी घट चुकी है और तेल बाजार इस अनिश्चितता पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। विशेषज्ञों के लिए चिंता की सबसे बड़ी वजह यह है कि हॉर्मुज़ के जरिए होने वाली ऊर्जा आपूर्ति में लंबे समय तक रुकावट से एशिया समेत दुनिया के कई बड़े तेल आयातक देशों पर असर पड़ सकता है, क्योंकि इस मार्ग से निकलने वाला तेल वैश्विक ऊर्जा व्यापार की महत्वपूर्ण कड़ी है। ऐसे में होसैन ताएब का ताजा बयान केवल ईरान की सैन्य या राजनीतिक स्थिति का संकेत नहीं है, बल्कि यह अमेरिका के साथ चल रही व्यापक रणनीतिक टकराव में तेहरान के सख्त रुख को भी दर्शाता है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ में समुद्री यातायात कब सामान्य होगा और क्या ईरान तथा अमेरिका के बीच कोई ऐसा समझौता हो पाएगा, जिससे इस महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग पर तनाव कम हो सके। जब तक दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर कायम हैं, तब तक हॉर्मुज़ की स्थिति वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और पूरे मध्य-पूर्व की भू-राजनीति के लिए बेहद अहम बनी रहेगी।


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स्वतंत्रता दिवस 2026: लाल किले पर लाल बंधनी साफा पहनकर नजर आए PM मोदी, फिर दिखी उनकी खास ‘सफा’ परंपरानई दिल्ली में शनिवा...
15/08/2026

स्वतंत्रता दिवस 2026: लाल किले पर लाल बंधनी साफा पहनकर नजर आए PM मोदी, फिर दिखी उनकी खास ‘सफा’ परंपरा

नई दिल्ली में शनिवार, 15 अगस्त 2026 को देश ने अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस उत्साह और देशभक्ति के माहौल में मनाया, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से लगातार 13वीं बार राष्ट्र को संबोधित किया। इस दौरान प्रधानमंत्री का पारंपरिक पहनावा भी खास आकर्षण का केंद्र रहा। पीएम मोदी ने लाल-मरून रंग का पारंपरिक बंधनी/बांधेज साफा पहना, जिसमें सफेद और पीले रंग के छोटे-छोटे पैटर्न दिखाई दे रहे थे और साफे का लंबा पल्ला कंधे की ओर लटक रहा था। समाचार रिपोर्टों के अनुसार यह पारंपरिक टाई-एंड-डाई शैली राजस्थान और गुजरात की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी मानी जाती है। प्रधानमंत्री ने इसे सफेद कुर्ते और चॉकलेट-ब्राउन रंग की नेहरू जैकेट के साथ पहना, जबकि तिरंगे के रंगों वाला पॉकेट स्क्वायर उनके पूरे लुक में राष्ट्रीय भावना को और उभार रहा था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के साफे अब केवल पहनावे का हिस्सा नहीं रह गए हैं, बल्कि हर साल उनके सार्वजनिक रूप का एक चर्चित प्रतीक बन चुके हैं। वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद से ही 15 अगस्त के अवसर पर उनके साफे के रंग, डिजाइन और क्षेत्रीय शैली में लगातार बदलाव देखने को मिला है। शुरुआती वर्षों में चमकीले लाल बांधेज से लेकर पीले, केसरिया, बहुरंगी और लहरिया जैसी विभिन्न शैलियों तक, उनके साफों में भारतीय हस्तशिल्प और अलग-अलग क्षेत्रों की पारंपरिक वस्त्र कला की झलक दिखाई देती रही है। 2022 में तिरंगे से प्रेरित साफा और 2024 में लहरिया शैली का साफा भी उनके स्वतंत्रता दिवस के चर्चित परिधानों में शामिल रहे।

इस वर्ष लाल बंधनी साफे का चुनाव भी इसी परंपरा की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। खास बात यह है कि प्रधानमंत्री के 2014 के पहले स्वतंत्रता दिवस लुक में भी लाल रंग के जोधपुरी बांधेज साफे की झलक देखने को मिली थी। इस तरह 2026 का लाल बंधनी साफा उनके स्वतंत्रता दिवस के पारंपरिक पहनावे की शुरुआत से एक दृश्य समानता भी बनाता है, हालांकि इस वर्ष की शैली और रंग-संयोजन अलग है। विशेषज्ञों और फैशन रिपोर्टों ने भी इस परिधान को राजस्थान की पारंपरिक बंधनी कला तथा प्रधानमंत्री की वर्षों पुरानी स्वतंत्रता दिवस साफा परंपरा से जोड़कर देखा है।

लाल किले पर स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान प्रधानमंत्री ने निर्धारित औपचारिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और राष्ट्रध्वज फहराने के बाद देश को संबोधित किया। इस वर्ष के समारोह में युवाओं की भागीदारी और राष्ट्रीय एकता पर विशेष जोर दिए जाने की जानकारी भी सामने आई। रिपोर्टों के अनुसार इस बार समारोह की शुरुआत में ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गान से पहले प्रस्तुत किए जाने की व्यवस्था भी की गई थी।

पीएम मोदी का हर वर्ष अलग अंदाज वाला साफा स्वतंत्रता दिवस की तस्वीरों और वीडियो का एक खास हिस्सा बन जाता है। रंग और डिजाइन में बदलाव के बावजूद इन साफों में भारतीय परंपरा, क्षेत्रीय हस्तकला और राष्ट्रीय अवसर के अनुरूप प्रतीकात्मकता दिखाई देती है। 2026 में लाल बंधनी साफे के साथ तिरंगे रंगों का स्पर्श उनके पहनावे को स्वतंत्रता दिवस की भावना से जोड़ता नजर आया। लाल किले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, हाथ में तिरंगा और पारंपरिक भारतीय परिधान के साथ प्रधानमंत्री का यह लुक इस वर्ष के स्वतंत्रता दिवस समारोह की प्रमुख तस्वीरों में शामिल रहा।
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अलवर में छात्रों के प्रदर्शन के बीच CJP नेता और SHO आमने-सामने, शिक्षा व्यवस्था को लेकर गरमाया मामलाराजस्थान के अलवर जिल...
15/08/2026

अलवर में छात्रों के प्रदर्शन के बीच CJP नेता और SHO आमने-सामने, शिक्षा व्यवस्था को लेकर गरमाया मामला

राजस्थान के अलवर जिले के जोधवास गांव में शुक्रवार को सरकारी स्कूल की बदहाल स्थिति को लेकर चल रहे छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान माहौल उस समय तनावपूर्ण हो गया, जब Cockroach Janta Party (CJP) के सह-संयोजक आशुतोष रांका और थानागाजी थाना प्रभारी महावीर सिंह के बीच तीखी बहस हो गई। बताया जा रहा है कि रांका गांव के सरकारी वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के छात्रों की मांगों के समर्थन में मौके पर पहुंचे थे। छात्रों का विरोध स्कूल भवन की जर्जर स्थिति को लेकर था। प्रदर्शन के पीछे तत्काल कारण बुधवार को पुराने और जर्जर भवन की छत का एक स्लैब गिरना बताया गया है। राहत की बात यह रही कि घटना के समय किसी छात्र के घायल होने की सूचना नहीं मिली, लेकिन इस घटना ने स्कूल भवन की सुरक्षा को लेकर पहले से मौजूद चिंताओं को और गंभीर बना दिया। छात्रों की मांग थी कि खतरनाक पुराने भवन को हटाया जाए, स्कूल के लिए नया भवन तैयार कराया जाए, शिक्षकों की कमी दूर की जाए और मौजूदा कक्षाओं की मरम्मत कराई जाए। इसी दौरान पुलिस अधिकारी और रांका के बीच बातचीत ने विवाद का रूप ले लिया। रांका ने पुलिस अधिकारी को कथित तौर पर राजनीति नहीं करने की चेतावनी देते हुए दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP के पूर्व आंदोलन और तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का हवाला दिया। बातचीत के दौरान स्थिति इतनी गर्म हो गई कि दोनों पक्षों के बीच धक्का-मुक्की जैसी स्थिति भी सामने आई और एक युवक की शर्ट फटने की बात सामने आई। रांका ने इस मामले में जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कार्रवाई की मांग भी उठाई। उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों की मांगों को जल्द स्वीकार करने पर जोर देते हुए कहा कि बच्चों की सुरक्षा के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए। विरोध के दौरान रांका ने राजस्थान में जर्जर स्कूल भवनों की समस्या को बड़ा मुद्दा बताते हुए चेतावनी दी कि यदि ऐसे भवनों की मरम्मत या पुनर्निर्माण नहीं कराया गया तो CJP राज्य में बड़े स्तर पर आंदोलन शुरू कर सकती है। उनके अनुसार प्रदेश में हजारों कक्षाओं की स्थिति खराब है और इसका सीधा असर लाखों विद्यार्थियों की पढ़ाई तथा सुरक्षा पर पड़ सकता है। उन्होंने सरकार से स्कूलों के बुनियादी ढांचे के लिए आवश्यक धन की व्यवस्था करने की मांग की और जरूरत पड़ने पर केंद्र से भी वित्तीय सहायता लेने की बात कही। बाद में प्रशासन और छात्रों के बीच बातचीत हुई, जिसके बाद प्रदर्शन समाप्त करने पर सहमति बनी। अधिकारियों की ओर से जर्जर भवन को हटाने, नए स्कूल भवन के निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने, शिक्षकों की कमी दूर करने, क्षतिग्रस्त रास्ते के पुल की मरम्मत, मौजूदा कक्षाओं को ठीक कराने और खेल मैदान की व्यवस्था जैसी मांगों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया गया। शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने भी शिक्षक पदों की कमी को दूर करने के लिए आवश्यक प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कही। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर राजस्थान के सरकारी स्कूलों में भवनों की सुरक्षा, शिक्षकों की उपलब्धता और बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं, रांका और पुलिस अधिकारी के बीच हुई तीखी नोकझोंक ने इस छात्र आंदोलन को स्थानीय शिक्षा समस्या से आगे राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का मुद्दा भी बना दिया है।

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जंतर-मंतर पर AI की नजर: कैमरों से चेहरों की पहचान तक, प्रदर्शनकारियों की निगरानी पर उठे बड़े सवालनई दिल्ली के जंतर-मंतर ...
15/08/2026

जंतर-मंतर पर AI की नजर: कैमरों से चेहरों की पहचान तक, प्रदर्शनकारियों की निगरानी पर उठे बड़े सवाल

नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस निगरानी के लिए इस्तेमाल की गई अत्याधुनिक तकनीक ने सुरक्षा और निजता के बीच संतुलन को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्टों के मुताबिक, प्रदर्शन स्थल के आसपास दिल्ली पुलिस ने ऐसे निगरानी तंत्र का इस्तेमाल किया जिसमें लाइव CCTV फीड, 360-डिग्री कैमरों से लैस मोबाइल सर्विलांस वाहन और AI आधारित Facial Recognition Technology शामिल थी। इनमें विशेष रूप से ‘इक्षणा’ नाम की मोबाइल सर्विलांस वैन चर्चा में रही, जिसे दिल्ली पुलिस ने 2023 के G20 शिखर सम्मेलन से पहले अपनी निगरानी व्यवस्था का हिस्सा बनाया था। इस वाहन में कई कैमरे लगे हैं और इसके जरिए आसपास के कैमरों से मिलने वाली वीडियो फुटेज को मॉनिटर किया जा सकता है। रिपोर्टों के अनुसार, जंतर-मंतर पर मौजूद लोगों के चेहरों को AI सिस्टम द्वारा चिन्हित कर पुलिस के उपलब्ध डेटाबेस से संभावित मिलान किया जा रहा था। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इस तकनीक का उद्देश्य हर प्रदर्शनकारी की पहचान करना नहीं, बल्कि भीड़ में मौजूद ऐसे लोगों को पहचानना है जिनका आपराधिक रिकॉर्ड हो सकता है या जो कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन स्थल पर आपराधिक तत्वों की संभावित मौजूदगी को देखते हुए यह व्यवस्था सुरक्षा के लिहाज से अपनाई गई थी और इसे सामान्य शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए नहीं बताया गया। वहीं, इस तकनीक के इस्तेमाल ने प्रदर्शनकारियों, डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों के बीच गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सवाल यह है कि किसी सार्वजनिक प्रदर्शन में शामिल होने वाले व्यक्ति के चेहरे की बायोमेट्रिक जानकारी किस सीमा तक रिकॉर्ड या विश्लेषित की जा सकती है, उस जानकारी तक किसकी पहुंच है, उसका इस्तेमाल कितने समय तक किया जा सकता है और किसी व्यक्ति के गलत तरीके से पहचान लिए जाने की स्थिति में उसके पास क्या प्रभावी कानूनी उपाय मौजूद हैं। रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि भारत में पुलिस द्वारा Facial Recognition Technology के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाला कोई अलग और व्यापक कानून फिलहाल मौजूद नहीं है, जिसके कारण निगरानी की सीमा, डेटा के रखरखाव, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस और तेज हो गई है। डिजिटल अधिकार संगठन Internet Freedom Foundation ने भी जंतर-मंतर पर लाइव Facial Recognition के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाते हुए डेटा रिटेंशन और स्पष्ट नियमों की मांग की है। दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस की दलील है कि आधुनिक तकनीक अपराध की पहचान, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संदिग्ध व्यक्तियों को पकड़ने में पुलिस की क्षमता बढ़ा सकती है। इसी विवाद के बीच दिल्ली हाई कोर्ट में भी इस तरह की निगरानी को चुनौती देने वाली याचिका सामने आई है, जिसमें निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न उठाए गए हैं। मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि Facial Recognition Technology केवल किसी चेहरे को कैमरे में रिकॉर्ड करने तक सीमित नहीं रहती; सिस्टम चेहरे की विशेषताओं का डिजिटल पैटर्न तैयार करके उसे उपलब्ध तस्वीरों या डेटाबेस से मिलाने की कोशिश कर सकता है। ऐसे में तकनीक की सटीकता, गलत पहचान की संभावना और उस पहचान के आधार पर आगे होने वाली पुलिस कार्रवाई बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। दिल्ली पुलिस से संबंधित पुराने RTI जवाबों में Facial Recognition System के लिए 80 प्रतिशत समानता के स्तर को ‘पॉजिटिव’ मैच माने जाने की जानकारी भी सामने आ चुकी है, जिससे तकनीकी त्रुटि और गलत पहचान को लेकर अतिरिक्त चिंता पैदा होती है। जंतर-मंतर की घटना ने इसलिए एक व्यापक सवाल खड़ा कर दिया है—क्या सार्वजनिक स्थान पर सुरक्षा के नाम पर अत्याधुनिक निगरानी को किसी स्पष्ट कानूनी सीमा, पारदर्शी प्रक्रिया और स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था के अधीन होना चाहिए? पुलिस के लिए ऐसी तकनीक अपराधियों की पहचान का प्रभावी माध्यम हो सकती है, लेकिन नागरिक अधिकारों के नजरिए से यह भी जरूरी है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल सामान्य नागरिकों की निजता और लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित रहें। यही वजह है कि जंतर-मंतर पर AI निगरानी का विवाद केवल एक प्रदर्शन या एक पुलिस वैन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत में आने वाले समय की डिजिटल पुलिसिंग और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संबंध का महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है। आखिर जब किसी सार्वजनिक जगह पर मौजूद हर चेहरा तकनीक की नजर में आ सकता है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है—सुरक्षा के लिए निगरानी की सीमा आखिर कहां खत्म होती है और नागरिकों की निजता की सीमा कहां से शुरू होती है? और जब AI सबको देख रहा हो, तो AI और उसे संचालित करने वाली व्यवस्था पर नजर कौन रखेगा?
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काला सागर में युद्ध रोकने की कोशिश तेज, यूक्रेन ने रूस के सामने रखा नागरिक ठिकानों पर हमले रोकने का प्रस्तावरूस और यूक्र...
15/08/2026

काला सागर में युद्ध रोकने की कोशिश तेज, यूक्रेन ने रूस के सामने रखा नागरिक ठिकानों पर हमले रोकने का प्रस्ताव

रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध अब काला सागर के समुद्री रास्तों और व्यापारिक जहाजों तक पहुंच चुका है, जिसके कारण वैश्विक खाद्य आपूर्ति और अनाज कारोबार को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। ताजा घटनाक्रम में Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन ने कथित तौर पर एक तीसरे पक्ष के माध्यम से रूस के सामने काला सागर में नागरिक लक्ष्यों पर हमले रोकने का आपसी प्रस्ताव रखा है और अब वह मॉस्को की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा है। यह पहल ऐसे समय सामने आई है जब पिछले कुछ सप्ताह में जहाजों, बंदरगाहों और समुद्री बुनियादी ढांचे पर हमलों में तेजी आई है। यूक्रेन के लिए काला सागर उसके कृषि उत्पादों और अनाज के निर्यात का बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है, जबकि रूस के Novorossiysk जैसे बंदरगाह भी क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। हाल के हमलों ने दोनों देशों की समुद्री गतिविधियों को प्रभावित किया है और वैश्विक बाजार में खाद्य आपूर्ति को लेकर नई आशंकाएं पैदा की हैं। Reuters के अनुसार, अगस्त में यूक्रेन के अनाज निर्यात में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जबकि वैकल्पिक मार्गों के रूप में रेल और डेन्यूब नदी के रास्ते उपलब्ध होने के बावजूद उनकी क्षमता सीमित मानी जा रही है। इसी बीच तुर्किये ने भी दोनों पक्षों से काला सागर में वाणिज्यिक और नागरिक जहाजों के खिलाफ हमलों पर रोक लगाने के लिए एक moratorium यानी अस्थायी रोक की व्यवस्था बनाने की अपील की है। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने चेतावनी दी है कि संघर्ष का दायरा पूरे काला सागर क्षेत्र तक फैलता जा रहा है और नागरिक तथा वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो रहा है। इससे पहले एक तुर्किये से जुड़े जहाज पर ड्रोन हमले के बाद Ankara ने भी समुद्री सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई थी। हालांकि यूक्रेन की ओर से बातचीत या सीमित समुद्री युद्धविराम की कोशिश के संकेत मिलने के बावजूद रूस का रुख फिलहाल बेहद सख्त नजर आ रहा है। 14 अगस्त को रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने Black Sea ceasefire के विचार को खारिज करते हुए कहा कि मॉस्को को किसी औपचारिक प्रस्ताव की जानकारी नहीं मिली है और रूस ऐसे किसी कदम को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है जिसे वह केवल एकतरफा राहत देने वाला उपाय मानता हो। रूस ने यूक्रेन पर नागरिक समुद्री यातायात को बाधित करने के लिए जानबूझकर हमले करने का आरोप भी लगाया है, जबकि यूक्रेन रूस के हमलों और अपने बंदरगाहों पर जारी सैन्य दबाव को संघर्ष की बड़ी वजह बताता है। ऐसे में फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों देशों के बीच काला सागर में सीमित युद्धविराम या नागरिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर कोई व्यावहारिक समझौता हो पाएगा या नहीं। लेकिन यूक्रेन की ओर से प्रस्ताव और तुर्किये की मध्यस्थता की कोशिश इस बात का संकेत है कि समुद्री संघर्ष को नियंत्रित करने की जरूरत अब केवल रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, अनाज निर्यात, खाद्य कीमतों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ रहा है। 2022 में संयुक्त राष्ट्र और तुर्किये की मध्यस्थता से Black Sea Grain Initiative के जरिए यूक्रेनी अनाज निर्यात को समुद्री रास्ता मिला था, लेकिन रूस ने 2023 में उस समझौते से हटने का फैसला किया था। अब बढ़ते हमलों के बीच एक बार फिर काला सागर को सुरक्षित व्यापारिक गलियारा बनाने की कोशिश सामने आई है, मगर रूस की मौजूदा असहमति के कारण किसी तत्काल समझौते की संभावना फिलहाल अनिश्चित बनी हुई है।

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🇮🇳 अटारी-वाघा बॉर्डर पर गूंजा देशभक्ति का जोश, 80वें स्वतंत्रता दिवस से पहले BSF का शानदार प्रदर्शनअमृतसर के अटारी-वाघा ...
15/08/2026

🇮🇳 अटारी-वाघा बॉर्डर पर गूंजा देशभक्ति का जोश, 80वें स्वतंत्रता दिवस से पहले BSF का शानदार प्रदर्शन

अमृतसर के अटारी-वाघा बॉर्डर पर भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर देशभक्ति, अनुशासन और सैन्य परंपरा का अद्भुत नजारा देखने को मिला। 14 अगस्त को सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवानों ने प्रतिष्ठित बीटिंग रिट्रीट समारोह के दौरान अपने शानदार कदमताल, ऊर्जावान परेड और सटीक सैन्य ड्रिल से वहां मौजूद लोगों में जोश भर दिया। समारोह से पहले पूरे अटारी सीमा क्षेत्र को तिरंगे की रोशनी और देशभक्ति के माहौल से सजाया गया, जिससे सीमा पर पूरा वातावरण राष्ट्रभक्ति के रंग में रंगा नजर आया। इस अवसर पर BSF जवानों की बेहतरीन तालमेल और अनुशासित प्रस्तुति समारोह का प्रमुख आकर्षण रही। अटारी-वाघा की यह बीटिंग रिट्रीट परंपरा भारत-पाकिस्तान सीमा पर होने वाले सबसे चर्चित सैन्य आयोजनों में शामिल है, जिसमें दोनों देशों के सुरक्षा बल अपनी विशिष्ट परेड और औपचारिक ड्रिल का प्रदर्शन करते हैं। यह समारोह हर शाम सूर्यास्त के आसपास होने वाली ध्वज अवतरण की परंपरा से जुड़ा है और वर्षों से लोगों के लिए सैन्य अनुशासन, राष्ट्रीय गौरव और सीमा सुरक्षा का प्रतीक बना हुआ है। इस बार स्वतंत्रता दिवस की 80वीं वर्षगांठ से ठीक पहले हुए आयोजन ने समारोह को और खास बना दिया। अटारी बॉर्डर पर उमड़ा देशभक्ति का उत्साह यह संदेश देता नजर आया कि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले जवानों के प्रति भारतवासियों के मन में सम्मान और गर्व हमेशा सर्वोपरि रहेगा। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देशभर में जहां तिरंगा फहराने और आजादी के अमर नायकों को याद करने की तैयारियां चल रही हैं, वहीं अटारी सीमा पर BSF के जवानों की शानदार प्रस्तुति ने पूरे माहौल को देशभक्ति से भर दिया। 🇮🇳 जय हिंद!

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पंजाब में 454 फार्मेसी ऑफिसर पदों की भर्ती परीक्षा को लेकर राजनीतिक विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। पंजाब एवं हरियाणा हाईक...
15/08/2026

पंजाब में 454 फार्मेसी ऑफिसर पदों की भर्ती परीक्षा को लेकर राजनीतिक विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया को लेकर दायर याचिका पर हस्तक्षेप करते हुए आगे की चयन प्रक्रिया को अदालत के फैसले के अधीन कर दिया है। यह मामला 19 जुलाई 2026 को आयोजित परीक्षा से जुड़ा है, जिसमें करीब 7,000 अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था। परीक्षा के दौरान कथित हाई-टेक नकल गिरोह का मामला सामने आया और पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया था। जांच के दौरान वायरलेस उपकरण, पेन कैमरा और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साधन बरामद किए जाने की बात सामने आई। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कथित संगठित नकल के कारण पूरी परीक्षा की निष्पक्षता प्रभावित हुई और परीक्षा रद्द कर दोबारा कराने की मांग की।

अदालत की कार्रवाई के बाद भारतीय जनता पार्टी ने आम आदमी पार्टी सरकार पर राजनीतिक हमला तेज कर दिया। BJP नेताओं ने सवाल उठाया कि जिस पार्टी ने पारदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था के नाम पर राजनीति की, उसके शासन में सरकारी भर्ती परीक्षा को लेकर इस तरह के आरोप क्यों सामने आ रहे हैं। BJP के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ ने मामले में CBI जांच की मांग करते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल पर भी सवाल खड़े किए। BJP की ओर से यह आरोप लगाया गया कि पंजाब में भर्ती और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवाद युवाओं के भविष्य तथा सरकारी नौकरियों की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।

BJP ने खास तौर पर अरविंद केजरीवाल की भूमिका और उनके बयानों को लेकर निशाना साधा। पार्टी नेताओं ने पूछा कि जब AAP नेता दूसरे राज्यों और केंद्र सरकार से जुड़े परीक्षा विवादों पर सवाल उठाते हैं, तो पंजाब में फार्मेसी ऑफिसर भर्ती परीक्षा को लेकर सामने आए आरोपों पर उनका रुख क्या है। BJP नेता अमित मालवीय ने भी केजरीवाल और AAP की कथित चुप्पी पर सवाल उठाते हुए इसे “selective activism” बताया। इसी क्रम में BJP नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने भी पंजाब के परीक्षा विवाद को लेकर AAP नेतृत्व पर निशाना साधा।

हालांकि AAP और पंजाब सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा है कि AAP सरकार के कार्यकाल में किसी प्रतियोगी परीक्षा का पेपर लीक नहीं हुआ। AAP नेतृत्व ने फार्मेसी ऑफिसर परीक्षा में सामने आए मामले को पेपर लीक के बजाय कथित नकल का मामला बताया है और कहा है कि संदिग्ध लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई। अरविंद केजरीवाल ने भी BJP पर पंजाब सरकार को बदनाम करने के लिए झूठ फैलाने का आरोप लगाया और दावा किया कि दिल्ली तथा पंजाब में AAP के शासन के दौरान पेपर लीक की कोई घटना नहीं हुई। पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने भी विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक प्रचार बताया।

इस पूरे विवाद में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने भर्ती प्रक्रिया पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। हाईकोर्ट में मामला अभी विचाराधीन है और आगे की चयन प्रक्रिया याचिका के परिणाम पर निर्भर करेगी। इसलिए इसे अदालत द्वारा भर्ती में गड़बड़ी साबित किए जाने के रूप में देखना सही नहीं होगा। फिलहाल आरोप, पुलिस की कार्रवाई, अभ्यर्थियों की याचिका और राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच पंजाब की फार्मेसी ऑफिसर भर्ती प्रक्रिया पर निगाहें अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

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