06/06/2026
यौन तस्करी पर लिखी गई रचनाएँ अधिकांश केवल पीड़ा का दस्तावेज़ बनकर रह जाती हैं, लेकिन कुछ कथाएँ ऐसी होती हैं जो अँधेरे के बीच प्रतिरोध की एक चमक भी खोज लेती हैं। रुचिरा गुप्ता का उपन्यास ‘मैं लड़ी और उड़ी’ ऐसी ही एक कहानी है। बिहार के सीमावर्ती इलाके के लालटेन बाज़ार से शुरू होकर यह कथा उन लड़कियों की दुनिया में प्रवेश करती है, जिनकी ज़िंदगी पर जन्म लेते ही बाज़ार की नज़र पड़ जाती है। गरीबी, जातिगत हाशियाकरण, देह-व्यापार, मानव तस्करी और पितृसत्तात्मक हिंसा के बीच चौदह वर्षीय हीरा का संघर्ष केवल एक मासूम स्त्री की कहानी नहीं रह जाता, बल्कि वह उस व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिरोध का रूप ले लेता है, जो स्त्री के भविष्य को पहले से तय कर देना चाहती है। यह उपन्यास यह सबक देता है कि शिक्षा, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास किस तरह नियति के सबसे कठोर घेरे को भी तोड़ सकते हैं।
लेख का लिंक कमेंट बॉक्स में