05/12/2015
बच्चों की दीर्घायु और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला महापर्व है.. "छठ-पूजा "
संजय कुमार गिरि ,नई दिल्ली ,भारत विभिन्न जाति धर्मों के व्यक्तियों का निवास स्थान होने के कारण यहाँ अनेको त्यौहार भी मनाएं जाते हैं भारत में ऐसे कई पर्व हैं जो बेहद कठिन माने जाते हैं और इन्हीं पर्वों में से एक पर्व है छठ पूजा ,पूर्वांचल, बिहार ,रांची ,.झारखंड एवं देश विदेश के उन तमाम प्रदेशों में रहने वालें प्रवासियों का महापर्व "छठ-पूजा "बड़ी आस्था व् धूमधाम से मनाया जाने वाला त्यौहार है | कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के छठे दिन को मनाया जाने वाला यह व्रत लोक आस्था का पर्व सूर्य देवता को स्मरण कर मनाया जाता है !
छठ को सिर्फ पर्व ही नहीं बल्कि इसे हम महापर्व भी कह सकते हैं ,सांस्कृतिक परम्परा के अनुसार चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में व्रती को लगभग तीन दिन का व्रत रखना होता है| जिसमें से दो दिन तो व्यक्ति को निर्जली व्रत रखा जाता है. आइए जानें छठ के बारे में कुछ विशेष बातें--
ये व्रत भैया दूज के तीसरे दिन यानी शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से आरम्भ हो जाता है ,
पहला दिन .--व्रत के पहले दिन नहखा कहा जाता है जिसका अर्थ होता है स्नान के बाद का खाना ,इस दिन गंगा जी में स्नान करने के उपरान्त गंगा जल को घर में लाकर घर को पवित्र किया जाता है और फिर शाम के समय सीता फल की सब्जी बनाकर खाई जाती है और फिर शुद्ध भोजन किया जाता है |
दुसरे दिन ---छठ व्रत के दुसरे दिन को खरना कहा जाता है ,इस दिन भी घर के पुरुष और महिलाएं पुरे दिन उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं इस दिन का मुख्य भोजन मीठी खीर और केले की सब्जी होती है |
तीसरा दिन --तीसरा दिन ही मुख्य दिन होता है इस दिन सायंकाल के समय व्रती महिलायं एवं पुरुष अपने सर पर पूजा की सामाग्री केले ,गन्ना,धूप दीपक अगरबती, फूल ,फल सहित एक टोकरी को लेकर छठ मैया के गीत गाते हुई नदियों के घाट पर जाते हैं और वहां पर डूबते सूरज को बहते पानी में अर्घ देते हैं, वहां पर पंडितों द्वारा संकल्प और मंत्रोच्चार के बाद अँधेरा होने के उपरान्त घर को लौट आते हैं |
व्रत का चौथा दिन ---.इस दिन को "परना" अथार्थ "विहान अर्घ "कहा जाता है |इस दिन प्रात:काल उठ कर पुन :व्रती महिलाएं और पुरुष छठी मैया के गीत गाते हुए नदी के किनारे तट पर एकत्रित होते हैं और इस समय उगते हुए सूरज को बहते पानी में अर्घ देते हैं ,
छठ का महत्व----
मार्कण्डेय पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने आप को छह भागों में विभाजित किया है और इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृ देवी के रूप में जाना जाता है, जो ब्रह्मा की मानस पुत्री और बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इन्हीं देवी की पूजा की जाती है. शिशु के जन्म के छह दिनों के बाद भी इन्हीं देवी की पूजा करके बच्चे के स्वस्थ, सफल और दीर्घ आयु की प्रार्थना की जाती है. पुराणों में इन्हीं देवी का नाम कात्यायनी मिलता है, जिनकी नवरात्र की षष्ठी तिथि को पूजा की जाती है.
रामायण काल में माँ सीता जी ने गंगा नदी तट के किनारे छठ मैया की पूजा आराधना की थी ,और महाभारत काल में भी महारानी कुंती ने भी सरस्वती नदी के तट पर सूर्य देव की पूजा अर्चना की थी इसी परिणाम स्वरुप उन्हें महाबली पांडव जैसे विख्यात पुत्रो की प्राप्ति हुई थी |इसके उपरान्त एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुआ में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत किया. इससे उसकी मनोकामनाएं पूरी हुई तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया. द्रोपदी ने भी हस्तिना पुर से निकलकर गढ़ गंगा में छठ पूजा की थी |
इसके अलावा छठ महापर्व का उल्लेख रामायण काल में भी मिलता. आज छठ ना सिर्फ बिहार और यूपी बल्कि संपूर्ण भारत में समान हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.
संजय कुमार गिरि (लेख पुराणो के अनुसार )