TAK TIMES

TAK TIMES जो सच है वही बताएंगे बात का बतंगड़ नही?

लेबर निगरानी ब्यूरो 1 से 15 मार्च संस्करण....।।
02/03/2016

लेबर निगरानी ब्यूरो 1 से 15 मार्च संस्करण....।।

16 फरवरी से 29 फरवरी तक ....
17/02/2016

16 फरवरी से 29 फरवरी तक ....

1 फरवरी से 15 फरवरी तक लेबर निगरानी ब्यूरो।।LNB )
01/02/2016

1 फरवरी से 15 फरवरी तक लेबर निगरानी ब्यूरो।।
LNB )

लेबर निगरानी ब्यूरो समाचार पत्र जनवरी 16-से 31..... एडिशन
20/01/2016

लेबर निगरानी ब्यूरो समाचार पत्र जनवरी 16-से 31..... एडिशन

लेबर निगरानी ब्यूरो। १ जनवरी संस्करण.........
31/12/2015

लेबर निगरानी ब्यूरो। १ जनवरी संस्करण.........

16 to 31 Edition .....
16/12/2015

16 to 31 Edition .....

05/12/2015

तबाही बनाम जिंदगी
तकरीबन २० दिन हो गये हैं तमिलनाडु में बारिश का कहर अभी जारी है, य यूं कहे की ईश्वर का कहर जारी है। तमिलनाडु में अब हालात नाजुक हो चुके हैं, जिंदगी और मौत के बीच लोग जंग लड़ रहे हैं। यह काफी दुखद है कि, अब तक तकरीब ३३० लोग इस जंग में हार चुके हैं और कई ऐसे भी बदनसीब हैं, जिनकी लाश का पता भी नहीं है। जरा महसूस कीजिए इनका दर्द तो आपके सामने वह सारा मंजर खुल जाएगा जो मेरे जहन मे है। एक बार आप उनकी जगह खुद को रख कर देखिये और फिर उनके दर्द को महसूस करने की कोशिस कीजिए। सोचिये एक बच्चा पानी में डूब रहा है, एक जानवर जिंदगी बचाने की जद्दोजहद में इधर-उधर कपकपाती हुई नजरों से सारा मंजर देख रहा है, उसे लग रहा है कि अब उसकी जान नहीं बचेगी। पर यह तो बस आपकी सोच है ऐसा ही मंजर तमिलनाडु राज्य में है। एक परिवार अपनी जान बचाने के लिए लोगों से चिल्ला-चिल्ला कर गुहार लगाकर, गिड़गिडाकर लोगों से मद्दद की आस रख रहा है। और लोग खुद को बचाने की जद्दोजहद में परेशान हैं, हालात यह है कि, कोई चाहते हुए भी किसी कि मदद नहीं कर सकता। यह नजारा जो आप देख रहे हैं यह पहली बार नहीं है। गौर करें तो ऐसा मंजर… २०११ उडीसा में, २०१२ असम में, जून २०१३ उत्तराखण्ड जिसमें ५००० हजार से भी अधिक लोगों ने अपनी जान गवाईं थी। इसके बाद सितंबर २०१४ कश्मीर जिसमें ४५० गांव बारिश की कहर में डूब गये थे। अगर आप गौर करें तो साल-साल भर में ईश्वर अपना कहर लगातार बरपा रहा है।आखिर कब तक ईश्वर का यह सिलसिला चलता रहेगा। क्या इसके लिए इंसान तो जिम्मेदार नही? इसपर सोचना होगा। तमिलनाडु अब पूरी तरह से तबाही के मंजर से घिरा हुआ है। यह बहुत दुखद है कि, बड़ी संख्या में अभी कई इलाके पानी में डूबे हुए हैं। चेन्नई, कुड्डालोर, कांचीपुरम और तिरुवल्लूर जिले बुरी तरह पानी की चपेट मे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसपर बहुत शोक जताया है। प्रधानमंत्री ने चेन्नई, कांचीपुरम और तिरुवल्लुवर जिलों के हवाई सर्वेक्षण के बाद बाढ़ के खराब हालात को देखते हुए १००० करोड़ रुपए के राहत पैकेज का ऐलान किया है। इससे पहले भी केंद्र सरकार ने ९४० करोड़ रूपये की राहत पैकज का ऐलान किया था। यह सहायता केंद्र की ओर से पहले दिए गए 940 करोड़ रुपए के अलावा है। केंद्र सरकार जिस तरह तामिलनाडु के साथ खड़ी है, यह वाकई सराहनीय है। जरूरत भी इसी तरह के पहल की है। सरकार को लगातार तमिलनाडु के साथ खड़ा रहना होगा। ईश्वर तो लगातार साल-साल भर पर इसी तरह का कहर ढा रहा है। अगर कहें की जिदंगी बनाम तबाही हो रही है तो गलत नहीं होगा। कई सवाल और भी हैं, जिनके जवाब हमें खुद ढूढ़ने होंगे कि, आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। फिलहाल तो हमें तमिलनाडु राज्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और वहां फंसे लोगों की जितनी सहायता की जा सके करनी चाहिए।

05/12/2015

सुलगती राह में ठंडी हवाएँ साथ रहती हैं
सफ़र कैसा हो अपनों की दुआएं साथ रहती हैं
कोई पूछे जो हमसे दोस्ती के मायने क्या हैं
दरख़्तों की हिफ़ाज़त में लताएँ साथ रहती हैं
हवन की आग मेरी उंगलियों को छू नहीं पाती
लबों पर मंत्र वेदों की ऋचाएं साथ रहती हैं
अगर बेदर्द बनकर मैं निकल भी जाऊं चुपके से
सिसकती राह में गीली निगाहें साथ रहती हैं
कि होठों पे खिली मुस्कान का ये राज़ बतलाऊं
मेरे महबूब की बांकी अदाएँ साथ रहती हैं ..''ASHOK VERMA ...

05/12/2015

भारत, भिखारी और भविष्य

नुमाईश में खड़े उस बचपन पर लगभग हर रोज निगहबानी करता रहता हूं. सेल्फियों के जरिए लोगों द्वारा उनकी मासूमियत के संग चिपकी गरीबी को कैद होते हुए देखता हूं. नन्हे-नन्हे हाथ, जुबान पर कुछ निवालों की ख्वाहिश लिए भारत का विकास माने जाने वाले तमाम बच्चे आज अपने विकास की दरकार में दर-दर कहें या घर-घर भटकते हैं. दरअसल भारत का एक हिस्सा आधुनिकता को जान रहा है, पहचान रहा है और हां उसके साथ खुद को सेट करने की कोशिश भी कर रहा है. लेकिन उनका क्या जो आज भी लोगों में समृद्ध की हल्की सी निशानी देखकर हाथ पसार देते हैं. भारत भले ही उम्र के हिसाब से विकास की ओर बढ़ रहा हो. पर आज भी महज पांच,छह और सात साल के बच्चे भीख मांगते दिखते हैं. इन्हें देखकर जहन में सवाल ये खड़ा होता है कि विकास के सवाल में इन्हें क्यों नहीं शामिल किया जाता है. इन्हें उचित सुविधाएं मुहैया कराते हुए एक मॉडल बनाने की दिशा में प्रयास क्यों नहीं होता. कोई सुपर 30 इनके लिए काम क्यों नहीं करती. अजी इन्हें भी इंजीनियर बनाईये क्योंकि देश का ढ़ांचा इनके बगैर काफी कमजोर समझ आ रहा है. बगैर इन भविष्यों पर चिंतन के न ही डिजिटल ही पूरा होगा और न ही इंडिया ही सकारात्मक तौर पर परिभाषित किया जा सकेगा.

भारत में भीख मांगना अपराध की श्रेणी में रखा गया है. फिर देश की सड़कों पर लोगों के सामने इतने सारे हाथ कैसे उम्मीद की ख्वाहिश करते हैं. बहरहाल ये सारी बातें, लेख, बहस कई बार आयोजित की गईं. मंच सजे पर राजनीतिक जुबानों पर इनका जिक्र नहीं था. क्योंकि उन्होंने राजनीति का मतलब महज धर्म का बटवारा, जाति में मतभेद बनाए रखा है. लेकिन मुद्दा लाख टके का है. कभी भी उछालिए. उछलेगा भी और बिकेगा भी. लोग अफसोस भी जताएंगे. कुछ दिन के लिए नजर और नजरिया भी बदलेगा. चाट के ठेलों, समोसे की दुकानों से स्पेशली एक आध चीजें लेकर दान का दिखावा भी करेंगे. लेकिन क्या इस प्रयास से वे सुखी हो जाएंगे. क्या एक दिन जुबान में आपके द्वारा पैदा किया चट्खारा उन्हे धन्य कर जाएगा. शायद क्या बिलकुल भी नहीं.

गरीबी एक धंधा भी बन चुका है. इसमें बाकायदा कई दलाल शामिल हैं. जो अपहरण करते हैं और बच्चों को भीख मांगने की जगह बताते हैं. इसके इतर एक समूह ऐसा है जो मजबूरी, भुखमरी या इन दोनों का योग कर उसे गरीबी कहें के कारण भी हाथ पसारते हैं. अब करते हैं आंकड़ों की बात तो हर साल करीबन 44 हजार बच्चों के गायब होने की सूचना पुलिस के पास दर्ज होती है. जिसमें से एक चौथाई कभी नहीं मिलते हैं.

भारत में ज्यादातर बाल भिखारी अपनी मर्जी से भीख नहीं मांगते. वे संगठित माफिया के चंगुल में फंसकर भीख मांगने का काम करते हैं. वैसे तो पूरा भारत इस गिरफ्त में है लेकिन तमिलनाडु, केरल, बिहार, नई दिल्ली और ओडिशा में ये एक बड़ी समस्या बना हुआ है. लगभग हर बैकग्राउंड से ताल्लुक रखने वालों के साथ ऐसा ही होता है. इनके पास किताबों की बजाए कटोरा आ जाता है. पर इसका कारण क्या है शायद ही इस बात को सरकार ने गंभीरता से लिया हो.

तमाम दावों के साथ काम करने के वादे भी हुए हैं. कई एनजीओ इन बच्चों के लिए कार्यरत् भी हैं लेकिन इन बाल भिखारियों की तादाद काफी ज्यादा है जिसके लिहाज से इंतजाम पर्याप्त नहीं है. कई एनजीओ जो की खुद के खर्च पर ऐसे बच्चों के लिए काम कर रहे हैं उनकी ओर राज्य क्या केंद्र भी निगहबानी करना तो छोड़िये जानना भी उचित नहीं समझती. जरूत है रवैया बदलने की. ताकि भारत असल में मजबूती के साथ खुद को विश्व के सामने पेश कर सके. नहीं तो भारत की पहचान के तौर पर एक स्याह सच बाल भिखारी के तौर पर जुड़ा रहेगा.

हिमांशु तिवारी आत्मीय

05/12/2015

बच्चों की दीर्घायु और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला महापर्व है.. "छठ-पूजा "

संजय कुमार गिरि ,नई दिल्ली ,भारत विभिन्न जाति धर्मों के व्यक्तियों का निवास स्थान होने के कारण यहाँ अनेको त्यौहार भी मनाएं जाते हैं भारत में ऐसे कई पर्व हैं जो बेहद कठिन माने जाते हैं और इन्हीं पर्वों में से एक पर्व है छठ पूजा ,पूर्वांचल, बिहार ,रांची ,.झारखंड एवं देश विदेश के उन तमाम प्रदेशों में रहने वालें प्रवासियों का महापर्व "छठ-पूजा "बड़ी आस्था व् धूमधाम से मनाया जाने वाला त्यौहार है | कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के छठे दिन को मनाया जाने वाला यह व्रत लोक आस्था का पर्व सूर्य देवता को स्मरण कर मनाया जाता है !
छठ को सिर्फ पर्व ही नहीं बल्कि इसे हम महापर्व भी कह सकते हैं ,सांस्कृतिक परम्परा के अनुसार चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में व्रती को लगभग तीन दिन का व्रत रखना होता है| जिसमें से दो दिन तो व्यक्ति को निर्जली व्रत रखा जाता है. आइए जानें छठ के बारे में कुछ विशेष बातें--
ये व्रत भैया दूज के तीसरे दिन यानी शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से आरम्भ हो जाता है ,
पहला दिन .--व्रत के पहले दिन नहखा कहा जाता है जिसका अर्थ होता है स्नान के बाद का खाना ,इस दिन गंगा जी में स्नान करने के उपरान्त गंगा जल को घर में लाकर घर को पवित्र किया जाता है और फिर शाम के समय सीता फल की सब्जी बनाकर खाई जाती है और फिर शुद्ध भोजन किया जाता है |
दुसरे दिन ---छठ व्रत के दुसरे दिन को खरना कहा जाता है ,इस दिन भी घर के पुरुष और महिलाएं पुरे दिन उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं इस दिन का मुख्य भोजन मीठी खीर और केले की सब्जी होती है |
तीसरा दिन --तीसरा दिन ही मुख्य दिन होता है इस दिन सायंकाल के समय व्रती महिलायं एवं पुरुष अपने सर पर पूजा की सामाग्री केले ,गन्ना,धूप दीपक अगरबती, फूल ,फल सहित एक टोकरी को लेकर छठ मैया के गीत गाते हुई नदियों के घाट पर जाते हैं और वहां पर डूबते सूरज को बहते पानी में अर्घ देते हैं, वहां पर पंडितों द्वारा संकल्प और मंत्रोच्चार के बाद अँधेरा होने के उपरान्त घर को लौट आते हैं |
व्रत का चौथा दिन ---.इस दिन को "परना" अथार्थ "विहान अर्घ "कहा जाता है |इस दिन प्रात:काल उठ कर पुन :व्रती महिलाएं और पुरुष छठी मैया के गीत गाते हुए नदी के किनारे तट पर एकत्रित होते हैं और इस समय उगते हुए सूरज को बहते पानी में अर्घ देते हैं ,
छठ का महत्व----
मार्कण्डेय पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने आप को छह भागों में विभाजित किया है और इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृ देवी के रूप में जाना जाता है, जो ब्रह्मा की मानस पुत्री और बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इन्हीं देवी की पूजा की जाती है. शिशु के जन्म के छह दिनों के बाद भी इन्हीं देवी की पूजा करके बच्चे के स्वस्थ, सफल और दीर्घ आयु की प्रार्थना की जाती है. पुराणों में इन्हीं देवी का नाम कात्यायनी मिलता है, जिनकी नवरात्र की षष्ठी तिथि को पूजा की जाती है.
रामायण काल में माँ सीता जी ने गंगा नदी तट के किनारे छठ मैया की पूजा आराधना की थी ,और महाभारत काल में भी महारानी कुंती ने भी सरस्वती नदी के तट पर सूर्य देव की पूजा अर्चना की थी इसी परिणाम स्वरुप उन्हें महाबली पांडव जैसे विख्यात पुत्रो की प्राप्ति हुई थी |इसके उपरान्त एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुआ में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत किया. इससे उसकी मनोकामनाएं पूरी हुई तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया. द्रोपदी ने भी हस्तिना पुर से निकलकर गढ़ गंगा में छठ पूजा की थी |
इसके अलावा छठ महापर्व का उल्लेख रामायण काल में भी मिलता. आज छठ ना सिर्फ बिहार और यूपी बल्कि संपूर्ण भारत में समान हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.
संजय कुमार गिरि (लेख पुराणो के अनुसार )

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