07/09/2026
📰 राष्ट्रीय उजाला | एक पहल, कई दावे… और सवाल सिर्फ श्रेय का नहीं
जिस नदी की गंदगी देखकर एक युवक अकेला उसे साफ करने उतर गया, आज उसी पहल के श्रेय को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।
बिट्टू ‘तबाही’ की नदी सफाई की पहल ने लोगों का ध्यान खींचा। एक युवा ने अपने स्तर पर नदी को साफ करने का बीड़ा उठाया, लोगों को जोड़ा और देखते ही देखते उसकी कोशिश चर्चा का विषय बन गई। यहां तक कि उसकी मेहनत को देखकर विदेश से नौकरी का प्रस्ताव मिलने की खबर भी सामने आई।
लेकिन अब सवाल नदी से निकलकर श्रेय की राजनीति तक पहुंच गया है।
जिस काम की शुरुआत समाज और पर्यावरण के लिए हुई थी, क्या उसका मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि उसका श्रेय किसके नाम जाए?
नदी किसके नाम से साफ हुई, इससे ज्यादा जरूरी है कि नदी साफ हुई या नहीं।
श्रम किसी एक का हो या सहयोग कई हाथों का—हर मदद का सम्मान होना चाहिए। लेकिन किसी की कड़ी मेहनत को केवल प्रचार और श्रेय की होड़ में छोटा कर देना भी उतना ही पीड़ादायक है।
कभी-कभी सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि “श्रेय किसे मिला?”
सवाल यह होता है कि “जिस नदी को हमने गंदा किया, उसे साफ करने के लिए हममें से कितने लोग आगे आए?”
बिट्टू की कहानी हमें आईना दिखाती है—नदियां कूड़े से ही नहीं, हमारी उदासीनता से भी मरती हैं। और जब कोई उन्हें बचाने के लिए आगे आता है, तो उसे श्रेय की लड़ाई में नहीं, सहयोग की कतार में खड़ा किया जाना चाहिए।
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