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यूनिवर्सिटी और कॉलेज का ख़्वाब और एक स्कूल की हक़ीक़तलेखक : नबील अख़्तर नवाज़ीकभी-कभी मुझे ख़याल आता है कि हमारी क़ौम के...
09/08/2026

यूनिवर्सिटी और कॉलेज का ख़्वाब और एक स्कूल की हक़ीक़त

लेखक : नबील अख़्तर नवाज़ी

कभी-कभी मुझे ख़याल आता है कि हमारी क़ौम के पास ख़्वाब देखने की सलाहियत शायद दुनिया की दूसरी क़ौमों से कुछ ज़्यादा है। हम ख़्वाब भी छोटे-मोटे नहीं देखते; सीधे यूनिवर्सिटी से आग़ाज़ करते हैं। अभी ज़मीन का टुकड़ा मिला नहीं, नक़्शा बना नहीं, दो कमरे तामीर नहीं हुए, मगर यूनिवर्सिटी का नाम तय हो गया। एक शानदार नाम, एक ख़ूबसूरत लोगो, एक इफ़्तिताही तक़रीब और फिर क़ौम से अपील!

और अगर किसी साहब ने ज़रा पूछ लिया कि हज़रत! स्कूल कहाँ है?

तो शायद यह सवाल ही गुस्ताख़ी तसव्वुर किया जाए।

किसी ने कहा था कि क़ौमें ख़्वाबों से बनती हैं। मैं इस बात से मुत्तफ़िक़ हूँ, मगर मेरी मामूली-सी गुज़ारिश यह है कि ख़्वाब देखने के बाद आँखें भी खोल लिया करें।

तालीमी इदारा क़ायम करना यक़ीनन बड़ी नेकी और अज़ीम क़ौमी ख़िदमत है। मुसलमानों को मयारी स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटियाँ चाहिएँ, बल्कि शायद हमारी ज़रूरत हमारी मौजूदा रफ़्तार से कहीं ज़्यादा है। लेकिन तालीमी इदारा कोई ऐसी इमारत नहीं, जिसकी बुनियाद रखते ही वह इदारा बन जाए।

इदारा इमारत से नहीं, निज़ाम से बनता है।

और निज़ाम एक दिन में नहीं बनता।

मुझे हमेशा हैरत होती है कि हमारे बाज़ अहबाब तालीमी इदारे क़ायम करने के मामले में मंज़िल से इतने मुतास्सिर होते हैं कि रास्ता भूल जाते हैं। किसी के ज़ेहन में तालीम का ख़याल आया और उसने ऐलान कर दिया:

"इंशाअल्लाह बहुत जल्द एक अज़ीमुश्शान यूनिवर्सिटी क़ायम की जाएगी!"

मैं सोचता हूँ, भाई! पहले एक अज़ीमुश्शान स्कूल तो क़ायम कर लो।

एक ऐसा स्कूल जिसके दरवाज़े पर खड़े होकर तुम्हें ख़ुद अपने काम पर फ़ख़्र महसूस हो।

एक ऐसा स्कूल जहाँ का तालिबे-इल्म सिर्फ़ किताबें न पढ़ता हो, बल्कि सोचना भी सीखता हो।

एक ऐसा स्कूल जहाँ उस्ताद सिर्फ़ हाज़िरी न लगाए, बल्कि नस्लें तैयार करे।

एक ऐसा स्कूल जिसके नताइज देखकर लोग कहें:

"यह स्कूल अगर ऐसा है तो इसके बनाने वालों को आगे बढ़ने से रोकना नहीं चाहिए।"

फिर आगे बढ़ो।

कॉलेज बनाओ।

फिर कॉलेजों का सिलसिला क़ायम करो।

फिर अगर वसाइल, सलाहियत और ज़रूरत इजाज़त दे तो यूनिवर्सिटी भी बनाओ।

मगर ख़ुदा के लिए यूनिवर्सिटी के ख़्वाब को स्कूल की हक़ीक़त से महरूम न करो।

कुछ अरसा पहले झारखंड के एक मारूफ़ इदारे से वाबस्ता एक शख़्सियत ने वहाँ इमाम अहमद रज़ा यूनिवर्सिटी क़ायम करने का ऐलान किया। मैंने अदब से अर्ज़ किया:

"हुज़ूर! पहले एक आध अच्छा स्कूल बना लीजिए, उसे कामयाब करके दिखाइए, फिर यूनिवर्सिटी की तरफ़ क़दम बढ़ाइए।"

बात शायद अच्छी नहीं लगी।

वह हज़रत नाराज़ हो गए।

मैंने उस वक़्त भी सोचा था और आज भी सोचता हूँ कि तालीम के मैदान में नाराज़ होने से ज़्यादा ज़रूरी मंसूबा बनाने की ज़रूरत है।

वक़्त गुज़रता गया।

यूनिवर्सिटी का ऐलान अपनी जगह मौजूद रहा, मगर यूनिवर्सिटी शायद अभी तक ऐलाननामे से बाहर नहीं निकल सकी।

यह वाक़िआ किसी फ़र्द की तनक़ीद के लिए नहीं, बल्कि हमारे मिज़ाज के मुतालिए के लिए काफ़ी है।

हम ऐलान बहुत जल्दी करते हैं।

इदारा बहुत देर से बनाते हैं।

और कभी-कभी इदारा बनता ही नहीं, सिर्फ़ ऐलान बाक़ी रह जाता है।

हमारी एक और आदत भी अजीब है।

हम किसी कामयाब शख़्स की आख़िरी मंज़िल देखकर उसका पहला क़दम तय कर लेते हैं।

आज सर सैयद अहमद ख़ाँ का नाम लीजिए। फ़ौरन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ज़ेहन में आती है। फिर हमारे अंदर का सर सैयद बेदार होता है और हम भी यूनिवर्सिटी के ख़्वाब देखने लगते हैं।

लेकिन ज़रा ठहरिए!

सर सैयद की ज़िंदगी की किताब सिर्फ़ आख़िरी बाब का नाम नहीं थी।

उन्होंने एक तवील फ़िक्री और इल्मी सफ़र तय किया था। सहाफ़त, तसनीफ़, इल्मी सरगर्मियाँ, साइंटिफ़िक सोसाइटी, तहज़ीबुल-अख़लाक़, जदीद तालीम की दावत, क़ौम की फ़िक्री तरबियत—यह सब उस सफ़र की मंज़िलें थीं।

फिर 1875 में अलीगढ़ में मदरसतुल-उलूम क़ायम हुआ।

1877 में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज वजूद में आया।

और 1920 में यह सफ़र अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी तक पहुँचा।

यानी जिस यूनिवर्सिटी को हम आज देखकर मुतास्सिर होते हैं, उसके पीछे कई दहाइयों की मेहनत, फ़िक्र, तंज़ीम, क़ुर्बानी और इदारा-साज़ी छिपी हुई है।

हमें यूनिवर्सिटी नज़र आती है, यूनिवर्सिटी बनाने वाला सब्र नज़र नहीं आता।

हमें अलीगढ़ की इमारत नज़र आती है, उसके पीछे खड़ी हुई सर सैयद की शख़्सियत नज़र नहीं आती।

शायद यही हमारी अस्ल ग़लती है।

हमें सर सैयद बनने का शौक़ है, मगर सर सैयद बनने के लिए जिस उम्र भर की मेहनत दरकार है, उसके लिए हमारे पास वक़्त नहीं।

फिर हालिया दौर की एक मिसाल सामने आती है।

वली रहमानी साहब और Umeed Global School की मिसाल।

लोग कहते हैं कि उन्होंने अपील की और क़ौम ने चंद दिनों में करोड़ों रुपये जमा कर दिए।

मैं कहता हूँ: माशाअल्लाह!

लेकिन ज़रा पूरी कहानी भी तो पढ़िए।

हर कामयाब चंदा मुहिम के पीछे एक कामयाब एतमाद मुहिम भी होती है।

अगर लोगों को यह यक़ीन न हो कि उनका दिया हुआ पैसा एक ज़िंदा, फ़आल और क़ाबिले-एतमाद मंसूबे में इस्तेमाल होगा तो सिर्फ़ ख़ूबसूरत तक़रीर करोड़ों रुपये नहीं निकाल सकती।

लोग पहले काम देखते हैं, फिर आदमी देखते हैं, फिर उसकी नीयत और दियानत पर एतमाद करते हैं और उसके बाद अपनी जेब खोलते हैं।

चंदा दरअसल पैसे से पहले एतमाद माँगता है।

यह बात हमारे तालीमी मंसूबा-साज़ों को समझने की ज़रूरत है।

हम क़ौम से कहते हैं:

"हम यूनिवर्सिटी बनाना चाहते हैं, चंदा दीजिए।"

क़ौम ख़ामोशी से पूछती है:

"अच्छा! पहले क्या बनाया है?"

हम कहते हैं:

"अभी कुछ नहीं, मगर बहुत शानदार बनाएँगे।"

क़ौम फिर पूछती है:

"ज़मीन?"

"है।"

"इमारत?"

"अभी नहीं।"

"असातिज़ा?"

"देखेंगे।"

"निज़ाम?"

"बन जाएगा।"

"माली वसाइल?"

"क़ौम देगी।"

क़ौम शायद यहाँ आकर कहती है:

"पहले कुछ बनाकर दिखाइए, फिर हम भी देखते हैं।"

इस जवाब को क़ौम की बे-हिसी समझ लेना शायद अपने आपको धोखा देना है।

मुझे तो कभी-कभी लगता है कि हमें यूनिवर्सिटियों से पहले अच्छे स्कूलों की एक तहरीक की ज़रूरत है।

एक स्कूल बनाइए।

उसमें पचास बच्चे पढ़ाइए।

फिर उन्हें अच्छा इंसान बनाइए।

उन्हें अच्छी अंग्रेज़ी सिखाइए।

साइंस पढ़ाइए।

कम्प्यूटर सिखाइए।

उनके अंदर सवाल करने की सलाहियत पैदा कीजिए।

उन्हें दीन से जोड़िए, मगर दुनिया से काटिए नहीं।

उनके हाथ में किताब भी दीजिए और किरदार भी।

फिर देखिए, एक दिन वही बच्चे आपके सबसे बड़े सफ़ीर होंगे।

आपको इश्तिहार देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

आपके तलबा आपके इश्तिहार होंगे।

उनके नताइज आपकी अपील होंगे।

उनकी कामयाबी आपका चंदा होगी।

और उनका किरदार आपके इदारे का तआरुफ़ होगा।

दुनिया के कामयाब तालीमी नेटवर्क्स का मुतालिआ कीजिए। कई इदारों ने एक स्कूल से आग़ाज़ किया, फिर दूसरे शहर में गए, फिर तीसरा स्कूल बनाया और आहिस्ता-आहिस्ता एक पूरा तालीमी नेटवर्क क़ायम कर दिया।

यही अस्ल कमाल है।

एक कामयाब मॉडल बनाना और फिर उसे बार-बार कामयाबी के साथ दोहराना।

हम शायद इस मरहले को बहुत मामूली समझते हैं।

हमें एक स्कूल छोटा काम लगता है।

हम कहते हैं:

"स्कूल तो कोई भी बना सकता है, हमें तो यूनिवर्सिटी बनानी है!"

मैं अर्ज़ करता हूँ:

जो शख़्स एक अच्छा स्कूल नहीं बना सकता, उसे यूनिवर्सिटी बनाने का ख़्वाब ज़रूर देखना चाहिए, मगर उस ख़्वाब को हक़ीक़त बनाने से पहले अपने आपको आज़माना भी चाहिए।

क्योंकि यूनिवर्सिटी स्कूल से बड़ी ज़रूर है, मगर स्कूल का कामयाब होना यूनिवर्सिटी की कामयाबी की ज़मानत तो नहीं, अलबत्ता इदारा-साज़ी की पहली तर्बियत ज़रूर है।

अस्ल मसला शायद यूनिवर्सिटी बनाने का नहीं, इदारा-साज़ बनने का है।

हमें पहले ऐसे लोग तैयार करने होंगे जो इदारा बना सकें, चला सकें, हिसाब दे सकें, असातिज़ा का इंतिख़ाब कर सकें, तालीमी मयार क़ायम रख सकें और दस साल बाद भी अपने इदारे के सामने शर्मिंदा न हों।

हमें इमारत-साज़ से ज़्यादा इदारा-साज़ चाहिएँ।

हमें ऐलान करने वालों से ज़्यादा अमल करने वाले चाहिएँ।

हमें चंदा जमा करने वालों से ज़्यादा एतमाद जमा करने वाले चाहिएँ।

और हमें बड़े ख़्वाब देखने वालों के साथ-साथ वे लोग भी चाहिएँ जो उन ख़्वाबों की पहली ईंट रखने के बाद बीस साल तक उस पर पानी देते रहें।

मेरा ख़याल है कि हमें एक उसूल तय कर लेना चाहिए:

यूनिवर्सिटी का ख़्वाब देखने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन यूनिवर्सिटी के सफ़र का आग़ाज़ एक अच्छे स्कूल से करने में कोई आर नहीं।

बल्कि शायद यही दानाई है।

एक स्कूल बनाइए।

उसे कामयाब कीजिए।

उसके तलबा को कामयाब कीजिए।

लोगों का एतमाद हासिल कीजिए।

फिर दूसरा स्कूल बनाइए।

फिर तीसरा।

फिर एक पूरा नेटवर्क क़ायम कीजिए।

और एक दिन अगर हालात इजाज़त दें तो कॉलेज बनाइए।

फिर जब वक़्त, तजुर्बा, वसाइल और सलाहियत सब आपके साथ हों तो यूनिवर्सिटी भी बनाइए।

उस वक़्त यूनिवर्सिटी का ऐलान महज़ एक ख़्वाब नहीं होगा।

वह आपकी कई साल की मेहनत का मंतिक़ी नतीजा होगा।

हमें शायद अपने तालीमी सफ़र में एक जुमला हमेशा याद रखना चाहिए:

"मंज़िल कितनी ही बड़ी हो, पहला क़दम ज़मीन पर ही रखा जाता है।"

यूनिवर्सिटी आसमान पर नहीं बनती।

उसकी बुनियाद भी ज़मीन में ही पड़ती है।

और अगर वह बुनियाद एक छोटे से स्कूल की सूरत में हो, जहाँ चंद दर्जन बच्चे इल्म, किरदार और शऊर की रोशनी हासिल कर रहे हों, तो उस छोटे से स्कूल को मामूली न समझिए।

मुमकिन है वही स्कूल कल एक कॉलेज बने।

वही कॉलेज कल एक यूनिवर्सिटी बने।

और वही यूनिवर्सिटी एक पूरी नस्ल का मुक़द्दर बदल दे।

इसलिए मेरे अज़ीज़ो!

यूनिवर्सिटी का ख़्वाब ज़रूर देखिए, मगर एक स्कूल बनाने से शर्माइए नहीं।

कभी-कभी तारीख़ के बड़े अबवाब का आग़ाज़ बहुत मामूली जुमले से होता है:

"चलिए, पहले एक अच्छा स्कूल बनाते हैं!"

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25/01/2026

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मेरा रब क्या से क्या कर देता है यार!!नज़रुल अब्दुल करीम एक गरीब और मेहनती मज़दूर था। रोज़ी-रोटी की तलाश में वह बांग्लादे...
25/01/2026

मेरा रब क्या से क्या कर देता है यार!!

नज़रुल अब्दुल करीम एक गरीब और मेहनती मज़दूर था। रोज़ी-रोटी की तलाश में वह बांग्लादेश से सऊदी अरब आया और वहाँ सड़कों पर झाड़ू लगाने लगा। एक दिन वह रियाद की एक बड़ी सड़क पर एक लग्ज़री ज्वेलरी शॉप के सामने कुछ पल के लिए रुक गया। शीशे के अंदर सोने का एक बहुत सुंदर सेट चमक रहा था। नज़रुल के हाथ में झाड़ू थी, कपड़े साधारण थे, शरीर थका हुआ था, लेकिन आँखों में एक खामोश सपना था।

उसी समय एक अमीर परिवार के युवक ने उसे देख लिया। उसने इंसानियत की नजर से नहीं, बल्कि घमंड से देखा। उसने नज़रुल की फोटो ली और सोशल मीडिया पर डाल दी, साथ में मज़ाक उड़ाने वाले शब्द लिखे: “ऐसे लोग कूड़ा देखने के ही लायक होते हैं, सोना देखने के नहीं।”

उसने एक गरीब मेहनतकश की इज़्ज़त को ठेस पहुँचाई, सिर्फ लाइक और कमेंट पाने के लिए।

लेकिन यह दुनिया सिर्फ इंसानों के फैसलों से नहीं चलती, यहाँ अल्लाह की अदालत भी है। अल्लाह ने चाहा कि उस मज़लूम की खामोशी बोले। वही फोटो, जो मज़ाक के लिए डाली गई थी, इज़्ज़त की वजह बन गई। लोग उस अमीर लड़के के खिलाफ बोलने लगे। सबने कहा कि मेहनत को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए।

फिर एक सामाजिक संस्था “इंसानियत” सामने आई। उन्होंने नज़रुल को ढूँढा ताकि उसकी बेइज़्ज़ती का बदला इज़्ज़त से लिया जाए। जब नज़रुल मिला, तो उस पर रहमत बरसने लगी। लोगों ने उसे सोने के गहने, पैसे, मोबाइल, ज़रूरी सामान और अपने देश जाने का टिकट तक दे दिया।

सबसे खास बात यह थी कि वही सोने का सेट, जिसे वह शीशे के पीछे देख रहा था, अब उसके हाथों में था। जैसे अल्लाह बता रहा हो कि जो चीज़ तुमने देखी थी, वह तुम्हारे लिए मना नहीं थी, बस उसका वक्त नहीं आया था।

बाद में पता चला कि नज़रुल बहुत ईमानदार और दयालु इंसान है। अपनी कम कमाई में से भी वह भूखी बिल्लियों को खाना देता था। शायद इसी रहम ने उसके लिए अल्लाह की मदद खोल दी।

जब उससे पूछा गया कि वह सोने का सेट क्यों देख रहा था, तो उसने कहा: “मैं बस अपने बेटे की शादी में उसकी मदद करना चाहता था।”

न सोना उसका सपना था, न शोहरत, वह बस एक बाप था।

यह सच्ची कहानी अरब सोशल मीडिया पर बहुत फैल गई और कई न्यूज चैनलों ने इसे दिखाया।

इस कहानी से सबक:
लोगों के ताने थोड़े समय के होते हैं, लेकिन अल्लाह के फैसले हमेशा के होते हैं। अगर कोई तुम्हें कपड़ों, काम या हैसियत से छोटा समझे तो याद रखना:

अल्लाह झाड़ू या सोना नहीं देखता, वह दिल देखता है।

और यही इस कहानी का संदेश है:
“जो तुम्हारे पास है वह खत्म हो जाएगा, और जो अल्लाह के पास है वही हमेशा रहने वाला है।”

डेनमार्क ने पहले बहुत ज़्यादा डिजिटल चीज़ों का इस्तेमाल किया। स्कूलों में बच्चे मोबाइल और स्क्रीन इस्तेमाल करते थे। अब ब...
12/01/2026

डेनमार्क ने पहले बहुत ज़्यादा डिजिटल चीज़ों का इस्तेमाल किया। स्कूलों में बच्चे मोबाइल और स्क्रीन इस्तेमाल करते थे। अब बड़े लोग इसके नुकसान देख रहे हैं। बच्चे तनाव महसूस करते हैं और ठीक से सोच नहीं पाते।

बहुत से बच्चे रोज़ पाँच घंटे तक मोबाइल चलाते हैं। यह पढ़ाई और सेहत दोनों के लिए नुकसानदायक है। अब स्कूलों में बच्चों को मोबाइल लाने की इजाज़त नहीं है। वे हर सुबह अपना फोन टीचर को दे देते हैं। काग़ज़ की किताबें फिर से कक्षा में आ गई हैं। क्लब और खेल के मैदानों में भी मोबाइल का इस्तेमाल बंद कर दिया गया है। अब बच्चे ज़्यादा बात करते हैं और साथ मिलकर खेलते हैं।

डेनमार्क सरकार नए क़ानून भी बनाने की योजना कर रही है। पंद्रह साल से कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया इस्तेमाल नहीं कर पाएँगे। माता-पिता और टीचर इस बदलाव से खुश हैं। वे चाहते हैं कि बच्चे सेहतमंद और खुश रहें।

यह ज़िंदगी भी अजीब खेल खेलती है…यह व्यक्ति कभी भारत की आसमानों का बादशाह था। ये नरेश गोयल हैं—जेट एयरवेज़ के पूर्व मालिक...
04/01/2026

यह ज़िंदगी भी अजीब खेल खेलती है…

यह व्यक्ति कभी भारत की आसमानों का बादशाह था। ये नरेश गोयल हैं—जेट एयरवेज़ के पूर्व मालिक, जो कभी भारत की प्रमुख एयरलाइन हुआ करती थी। आज वही एयरलाइन दिवालिया होकर बंद हो चुकी है। नरेश गोयल को धोखाधड़ी और अन्य आर्थिक अपराधों के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। उनकी पत्नी नीता गोयल को भी जेल जाना पड़ा और मुकदमे के दौरान कैंसर से उनका निधन हो गया।

जो व्यक्ति कभी बहुत अमीर था, आज वही जेल में टूटा हुआ और बेबस नज़र आता है। उन्होंने अदालत में कहा है कि उनकी सारी उम्मीदें टूट चुकी हैं और जेल में मर जाना ही बेहतर लगता है। हमने उनके अच्छे दिन भी देखे हैं और अब यह तस्वीर भी देख रहे हैं।

इस तस्वीर में ज़िंदगी का एक बड़ा सबक छिपा है। कभी घमंड न करें, क्योंकि जो आया है, वह एक दिन चला भी सकता है। समय के चक्कर में खुद को मत उलझाइए। अपने धन, शोहरत और ताकत पर कभी घमंड न करें। कारोबार या दौलत बढ़ाने के लिए कभी गैर-कानूनी तरीकों का इस्तेमाल न करें। दयालु बनें और हमेशा ज़मीन से जुड़े रहें।

याद रखिए—आपके कर्म, आपके पैसे या दौलत से कहीं ज़्यादा अहम होते हैं।

01/01/2026
शिक्षा: भारतीय मुसलमानों की तरक्की का एकमात्र रास्तालेखक: नबील अख्तर नवाज़ीभारत जैसे बहुसांस्कृतिक और प्रतिस्पर्धी समाज ...
01/01/2026

शिक्षा: भारतीय मुसलमानों की तरक्की का एकमात्र रास्ता
लेखक: नबील अख्तर नवाज़ी
भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और प्रतिस्पर्धी समाज में किसी भी समुदाय की तरक्की सिर्फ भावनाओं या शिकायतों पर नहीं बल्कि ज्ञान, शिक्षा और सोच-समझ पर निर्भर करती है। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि आज के समय में भारतीय मुसलमान शिक्षा के क्षेत्र में जिस पिछड़ेपन का सामना कर रहे हैं, वह सिर्फ चिंता का विषय नहीं बल्कि उनके भविष्य के लिए खतरे की घंटी भी है।
यह सच है कि बिना शिक्षा के न तो आर्थिक स्थिरता संभव है, न सामाजिक सम्मान, और न ही राजनीतिक जागरूकता। आधुनिक भारत में जहां तरक्की के मापदंड तेजी से बदल रहे हैं, वहां मुसलमानों का शिक्षा में पिछड़ जाना उन्हें समाज के किनारे धकेल रहा है। सरकारी और गैर-सरकारी रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि उच्च शिक्षा, तकनीकी कौशल और पेशेवर पाठ्यक्रमों में मुसलमानों की भागीदारी उनकी कुल आबादी के अनुपात से बहुत कम है।
समस्या सिर्फ गरीबी या संसाधनों की कमी तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सोच में कमी, प्राथमिकताओं का अभाव और सामूहिक योजना की कमी भी है। शिक्षा को आज भी अक्सर धार्मिक या सांसारिक शिक्षा में बाँटकर देखा जाता है, जबकि समय की जरूरत है कि दोनों को एक-दूसरे का सहारा माना जाए, विरोधी नहीं।
विशेषकर मुसलमान लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान देने की जरूरत है। यह सच मानना चाहिए कि जिस समुदाय की आधी आबादी शिक्षा से दूर हो, उसकी तरक्की का सपना केवल एक भ्रम बनकर रह जाता है। शिक्षित माँ ही एक समझदार पीढ़ी की नींव रख सकती है, और इससे इनकार करना मतलब भविष्य से इनकार करना है।
ज़रूरत इस बात की है कि मुसलमान समाज में शिक्षा को सबसे पहली राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए। इस काम में अलिम, बुद्धिजीवी, शैक्षिक संस्थान, सामाजिक संगठन और संपन्न वर्ग सबको मिलकर आगे आना होगा। स्कॉलरशिप, कोचिंग सेंटर, करियर गाइडेंस और आधुनिक शिक्षा तक पहुंच जैसे ठोस कदम उठाए बिना सिर्फ भाषण और बयान समस्या का हल नहीं बन सकते।
साथ ही, मुसलमानों को आत्म-निरीक्षण और जिम्मेदारी की हिम्मत भी दिखानी होगी। हर असफलता को बाहरी परिस्थितियों पर डाल देना आसान लेकिन गैर-जिम्मेदाराना रवैया है। समाज तभी आगे बढ़ता है जब वह अपनी कमियों को स्वीकार कर सुधार की राह अपनाता है।
यह समय शिकायत करने का नहीं, बल्कि सुनियोजित निर्णय लेने का है। अगर भारतीय मुसलमान आने वाले दशकों में सम्मानित नागरिक के रूप में अपनी जगह बनाए रखना चाहते हैं, तो उन्हें शिक्षा को सिर्फ एक क्षेत्र नहीं बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन बनाना होगा। इतिहास गवाह है कि ज्ञान से मुंह मोड़ने वाली जातियां समय के पन्नों से मिट गईं, जबकि ज्ञान को थामने वाली समुदायों ने हालात का रुख बदल दिया।

2025 में दुनिया के लिए अच्छी खबर है। साफ़ ऊर्जा अब कोयले से ज़्यादा बिजली बनाती है। कई देश सूरज और हवा से ज़्यादा बिजली ...
01/01/2026

2025 में दुनिया के लिए अच्छी खबर है। साफ़ ऊर्जा अब कोयले से ज़्यादा बिजली बनाती है। कई देश सूरज और हवा से ज़्यादा बिजली बना रहे हैं। यूरोप के कुछ देशों में कोयले से चलने वाले बिजली घर बंद हो रहे हैं। लोग अब ज़्यादा साफ़ ऊर्जा का उपयोग कर रहे हैं। इससे धरती को फ़ायदा होता है।

परिवारों के लिए भी मदद है। ऑस्ट्रेलिया छात्रों को पढ़ाई के लिए पैसे की मदद देता है। न्यू मैक्सिको में सभी परिवारों को मुफ्त बाल देखभाल मिलती है। माता-पिता का खर्च कम होता है। कई लोगों को नई नौकरियाँ मिल रही हैं।

देश प्रकृति की भी रक्षा कर रहे हैं। समुद्र और जंगलों के बड़े इलाकों को सुरक्षित किया जा रहा है। जानवर अब ज़्यादा सुरक्षित जगहों पर रहते हैं।

डॉक्टर नए तरीकों से लोगों की मदद कर रहे हैं। बच्चों को मलेरिया की दवा मिल रही है। गंभीर बीमारियों वाले लोगों का बेहतर इलाज हो रहा है। कैंसर का इलाज अब तेज़ और आसान हो गया है। कई लोगों की ज़िंदगी पहले से बेहतर महसूस हो रही है۔

01/01/2026


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