09/08/2026
यूनिवर्सिटी और कॉलेज का ख़्वाब और एक स्कूल की हक़ीक़त
लेखक : नबील अख़्तर नवाज़ी
कभी-कभी मुझे ख़याल आता है कि हमारी क़ौम के पास ख़्वाब देखने की सलाहियत शायद दुनिया की दूसरी क़ौमों से कुछ ज़्यादा है। हम ख़्वाब भी छोटे-मोटे नहीं देखते; सीधे यूनिवर्सिटी से आग़ाज़ करते हैं। अभी ज़मीन का टुकड़ा मिला नहीं, नक़्शा बना नहीं, दो कमरे तामीर नहीं हुए, मगर यूनिवर्सिटी का नाम तय हो गया। एक शानदार नाम, एक ख़ूबसूरत लोगो, एक इफ़्तिताही तक़रीब और फिर क़ौम से अपील!
और अगर किसी साहब ने ज़रा पूछ लिया कि हज़रत! स्कूल कहाँ है?
तो शायद यह सवाल ही गुस्ताख़ी तसव्वुर किया जाए।
किसी ने कहा था कि क़ौमें ख़्वाबों से बनती हैं। मैं इस बात से मुत्तफ़िक़ हूँ, मगर मेरी मामूली-सी गुज़ारिश यह है कि ख़्वाब देखने के बाद आँखें भी खोल लिया करें।
तालीमी इदारा क़ायम करना यक़ीनन बड़ी नेकी और अज़ीम क़ौमी ख़िदमत है। मुसलमानों को मयारी स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटियाँ चाहिएँ, बल्कि शायद हमारी ज़रूरत हमारी मौजूदा रफ़्तार से कहीं ज़्यादा है। लेकिन तालीमी इदारा कोई ऐसी इमारत नहीं, जिसकी बुनियाद रखते ही वह इदारा बन जाए।
इदारा इमारत से नहीं, निज़ाम से बनता है।
और निज़ाम एक दिन में नहीं बनता।
मुझे हमेशा हैरत होती है कि हमारे बाज़ अहबाब तालीमी इदारे क़ायम करने के मामले में मंज़िल से इतने मुतास्सिर होते हैं कि रास्ता भूल जाते हैं। किसी के ज़ेहन में तालीम का ख़याल आया और उसने ऐलान कर दिया:
"इंशाअल्लाह बहुत जल्द एक अज़ीमुश्शान यूनिवर्सिटी क़ायम की जाएगी!"
मैं सोचता हूँ, भाई! पहले एक अज़ीमुश्शान स्कूल तो क़ायम कर लो।
एक ऐसा स्कूल जिसके दरवाज़े पर खड़े होकर तुम्हें ख़ुद अपने काम पर फ़ख़्र महसूस हो।
एक ऐसा स्कूल जहाँ का तालिबे-इल्म सिर्फ़ किताबें न पढ़ता हो, बल्कि सोचना भी सीखता हो।
एक ऐसा स्कूल जहाँ उस्ताद सिर्फ़ हाज़िरी न लगाए, बल्कि नस्लें तैयार करे।
एक ऐसा स्कूल जिसके नताइज देखकर लोग कहें:
"यह स्कूल अगर ऐसा है तो इसके बनाने वालों को आगे बढ़ने से रोकना नहीं चाहिए।"
फिर आगे बढ़ो।
कॉलेज बनाओ।
फिर कॉलेजों का सिलसिला क़ायम करो।
फिर अगर वसाइल, सलाहियत और ज़रूरत इजाज़त दे तो यूनिवर्सिटी भी बनाओ।
मगर ख़ुदा के लिए यूनिवर्सिटी के ख़्वाब को स्कूल की हक़ीक़त से महरूम न करो।
कुछ अरसा पहले झारखंड के एक मारूफ़ इदारे से वाबस्ता एक शख़्सियत ने वहाँ इमाम अहमद रज़ा यूनिवर्सिटी क़ायम करने का ऐलान किया। मैंने अदब से अर्ज़ किया:
"हुज़ूर! पहले एक आध अच्छा स्कूल बना लीजिए, उसे कामयाब करके दिखाइए, फिर यूनिवर्सिटी की तरफ़ क़दम बढ़ाइए।"
बात शायद अच्छी नहीं लगी।
वह हज़रत नाराज़ हो गए।
मैंने उस वक़्त भी सोचा था और आज भी सोचता हूँ कि तालीम के मैदान में नाराज़ होने से ज़्यादा ज़रूरी मंसूबा बनाने की ज़रूरत है।
वक़्त गुज़रता गया।
यूनिवर्सिटी का ऐलान अपनी जगह मौजूद रहा, मगर यूनिवर्सिटी शायद अभी तक ऐलाननामे से बाहर नहीं निकल सकी।
यह वाक़िआ किसी फ़र्द की तनक़ीद के लिए नहीं, बल्कि हमारे मिज़ाज के मुतालिए के लिए काफ़ी है।
हम ऐलान बहुत जल्दी करते हैं।
इदारा बहुत देर से बनाते हैं।
और कभी-कभी इदारा बनता ही नहीं, सिर्फ़ ऐलान बाक़ी रह जाता है।
हमारी एक और आदत भी अजीब है।
हम किसी कामयाब शख़्स की आख़िरी मंज़िल देखकर उसका पहला क़दम तय कर लेते हैं।
आज सर सैयद अहमद ख़ाँ का नाम लीजिए। फ़ौरन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ज़ेहन में आती है। फिर हमारे अंदर का सर सैयद बेदार होता है और हम भी यूनिवर्सिटी के ख़्वाब देखने लगते हैं।
लेकिन ज़रा ठहरिए!
सर सैयद की ज़िंदगी की किताब सिर्फ़ आख़िरी बाब का नाम नहीं थी।
उन्होंने एक तवील फ़िक्री और इल्मी सफ़र तय किया था। सहाफ़त, तसनीफ़, इल्मी सरगर्मियाँ, साइंटिफ़िक सोसाइटी, तहज़ीबुल-अख़लाक़, जदीद तालीम की दावत, क़ौम की फ़िक्री तरबियत—यह सब उस सफ़र की मंज़िलें थीं।
फिर 1875 में अलीगढ़ में मदरसतुल-उलूम क़ायम हुआ।
1877 में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज वजूद में आया।
और 1920 में यह सफ़र अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी तक पहुँचा।
यानी जिस यूनिवर्सिटी को हम आज देखकर मुतास्सिर होते हैं, उसके पीछे कई दहाइयों की मेहनत, फ़िक्र, तंज़ीम, क़ुर्बानी और इदारा-साज़ी छिपी हुई है।
हमें यूनिवर्सिटी नज़र आती है, यूनिवर्सिटी बनाने वाला सब्र नज़र नहीं आता।
हमें अलीगढ़ की इमारत नज़र आती है, उसके पीछे खड़ी हुई सर सैयद की शख़्सियत नज़र नहीं आती।
शायद यही हमारी अस्ल ग़लती है।
हमें सर सैयद बनने का शौक़ है, मगर सर सैयद बनने के लिए जिस उम्र भर की मेहनत दरकार है, उसके लिए हमारे पास वक़्त नहीं।
फिर हालिया दौर की एक मिसाल सामने आती है।
वली रहमानी साहब और Umeed Global School की मिसाल।
लोग कहते हैं कि उन्होंने अपील की और क़ौम ने चंद दिनों में करोड़ों रुपये जमा कर दिए।
मैं कहता हूँ: माशाअल्लाह!
लेकिन ज़रा पूरी कहानी भी तो पढ़िए।
हर कामयाब चंदा मुहिम के पीछे एक कामयाब एतमाद मुहिम भी होती है।
अगर लोगों को यह यक़ीन न हो कि उनका दिया हुआ पैसा एक ज़िंदा, फ़आल और क़ाबिले-एतमाद मंसूबे में इस्तेमाल होगा तो सिर्फ़ ख़ूबसूरत तक़रीर करोड़ों रुपये नहीं निकाल सकती।
लोग पहले काम देखते हैं, फिर आदमी देखते हैं, फिर उसकी नीयत और दियानत पर एतमाद करते हैं और उसके बाद अपनी जेब खोलते हैं।
चंदा दरअसल पैसे से पहले एतमाद माँगता है।
यह बात हमारे तालीमी मंसूबा-साज़ों को समझने की ज़रूरत है।
हम क़ौम से कहते हैं:
"हम यूनिवर्सिटी बनाना चाहते हैं, चंदा दीजिए।"
क़ौम ख़ामोशी से पूछती है:
"अच्छा! पहले क्या बनाया है?"
हम कहते हैं:
"अभी कुछ नहीं, मगर बहुत शानदार बनाएँगे।"
क़ौम फिर पूछती है:
"ज़मीन?"
"है।"
"इमारत?"
"अभी नहीं।"
"असातिज़ा?"
"देखेंगे।"
"निज़ाम?"
"बन जाएगा।"
"माली वसाइल?"
"क़ौम देगी।"
क़ौम शायद यहाँ आकर कहती है:
"पहले कुछ बनाकर दिखाइए, फिर हम भी देखते हैं।"
इस जवाब को क़ौम की बे-हिसी समझ लेना शायद अपने आपको धोखा देना है।
मुझे तो कभी-कभी लगता है कि हमें यूनिवर्सिटियों से पहले अच्छे स्कूलों की एक तहरीक की ज़रूरत है।
एक स्कूल बनाइए।
उसमें पचास बच्चे पढ़ाइए।
फिर उन्हें अच्छा इंसान बनाइए।
उन्हें अच्छी अंग्रेज़ी सिखाइए।
साइंस पढ़ाइए।
कम्प्यूटर सिखाइए।
उनके अंदर सवाल करने की सलाहियत पैदा कीजिए।
उन्हें दीन से जोड़िए, मगर दुनिया से काटिए नहीं।
उनके हाथ में किताब भी दीजिए और किरदार भी।
फिर देखिए, एक दिन वही बच्चे आपके सबसे बड़े सफ़ीर होंगे।
आपको इश्तिहार देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
आपके तलबा आपके इश्तिहार होंगे।
उनके नताइज आपकी अपील होंगे।
उनकी कामयाबी आपका चंदा होगी।
और उनका किरदार आपके इदारे का तआरुफ़ होगा।
दुनिया के कामयाब तालीमी नेटवर्क्स का मुतालिआ कीजिए। कई इदारों ने एक स्कूल से आग़ाज़ किया, फिर दूसरे शहर में गए, फिर तीसरा स्कूल बनाया और आहिस्ता-आहिस्ता एक पूरा तालीमी नेटवर्क क़ायम कर दिया।
यही अस्ल कमाल है।
एक कामयाब मॉडल बनाना और फिर उसे बार-बार कामयाबी के साथ दोहराना।
हम शायद इस मरहले को बहुत मामूली समझते हैं।
हमें एक स्कूल छोटा काम लगता है।
हम कहते हैं:
"स्कूल तो कोई भी बना सकता है, हमें तो यूनिवर्सिटी बनानी है!"
मैं अर्ज़ करता हूँ:
जो शख़्स एक अच्छा स्कूल नहीं बना सकता, उसे यूनिवर्सिटी बनाने का ख़्वाब ज़रूर देखना चाहिए, मगर उस ख़्वाब को हक़ीक़त बनाने से पहले अपने आपको आज़माना भी चाहिए।
क्योंकि यूनिवर्सिटी स्कूल से बड़ी ज़रूर है, मगर स्कूल का कामयाब होना यूनिवर्सिटी की कामयाबी की ज़मानत तो नहीं, अलबत्ता इदारा-साज़ी की पहली तर्बियत ज़रूर है।
अस्ल मसला शायद यूनिवर्सिटी बनाने का नहीं, इदारा-साज़ बनने का है।
हमें पहले ऐसे लोग तैयार करने होंगे जो इदारा बना सकें, चला सकें, हिसाब दे सकें, असातिज़ा का इंतिख़ाब कर सकें, तालीमी मयार क़ायम रख सकें और दस साल बाद भी अपने इदारे के सामने शर्मिंदा न हों।
हमें इमारत-साज़ से ज़्यादा इदारा-साज़ चाहिएँ।
हमें ऐलान करने वालों से ज़्यादा अमल करने वाले चाहिएँ।
हमें चंदा जमा करने वालों से ज़्यादा एतमाद जमा करने वाले चाहिएँ।
और हमें बड़े ख़्वाब देखने वालों के साथ-साथ वे लोग भी चाहिएँ जो उन ख़्वाबों की पहली ईंट रखने के बाद बीस साल तक उस पर पानी देते रहें।
मेरा ख़याल है कि हमें एक उसूल तय कर लेना चाहिए:
यूनिवर्सिटी का ख़्वाब देखने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन यूनिवर्सिटी के सफ़र का आग़ाज़ एक अच्छे स्कूल से करने में कोई आर नहीं।
बल्कि शायद यही दानाई है।
एक स्कूल बनाइए।
उसे कामयाब कीजिए।
उसके तलबा को कामयाब कीजिए।
लोगों का एतमाद हासिल कीजिए।
फिर दूसरा स्कूल बनाइए।
फिर तीसरा।
फिर एक पूरा नेटवर्क क़ायम कीजिए।
और एक दिन अगर हालात इजाज़त दें तो कॉलेज बनाइए।
फिर जब वक़्त, तजुर्बा, वसाइल और सलाहियत सब आपके साथ हों तो यूनिवर्सिटी भी बनाइए।
उस वक़्त यूनिवर्सिटी का ऐलान महज़ एक ख़्वाब नहीं होगा।
वह आपकी कई साल की मेहनत का मंतिक़ी नतीजा होगा।
हमें शायद अपने तालीमी सफ़र में एक जुमला हमेशा याद रखना चाहिए:
"मंज़िल कितनी ही बड़ी हो, पहला क़दम ज़मीन पर ही रखा जाता है।"
यूनिवर्सिटी आसमान पर नहीं बनती।
उसकी बुनियाद भी ज़मीन में ही पड़ती है।
और अगर वह बुनियाद एक छोटे से स्कूल की सूरत में हो, जहाँ चंद दर्जन बच्चे इल्म, किरदार और शऊर की रोशनी हासिल कर रहे हों, तो उस छोटे से स्कूल को मामूली न समझिए।
मुमकिन है वही स्कूल कल एक कॉलेज बने।
वही कॉलेज कल एक यूनिवर्सिटी बने।
और वही यूनिवर्सिटी एक पूरी नस्ल का मुक़द्दर बदल दे।
इसलिए मेरे अज़ीज़ो!
यूनिवर्सिटी का ख़्वाब ज़रूर देखिए, मगर एक स्कूल बनाने से शर्माइए नहीं।
कभी-कभी तारीख़ के बड़े अबवाब का आग़ाज़ बहुत मामूली जुमले से होता है:
"चलिए, पहले एक अच्छा स्कूल बनाते हैं!"