Ravi Singh Rajawat

Ravi Singh Rajawat तुम शब्द मै अर्थ तुम बिन मै व्यर्थ
जय सियाराम 🙏🏻🙏🏻

पीपल की शीतल छाया में, सोए हैं अंजनी कुमार!कण-कण में है राम बसे, रोम-रोम में उपकार!!माथे पर है स्वर्ण मुकुट, तन पर सिंदू...
30/12/2025

पीपल की शीतल छाया में, सोए हैं अंजनी कुमार!
कण-कण में है राम बसे, रोम-रोम में उपकार!!
माथे पर है स्वर्ण मुकुट, तन पर सिंदूरी चोला!
शक्ति जिनकी अतुलित है, मन जिनका है भोला!!
​पास पड़ी है गदा स्वर्ण की, रण का वीर निशान!
पर आज धरा की गोद में, सोया है बलवान!!
पत्थर का तकिया बना लिया, सादा है विश्राम!
साँसों की हर लय कहती है— जय सिया-राम!!
​भक्तों के सब संकट हर कर, पल भर ली है तान!
हे संकटमोचन, हे महावीर, चरणों में कोटि प्रणाम!!

🌹🙏🏻

💥जय सियाराम जी!!🌹🙏🏻
💥 जय श्री हनुमान जी!!
ाधा_चूर_हो_जाएगी ंगबली_जी_की ीवन_में_तूफान_आए
#जयतुसनातन

*_|| मन का मौन ही सर्वोत्तम है ||_*⚘️ ⚘️ ⚘️ ⚘️ ⚘️ ⚘️ ⚘️ ⚘️ ⚘️ ⚘भाव- भगवान् नहीं ह्रदय में पहले भाव आता है. भाव आ जाएगा त...
02/12/2025

*_|| मन का मौन ही सर्वोत्तम है ||_*
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भाव- भगवान् नहीं ह्रदय में पहले भाव आता है. भाव आ जाएगा तो भगवान् को आते देर ना लगेगी. भाव से ही भव बंधन कटते हैं.

भाव से भव सागर पार होता है. पदार्थ को नहीं भक्त के भाव को ठाकुर जी ग्रहण करते हैं.

भाव भगवान् की कृपा से प्रगट होता है या सत्संग और संतों की कृपा से प्रगट होता है.

दुनिया में कुछ भी छूटे छूट जाने देना, कथा का त्याग मत करना. शास्त्रों के सूत्र संत की कृपा से जल्दी ह्रदय में उतरकर आचरण बन जाते हैं.

रसिक बनना है तो भैया संतों के चरणों में बैठना आना चाहिए. संत सत तक पहुंचा देता है. उर ( ह्रदय ) के मैल को संत कृपा करके दूर कर देते हैं. हमारा ख़ुद का अनुभव भी यही कहता है.

भाव भी संत की कृपा से प्रगट होता है। सत के आश्रय के साथ-साथ संत आश्रय और हो जाये तो कल्याण होते देर ना लगेगी.

2. मौन- सन्त जन कहते हैं कि मधुर बोलो. आज से ही मधुर बोलने का निश्चय करें , किसी के दिल को चोट लगे, ऐसे शब्द कभी नहीं बोलने चाहिये.

मीठा बोलने वालों की मिर्ची भी बिक जाती है और कड़वा बोलने वालों का शहद भी नहीं बिकता.

लकड़ी की मार तो भुलाई जा सकती है किन्तु शब्दो की मार हमेशा याद रहती है, कुछ कठोर बोलना भी पड़े तो प्रेम से बोलो.मन का मौन ही सर्वोत्तम है,

कई लोग शरीर से सावधान रहते हैं, मुँह बन्द रखते हैं किंतु मन से चलते फिरते और बोलते रहते हैं।मौन का अर्थ मन से भी कुछ न बोला जाये.

3. स्वयं की आवाज - विनम्रता का अर्थ सबकी सुन लेना नहीं अपितु स्वयं की सुन लेना है. विनम्र मनुष्य का अर्थ ही वह मनुष्य है, जो दूसरों की कम और स्वयं की आत्मा की आवाज को ज्यादा सुनता हो।

स्वयं की आवाज सुनने वाला मनुष्य कभी भी उग्र नहीं हो सकता क्योंकि उग्रता का कारण ही केवल इतना सा है, कि स्वयं की आवाज को अनसुना कर देना.

जो मनुष्य सबकी सुने मगर स्वयं की न सुने, तो समझ लेना वह व्यक्ति कभी भी वास्तविक विनम्र नहीं हो सकता. उसकी वह विनम्रता केवल और केवल दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं।

विनम्रता झुकना नहीं सिखाती अपितु स्वाभिमान के साथ जीना सिखाती है. सबको सुनना फिर स्वयं को सुनना फिर उसे गुनना और फिर कुछ कहना, इसी का नाम तो विनम्रता है।।।

_🌷🌷राम राम जी 🙏🏻🌷🌷_
_जय_बजरंगबली 🙏🏻💐👏💖_

_जय श्री राम जी🌷🙏💕_ 🙏🙏_

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