Ravi Singh Rajawat

Ravi Singh Rajawat तुम शब्द मै अर्थ तुम बिन मै व्यर्थ
जय सियाराम 🙏🏻🙏🏻

 # जहाँ राम नाम होता है, वहाँ वे आज भी आते हैं # # एक रहस्यमयी, भावपूर्ण और आध्यात्मिक कथापुरानी लखनऊ की गलियाँ अपने भीत...
13/05/2026

# जहाँ राम नाम होता है, वहाँ वे आज भी आते हैं

# # एक रहस्यमयी, भावपूर्ण और आध्यात्मिक कथा

पुरानी लखनऊ की गलियाँ अपने भीतर जाने कितनी कहानियाँ छुपाए रहती हैं।
कुछ कहानियाँ दीवारों में बस जाती हैं, कुछ पुराने दरवाज़ों में, और कुछ उन आवाज़ों में जो समय बीत जाने के बाद भी हवा में तैरती रहती हैं।

चौक की एक संकरी गली में हमारा पुश्तैनी घर था।
पुराना लकड़ी का दरवाज़ा, ऊपर जंग लगी घंटी, बीच में छोटा-सा आँगन, और आँगन के एक कोने में तुलसी चौरा।

हर मंगलवार शाम होते ही घर बदल जाता था।
दरी बिछती।
अगरबत्ती की खुशबू फैलती।
पीतल की थाली निकलती।
ढोलक पर कपड़ा चढ़ाया जाता।
और दादी अपनी पुरानी लाल चुनरी ओढ़कर आँगन में बैठ जातीं।

फिर शुरू होता—
सुंदरकांड।

यह परंपरा 1982 से चल रही थी।
दादी कहती थीं—
“जब तक घर में राम कथा चलती रहेगी, तब तक यह घर खाली नहीं होगा।”

मैं बचपन से यह सब देखता आया था।
मगर सच कहूँ तो मेरे लिए यह सिर्फ एक धार्मिक रस्म थी।
लोग आते, पाठ होता, प्रसाद मिलता, और सब चले जाते।

लेकिन दादी की एक बात हमेशा अजीब लगती थी।

वो हर मंगलवार दरी के आखिर में एक जगह खाली छोड़ती थीं।
कोई वहाँ नहीं बैठता था।

एक बार मैंने पूछा—
“दादी, ये जगह खाली क्यों रखते हो?”

दादी मुस्कुराईं।
उनकी आँखों में उस समय एक अजीब चमक थी।

उन्होंने धीरे से कहा—
“उनके लिए… जो बिना बुलाए आते हैं।”

“कौन?”

दादी ने सिर्फ इतना कहा—
“राम कथा सुनने वाले कभी अकेले नहीं होते।”

मैं हँस पड़ा।
मुझे लगा दादी बूढ़ी हो गई हैं।

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# # दादी का आखिरी मंगलवार

2023 की सर्दियों में दादी बहुत बीमार रहने लगीं।
उम्र 89 साल थी।
शरीर कमजोर हो चुका था, पर मंगलवार आते ही उनमें जाने कहाँ से ताकत आ जाती।

उस दिन भी मंगलवार था।
साँसें तेज चल रही थीं।
माँ ने कहा—
“अम्मा, आज मत बैठो।”

दादी बोलीं—
“जब तक साँस है, सुंदरकांड रुकेगा नहीं।”

उन्होंने काँपते हाथों से मंजीरा उठाया।
आवाज़ कमजोर थी, मगर भाव वैसा ही था।

जब चौपाई आई—

*"राम काज कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम..."*

तो दादी रो पड़ीं।

उनकी आँखों से आँसू बहते रहे।

पाठ खत्म हुआ।
आरती हुई।

दादी ने मुझे पास बुलाया।
मेरा हाथ पकड़ा।

धीरे से बोलीं—
“एक जगह हमेशा खाली रखना…”

मैंने पूछा—
“किसके लिए?”

उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

बस इतना कहा—
“वो आते हैं…”

और अगले दिन दादी चली गईं।

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# खाली जगह

दादी के जाने के बाद घर सूना हो गया।

कुछ हफ्तों तक ऐसा लगा जैसे अब सुंदरकांड नहीं होगा।
लेकिन पापा ने कहा—

“ये उनकी आखिरी इच्छा थी। इसे बंद नहीं करेंगे।”

फिर मंगलवार आने लगा।
दरी फिर बिछने लगी।
ढोलक फिर बजने लगी।

और मैं…
मैं हर बार दरी के आखिर में एक जगह खाली छोड़ देता।

पता नहीं क्यों।
शायद आदत बन गई थी।
शायद दादी की बात मन में कहीं रह गई थी।

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# वो पहला मंगलवार

जुलाई की बारिश थी।
आसमान काला था।
गली में पानी भरा हुआ था।

उस दिन बहुत कम लोग आए।
कुल नौ लोग।

बिजली बार-बार जा रही थी।
आँगन में हल्की पीली रोशनी थी।

हमने पाठ शुरू किया—

*"जय हनुमान ज्ञान गुण सागर..."*

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।

मैंने देखा—
एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

करीब 70-75 साल की उम्र।
भीगा हुआ शरीर।
सफेद दाढ़ी।
घुटनों तक धोती।
कंधे पर पुराना अंगोछा।

लेकिन उसकी आँखें…
उन आँखों में कुछ अलग था।

लाल…
जैसे बहुत रोया हो।
या जैसे बरसों से जाग रहा हो।

माँ ने कहा—
“बाबा, अंदर आ जाइए।”

वो चुपचाप अंदर आया।
जूते उतारे।
और सीधे जाकर उसी खाली जगह पर बैठ गया।

मैं सिहर गया।

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# उसकी आँखों के आँसू

पाठ चलता रहा।

जब चौपाई आई—

*"जामवंत के वचन सुहाए..."*

तो मैंने देखा—
उस बूढ़े की आँखों से आँसू बहने लगे।

वो रो रहा था।
लेकिन आवाज़ नहीं थी।

सिर्फ आँसू।

उसने उन्हें पोंछा भी नहीं।

मैंने पहली बार उसके हाथों को गौर से देखा।

बहुत बड़े हाथ।
उभरी नसें।
नाखून टूटे हुए।

ऐसा लग रहा था जैसे उन हाथों ने जीवन भर कोई भारी भार उठाया हो।

आरती खत्म हुई।

मैंने प्रसाद दिया।
दो लड्डू।

उसने एक लिया।
दूसरा वापस कर दिया।

धीरे से बोला—
“एक ही बहुत है।”

मैंने पूछा—
“बाबा, कहाँ से आए?”

वो मुस्कुराया।

“जहाँ राम जी बुला लें।”

“नाम क्या है?”

उसने मेरी तरफ देखा।
फिर बोला—

“दास।”

बस इतना।

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# दूसरा मंगलवार

अगले मंगलवार वो फिर आया।

इस बार बारिश नहीं थी।
लेकिन उसकी आँखें फिर लाल थीं।

वो आया, वही जगह पर बैठा, और पूरा समय चुप रहा।

जब चौपाई आई—

*"तुम्हरो मंत्र विभीषण माना..."*

तो उसका शरीर हल्का काँपने लगा।

जैसे किसी पुराने घाव पर हाथ रख दिया गया हो।

पापा ने बाद में मुझसे कहा—

“ये बाबा हर बार इतना रोता क्यों है?”

मैंने कहा—
“पता नहीं…”

लेकिन सच यह था कि अब मुझे भी बेचैनी होने लगी थी।

उस बूढ़े में कुछ था।
कुछ ऐसा… जिसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता।

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# दादी की डायरी

उस रात मैं पुराने संदूक में दादी की चीज़ें देख रहा था।

तभी एक पुरानी डायरी मिली।
पीले पड़े पन्ने।
ऊपर लिखा था—
“1998”

मैंने यूँ ही खोल लिया।

एक जगह लिखा था—

*"आज सुंदरकांड में एक बूढ़ा आया। पीछे बैठा। बहुत रोया। मैंने प्रसाद दिया तो बोला—माता, तुम्हारा कंठ मीठा है। जैसे माता सीता गाती थीं। मैंने पूछा कौन हो, तो बोला—राम कथा का पहरेदार।"*

मेरे हाथ काँप गए।

आगे लिखा था—

*"बारिश बहुत थी, मगर उसके पैरों पर कीचड़ नहीं थी।"*

मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा।

क्या ये वही था?

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# तीसरा मंगलवार

अब मैं उसका इंतजार करने लगा था।

उस दिन मैं सबसे पहले आँगन में बैठा था।

लेकिन वो पहले से वहाँ मौजूद था।

वही खाली जगह।
सिर झुकाए।

मैं उसके पास गया।

धीरे से पूछा—
“बाबा… आप हनुमान जी के भक्त लगते हो।”

उसने मेरी तरफ देखा।

उसकी आँखों में ऐसा तेज था कि मैं खुद-ब-खुद झुक गया।

वो बोला—

“भक्त नहीं… सेवक।”

“क्या फर्क है?”

वो हल्का मुस्कुराया।

“भक्त माँगता है।
सेवक सिर्फ सुनता है।”

मैं चुप हो गया।

फिर मैंने पूछा—
“आप क्या माँगते हो?”

वो हँसा।

“वही… जो पाँच हजार साल से माँग रहा हूँ…
राम नाम और सुनने को मिल जाए।”

मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

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# चौथा मंगलवार

उस दिन बिजली चली गई थी।
पूरा आँगन मोमबत्ती की रोशनी में डूबा था।

हम पाठ कर रहे थे।

मैं बार-बार उसकी तरफ देख रहा था।

तभी मैंने कुछ अजीब देखा।

दीवार पर उसकी परछाई बाकी सब से बड़ी थी।

बहुत बड़ी।

जैसे कोई बैठा नहीं… खड़ा हो।

कंधे चौड़े।
आकृति विशाल।

मेरी साँस रुक गई।

आरती खत्म हुई।
सब लोग चले गए।

वो अकेला बैठा रहा।

फिर धीरे-धीरे उठा।
मेरे पास आया।

उसने मेरे सिर पर हाथ रखा।

उसका हाथ बहुत गरम था।
और भारी भी।

जैसे किसी पर्वत का भार हो।

वो बोला—

“तुम्हारी दादी ने जगह खाली रखी।
तुमने भी रखी।
इसलिए आया।”

मैंने काँपते हुए पूछा—

“आप… कौन हो?”

वो दरवाज़े तक गया।
फिर मुड़ा।

और बोला—

“जहाँ राम कथा अधूरी छूटे…
वहाँ मैं पूरी सुनने आता हूँ।

जहाँ कोई प्रेम से रोए…
वहाँ मैं आँसू पोंछने आता हूँ।

नाम मत पूछो…
नाम लोगे तो चला जाऊँगा।”

और वो बाहर चला गया।

मैं दौड़कर गली में पहुँचा।

बारिश तेज थी।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

न पैरों के निशान।
न कोई परछाई।

कुछ भी नहीं।

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# दीपावली की रात

फिर कई मंगलवार बीत गए।
वो नहीं आया।

मैं उदास रहने लगा।

माँ ने कहा—
“शायद कहीं और चले गए।”

दीपावली आई।
घर में बड़ा सुंदरकांड रखा गया।

करीब पचास लोग आए।
पूरा आँगन भरा हुआ था।

और तभी…
दरवाज़े पर वो फिर दिखाई दिया।

इस बार उसकी धोती बिल्कुल साफ थी।
कंधे पर लाल चोला।
चेहरे पर हल्की मुस्कान।

मैंने तुरंत उसके लिए वही जगह खाली की।

वो बैठ गया।

पाठ शुरू हुआ।

जब जयकारा लगा—

**“सियावर रामचंद्र की जय!”**

तो सब खड़े हो गए।

वो भी खड़ा हुआ।

उसी पल बिजली आ गई।

और पहली बार मैंने उसे साफ देखा।

उसकी आँखें बंद थीं।
गालों पर आँसू बह रहे थे।
और चेहरे पर ऐसी शांति थी…
जैसे कोई बरसों बाद अपने घर लौटा हो।

आरती के बाद मैं उसके चरण छूने झुका।

उसने तुरंत रोक दिया।

फिर मेरे कान में धीरे से बोला—

“पैर मत छुओ।
कथा सुनो।

मैं कथा में रहता हूँ…
पैरों में नहीं।”

और वो चला गया।

इस बार हमेशा के लिए।

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# आज भी एक जगह खाली रहती है

अब भी हर मंगलवार हमारे घर में सुंदरकांड होता है।

दरी बिछती है।
ढोलक बजती है।
अगरबत्ती जलती है।

और सबसे पीछे…
एक जगह खाली रहती है।

क्योंकि अब हमें यकीन है—

वो आज भी आते हैं।

चुपचाप।
बिना शोर के।
बिना परिचय के।

जहाँ कोई सच्चे मन से राम नाम लेता है…
जहाँ कोई प्रेम से रोता है…
जहाँ कथा केवल शब्द नहीं, भावना बन जाती है…

वहाँ हनुमान आज भी बैठते हैं।

सबसे पीछे।
सबसे शांत।
सबसे अदृश्य।

और शायद…
आपके घर भी कभी आए हों।

अगर पहचानना हो तो देखना—

जो सबसे पीछे बैठे,
जो कम बोले,
जो राम नाम पर रो पड़े,
जो प्रसाद में सिर्फ एक लड्डू ले,
और जाते-जाते सिर पर हाथ रख दे…

शायद वही हों।

# # 🚩 जय श्री राम 🚩

# # 🚩 जय बजरंगबली 🚩



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