05/10/2026
BJP का काला चिट्ठा? देश की जनता पूछ रही है सवाल!
आज एक सवाल देश के हर नागरिक से है...
जब सरकार से रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर सवाल होना चाहिए, तो राजनीति बार-बार धर्म और पहचान के मुद्दों के आसपास क्यों घूमती दिखाई देती है?
आज देश में मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुसलमान, धार्मिक जुलूस, DJ और मस्जिदों के सामने विवाद जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा बन रहे हैं।
कहीं पुराने धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद है, तो कहीं निर्माण और कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
सवाल यह नहीं कि मंदिर किसका है या मस्जिद किसकी है।
सवाल यह है कि आम आदमी की जिंदगी कब आसान होगी?
आम जनता के असली मुद्दे क्या हैं?
रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा।
लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता को इन मुद्दों से ध्यान हटाकर बार-बार धर्म, मंदिर-मस्जिद और हिंदू-मुसलमान की बहस में उलझाया जा रहा है?
क्योंकि जब जनता असली सवाल पूछना शुरू करती है, तब राजनीति को भी जवाब देना पड़ता है।
और अब जरा पीछे मुड़कर देखिए...
2016 में नोटबंदी हुई। आम लोगों को अपना पैसा निकालने के लिए बैंकों और ATM के बाहर लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ा।
2020 में कोरोना लॉकडाउन आया। देशभर में कारोबार और रोजगार पर बड़ा असर पड़ा और बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों के सामने घर लौटने का संकट खड़ा हुआ।
इसके बाद लगातार सवाल उठे...
👉 महंगाई पर क्या हुआ?
👉 युवाओं के रोजगार पर क्या हुआ?
👉 छोटे कारोबारियों की परेशानी पर क्या हुआ?
👉 रसोई गैस और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर आम आदमी को कितनी राहत मिली?
अब बात SIR और वोटर लिस्ट की...
आज देश में SIR यानी Special Intensive Revision को लेकर भी बहस चल रही है।
वोटर लिस्ट को अपडेट और जांचने की इस प्रक्रिया में अगर किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से बाहर हो जाता है, तो वह चुनाव में वोट नहीं दे पाएगा।
यहीं से एक बड़ा सवाल पैदा होता है...
अगर किसी पात्र नागरिक का नाम वोटर लिस्ट में नहीं रहेगा, तो वह अपने मताधिकार का इस्तेमाल कैसे करेगा?
गरीब, मजदूर, ग्रामीण और ऐसे लोगों के लिए यह प्रक्रिया कितनी आसान होगी जिनके पास पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं?
यह भी साफ समझना जरूरी है कि वोटर लिस्ट से नाम हटना अपने-आप भारतीय नागरिकता खत्म होने के बराबर नहीं है। नागरिकता और मतदाता सूची दो अलग कानूनी विषय हैं।
लेकिन लोकतंत्र में सवाल यह जरूर है कि हर पात्र नागरिक का मताधिकार सुरक्षित कैसे रहेगा?
चुनाव आयोग SIR को मतदाता सूची को अपडेट और अधिक सटीक बनाने की प्रक्रिया बताता है, जबकि विपक्ष और कई अन्य पक्ष इसके तरीके और संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
इसलिए सवाल पूछना जरूरी है...
किसी पात्र नागरिक का नाम अगर वोटर लिस्ट में नहीं है, तो उसे अपना नाम जुड़वाने का आसान और पारदर्शी रास्ता मिलना चाहिए या नहीं?
अब सवाल BJP से ही नहीं, हर सरकार से है:
👉 रोजगार कहां है?
👉 महंगाई से राहत कब मिलेगी?
👉 युवाओं के भविष्य की गारंटी कौन देगा?
👉 किसानों और छोटे व्यापारियों की स्थिति कब सुधरेगी?
👉 हर पात्र नागरिक का वोट सुरक्षित कैसे रहेगा?
और सबसे बड़ा सवाल...
क्या भारत की राजनीति विकास के मुद्दों पर होगी या हिंदू-मुसलमान के मुद्दों पर?
जनता के सामने मुद्दे होने चाहिए:
रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, सुरक्षा और सम्मान।
क्योंकि चुनाव के समय जनता सिर्फ भाषण नहीं सुनती...
जनता अपने घर का खर्च देखती है,
अपने बच्चों का भविष्य देखती है,
और अपने वोट की कीमत भी समझती है।
सवाल जनता के हैं...
और जवाब सरकार को देना है।
#जनताकेसवाल