26/09/2025
.... गुज़रती लहरें ....
इश्क है ही ये कमाल,
सोचो भी न तो.. खयालों में चला आता है।
होगा कल क्या मोहब्बत में हासिल,
इसी तरह हर बार.. सवालों में चला आता है।।
मोहब्बत है जो बहारों की,
खिज़ां उसे कब तक रोकेगी?
यही ख्याल हर बार..दिल की
दीवारों पे चला आता है।।
मैंने लिख लिखकर साहिल पे,
मिटा डाला था जो नाम ।
गुज़रती लहरों के.. मगर फिर भी
वो इशारों पे चला आता है।।
रोज़ तारों की ये छांव,
मुझे अब रोशन नहीं करती।
मेरे लिए मगर.. अमावस में भी चांद,
तारों में चला आता है।।
लेखक:-
विवेक गुलेरिया
राम नगर कालोनी
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