25/08/2026
पत्रकार ज्योति बंसल सोलन
जोगिंद्रा बैंक सोलन में करोड़ों के ऋण पर गंभीर सवाल, राम पाल-बृज लाल की मिलीभगत उजागर हुई।
सोलन। जोगिंद्रा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक में कथित ऋण अनियमितताओं और बैंक के बहुमूल्य धन को जोखिम में डालने के मामले में NABARD के CVO से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है। शिकायत में अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने तत्कालीन अधिकारी एवं वर्तमान AGM राम पाल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया गया है कि उनकी तैनाती के दौरान अर्की, दाड़लाघाट और ससेवड़ा चंडी शाखाओं में बैंक नियमों की अनदेखी कर करोड़ों रुपये के कई ऋण स्वीकृत एवं वितरित किए गए।
शिकायत में 26 सितंबर 2017 की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि राम पाल को जांच अधिकारी द्वारा 31 बार Delinquent Officer तथा 59 बार Charged Officer बताया गया था। जांच रिपोर्ट में एक ही परिवार के कई सदस्यों को अलग-अलग शाखाओं से ऋण देने, ऋण लेने वालों की भुगतान क्षमता का पर्याप्त आकलन न करने तथा पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित किए बिना ऋण स्वीकृत करने जैसी गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है।
शिकायत में बृज लाल, चेत राम और नीम चंद सहित एक ही परिवार से जुड़े लोगों को SCC, SSI और KCC जैसी अलग-अलग ऋण योजनाओं के तहत ऋण दिए जाने का उल्लेख है। अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने आरोप लगाया कि पहले से ऋण होने तथा कुछ खातों के ओवरड्यू/NPA होने के बावजूद परिवार के सदस्यों को नए ऋण दिए गए।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि राम पाल ने बृज लाल को आठ अलग-अलग ऋण मामलों में गारंटर के रूप में स्वीकार किया, जिसे शिकायतकर्ता ने बैंक नियमों के विपरीत बताते हुए इसकी जांच की मांग की है। शिकायत में कहा गया है कि उपरोक्त ज्यादातर ऋण खाते बाद में NPA की श्रेणी में पहुंच गए। इससे बैंक के बहुमूल्य धन को नुकसान पहुंचाने में राम पाल और बृज लाल के बीच जानबूझ कर की गई मिलीभगत सामने आ गई है।
शिकायतकर्ता अधिवक्ता शर्मा के अनुसार, बृज लाल से संबंधित वर्ष 2010-11 में दिए गए ऋण आज तक पूरी तरह वसूल नहीं हो पाए हैं और करीब ₹21 लाख की मूल ऋण राशि व ब्याज अभी तक बकाया बताई जा रही है। यदि इतने पुराने ऋण वर्षों बाद भी लंबित हैं, तो यह न केवल उस समय ऋण स्वीकृत करने वाले राम पॉल वी अन्य अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि बैंक मुख्यालय के Recovery Section की कार्यप्रणाली और अब तक की वसूली प्रक्रिया पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
सवाल यह भी है कि वर्ष 2010-11 में दिए गए ऋणों की वसूली के लिए पिछले डेढ़ दशक में क्या प्रभावी कदम उठाए गए? यदि बैंक के रिकॉर्ड में ऋण खाते आज भी बकाया हैं, तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित रिकवरी व्यवस्था की जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई?
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि गंभीर जांच निष्कर्षों के बावजूद राम पाल के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि उन्हें लगातार पदोन्नतियां दी गई। अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने यह सवाल भी उठाया है कि जिन अधिकारीयों के विरुद्ध पूर्व में गंभीर अनियमितताओं की जांच हो चुकी हो, उन्हें बाद में अन्य मामलों में Inquiry Officer की जिम्मेदारी कैसे दी गई।
शिकायतकर्ता ने NABARD से पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच, संबंधित ऋण खातों की दोबारा समीक्षा, बैंक को हुए संभावित वित्तीय नुकसान का आकलन, लंबित ऋणों की वसूली की जांच तथा राम पाल, बृज लाल और संबंधित बैंक अधिकारियों की भूमिका तय करने की मांग की है।
मुकेश कुमार शर्मा, एडवोकेट
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट, चंडीगढ़