24/12/2025
आपको कुछ ताजी और सत्य लेकिन क्रूर घटनाएं बताता हूं। आपको केवल यह समझना और बताना है कि सभी घटनाओं में अंतर क्या है? किसका विरोध, किसका समर्थन और क्यों? साथ ही यह भी सोचना कि आखिर किस ओर जाना चाहते हैं हम जो इंसानों को मारकर धर्म को बचाने निकले हैं?
प्रथम घटना बांग्लादेश की है जहां दीपू दास नामक एक हिंदू, दलित युवक किसी फैक्ट्री में काम करता था। उस पर उसी के साथ काम करने वाले कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि इसने हमारी (इस्लाम) धार्मिक भावनाओं को आहत (बेअदबी) किया है। हालांकि जांच में अभी तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला।
कहा यह भी जा रहा है कि फैक्ट्री के मैनेजमेंट ने उसे एक कमरे में बंद कर दिया था और पुलिस को भी सूचना दे दी गई थी और लोगों को शांत करने के लिए झूठा इस्तीफा भी दिलवाया था लेकिन इसी बीच में बेकाबू भीड़ ने सबकुछ तहस–नहस करके दीपू की पीट पीटकर हत्या कर डाली।
दूसरी घटना बिहार के नवादा की है जहां मुस्लिम युवक मोहम्मद अतहर फेरी लगाकर गुजारा करता था। अचानक साइकिल पंचर होने पर वह पंचर दुकान का पता पूछता हैं लेकिन कुछ लोगों ने उसके धर्म को देखकर पीटना शुरू कर दिया और अंततः अतहर अस्पताल में दम तोड़ देता है।
तीसरी घटना केरल की जहां छत्तीसगढ़ का दलित युवक रामनारायण बघेल काम की तलाश में केरल गया था। भाषाई अंतर की वजह से तथा नया होने के चलते भटक गया लेकिन भीड़ ने रामनारायण को बांग्लादेशी समझकर पीट–पीटकर मार डाला। सीपीआईएम ने आरएसएस पर इसका आरोप लगाया है।
ये तमाम घटनाएं इसी दिसंबर महीने की है। कुछ लोग इन्हें अपने धार्मिक नजरिए से देखकर उठा रहे हैं तो कुछ राजनीतक नफा, नुकसान देखकर लेकिन सभी की आड़ में एक भीड़ है जो अमानवीय है। उस अमानवीय भीड़ का धर्म क्या कभी मानवीय हो सकता है? यदि नहीं तो सबको धिक्कार और लानत भेजिएगा।
अब सोचने वाली बात है कि हम लोग किस तरह के इंसान बन गए है।