09/03/2026
नो इफ बट, फैसला ऑन द स्पॉट जैसे शब्द हों या नाना पाटेकर, राजकुमार के डायलॉग्स, फिल्मों में ही अच्छे लगते हैं...
प्रश्न पूछना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन उसकी भी एक मर्यादा और तरीका होता है। क्लास में बच्चे भी शिक्षक से सवाल पूछते हैं, लेकिन मर्यादा में रहकर। पुत्र भी पिता से प्रश्न करता है, पर उसी टोन में नहीं पूछ सकता जिस टोन में पिता पुत्र से पूछता है।
DM, SDM, Teacher और Police — ये सभी अपनी मेहनत और योग्यता से उस स्थान तक पहुँचते हैं। जनता के प्रतिनिधि होने के नाम पर किसी से अनुशासनहीन व्यवहार करना उचित नहीं है। सिस्टम से सवाल कीजिए, लेकिन व्यवस्था और नियमों के भीतर रहकर।
अगर शौचालय गंदा है तो इसका मतलब यह नहीं कि आप शिक्षक का कॉलर पकड़ लें। लोकतंत्र में सही तरीका यह है कि किसी विभाग में अनियमितता है तो उसकी शिकायत पहले उसके वरीय अधिकारी से करिए। कुछ दिन प्रतीक्षा करें यदि कार्रवाई नहीं होती तो जिला स्तरीय अधिकारी को आवेदन दें। इसके बाद पटना में सचिवालय व सीएम तक जा सकते हैं। यदि वित्तीय अपराध है तो आरटीआई का सहारा लेकर उसे उजागर करें।
यदि इस माध्यम से नेतागिरी करनी है तो आप अपनी बात जनता के सामने रखें। अगर जनता को आपकी आवाज और आपका तरीका पसंद आ गया, तो वही जनता आपको अपने सवाल उठाने के लिए सदन तक भेजेगी।
पोस्टमार्टम हाउस में ही अगर कोई गोली से मारी गई हो, तब भी बिना पुलिस के पंचनामा के पोस्टमार्टम नहीं होता। इसी तरह बैंक में भी आप कितने ही सबूत दे दें कि आपका पैसा जमा है, लेकिन पैसा आपको तभी मिलेगा जब आप सही प्रक्रिया से चेक या विदड्रॉल फॉर्म भरेंगे और आपके हस्ताक्षर मिलेंगे।
यदि आप नियमों को छोड़कर केवल ऊँची आवाज में हंगामा करेंगे, तो वह अधिकार नहीं बल्कि अराजकता कहलाएगा।
हमेशा याद रखें, कानून को हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं है।
प्रश्न जरूर उठाइए, लेकिन संवैधानिक और लोकतांत्रिक दायरे में।