21/12/2025
दीपू चंद्र दास भारतीय नहीं थे।
वे बांग्लादेश के नागरिक थे।
लेकिन उन्हें भीड़ ने
पीट-पीटकर मार डाला…
और फिर जला दिया।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि—
वे बांग्लादेश पुलिस की हिरासत में थे।
उन्होंने जान की भीख मांगी थी,
फिर भी सुरक्षा में रहते हुए
उन्हें भीड़ के हवाले कैसे कर दिया गया?
अपराध क्या था?
सिर्फ इतना कि वे हिंदू थे।
यह कोई अचानक भड़की हिंसा नहीं है।
यह उस व्यवस्था की विफलता है,
जहाँ पुलिस की मौजूदगी भी
न्याय और सुरक्षा की गारंटी नहीं रह गई।
राज्य उनकी रक्षा नहीं कर सका।
बल्कि, भीड़ ने इस क्रूर कृत्य का जश्न मनाया।
और बांग्लादेश में इस पर नाममात्र का आक्रोश है।
जब धर्म के आधार पर
जीने और मरने का फ़ैसला होने लगे,
और राज्य मूकदर्शक बना रहे—
तो समझ लीजिए,
एक विकृत और खतरनाक समाज गढ़ा जा रहा है।
यह सिर्फ एक हत्या नहीं,
पूरे सिस्टम पर सवाल है।