Bihar News

Bihar News Bihar News Desk
(1)

26 साल बाद संत से फिर CRPF जवान बने मुरैना के  गिरवर सिंह । इनकी कहानी बड़ी दिलचस्प है । गिरवर सिंह को बचपन से है सेना न...
02/09/2026

26 साल बाद संत से फिर CRPF जवान बने मुरैना के गिरवर सिंह ।

इनकी कहानी बड़ी दिलचस्प है ।

गिरवर सिंह को बचपन से है सेना ने भर्ती होने का शोक था उन्होंने कम उम्र से ही तैयारी शुरू कर दी थी।
और 1991 मे CRPF मे हवलदार पद पर चयन हुआ। करीब 8 साल नौकरी अच्छे से चली और उनका नाम प्रमोशन मे आने बाला था।
लेकिन साल 1999 मे CRPF के एक बड़े अभिकारी से उनका विवाद हो गया।
उस अभिकारी ने उन्हे निलंबित कर दिया इसके बाद जांच बैठाई गई , और 21 october 1999 मे गिरवर सिंह को बर्खास्त कर दिया गया।
इसके बाद कुछ समय घर रहे और फिर संत बन गए और मुरैना की एक गुफा मे पूजा पाठ करने लगे।
और उनका नाम गिरवर दास महाराज पड़ा।
बर्खास्त के बाद गिरवर सिंह ने लखनऊ हाई कोर्ट मे दरवाजा खटखटाया और लडाई चली आ रही थी।
और 2007 मे उनके पक्ष मे फैन्सला आया तो CRPF ने इस पर स्टै लगा दिया।
इसके बाद गिरबर ने हाई कोर्ट की डबल बेंच मे apeal की और लंबी लडाई के बाद 28 अगस्त 2025 का आदेश मिल लेकिन जोइनिंग नही कराई गई।

फिर उन्होंने वकीलों की मदत से आदेश जारी कराये और अंत मे 26 अगस्त 2026 मे जोइनिंग मिली।

मैंने अपना ऑपरेशन एनेस्थीसिया से नौ घंटे पहले रद्द कर दिया। ऑपरेशन मेरा ही होना था — तीस साल के अनुभव वाले न्यूरोसर्जन क...
02/09/2026

मैंने अपना ऑपरेशन एनेस्थीसिया से नौ घंटे पहले रद्द कर दिया। ऑपरेशन मेरा ही होना था — तीस साल के अनुभव वाले न्यूरोसर्जन का।

इनकार का वह काग़ज़ आज भी मेरी दराज़ में पड़ा है। मैंने उसे ख़ुद, अपने हाथ से, रात साढ़े ग्यारह बजे उसी डॉक्टर रूम में लिखा था, जहाँ मैंने बाईस साल गुज़ारे। उसी लिखावट में, जिससे मैं तीस साल ऑपरेशन प्रोटोकॉल पर दस्तख़त करता आया हूँ।

मेरा नाम डॉ. अरविंद माथुर है। मेरी उम्र अट्ठावन साल है। मैं न्यूरोसर्जन हूँ। तीस साल से दिल्ली में रीढ़ के ऑपरेशन करता हूँ।

यह लेख लिखने से पहले तक मैंने अपने ऑपरेशन कभी गिने नहीं थे। अब गिने। तीन हज़ार आठ सौ से ज़्यादा।

तीन हज़ार आठ सौ लोग, जिन्हें मैंने खोला।

और रीढ़ के बारे में मैं एक बात जानता हूँ, जो मरीज़ों से हर दिन कहता हूँ। तीस साल से कहता आ रहा हूँ।

वापसी नहीं होती।

नष्ट हो चुकी डिस्क दोबारा नहीं बनती। घिसी हुई उपास्थि दोबारा नहीं उगती। चिकित्सा बस इतना कर सकती है कि जो नस को दबा रहा है उसे हटा दे और जो हिल रहा है उसे कस दे। धातु से। स्क्रू से। केज से।

मैं इस पर यक़ीन करता था। मुझे दिल्ली में यही सिखाया गया, फिर लंदन में विशेषज्ञता के दौरान भी यही। और मैंने यही आगे बढ़ाया — युवा डॉक्टरों की दो पीढ़ियों तक, जो आज इस देश में ऑपरेशन कर रहे हैं।

और फिर ऑपरेशन की ज़रूरत मुझे ख़ुद पड़ गई।

सिलसिलेवार बताता हूँ, वरना यह किसी पागल का इक़बालिया बयान लगेगा।

सर्जन की एक पेशेवर बीमारी होती है, जिसके बारे में पर्चों में नहीं लिखा जाता। हम खड़े रहते हैं। रीढ़ का ऑपरेशन चार, छह, कभी-कभी आठ घंटे — एक ही मुद्रा में, आगे झुके हुए, सीसे के एप्रन में, एक्स-रे आर्च के नीचे।

सीसे का एप्रन सात किलो का होता है। तीस साल में मैंने उसमें लगभग बीस हज़ार घंटे बिताए हैं।

दर्द इक्यावन की उम्र में शुरू हुआ। पहले लंबे ऑपरेशनों के बाद। फिर हर ऑपरेशन के बाद। फिर बिना किसी वजह के।

अपनी जाँच मैंने ख़ुद की, तीन मिनट में, अपना ही एमआरआई देखकर। खिसकाव के साथ लंबर कैनाल का डिजनरेटिव स्टेनोसिस। बिल्कुल आम मामला। ऐसे मामलों का ऑपरेशन मैं आँखें बंद करके करता हूँ।

किसी को नहीं बताया।

चार साल मैंने दर्दनिवारकों के सहारे ऑपरेशन किए। मेरा एनेस्थीसिया वाला साथी मुझे चेंजिंग रूम में ही ब्लॉक लगा देता था — दोस्ती में, बिना किसी काग़ज़ के, क्योंकि काग़ज़ में दर्ज होने का मतलब होता काम से हटा दिया जाना।

फिर ब्लॉक पूरे ऑपरेशन तक टिकना बंद हो गए। वे चार घंटे चलने लगे।

पिछले साल मार्च में, ज़िंदगी में पहली बार, मैंने बीच ऑपरेशन में टेबल अपने सहायक को सौंप दी। मैं मेज़ का किनारा पकड़े खड़ा रहा और उसे बताता रहा कि कहाँ काटना है, क्योंकि मैं ख़ुद और खड़ा नहीं रह सकता था।

वह बहुत अच्छा लड़का था। उसने न तब कुछ कहा, न बाद में।

एक हफ़्ते बाद मैंने अपना ऑपरेशन तय कर लिया। अपने ही साथी डॉ. संजय भारद्वाज के पास। हमने साथ पढ़ाई की थी। विभाग में मेरे बाद सबसे अच्छे हाथ उन्हीं के हैं।

तारीख़ थी चौदह मई।

और अब वह बात, जिसकी वजह से सब कुछ टूट गया।

मेरे पास एक फ़ाइल है। मैं उसे उन्नीस साल से रखता आ रहा हूँ, और क्लिनिक में उसके बारे में सिर्फ़ दो लोग जानते थे।

यह उन लोगों की फ़ाइल है जिन्होंने मना कर दिया। वे मरीज़, जिन्हें मैंने ऑपरेशन की सलाह दी और जिन्होंने इनकार कर दिया।

मैंने यह दया से शुरू नहीं की थी। मैंने इसे ज़िद में शुरू किया था — युवा सर्जन के तौर पर मैं सबूत जमा करना चाहता था कि ऑपरेशन से इनकार का अंत बुरा होता है। मैं एक शोधपत्र लिखने की तैयारी कर रहा था।

उन्नीस साल मैं वहाँ नाम दर्ज करता रहा और बाद में पता लगाता रहा कि उनका क्या हुआ। कोई साल भर बाद लौटता, कोई दो साल बाद — और पहले से भी बदतर। कोई लौटता ही नहीं, और रिश्तेदारों से पता चलने पर मैं उनका नाम काट देता।

वह शोधपत्र मैंने कभी नहीं लिखा।

क्योंकि लगभग दो हज़ार उन्नीस से उस फ़ाइल में ऐसी प्रविष्टियाँ आने लगीं, जो किसी भी शोधपत्र में फ़िट नहीं बैठती थीं।

मोहनलाल सक्सेना। उनहत्तर साल, मेरठ। स्टेनोसिस, दो हर्निया, दो हज़ार बाईस में इनकार।

चौदह महीने बाद वे मेरे पास जाँच के लिए आए। अकेले। पैदल, बिना छड़ी के, और पहली मंज़िल तक सीढ़ियों से चढ़कर, क्योंकि उस दिन लिफ़्ट ख़राब थी।

मैंने उनके एक्स-रे पाँच मिनट तक देखे। फिर पूछा कि उन्होंने क्या किया।

उन्होंने कहा: „मैं एक आदमी के पास गया था। हरिद्वार के पास एक गाँव है। एक बुज़ुर्ग हैं, जड़ी-बूटियों का काम करते हैं।“

मैंने यह फ़ाइल में लिख लिया और बग़ल में एक प्रश्नचिह्न लगा दिया।

शारदा दुबे। चौहत्तर साल, बरेली। गंभीर मामला, मैंने तीन स्तरों पर स्थिरीकरण की सलाह दी थी। उन्होंने मई में इनकार किया, और अगले अगस्त में बेटी के हाथों मुझे एक चिट्ठी और एक तस्वीर भेजी।

तस्वीर में वे खेत में कुदाल लिए खड़ी हैं।

बेटी ने ज़ुबानी कहा: „माँ ने कहा है कि आप बुरा न मानें।“

द्वारिका प्रसाद। तिरेसठ साल, गोरखपुर। दो बार इनकार किया — इक्कीस में और तेईस में। दूसरी बार उन्होंने मुझसे वह बात कही, जो तब मुझे गुस्ताख़ी लगी थी और अब हर हफ़्ते याद आती है।

उन्होंने कहा: „डॉक्टर साहब, आप अच्छे इंसान हैं। लेकिन आप मुझे वही दे रहे हैं, जो अकेला आपको आता है।“

पिछली बसंत तक फ़ाइल में ऐसी छब्बीस प्रविष्टियाँ थीं। छब्बीस लोग, जिन्होंने मेरा चाकू ठुकराया और साल-दो साल बाद पहले से बेहतर चल रहे थे।

छब्बीस — उन तीन सौ से ज़्यादा लोगों में से, जिन्होंने उन्नीस साल में इनकार किया। यह बहुमत नहीं है। मैं जानता हूँ कि ऐसे आँकड़े कैसे पढ़े जाते हैं।

लेकिन उन छब्बीस में से ग्यारह ने, जब मैंने पूछा, एक ही जगह बताई। हरिद्वार के पास वही गाँव। वही बुज़ुर्ग। जड़ी-बूटियाँ।

ग्यारह लोग, अलग-अलग शहरों से, जो एक-दूसरे को जानते तक नहीं।

तेरह मई को, अपने ही ऑपरेशन से एक रात पहले, मुझे नींद नहीं आई। रात दो बजे उठा, अपने कमरे में गया और वह फ़ाइल निकाल ली।

मैं उसे सुबह चार बजे तक पढ़ता रहा। फिर बैठकर अपने हाथों को देखता रहा।

साढ़े ग्यारह बजे — यानी असल में चौदह मई को, एनेस्थीसिया से नौ घंटे पहले — मैंने ऑपरेशन से इनकार लिख दिया। उसे ड्यूटी वाली नर्स को दे दिया। उसने मेरी ओर देखा और एक शब्द नहीं कहा।

संजय ने सुबह फ़ोन किया। चिल्लाए नहीं। बस इतना पूछा: „तुम्हें पता भी है कि तुम क्या कर रहे हो?“

मैंने कहा: „नहीं।“

यह ईमानदार जवाब था।

चार दिन बाद मैं उस गाँव गया।

नाम नहीं बताऊँगा। हरिद्वार से एक घंटे से भी कम, फिर वह रास्ता, जिस पर मेरी गाड़ी दो बार नीचे से टकराई।

लकड़ी का घर। आँगन। एक छप्पर, जिसके नीचे सूखी जड़ी-बूटियों के गट्ठर लटके हैं — दर्जनों, सिर नीचे किए हुए। और वह ख़ुशबू, जो फाटक से ही टकराती है।

और बाड़ के पास एक बेंच, जिस पर एक आदमी बैठा था।

मैंने उसे तुरंत पहचान लिया।

रामअवतार दीक्षित। आगरा। मैंने उनका दो बार ऑपरेशन किया था — दो हज़ार अठारह और दो हज़ार बीस में। दूसरा ऑपरेशन रिवीज़न था, क्योंकि पहले के बाद उन्हें और तकलीफ़ हो गई थी।

दूसरे के बाद तकलीफ़ और भी बढ़ गई।

मुझे याद है कि वे मेरे सामने बैठकर पूछ रहे थे कि अब आगे क्या। मैंने उन्हें वही कहा, जो ऐसे मामलों में कहा जाता है: „आगे — दर्दनिवारक और आराम।“

चार साल से मैंने उन्हें नहीं देखा था।

वे उस बुज़ुर्ग के आँगन में बेंच पर बैठे थे और मुझसे हाथ मिलाया। खड़े होकर। मुझे देखते ही वे उठ खड़े हुए।

उन्होंने कहा: „डॉक्टर साहब। आप भी यहाँ?“

मैं जवाब नहीं दे सका। मैं किसी और के आँगन के बीचोंबीच खड़ा था — तीस साल के अनुभव वाला न्यूरोसर्जन — और उस आदमी से एक शब्द नहीं कह पाया, जिसे मैंने ख़ुद दो बार काटा था।

उन्होंने कहा: „आप परेशान मत होइए। आपने वही किया, जो आपको आता था।“

ये वही शब्द थे, जो द्वारिका प्रसाद ने कहे थे। दूसरा आदमी, दूसरा शहर, वही वाक्य।

रामनाथ तिवारी ख़ुद मेरे सामने निकले।

उनकी उम्र एक सौ दो साल है।

मुझे तब तक यक़ीन नहीं हुआ, जब तक मैंने उनकी चाल नहीं देखी। मेरी एक पेशेवर आदत है: आदमी की चाल देखकर मैं बता देता हूँ कि उसके एक्स-रे में क्या दिखेगा। दरवाज़े से बिस्तर तक उसे चलते देख लेना मेरे लिए काफ़ी है।

उन्होंने फाटक ख़ुद खोला और बिना छड़ी के पूरा आँगन पार किया।

तीस साल से मैं सत्तर, अस्सी, नब्बे साल के लोगों को चलते देख रहा हूँ। मुझे पता है वह कैसा दिखता है।

वे साठ साल के आदमी की तरह चल रहे थे।

हम आँगन में बैठ गए। उन्होंने पूछा कि मैं कौन हूँ। मैंने सच कहा: „मैं न्यूरोसर्जन हूँ। मेरी फ़ाइल में ग्यारह नाम हैं, और सबने आपका नाम लिया है।“

वे हँसे। धीरे से, बिना किसी जीत के भाव के।

फिर उन्होंने मेरी ओर देखा और कहा: „तुम बाएँ पैर पर खड़े हो।“

मैं बाएँ पैर पर ही खड़ा था। चार साल से उसी पर खड़ा हूँ, क्योंकि वज़न डालते ही दाएँ में कूल्हे तक करंट जाता है। मेरे किसी साथी ने — संजय ने भी, जिन्हें मेरा ऑपरेशन करना था — यह नहीं देखा। वे एमआरआई देखते थे।

उन्होंने कहा: „दिखाओ, तुम बैठते कैसे हो।“

मैं बैठा। उन्होंने देखा। फिर उँगली से मेरी कमर में एक जगह दबाई — ठीक उसी हिस्से पर, जो मेरी एमआरआई रिपोर्ट में निशान लगाकर लिखा था।

तीस साल से मैं छात्रों को पढ़ाता हूँ कि नैदानिक जाँच रिपोर्ट से ज़्यादा ज़रूरी है। और ख़ुद यह करना मैंने प्रैक्टिस के पंद्रहवें साल के आसपास छोड़ दिया था।

वे घर के भीतर गए और एक छोटी डिब्बी लेकर आए। सफ़ेद, बिना किसी भड़कीले लेबल के। बस हाथ से लिखा हुआ नाम।

उन्होंने कहा: „सुबह और शाम एक-एक कैप्सूल, पानी के साथ। दस दिन। अगर फ़ायदा न हो — भूल जाना कि तुम आए थे। लेकिन दस दिन मुझे दो।“

मैंने ले ली। मैं, जो तीस साल से मरीज़ों को समझाता आया हूँ कि मुँह से ली गई कोई भी जड़ी-बूटी जोड़ तक पहुँचती ही नहीं — पेट में ही टूट जाती है — मैंने वह डिब्बी ले ली, बिना संघटन के, बिना किसी प्रमाणपत्र के और बिना एक भी शोध के।

मैंने इसलिए ली, क्योंकि चार दिन पहले मैंने अपना ऑपरेशन रद्द किया था और अब मेरे पास खोने को कुछ बचा ही नहीं था।

पहले हफ़्ते कुछ नहीं।

यानी — बिल्कुल कुछ नहीं, ऐसा भी नहीं। चौथे दिन सुबह मैं करवट लिए बिना बिस्तर से उठा। बस बैठा और खड़ा हो गया। यह मैंने शाम को ही देखा, जब दिन को दोहरा रहा था।

सातवें दिन मैं पूरा ऑपरेशन खड़े होकर कर गया। तीन घंटे चालीस मिनट। बिना ब्लॉक के।

दसवें दिन मैं ऑपरेशन थिएटर से निकला, एप्रन उतारा, अलमारी में टाँगा — और समझा कि मैं वॉशबेसिन तक हाथों का सहारा लेने नहीं जा रहा, जैसा मैं लगातार चार साल से करता आया था।

मैं प्री-ऑप कमरे में अकेला खड़ा रहा और अपनी जगह से हिल नहीं सका।

उसी शाम मैंने उन्हें फ़ोन किया।

उन्होंने मुझे सुना और कहा: „अच्छा है। दो महीने और लो। फिर तुम्हें ज़रूरत नहीं पड़ेगी।“

मैंने उनसे पूछा: „आपको अंदाज़ा है कि अगर यह काम करता है, तो मैं तीस साल से ग़लत काम करता रहा हूँ?“

वे चुप रहे। फिर बोले: „तुमने वही किया, जो तुम्हें सिखाया गया। ये दोनों एक बात नहीं हैं।“

फिर उन्होंने मुझे अपने बेटे के बारे में बताया। अनिल डॉक्टर नहीं हैं। वे इन्हीं जड़ी-बूटियों और तराज़ुओं के बीच बड़े हुए, नुस्खा बचपन से जानते हैं। सालों वे पिता को समझाते रहे कि यह नुस्खा एक गाँव में न रह जाए। आख़िर में उन्होंने एक प्रयोगशाला और ऐसे लोग खोजे, जिन्होंने इसे सामान्य पैकिंग में सामान्य उत्पाद बनाने में मदद की। ताकि आदमी गाँव तक न जाए, बल्कि डिब्बी आदमी तक पहुँचे।

बुज़ुर्ग तुरंत नहीं माने। उनके यहाँ छह महीने की प्रतीक्षा सूची थी, और उन्होंने मुझसे बस एक बात कही: „लोग इंतज़ार नहीं कर पाते थे।“

डेढ़ महीने बाद मेरे दफ़्तर में उस कंपनी का प्रतिनिधि आया, जो हमें स्थिरीकरण की प्रणालियाँ सप्लाई करती है। हम ग्यारह साल से साथ काम कर रहे हैं।

उसने पूछा कि सब ठीक तो है: विभाग में इम्प्लांट वाले ऑपरेशनों की संख्या गिर गई है।

मैंने सच कहा: „मैंने ज़्यादा मना करना शुरू कर दिया है।“

वह मुस्कुराया और बोला कि यह तो ज़ाहिर है डॉक्टर के ज़मीर का मामला है, और फिर उसने मुझे पतझड़ में वियना के सम्मेलन की याद दिलाई। पंजीकरण, हवाई टिकट, होटल — हमेशा की तरह, उनके ख़र्च पर। साथ में एक व्याख्यान, जिसका भुगतान अलग से होता है।

और जोड़ा: „प्रोफ़ेसर साहब, आप समझते हैं, हमारे बजट संख्या से तय होते हैं।“

मैं उस पर ऐसी धमकी नहीं थोपना चाहता, जो हुई ही नहीं। वह शिष्ट था। उसने बस इतना कहा कि यह चलता कैसे है।

मैं उस सम्मेलन में नहीं गया।

दो साथी अब मुझसे बात नहीं करते। उनमें से एक बग़ल के विभाग के प्रमुख हैं, जिनके साथ मैंने बीस साल एक ही कमरे में चाय पी है।

इसीलिए नवंबर में हमारे मुख्य एनेस्थीसिया विशेषज्ञ मेरे पास आए। वही, जो चार साल तक मुझे चेंजिंग रूम में ब्लॉक लगाते रहे।

उन्होंने दरवाज़ा बंद किया और धीरे से पूछा: „अरविंद। सुना है तुम्हारे पास कोई पता है।“

मैंने पूछा: „मरीज़ के लिए?“

उन्होंने कहा: „माँ के लिए।“

वे इक्यासी साल की हैं। आर्थ्रोसिस, कूल्हा। वे पच्चीस साल के अनुभव वाले एनेस्थीसिया विशेषज्ञ हैं और ऑपरेशनों के बारे में ज़्यादातर सर्जनों से ज़्यादा जानते हैं।

मैंने उनसे पूछा: „तो ऑपरेशन क्यों नहीं करा रहे?“

उन्होंने जवाब दिया: „क्योंकि पच्चीस साल से मैं सिरहाने खड़ा रहता हूँ और देखता हूँ कि इक्यासी साल की उम्र में इसका अंत कैसा होता है।“

मैंने उन्हें पता दे दिया।

और अब वह बात, जिसकी वजह से मैं यह सब लिख रहा हूँ।

मेरी माँ। सावित्री देवी। तिरासी साल। झाँसी में रहती हैं, उसी घर में जहाँ मैं बड़ा हुआ।

चार साल तक वे मुझे फ़ोन पर कहती रहीं कि उनके यहाँ „सब ठीक है, बेटा“।

चार साल तक उनका एक बेटा था — न्यूरोसर्जन, प्रोफ़ेसर, विभाग प्रमुख। और चार साल तक उन्होंने मुझे नहीं बताया कि उन्होंने मंदिर जाना छोड़ दिया है, क्योंकि वे पूरी आरती खड़े होकर नहीं कर पातीं।

यह मुझे पड़ोसन से पता चला।

जुलाई में मैं उनके पास वह डिब्बी लेकर गया। क्लिनिक का रेफ़रल नहीं, किसी साथी की सलाह नहीं, ऑपरेशन का कोटा नहीं — बस एक डिब्बी।

पहले हफ़्ते मैं ख़ुद उन्हें सुबह और शाम कैप्सूल देता रहा, क्योंकि वे भूल जाती थीं।

जन्माष्टमी पर उन्होंने पूरी आरती खड़े होकर पूरी की। शाम को उन्होंने मुझे फ़ोन किया और यह बात ऐसे बताई, जैसे इसका कोई मतलब ही न हो।

मैं उन्हें सुनता रहा और फ़ोन पर चुप रहा, क्योंकि मैं बोल नहीं पा रहा था।

मैं ऐसे नतीजे नहीं निकालूँगा, जिन्हें निकालने का मुझे हक़ नहीं। मैंने कोई रैंडमाइज़्ड अध्ययन नहीं किया। मेरे पास कोई नियंत्रण समूह नहीं है। मेरे पास बस उन्नीस साल से रखी एक फ़ाइल है और अपनी कमर।

लेकिन तीस साल मैंने लोगों से „लाइलाज“ शब्द कहा है। मैं उसे पूरे भरोसे से कहता था, क्योंकि मुझे भरोसा था।

अब मैं उसे कम कहता हूँ। पहले पूछता हूँ: „आपने सब कुछ आज़मा लिया है?“

और पिछले दस साल में यही एकमात्र पेशेवर बदलाव है, जिस पर मुझे सचमुच गर्व है।

अगर आप यह पढ़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आपके या आपके माता-पिता के घुटने, कूल्हे, कमर दर्द करते हैं।

शायद आपसे कहा जा चुका है: „आपकी उम्र में यह सामान्य है।“ शायद आपको दवा दुकान से वह मलहम लिखकर दे दिया गया है, जो चार घंटे असर करता है। शायद आपको ऑपरेशन की क़ीमत बता दी गई है — और आपने हिसाब लगाया कि यह कितनी पेंशन के बराबर है।

और शायद आप उसी गलियारे में बैठे हैं, जहाँ मेरे जैसा कोई आपको समझाएगा कि कोई विकल्प नहीं है।

विकल्प है। यह मैं उस आदमी के तौर पर कह रहा हूँ, जो तीस साल इसका उल्टा कहता रहा।

इंतज़ार मत कीजिए कि उपास्थि पूरी तरह ख़त्म हो जाए। इंतज़ार मत कीजिए कि दबी हुई नस मर जाए — डिस्क अब भी लौट सकती है, नस नहीं। यह मैं पक्के तौर पर जानता हूँ, यही मेरी विशेषज्ञता है, और मेरे पेशे में यह अकेली चीज़ है जो नहीं बदली।

इंतज़ार मत कीजिए कि आपके बच्चे आपस में वृद्धाश्रम की बात करने लगें।

इस लेख के नीचे एक नीला बटन है — „और जानें“। वहाँ रामनाथ तिवारी का आधिकारिक लेख है: संघटन, यह काम कैसे करता है, उन लोगों के अनुभव जो अपने पैरों पर खड़े हुए। ध्यान से पढ़िए।

कूरियर तीन-चार दिनों में पहुँचाता है, डिलीवरी पर भुगतान, पूरे भारत में।

यह अपनी माँ को भेजिए। पिता को। पति को। पत्नी को। हर उस इंसान को, जो सुबह कराहते हुए उठता है और आपसे कहता है कि सब ठीक है।

मैंने तीन हज़ार आठ सौ से ज़्यादा ऑपरेशन किए हैं।

और उन सबमें सबसे सही वही निकला, जिसे मैंने एनेस्थीसिया से नौ घंटे पहले रद्द कर दिया।
#स्वास्थ #ईश्वर

सादर,

डॉ. अरविंद माथुर, न्यूरोसर्जन, 58 वर्ष, दिल्ली

बिहार राज्य नागरिक परिषद के महासचिव बने भोजपुर के हरेंद्र बहादुर सिंह, सरकार ने जारी की अधिसूचनाआरा। भोजपुर जिले के लिए ...
01/09/2026

बिहार राज्य नागरिक परिषद के महासचिव बने भोजपुर के हरेंद्र बहादुर सिंह, सरकार ने जारी की अधिसूचना

आरा। भोजपुर जिले के लिए महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। बिहार सरकार के मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग की ओर से जारी अधिसूचना के तहत भोजपुर जिले के हरेंद्र बहादुर सिंह को बिहार राज्य नागरिक परिषद का महासचिव नियुक्त किया गया है। वहीं डॉ. अजय कुमार सिंह को परिषद का उपाध्यक्ष बनाया गया है।
सरकार की ओर से जारी अधिसूचना में बताया गया है कि राज्य नागरिक परिषद में रिक्त पदों पर दोनों पदाधिकारियों की नियुक्ति की गई है। अधिसूचना के अनुसार हरेंद्र बहादुर सिंह, पिता श्री दुक्षेश्वर सिंह, ग्राम पैंवट, पोस्ट बेहरा, जिला भोजपुर (आरा) के निवासी हैं। उन्हें परिषद में महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
विभागीय अधिसूचना में यह भी स्पष्ट किया गया है कि नवनियुक्त उपाध्यक्ष एवं महासचिव को संबंधित विभागीय प्रावधानों के अनुसार वेतन, अन्य सुविधाएं तथा मानदेय देय होगा। यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू माना जाएगा।
भोजपुर से जुड़े हरेंद्र बहादुर सिंह को मिली बड़ी जिम्मेदारी
राज्य नागरिक परिषद में महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर भोजपुर के हरेंद्र बहादुर सिंह की नियुक्ति को जिले के लिए अहम माना जा रहा है। सरकारी अधिसूचना जारी होने के बाद उनके समर्थकों और शुभचिंतकों में खुशी का माहौल है।

दुनिया के एकमात्र वकील जो 41 साल से लड़ रहे संस्कृत भाषा में मुकदमा |कोर्ट-कचहरी में आपने हिंदी और अंग्रेजी का इस्तेमाल ...
01/09/2026

दुनिया के एकमात्र वकील जो 41 साल से लड़ रहे संस्कृत भाषा में मुकदमा |

कोर्ट-कचहरी में आपने हिंदी और अंग्रेजी का इस्तेमाल होते हुए खूब देखा होगा। अगर हम कहें कि भारत में इन्हीं दो भाषाओं में सबसे ज्यादा दलीलें पेश की जाती है तो इसमें कोई शक की बात नहीं होगी।

लेकिन हिंदी और अंग्रेजी की जगह कोई वकील अगर संस्कृत में ही वकालत करने लगे तो वाकई यह सबको हैरान कर सकता है। पर ऐसा सच में है। दरअसल उत्तर प्रदेश के वाराणसी में ऐसे वकील हैं जो ना अंग्रेजी में लिखते हैं नहीं हिंदी में।

उन्होंने अपनी भाषा के रूप में संस्कृत को चुना है। वह अपनी वकालत 41 सालों से संस्कृत भाषा में ही करते हैं। यह वकील हैं आचार्य श्याम उपाध्याय।

आचार्य श्याम उपाध्याय दुनिया के ऐसे एक मात्र वकील हैं जो अपना सारा मुकदमा संस्कृत में ही लड़ते हैं। न्यायालय में वकालतनामा पेश करने की बात हो या शपथ पत्र, प्रार्थना पत्र आदि जमा करने की बात हो, आचार्य श्याम उपाध्याय यह सभी काम संस्कृत भाषा में ही करते हैं।

इतना ही नहीं, आचार्य जब कोर्ट में संस्कृत भाषा में जिरह करने लगते हैं तो विरोधी वकील के पास कोई जवाब नहीं होता है। आचार्य श्याम उपाध्याय की मानें तो वह 40 साल से संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और इसी वजह से वे संस्कृत में ही मुकदमा लड़ते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से देववाणी के प्रति लोगों को जागरूक किया जा सकता है।

ऐसी ही और जानकारी के लिए फॉलो करे और पोस्ट को शेयर करे 🙏

© All Rights Reserved – Parshu Rajput
Unauthorized copying, re-upload or reproduction is strictly prohibited

मुलायम की सरकार में मुख्तार अंसारी के घर छापा मारकर सेना की मशीन गन बरामद करने पर डिप्टी SP शैलेन्द्र सिंह  की यह तस्वीर...
28/08/2026

मुलायम की सरकार में मुख्तार अंसारी के घर छापा मारकर सेना की मशीन गन बरामद करने पर डिप्टी SP शैलेन्द्र सिंह की यह तस्वीर है

कुसूर यह कि मुलायम सरकार में उस मुख़्तार के खिलाफ पोटा लगा दिया, जिसके आगे सब नतमस्तक थे

यूं ही नहीं शैलेन्द्र ने नौकरी को ठोकर मारी होगी

मुख़्तार अंसारी के गुर्गों द्वारा सेना की लाइट गन मशीन चुराने का पर्दाफाश करने पर जिस अफसर को मेडल मिलना था

उस अफसर को मुलायम सरकार में इस तरह जलील कर जेल में डाला गया था

डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह उन पुलिस अधिकारियों में एक हैं जिन्होंने मुख्तार अंसारी पर शिंकजा कसने की कोशिश की थी। लेकिन सरकार के दबाव के तहत उन्हें इस्तीफा तक देना पड़ गया था।

मुलायम सिंह यादव की अल्पमत की सरकार किसी भी कीमत पर मुख्तार अंसारी को बचाना चाहती थी। मेरे ऊपर मुख्तार पर दर्ज मुकदमे से पोटा हटाने का दबाव था। मैंने इंकार किया तो आईजी जोन, डीआईजी रेंज और एसटीएफ के एसएसपी का तबादला कर दिया।

इतना दबाव डाला गया कि अच्छी नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा। मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया गया। बाहर आने पर कहीं नौकरी नहीं करने दी। कोई किराए का मकान तक नहीं देता था। यह दास्तां है एसटीएफ की वाराणसी यूनिट के पूर्व डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह का, जिन्होंने मुख्तार को लाइट मशीन गन बेचने आए तीन बदमाशों को गिरफ्तार किया था।

उनकी इस बहादुरी का इनाम देने के बजाय सरकार खुलकर मुख्तार के समर्थन में आ गयी थी।

माफिया मुख्तार अंसारी की बांदा जेल में मौत के बाद शैलेंद्र सिंह ने कहा कि उस दौरान मुख्तार का भय चरम पर था। उसे सरकार का खुला समर्थन हासिल था। मऊ दंगे में हथियार लेकर घूमने पर किसी की विरोध या कार्रवाई करने की हिम्मत तक नहीं हुई। मैंने यूपी में पहली बार एलएमजी बरामद कराई थी। मुख्तार को जेल भेजने के लिए पोटा लगाया था, जो उस दौर का सबसे सख्त कानून था। हालांकि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव मुख्तार को किसी भी कीमत पर बचाना चाहते थे।

अत्यधिक दबाव में मजबूरीवश मुझे इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि मैंने अपनी बात जनता को बताई कि किस तरह आपकी चुनी हुई सरकार माफिया के निर्देश पर काम कर रही है। मैंने अपनी टीम के साथ एलएमजी बरामद की थी। मेरी ड्यूटी थी कि जनता के लिए कहर बनने वाले ऐसे तत्वों को रोका जाए।

शैलेंद्र ने कहा कि जब हम नौकरी में आते हैं तो पब्लिक सर्वेंट बोला जाता है। बाद में पार्टी के एजेंट बन जाते हैं और उनके मुताबिक फैसले लेने लगते हैं। पुरानी कहावत है कि यदि पुलिस चाह ले तो पत्ता भी नहीं खड़क सकता है। मैंने स्टैंड लेकर अपनी और अपने परिवार की जान को जोखिम में डाला था।

इस्तीफे के बाद उनके खिलाफ वाराणसी में प्रदर्शन/डीएम कार्यालय से जुड़े मामले में FIR हुई और उन्हें गिरफ्तार भी किया गया। 2021 में उत्तर प्रदेश सरकार ने यह मुकदमा वापस ले लिया था

“जब सत्ता के दबाव के सामने झुकने से इनकार किया, तो कुर्सी चली गई… लेकिन शैलेंद्र सिंह ने अपना ईमान नहीं बेचा। यही कहानी बताती है कि वर्दी की असली ताकत पद में नहीं, अपने कर्तव्य के प्रति खड़े रहने में होती है।”

ऐसी ही और जानकारी के लिए फॉलो करे और पोस्ट को शेयर करे 🙏

©

*शयन की सावधानियाँ- #शयन विधान-*सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घंटे) के बाद ही शयन करना।सोने की मुद्रा:1 उल्टा सोये भोगी,...
23/08/2026

*शयन की सावधानियाँ- #शयन विधान-*

सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घंटे) के बाद ही शयन करना।
सोने की मुद्रा:
1 उल्टा सोये भोगी,
2 सीधा सोये योगी,
3 डाबा सोये निरोगी,
4 जीमना सोये रोगी।
शास्त्रीय विधान
आयुर्वेद में ‘वामकुक्षि’ की बात आती हैं, बायीं करवट #सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर हैं।
शरीर विज्ञान के अनुसार चित सोने से रीढ़ की हड्डी को नुकसान और औधा या ऊल्टा सोने से आँखे बिगडती है।
सोने से पहले कितने गायत्री मंत्र करें
सूतां सात, उठता आठ”सोते वक्त सात भय को दूर करने के लिए सात मंन्त्र गिनें और उठते वक्त आठ कर्मो को दूर करने के लिए आठ मंन्त्र गिनें।
सात भय:- इहलोक,परलोक,आदान,अकस्मात ,वेदना,मरण ,अश्लोक (भय)

दिशा घ्यान:-
दक्षिणदिशा (South) में पाँव रखकर कभी सोना नहीं । यम और दुष्टदेवों का निवास है ।कान में हवा भरती है । मस्तिष्क में रक्त का संचार कम को जाता है स्मृति- भ्रंश,मौत व असंख्य बीमारियाँ होती है।

यह बात वैज्ञानिकों ने एवं वास्तुविदों ने भी जाहिर की है।
1:- पूर्व ( E ) दिशा में मस्तक रखकर सोने से विद्या की प्राप्ति होती है।

2:-दक्षिण ( S ) में मस्तक रखकर सोने से धनलाभ व आरोग्य लाभ होता है।

3:-पश्चिम( W ) में मस्तक रखकर सोने से प्रबल चिंता होती है ।

4:-उत्तर ( N ) में मस्तक रखकर सोने से मृत्यु और हानि होती है।

अन्य धर्गग्रंथों में शयनविधि में और भी बातें सावधानी के तौर पर बताई गई है।

शयन की विशेष सावधानियाँ
1:-मस्तक और पाँव की तरफ दीपक रखना नहीं। दीपक बायीं या दायीं और कम से कम 5 हाथ दूर होना चाहिये।
2:-सोते समय मस्तक दिवार से कम से कम 3 हाथ दूर होना चाहिये।
3:-संध्याकाल में निद्रा नहीं लेनी।
4:-शय्या पर बैठे-बैठे निद्रा नहीं लेनी।
5:-द्वार के उंबरे/ देहरी/थलेटी/चौकट पर मस्तक रखकर नींद न लें।
6:-ह्रदय पर हाथ रखकर,छत के पाट या बीम के नीचें और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें।
7:-सूर्यास्त के पहले सोना नहीं।
8:-पाँव की और शय्या ऊँची हो तो अशुभ है। केवल चिकित्स उपचार हेतु छूट हैं।
9:- शय्या पर बैठकर खाना-पीना अशुभ है। (बेड टी पीने वाले सावधान।
10:- सोते सोते पढना नहीं।
11:-सोते-सोते तंम्बाकू चबाना नहीं। (मुंह में गुटखा रखकर सोने वाले कैंसर और #हकलाहट, मंद मति के रोग के लिए तैयार रहें।
12:-ललाट पर #तिलक रखकर सोना अशुभ है (इसलिये सोते वक्त तिलक मिटाने का कहा जाता है।
13:-शय्या पर बैठकर सरोता से सुपारी के टुकड़े करना अशुभ हैं।

सोते समय पूर्व-पश्चिम दिशा में क्यो सोना चाहिए ?
1. पूर्व-पश्चिम दिशा में सोने का कारण
जीव के अंतस्थ चक्रों की यात्रा उचित दिशा में होना और शांत निद्रा लगना
सोते समय सिर पूर्व #दिशा में एवं पैर पश्चिम दिशा में होने चाहिए । पूर्व दिशा से आह्नाददायक सप्त तरंगें प्रक्षेपित होती हैं । इन तरंगों के कारण जीव के शरीर में विद्यमान चक्रों का अचक्रवार स्वरूप में नहीं; अपितु चक्रवार स्वरूप में, अर्थात विपरीत दिशा में न घूमते हुए उचित दिशा में घूमना आरंभ हो जाता है । पूर्व दिशा में सिर करने से इस दिशा से प्रक्षेपित आह्लाददायक सप्त तरंगें जीव के षट्चक्रों द्वारा 10 प्रतिशत अधिक मात्रा में ग्रहण होती हैं । जीव के शरीर में विद्यमान चक्रों की #यात्रा उचित दिशा में होने के कारण, निद्रा द्वारा जीव में निर्मित रजकणों का उसे कष्ट नहीं होता और शांत नींद लगती है । साथ ही रुपहली डोर से संबंधित मन की यात्रा में विशेष बाधाएं उत्पन्न नहीं होतीं ।
टिप्पणी 1 : जीव की स्थूल देह को एवं सूक्ष्म-देह को जोडनेवाली ‘रुपहली डोर’ होती है । जब तक जीव के सुख-दुःख (भोग) होते हैं तब तक जीव इस रुपहली डोर द्वारा स्थूल देह से जुडा होता है । व्यक्ति के सो जाने पर उसकी सूक्ष्म-देह स्थूल देह से निकलकर कहीं भी चली जाए, तब भी वह इस डोर से जुडी होती है और इसीलिए वह पुनः उसी देह में प्रवेश कर सकती है । ध्यान के समय भी ऐसा ही होता है । योगी ध्यान में अपनी सूक्ष्म-देह से निकलकर अपनी अपेक्षानुसार कार्य करते हैं, तब भी वह जीव ‘रुपहली डोर’के कारण ही पुनः उस स्थूल देह में प्रवेश करता है । मृत्यु होने पर यह रुपहली डोर टूट जाती है । तत्पश्चात सूक्ष्म-देह कितने भी प्रयास करे, वह पुनः उस देह में प्रवेश नहीं कर पाती ।
रज-तम कणों की यात्रा
1. सामान्य जीव
मनुष्य द्वारा दिन-भर किए जाने वाले कार्य के कारण जीव में विद्यमान रजकण गतिशील रहते हैं । रजकणों की प्रबलता के कारण संपूर्ण दिन जीव की सूर्यनाडी जागृत रहती है । इसलिए जीव में रज-तम कणों की मात्रा में वृद्धि होती है । देह से इन रज-तम कणों का विघटन उचित पद्धति से हो, इस हेतु रात्रि में पैरों की उंगलियों में स्थित देह शुद्धक चक्र (प्रत्येक कृत्य करते समय स्थूल देह में निर्मित रज-तम कण जीव के शरीर से ऐसे #चक्रों के माध्यम से निकलते हैं । इन चक्रों का मूल उद्देश्य है, ‘देहृकोष की निरंतर शुद्धि करते रहना’ । इसलिए उन्हें ‘देह शुद्धक चक्र’ कहते हैं ।) रात्रि रजकणों की प्रबलता के कारण ये देहशुद्धक चक्र खुलते हैं और पैराेंकी उंगलियों द्वारा रज-तम कण बाहर निकलते हैं । पश्चिम दिशा (शक्तिस्वरूपी कार्य) अस्त होने की दिशा है । इस कारण पैरों की उंगलियों द्वारा प्रक्षेपित रज-तम कण उस दिशा में उत्सर्जित होकर अस्त होते हैं । पूर्व दिशा में उत्पत्ति स्वरूपी शक्ति का प्रक्षेपण होता है । उस दिशा में पैर कर सोने से अस्त होने वाले कणों की यात्रा, उत्पत्तिस्वरूपी शक्ति प्रक्षेपित करने वाली दिशा में होती है । इस कारण पैरों की उंगलियों के पास दोनों प्रकार की शक्तियों के बीच घर्षण होता है और जो शक्ति अधिक बलवान होती है, उसकी विजय होती है । कलियुग के मनुष्य में रज-तम कणों की मात्रा अधिक होने के कारण पैरों से निकलने वाली शक्ति अधिक मात्रा में विजयी होती है । इस कारण वृद्धिंगत रज-तम कण पैरों के माध्यम से नहीं निकलते ।
2. आध्यात्मिक पीडा से मुक्त साधक
मनुष्य के शरीर में 108 देह शुद्धक चक्र होते हैं । नामजप करने से ये सर्व चक्र जागृत होते हैं और अनावश्यक तमो-गुणी कण एवं काली शक्ति निकलती है । दिनभर नामजप करने वाले साधक को पूर्व अथवा पश्चिम दिशा में सिर कर सोने के उपरांत भी कष्ट नहीं होता ।
3. उन्नत पुरुष
उन्नत जीवों का नामजप उच्च मध्यमा अथवा पश्यंति वाणी में होता है, इस कारण उनमें काली शक्ति की निर्मिति अल्प होती है । इसलिए उन्नत जीवो को पूर्व अथवा पश्चिम में से किसी भी दिशा में पैर कर सोने से कष्ट नहीं होता ।
4. पूर्व की ओर सिर कर पूर्व-पश्चिम सोने से जीव सात्त्विक बनना
‘पूर्व-पश्चिम दिशा में सोना चाहिए । इससे सत्त्व, रज एवं तम तरंगों में समतोल रहता है । प्रातः पूर्व दिशा से सत्त्व तरंगें अधिक मात्रा में प्रक्षेपित होती हैं । #ब्रह्मरंध्र द्वारा वातावरण की सत्त्व तरंगें शरीर में प्रवेश करती हैं । उन्हें ग्रहण कर जीव सात्त्विक बनता है । प्रातः जो सत्त्व तरंगें प्राप्त होती हैं, उन्हें ग्रहण कर जीव के दिन का आरंभ सत्त्व से होता है । संक्षेप में, दिन का आरंभ उत्तम प्रकार से हो, इस हेतु पूर्व-पश्चिम दिशा में सोना चाहिए ।
5. पूर्व-पश्चिम दिशा में सोने से #ईश्वर की क्रिया तरंगों का लाभ होना
पूर्व-पश्चिम ही सोना चाहिए, तिरछा नहीं, इसका अध्यात्म शास्त्रीय आधार क्या है ?
6. पूर्व-पश्चिम दिशा में सोना : पूर्व-पश्चिम दिशा में सोने से उस दिशा से संलग्न एवं इन दो दिशाओं की रिक्ति में भ्रमण करने वाली ईश्वर की क्रिया तरंगों का लाभ होता है । ईश्वर की क्रिया शक्ति कार्य करने का बल प्रदान करती है । पूर्व-पश्चिम, इन कार्यमयी दिशाओं की सहायता से जीव के शरीर में सात्त्विक क्रिया तरंगों का संक्रमण होकर नाभिस्थित पंचप्राण कार्यरत होने में सहायता मिलती है । ये पंचप्राण उप-प्राणों के माध्यम से शरीर में विद्यमान त्याज्य सूक्ष्म-वायुओं को बाहर धकेलते हैं । यह जीव की प्राण-देह एवं प्राणमयकोष की शुद्धि में सहायक होता है ।
7. तिरछा सोना : इसके विपरीत तिरछा सोने से वायुमंडल में विद्यमान तिरछी रेखा में कार्यमान तमो-गुणी तिर्यक तरंगें जीव की ओर आकृष्ट होकर शरीर में संक्रमित होती हैं । इसलिए नींद में दुःस्वप्न आना, शरीर की अनावश्यक गतिविधियां होना, अस्वस्थता का अनुभव होना तथा तिर्यक तरंगों की सहायता से वायुमंडल में भ्रमण करने वाली किसी अनिष्ट शक्ति का शरीर में प्रविष्ट होना, ऐसे कष्ट होते हैं । वायुमंडल में तिर्यक तरंगोंके भ्रमण के कारण यथासंभव इस दिशा में न सोएं ।
8. आग्नेय अथवा नैऋत्य दिशामें सिर रखकर सोनेके लिए क्यों नहीं कहा जाता ?
पूर्व एवं पश्चिम दिशाओं में भ्रमण करने वाली तरंगों की दिशा ऊर्ध्वगामी होती है । इस कारण इन तरंगों के माध्यम से प्राप्त सात्त्विकता अधिक मात्रा में निर्गुणप्रवण होती है एवं आग्नेय-नैऋत्य दिशाओं की तुलना में दीर्घकाल तक बनी रहती है । साथ ही पूर्व- पश्चिम दिशाओं में भ्रमण करने वाली तरंगों में विद्यमान पंचतत्त्वों का स्तर आग्नेय-नैऋत्य दिशाओं की अपेक्षा उच्च होने के कारण इन दिशाओं की ओर सिर रखने से जीव को अधिक मात्रा में लाभ मिलता है तथा वह दीर्घकाल तक बना रहता है । इसलिए मुख्यतः पूर्व-पश्चिम दिशाओं को प्रधानता दी जाती है ।
9. दक्षिणोत्तर क्यों न सोएं ?
दक्षिणोत्तर सोने से अधोगामी तथा तिर्यक तरंगों के कार्य के कारण वातावरण में विद्यमान रज-तम कणों का संचालन बढता है । इस कारण अनिष्ट शक्तियों के कार्य को गति मिलने से जीव को अनिष्ट शक्तियों से कष्ट होने की आशंका सर्वाधिक रहती है । इसलिए यथासंभव दक्षिणोत्तर न सोएं ।
दक्षिण की ओर पैर कर सोने से यमलोक एवं पाताललोक के स्पंदन एकत्रित होकर रज-तम तरंगें जीव की ओर आकर्षित होना
दक्षिण दिशा यम की, रज-तम तरंगों की एवं कष्ट की दिशा है । साथ ही जीव के शरीर में शक्ति का प्रवाह ऊपर की दिशा में ईश्वर-प्राप्ति की ओर तथा नीचे की दिशा में अर्थात पैर से पाताल की ओर जाता है । दक्षिण की ओर पैर कर सोने से यमलोक एवं पाताललोक के स्पंदन एकत्रित होते हैं और जीव रज-तम तरंगें आकर्षित करता है । इस कारण मनुष्य को नींद न आना, दुःस्वप्न आना, नींद में भय लगना अथवा घबराकर उठना आदि कष्ट होते हैं । इसलिए दक्षिण की ओर पैर कर नहीं सोते ।
10. साधना प्रारंभ करने के उपरांत विविध दिशाओं में सिर रखकर सोने से हुई अनुभूतियां
साधना आरंभ करने से पूर्व मैं किसी भी दिशा में सिर रखकर सोता था । तब मुझे किसी भी प्रकार के कष्ट का अनुभव नहीं होता था; परंतु सनातन संस्था के मार्गदर्शनानुसार साधना आरंभ करने के चार माह पश्चात मुझे निम्नानुसार प्रतीत हुआ ।
दक्षिण दिशा में सिर रखकर सोना
मैं सदा ही दक्षिण दिशा की ओर सिर रखकर सोता था । दोपहर को कुछ समय के लिए सोना, मेरा स्वभाव (आदत) है । दोपहर नींद से उठने के उपरांत मुझे शारीरिक एवं मानसिक अस्वस्थता प्रतीत होती थी । वह इतनी बढ जाती थी कि मैं एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाता था । मैं भिन्न दशाओं में बैठा रहता । मुझे स्वस्थ एवं अच्छा प्रतीत हो, इसके लिए मेरी पत्नी मेरी पीठ पर तेल मलकर धीरज बंधाती थी । यह सब 45 मिनट से एक घंटे तक चलता था, तत्पश्चात मेरा कष्ट अपने आप न्यून हो जाता था । हमने एक देवालय के पुरोहित से इस संबंध में पूछा, तब उन्होंने बताया, ‘‘आपकी दादी की मृत्यु के उपरांत उनके लिए आपने कुछ क्रियाकर्म नहीं किया है; इसलिए आपको पूर्वज दोष के कारण इस प्रकार कष्ट हो रहा है ।’’ कष्टों के निवारण हेतु उन्होंने विशेष पूजा करने के लिए कहा । साथ ही एक विशेष दिन पर ब्राह्मण एवं ग्रामदेवता को अन्नदान एवं वस्त्रदान करने के लिए कहा । पुरोहित के कहे अनुसार मैंने सबकुछ किया; परंतु उन कष्टों का निवारण नहीं हुआ ।
पूर्व अथवा पश्चिम दिशा में सिर रखकर सोना
वर्ष 2000 में एक दिन दोपहर को जब मैं सोने गया, तब मुझे लगा कि मेरे बिछौने पर कुछ तो है, जो मुझे कष्ट दे रहा है ।’ इसीलिए मैंने भूमि पर सोने का निश्चय किया । मेरे पलंग के आगे अत्यल्प खुला स्थान होने से मैं केवल ‘पूर्व-पश्चिम’ अथवा ‘पश्चिम-पूर्व’दिशाओं में ही सो सकता था । इसलिए मैं पश्चिम दिशा की ओर सिर करके सो गया । तब मुझे दक्षिणोत्तर दिशा में सोने की तुलना में अधिक अच्छा अनुभव हुआ । मुझे 45 प्रतिशत अच्छा एवं 55 प्रतिशत कष्ट का अनुभव हुआ । तब मेरे ध्यान में आया कि ‘हम किस दिशा की ओर सिर करके सोते हैं, उससे हमारा कष्ट संबंधित हो सकता है ।’अगले दिन मैं पूर्व दिशा की ओर सिर रखकर सोया । तब मुझे प्रतीत हुआ कि मेरा कष्ट 100 प्रतिशत घट गया है । तत्पश्चात मैं पूर्व दिशा की ओर सिर कर सोने लगा । तबसे मेरा कष्ट पूर्णरूप से मिट गया ।’
वास्‍तु के अनुसार सोने के नियम :
शयनकक्ष वास्‍तु के अनुसार क्‍यों न निर्मित किया गया हो, किन्तु यदि आपको सोने के नियम नहीं मालूम हैं तो आप तनावग्रस्‍त रहेंगे। यहां हम आपको बता रहे हैं शास्त्र सम्मत सोने के कुछ नियम :
1 सोते समय वास्तु के अनुसार सिर सदैव दक्षिण में व पैर उत्तर दिशा में होने चाहिये अगर ऐसा किसी कारण वश यह संभव न हो तो यह स्मरण रहे कि इसका विपरीत कभी न करें अर्थात उत्तर दिशा में सिर व दक्षिण में पैर कदापि न करें।
2 बेड या पलंग आरामदायक होना चाहिए, परन्तु बेड के बीचों-बीच कोई लैम्प, पंखा, इलैक्ट्रानिक उपकरण आदि नहीं होना चाहिए। अन्यथा शयनकर्ता का पाचन प्रायः खराब रहता है।
3 घड़ी को कभी भी सिर के नीचे या बिस्तर या बेड के पीछे रखकर नहीं सोना चाहिए। घड़ी को बेड के सामने भी नहीं लगाना चाहिए अन्यथा बेड पर सोने वाला जातक हमेशा चिन्ताग्रस्त या तनाव में रहता है। घड़ी को बिस्तर के दायीं अथवा बायीं तरफ ही लगाना हितकर रहता है।
4 किसी भी सदस्य को बुरे स्वप्न आते हो तो गंगा जल सिरहाने रख कर सोएँ।
5 अर्ध चनद्रकार या गोल तकिये वाला पलंग या बेड वायु तत्व का प्रतिधिनित्व करता है। जो लोग फैक्ट्री कारखाने, पेपर मिल ,शुगर मिल या लकड़ी के कारखाने में कार्यरत हो उनके लिए इस प्रकार का पलंग या बेड विशेष लाभकारी रहता है।
6 तिकोने कोने वाला पलंग या बेड किसी भी जातक के लिए शुभ नहीं माना जाता है। इस प्रकार के बेड में अग्नितत्व की प्रधानता रहती हैं, जिसके फलस्वरूप नींद में बाधा पहुंचती है।
7 चोकोर तकिया वाला पलंग या बेड पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। जिन लोगों का पृथ्वी तत्व में जन्म हुआ हैए उनके लिए चैकोर प्रकार के तकिया शुभ माने जाते है। चौकोर तकिया वाले पलंग या बेड उन लोगों के लिए भी शुभ होते हैं, जो किसी प्रकार का व्यवसाय करते है।
8 लहरदार घेरों वाला पलंग या बेड जल तत्व का प्रतीक माना जाता है। जल तत्व में जन्म लेने वाले व्यक्तियों जैसे- कलाकार, संगीतकार, डिजाइनकार एंव राजनैतिक व्यक्तियों के लिए विशेषकर लाभकारी प्रतीत होता है। जिन जातकों का चन्द्रमा बलवान होए उनके लिए भी इस प्रकार के बेड शुभ माने जाते हैं।
9 बेड पर सादी डिजाइन तकिये व चादर रखने चाहिए न कि रंग- बिरंगी व अधिक डिजाइन वाले हो।
10 बेड रूम में मन्दिर व पूर्वजों की तस्वीरें न रखें।
11 सोने से पूर्व ध्यान , बड़ो को प्रणाम करके सोना चाहिए !
12 बेड के नीचे कुछ भी नहीं रखना चाहिए , आज कल बॉक्स बेड का प्रचलन अनिद्रा अथवा अतिनिद्रा की बीमारिया लाता है !
13 बेड का तकिया-सिरहाना दीवार के पास हो , बीचोबीच कमरे में नहीं सोना चाहिए , लोग पंखे के बिलकुल नीचे सोते है , यह ठीक नहीं है !
14 काले या बहुत डार्क रंग की बेडशीट या तकिया लगाने से डरावने स्वप्न बहुत आते है अतः हलके रंग प्रयोग करें.।
#प्राणयोग #आयुर्वेद #स्वास्थ #निद्रा #शयन #सोना

🙏🚩🙏

Address

Patna

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Bihar News posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Bihar News:

Shortcuts

Share