16/10/2025
1. शाब्दिक अर्थ व भावार्थ:
"अपना काम बनता भा!र में जाए जनता" (अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता): इसका सीधा सा मतलब है कि जिन पर जनता की सेवा का दायित्व है, वे सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हैं। जनता की परेशानियाँ और दुख उनके लिए मायने नहीं रखतीं।
"नाले में गिर गए झींगा-भात-झींगा-भात करते हुए": यह एक बहुत ही सटीक रूपक है।
"झींगा-भात": बिहार/पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक साधारण और सामान्य लोकप्रिय भोजन है। यह आम जनता के सादगीपूर्ण जीवन का प्रतीक है।
"नाले में गिर गए": इसका मतलब है कि वह आम जनता (जिसका प्रतिनिधित्व 'झींगा-भात' कर रहा है) मुश्किलों, गंदगी और हालात की दलदल में फंस गई है।
"झींगा-भात-झींगा-भात करते हुए": यह दर्शाता है कि जनता अपनी दैनिक जीवन की साधारण जद्दोजहद (रोटी, रोजी, पेट भरने की लड़ाई) में ही लगी हुई है, और इसी संघर्ष के दौरान वह बदहाल स्थितियों (नाले) का शिकार हो गई है।
"पर कोई सुध नहीं लेने वाला!": यह पूरी स्थिति पर दुख और क्रय का अंतिम सुर है। यह बताता है कि जनता की इस दुर्दशा को सुधारने के लिए कोई नहीं आ रहा है। नेता, प्रशासन, या जिम्मेदार लोग पूरी तरह से उदासीन हैं।
2. समग्र संदेश:
इस कहावत/कविता का समग्र संदेश सत्ता और व्यवस्था के प्रति गहरी निराशा और क्षोभ व्यक्त करना है। इसका संदेश है:
"जनता के प्रतिनिधि और शासक वर्ग तो बस अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। आम आदमी अपने छोटे-छोटे सुख-दुख और रोजी-रोटी के संघर्ष में ही इतना व्यस्त है कि वह बदहाल व्यवस्था और गंदगी में धंसता चला जा रहा है। और सबसे दुखद बात यह है कि उसे इस हालात से निकालने वाला कोई नहीं है।"
आपकी यह पंक्ति वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर एक सटीक और मार्मिक टिप्पणी है। यह दर्शाती है कि आम आदमी खुद को व्यवस्था द्वारा छला हुआ और उपेक्षित महसूस कर रहा है।