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।। जय माता दी ।।
11/10/2024

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माता पार्वती को क्यों करना पड़ा शिव का दान🍀एक दिन पार्वतीजी ने भगवान शंकर से कहा-'मैं एक श्रेष्ठ पुत्र चाहती हूँ ।' भगवा...
29/05/2023

माता पार्वती को क्यों करना पड़ा शिव का दान🍀

एक दिन पार्वतीजी ने भगवान शंकर से कहा-'मैं एक श्रेष्ठ पुत्र चाहती हूँ ।' भगवान शंकर ने पार्वतीजी को 'पुण्यक' नामक महान व्रत करने को कहा।

पार्वतीजी ने शुभ मुहुर्त में व्रत आरम्भ करके पूरे वर्ष श्रद्धा के साथ व्रत किया। व्रत की समाप्ति पर पुरोहित सनत्कुमार ने पार्वतीजी से दक्षिणास्वरूप उनके पति को ही माँग लिया।

यह सुनकर पार्वतीजी बेहोश हो गयीं। उनके होश में आने पर भगवान शंकर ने उन्हें समझाते हुए कहा कि ब्राह्मण को संकल्प की हुई दक्षिणा उसी समय न देने से वह बढ़कर कई गुनी हो जाती है।

ब्रह्माजी ने भी पार्वतीजी से कहा-'या तो तुम दक्षिणा में अपने पति को प्रदान करो या अपने कठोर तप का फल भी त्याग दो।'

पुरोहित सनत्कुमार ने भी पार्वतीजी से कहा-'दक्षिणा न मिलने पर मैं तुम्हारे समस्त कर्मों का फल प्राप्त कर लूंगा।'

पार्वतीजी ने कहा-'दक्षिणा देने से धर्म और पुत्र की प्राप्ति से मेरा क्या हित होगा? पुत्र पति का ही वंश होता है किन्तु उसका मूल तो पति ही होता है । मूलधन के नष्ट होने पर तो सारा व्यापार ही नष्ट हो जाएगा।

भगवान नारायण ने पार्वतीजी को समझाते हुए कहा-'शिवे ! इस समय तुम अपने पति महादेव को दक्षिणा में देकर अपना व्रत पूर्ण कर लो। फिर तुम पुरोहित को गोमूल्य देकर अपने पति को लौटा लेना।'

पार्वतीजी ने हवन की पूर्णाहुति की और अपने प्राणनाथ शिव को पुरोहित को दक्षिणा रूप में दे दिया। दक्षिणा देने के बाद पार्वतीजी ने पुरोहित से कहा- मैं आपको एक लाख सुन्दर गाय प्रदान करुंगी, आप मेरे पति को लौटा दें।'

पुरोहित ने पार्वतीजी से कहा-'मैं ब्राह्मण हूँ । मैं एक लाख गौएं लेकर क्या करुंगा । इस दुर्लभ रत्न (शिवजी) के सामने इन गौओं की क्या तुलना ?

कोमलहृदया पार्वतीजी पुरोहित की बात सुनकर बिना जल की मछली की भांति छटपटाने लगीं । पार्वतीजी सोचने लगीं-'मैंने यह कैसी मूर्खता की, पुत्र के लिए एक वर्ष तक पुण्यक व्रत करने में इतना कष्ट भोगा पर फल क्या मिला? पुत्र तो मिला ही नहीं, पति को भी खो बैठी।

वे व्रत के आराध्य श्रीकृष्ण की स्तुति करने लगीं।

उसी समय आकाश में तेज समूह प्रकट हुआ जिसके मध्य विश्वमोहन श्री कृष्ण-स्वरूप विराजमान थे। ऐसे अनूप रूप को देखकर भगवती पार्वती उसी के सदृश पुत्र की कामना करने लगीं और उसी क्षण उन्हें वह वर भी प्राप्त हो

हनुमान चालीसा:श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।बुद्धिहीन तनु जानिके, ...
28/05/2023

हनुमान चालीसा:

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
चौपाई :
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
कांधे मूंज जनेऊ साजै।
संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बन्दन।।
विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे।।
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना।।
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै।।
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै।।
अन्तकाल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत

जब एक शख्स लगभग पैंतालीस वर्ष के थे तब उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। लोगों ने दूसरी शादी की सलाह दी परन्तु उन्होंने...
27/05/2023

जब एक शख्स लगभग पैंतालीस वर्ष के थे तब उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। लोगों ने दूसरी शादी की सलाह दी परन्तु उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि पुत्र के रूप में पत्नी की दी हुई भेंट मेरे पास हैं, इसी के साथ पूरी जिन्दगी अच्छे से कट जाएगी।

पुत्र जब वयस्क हुआ तो पूरा कारोबार पुत्र के हवाले कर दिया। स्वयं कभी अपने तो कभी दोस्तों के आॅफिस में बैठकर समय व्यतीत करने लगे।

पुत्र की शादी के बाद वह ओर अधिक निश्चित हो गये। पूरा घर बहू को सुपुर्द कर दिया।

पुत्र की शादी के लगभग एक वर्ष बाद दोहपर में खाना खा रहे थे, पुत्र भी लंच करने ऑफिस से आ गया था और हाथ–मुँह धोकर खाना खाने की तैयारी कर रहा था।

उसने सुना कि पिता जी ने बहू से खाने के साथ दही माँगा और बहू ने जवाब दिया कि आज घर में दही उपलब्ध नहीं है। खाना खाकर पिताजी ऑफिस चले गये।

थोडी देर बाद पुत्र अपनी पत्नी के साथ खाना खाने बैठा। खाने में प्याला भरा हुआ दही भी था। पुत्र ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और खाना खाकर स्वयं भी ऑफिस चला गया।

कुछ दिन बाद पुत्र ने अपने पिताजी से कहा- ‘‘पापा आज आपको कोर्ट चलना है, आज आपका विवाह होने जा रहा है।’’

पिता ने आश्चर्य से पुत्र की तरफ देखा और कहा-‘‘बेटा मुझे पत्नी की आवश्यकता नही है और मैं तुझे इतना स्नेह देता हूँ कि शायद तुझे भी माँ की जरूरत नहीं है, फिर दूसरा विवाह क्यों?’’

पुत्र ने कहा ‘‘ पिता जी, न तो मै अपने लिए माँ ला रहा हूँ न आपके लिए पत्नी,
*मैं तो केवल आपके लिये दही का इन्तजाम कर रहा हूँ।*

कल से मै किराए के मकान मे आपकी बहू के साथ रहूँगा तथा आपके ऑफिस मे एक कर्मचारी की तरह वेतन लूँगा ताकि *आपकी बहू को दही की कीमत का पता चले.
*-माँ-बाप हमारे लिये*
*ATM कार्ड बन सकते है,*
*तो ,हम उनके लिए*
*Aadhar Card तो बन ही सकते है.

एक बनिया था 5 रुपए की एक रोटी बेचता था। उसे रोटी की कीमत बढ़ानी थी लेकिन बिना राजा की अनुमति कोई भी अपने दाम नहीं बढ़ा स...
27/05/2023

एक बनिया था 5 रुपए की एक रोटी बेचता था। उसे रोटी की कीमत बढ़ानी थी लेकिन बिना राजा की अनुमति कोई भी अपने दाम नहीं बढ़ा सकता था। लिहाजा राजा के पास बनिया पहुंचा, बोला राजाजी मुझे रोटी का दाम 10 करना है। राजा बोला तुम 10 नहीं 30 रुपए करो, बनिया बोला महाराज इससे तो हाहाकार मच जाएगा, राजा बोला इसकी चिंता तुम मत करो, तुम 10 रुपए दाम कर दोगे तो मेरे राजा होने का क्या फायदा, तुम अपना फायदा देखो और 30 रुपए दाम कर दो, अगले दिन बनिये ने रोटी का दाम बढ़ाकर 30 रुपए कर दिया, शहर में हाहाकार मच गया, तभी सभी जनता राजा के पास पहुंचे, बोले महाराज यह बनिया अत्याचार कर रहा है, 5 की रोटी 30 में बेच रहा है, राजा ने अपने सिपाहियों को बोला उस गुस्ताख बनिए को मेरे दरबार में पेश करो, बनिया जैसे ही दरबार में पहुंचा, राजा ने गुस्से में कहा गुस्ताख तेरी यह मजाल तूने बिना मुझसे पूछे कैसे दाम बढ़ा दिया, यह जनता मेरी है तू इन्हें भूखा मारना चाहता है, राजा ने बनिए को आदेश दिया तुम रोटी कल से आधे दाम में बेचोगे, नहीं तो तुम्हारा सर कलम कर दिया जाएगा, राजा का आदेश सुनते ही पूरी जनता ने जोर से बोला.... महाराज की जय हो , महाराज की जय हो, महाराज की जय हो। नतीजा सुनिए..
अगले दिन से 5 की रोटी 15 में बिकने लगी।🤭

अब जनता भी खुश...बनिया भी खुश...और राजा भी खुश।

जनता को मूर्ख बनाने में माहिर को ही जनता कुशल शासक मान लेती है । इसको कहते हैं विवेक शून्यता।

27/05/2023
इस टिन के बॉक्स का 90s के समय घरों में एक अलग ही भौकाल था 😍😍,मेरे दादा जी इस बॉक्स में दाढ़ी बनाने(शेविंग करने) का सामान ...
27/05/2023

इस टिन के बॉक्स का 90s के समय घरों में एक अलग ही भौकाल था 😍😍,मेरे दादा जी इस बॉक्स में दाढ़ी बनाने(शेविंग करने) का सामान रखते थे 👍👍
आजकल के बच्चों को पता भी नही होगा ये बला है क्या 😆
इस बॉक्स में गैस मेंटल आते थे जिससे गैस की लालटेन या घासलेट की लालटेन में बांधकर इससे उजाला करने का एक मात्र साधन होता था । हमारे यहां 90s के समय शादी विवाह के कार्यक्रम में सिर्फ इसी का उपयोग होते देखा है । दूर दूर तक जनरेटर तक कि सुविधा नही थी 👍
यादें बचपन की 📺 📷

इसे कहते है कसक ओर चाहतट्रेन चलने को ही थी कि अचानक कोई जाना पहचाना सा चेहरा जर्नल बोगी में आ गया। मैं अकेली सफर पर थी। ...
24/05/2023

इसे कहते है कसक ओर चाहत

ट्रेन चलने को ही थी कि अचानक कोई जाना पहचाना सा चेहरा जर्नल बोगी में आ गया। मैं अकेली सफर पर थी। सब अजनबी चेहरे थे। स्लीपर का टिकिट नही मिला तो जर्नल डिब्बे में ही बैठना पड़ा। मगर यहां ऐसे हालात में उस शख्स से मिलना। जिंदगी के लिए एक संजीवनी के समान था।

जिंदगी भी कमबख्त कभी कभी अजीब से मोड़ पर ले आती है। ऐसे हालातों से सामना करवा देती है जिसकी कल्पना तो क्या कभी ख्याल भी नही कर सकते ।

वो आया और मेरे पास ही खाली जगह पर बैठ गया। ना मेरी तरफ देखा। ना पहचानने की कोशिश की। कुछ इंच की दूरी बना कर चुप चाप पास आकर बैठ गया। बाहर सावन की रिमझिम लगी थी। इस कारण वो कुछ भीग गया था। मैने कनखियों से नजर बचा कर उसे देखा। उम्र के इस मोड़ पर भी कमबख्त वैसा का वैसा ही था। हां कुछ भारी हो गया था। मगर इतना ज्यादा भी नही।

फिर उसने जेब से चश्मा निकाला और मोबाइल में लग गया।

चश्मा देख कर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ। उम्र का यही एक निशान उस पर नजर आया था कि आंखों पर चश्मा चढ़ गया था। चेहरे पर और सर पे मैने सफेद बाल खोजने की कोशिश की मग़र मुझे नही दिखे।

मैंने जल्दी से सर पर साड़ी का पल्लू डाल लिया। बालो को डाई किए काफी दिन हो गए थे मुझे। ज्यादा तो नही थे सफेद बाल मेरे सर पे। मगर इतने जरूर थे कि गौर से देखो तो नजर आ जाए।

मैं उठकर बाथरूम गई। हैंड बैग से फेसवाश निकाला चेहरे को ढंग से धोया फिर शीशे में चेहरे को गौर से देखा। पसंद तो नही आया मगर अजीब सा मुँह बना कर मैने शीशा वापस बैग में डाला और वापस अपनी जगह पर आ गई।

मग़र वो साहब तो खिड़की की तरफ से मेरा बैग सरकाकर खुद खिड़की के पास बैठ गए थे।

मुझे पूरी तरह देखा भी नही बस बिना देखे ही कहा, " सॉरी, भाग कर चढ़ा तो पसीना आ गया था । थोड़ा सुख जाए फिर अपनी जगह बैठ जाऊंगा।" फिर वह अपने मोबाइल में लग गया। मेरी इच्छा जानने की कोशिश भी नही की। उसकी यही बात हमेशा मुझे बुरी लगती थी। फिर भी ना जाने उसमे ऐसा क्या था कि आज तक मैंने उसे नही भुलाया। एक वो था कि दस सालों में ही भूल गया। मैंने सोचा शायद अभी तक गौर नही किया। पहचान लेगा। थोड़ी मोटी हो गई हूँ। शायद इसलिए नही पहचाना। मैं उदास हो गई।

जिस शख्स को जीवन मे कभी भुला ही नही पाई उसको मेरा चेहरा ही याद नही😔

माना कि ये औरतों और लड़कियों को ताड़ने की इसकी आदत नही मग़र पहचाने भी नही😔

ये सिर्फ़ तस्वीर नहीं है ये आत्मसंतुष्टि है पूज्य सरकार की…जिस जंगल में कथा करने से लोग हिचकते है उस जंगल में आनंद की अद...
24/05/2023

ये सिर्फ़ तस्वीर नहीं है ये आत्मसंतुष्टि है पूज्य सरकार की…जिस जंगल में कथा करने से लोग हिचकते है उस जंगल में आनंद की अद्भुत धारा प्रवाहित कर रहे है पूज्य सरकार वो भी दिल से….

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