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17/02/2026

#दिल्ली #बिहार #यादव #यादव_जी #यदुकुल #पुलिस

17/02/2026
17/02/2026

जमुई जिलान्तर्गत विगत 24 घंटे में पुलिस द्वारा की गयी कार्रवाई एवं उपलब्धि से संबंधित विवरणीः-





Bihar Police
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Information & Public Relations Department, Government of Bihar

   #बिहार  #दिल्ली Tejashwi Yadav     Tej Pratap Yadav Rahul Gandhi Narendra Modi Yogendra Yadav
17/02/2026

#बिहार #दिल्ली Tejashwi Yadav Tej Pratap Yadav Rahul Gandhi Narendra Modi Yogendra Yadav

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17/02/2026

*🔰 अमावस्या के दिन ही क्यों लगता है सूर्य ग्रहण? क्या है 'रिंग ऑफ फायर'? 🔰*

*Surya Grahan 2026:* साल का पहला सूर्य ग्रहण 17 फरवरी को लगने जा रहा है, जिसे लेकर लोगों के मन में बहुत सारे सवाल और शंकाएं हैं, क्योंकि वैदिक धर्म में सूर्य ग्रहण को अच्छा नहीं माना जाता है। वैसे तो ये खगोलीय घटना है लेकिन ज्योतिष विद्या में इसे शुभ नहीं मानते हैं और इसी वजह से ग्रहण काल के दौरान पूजा-पाठ और शुभ काम नहीं होते हैं।

लेकिन लोगों को भयभीत होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि 17 फरवरी को लगने वाला सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखेगा। इसलिए इसका सूतक काल नहीं लगेगा और ना ये प्रभावी होगा।

आपको बता दें कि जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच आता है तब ये तीनों खगोलीय पिंड एक सीध में आ जाते हैं, जिससे कुछ देर के लिए सूर्य की छाया पृथ्वी पर नहीं पड़ती है तो इस स्थिति को सूर्य ग्रहण कहा जाता है। ये खगोलीय घटना हमेशा अमावस्या को घटती है, जिसके पीछे भी बहुत बड़ा खास कारण है।

*>> सूर्य ग्रहण केवल अमावस्या को लगता है कितने बजे लगेगा सूर्य ग्रहण? कहां-कहां दिखेगा सूर्य ग्रहण सूर्य ग्रहण के दौरान क्या करें?

17/02/2026

*📜 17 फरवरी 📜*

*🌹 स्वतंत्रता सेनानी रानी मां गाइडिन्ल्यू // पुण्यतिथि 🌹*

जन्म : 26 जनवरी 1915
मृत्यु : 17 फरवरी 1993

देश की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश जेल में भीषण यातनाएँ भोगने वाली गाइडिन्ल्यू का जन्म 26 जनवरी, 1915 को नागाओं की रांगमेयी जनजाति में हुआ था। केवल 13 वर्ष की अवस्था में ही वह अपने चचेरे भाई जादोनांग से प्रभावित हो गयीं। जादोनांग प्रथम विश्व युद्ध में लड़ चुके थे।

युद्ध के बाद अपने गाँव आकर उन्होंने तीन नागा कबीलों जेमी, ल्यांगमेयी और रांगमेयी में एकता स्थापित करने हेतु ‘हराका’ पन्थ की स्थापना की। आगे चलकर ये तीनों सामूहिक रूप से जेलियांगरांग कहलाये। इसके बाद वे अपने क्षेत्र से अंग्रेजों को भगाने के प्रयास में लग गयेे।

इससे अंग्रेज नाराज हो गये। उन्होंने जादोनांग को 29 अगस्त 1931 को फाँसी दे दी; पर नागाओं ने गाइडिन्ल्यू के नेतृत्व में संघर्ष जारी रखा। अंग्रेजों ने आन्दोलनरत गाँवों पर सामूहिक जुर्माना लगाकर उनकी बन्दूकें रखवा लीं। 17 वर्षीय गाइडिन्ल्यू ने इसका विरोध किया। वे अपनी नागा संस्कृति को सुरक्षित रखना चाहती थीं। हराका का अर्थ भी शुद्ध एवं पवित्र है। उनके साहस एवं नेतृत्वक्षमता को देखकर लोग उन्हें देवी मानने लगे।

अब अंग्रेज गाइडिन्ल्यू के पीछे पड़ गये। उन्होंने उनके प्रभाव क्षेत्र के गाँवों में उनके चित्र वाले पोस्टर दीवारों पर चिपकाये तथा उन्हें पकड़वाने वाले को 500 रु. पुरस्कार देने की घाषिणा की; पर कोई इस लालच में नहीं आया। अब गाइडिन्ल्यू का प्रभाव उत्तरी मणिपुर, खोनोमा तथा कोहिमा तक फैल गया। नागाओं के अन्य कबीले भी उन्हें अपना नेता मानने लगे।

1932 में गाइडिन्ल्यू ने पोलोमी गाँव में एक विशाल काष्ठदुर्ग का निर्माण शुरू किया, जिसमें 40,000 योद्धा रह सकें। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे अन्य जनजातीय नेताओं से भी सम्पर्क बढ़ाया। गाइडिन्ल्यू ने अपना खुफिया तन्त्र भी स्थापित कर लिया। इससे उनकी शक्ति बहुत बढ़ गयी। यह देखकर अंग्रेजों ने डिप्टी कमिश्नर जे.पी.मिल्स को उन्हें पकड़ने की जिम्मेदारी दी। 17 अक्तूबर, 1932 को मिल्स ने अचानक गाइडिन्ल्यू के शिविर पर हमला कर उन्हें पकड़ लिया।

गाइडिन्ल्यू को पहले कोहिमा और फिर इम्फाल लाकर मुकदमा चलाया गया। उन पर राजद्रोह के भीषण आरोप लगाकर 14 साल के लिए जेल के सीखचों के पीछे भेज दिया गया। 1937 में जब पंडित नेहरू असम के प्रवास पर आये, तो उन्होंने गाइडिन्ल्यू को ‘नागाओं की रानी’ कहकर सम्बोधित किया। तब से यही उनकी उपाधि बन गयी। आजादी के बाद उन्होंने राजनीति के बदले धर्म और समाज की सेवा के मार्ग को चुना।

1958 में कुछ नागा संगठनों ने विदेशी ईसाई मिशनरियों की शह पर नागालैण्ड को भारत से अलग करने का हिंसक आन्दोलन चलाया। रानी माँ ने उसका प्रबल विरोध किया। इस पर वे उनके प्राणों के प्यासे हो गये। इस कारण रानी माँ को छह साल तक भूमिगत रहना पड़ा। इसके बाद वे भी शान्ति के प्रयास में लगी रहीं।

1972 में भारत सरकार ने उन्हें ताम्रपत्र और फिर ‘पद्मभूषण’ देकर सम्मानित किया। वे अपने क्षेत्र के ईसाइकरण की विरोधी थीं। अतः वे वनवासी कल्याण आश्रम और विश्व हिन्दू परिषद् के अनेक सम्मेलनों में गयीं। आजीवन अविवाहित रहकर नागा जाति, हिन्दू धर्म और देश की सेवा करने वाली रानी माँ गाइडिन्ल्यू ने 17 फरवरी, 1993 को यह शरीर और संसार छोड़ दिया।

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#इंडिया #बिहार

17/02/2026

*📜 17 फरवरी 📜*

*🌹 सशस्त्र क्रांति के पितामह 'वासुदेव बलवंत फडके' // पुण्यतिथि 🌹*

जन्म : 04 नवंबर 1845
मृत्यु : 17 फरवरी 1883

वासुदेव बलवंत फडके भारत के स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी थे जिन्हें आदि क्रांतिकारी कहा जाता है। जिनका केवल नाम लेने से युवकों में राष्ट्रभक्ति जागृत हो जाती थी, ऐसे थे वासुदेव बलवंत फडके। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आद्य क्रांतिकारी थे।

स्वतंत्र भारत के इस मन्दिर की नींव में पड़े हुए असंख्य पत्थरों को कौन भुला सकता है? जो स्वयं स्वाहा हो गए किन्तु भारत के इस भव्य और स्वाभिमानी मंदिर की आधारशिला बन गए। ऐसे ही एक गुमनाम पत्थर के रूप में थे, बासुदेव बलवन्त फड़के, जिन्होंने 1857 की प्रथम संगठित महाक्रांति की विफलता के बाद आजादी के महासमर की पहली चिनगारी जलायी थी। बासुदेव महाराष्ट्र के कालवा जिले के श्रीधर ग्राम में जन्मे थे। बासुदेव के पिता चाहते थे कि वह एक व्यापारी की दुकान पर दस रुपए मासिक वेतन की नौकरी कर लें, पढ़ाई छोड़ दें, किन्तु बासुदेव ने यह बात नहीं मानी और मुम्बई आ गए। वहाँ पर जी.आर.पी. में बीस रुपए मासिक की नौकरी करते हुए, अपनी पढ़ाई जारी रखी। 28 वर्ष की आयु में बासुदेव की पहली पत्नी के निधन के कारण दूसरा विवाह हुआ।

उन्हीं दिनों 1870 में महाराष्ट्र स्वदेशी आंदोलन के प्रमुख नेता न्यायमूर्ति रानाडे का मुम्बई में भाषण सुनकर बासुदेव प्रभावित हुए। 1871 में एक दिन सायंकाल वे कुछ गंभीर विचार में बैठे थे। तभी उनकी माताजी की तीव्र अस्वस्थता का तार उनको मिला, कि बासु! तुम तुरन्त आ जाओ अन्यथा माँ के दर्शन भी शायद न हो सकें। इस वेदनापूर्ण तार को पढ़कर अतीत की स्मृतियाँ मानस पटल पर आ गयीं और तार लेकर अंग्रेज अधिकारी के पास अवकाश का प्रार्थना पत्र देने गए, किन्तु अंग्रेज तो भारतीयों को अपमानित करने के लिए सतत् प्रयासरत रहते थे। उस अंग्रेज अधिकारी ने अवकाश नहीं दिया, किन्तु बासुदेव दूसरे दिन अपने गांव-चले गए। वहाँ पहुंचकर बासुदेव पर वज्राघात हुआ। जब उन्होंने देखा कि उनका मुंह देखे बिना तड़फते-तड़फते उनकी ममतामयी मां चल बसी। उन्होंने पांव छूकर रोते हुए माता से क्षमा मांगी, किन्तु अंग्रेजी शासन के दुव्यर्वहार से उनका ह्मदय चीत्कार कर उठा।

उन्होंने पूरे महाराष्ट्र में घूम-घूमकर नवयुवकों से विचार-विमर्श किया, और उन्हें संगठित करने का प्रयास किया। किन्तु उन्हें नवयुवकों के व्यवहार से आशा की कोई किरण नहीं दिखायी पड़ी। कुछ दिनों बाद गोविन्द राव दावरे तथा कुछ अन्य युवक उनके साथ खड़े हो गए। फिर भी कोई शक्तिशाली संगठन खड़ा होता नहीं दिखायी दिया। तब उन्होंने वनवासी जातियों की ओर नजर उठायी और सोचा आखिर भगवान श्रीराम ने भी तो वानरों और वनवासी समूहों को संगठित करके लंका पर विजय पायी थी। महाराणा प्रताप ने भी इन्हीं वनवासियों को ही संगठित करके अकबर को नाको चने चबवा दिए थे शिवाजी ने भी इन्हीं वनवासियों को स्वाभिमान की प्रेरणा देकर औरंगजेब को हिला दिया था।

भारत माता की सेवा के लिए बासुदेव ने नौकरी छोड़ दी, पत्नी को भूल गए और अपनी सेना बनाने लगे। रोमोशी जनजाति के तमाम विश्वस्त, सिद्धहस्त लोग इस लड़ाकू सेना में सामिल हो गए।

महाराष्ट्र के सात जिलों में बासुदेव की सेना का जबर्दस्त प्रभाव फैल चुका था। अंग्रेज अफसर डर गए थे। इस कारण एक दिन मंत्रणा करने के लिए विश्राम बाग में इकट्ठा थे। वहाँ पर एक सरकारी भवन में बैठक चल रही थी। 13 मई, 1879 को रात 12 बजे बासुदेव अपने साथियों सहित वहाँ आ गए, अंग्रेज अफसरों को मारा तथा भवन को आग लगा दी। उसके बाद अंग्रेज सरकार ने उन्हें जिन्दा या मुर्दा पकड़ने पर पचास हजार रुपए का इनाम घोषित किया। किन्तु दूसरे ही दिन मुम्बई नगर में बासुदेव के हस्ताक्षर से इश्तहार लगा दिए गए कि जो अंग्रेज अफसर रिचर्ड का सिर काटकर लाएगा उसे 75 हजार रुपए का इनाम दिया जाएगा। अंग्रेज अफसर इससे बौखला गए। अन्ततोगत्वा एक दिन बासुदेव अपने एक मित्र के घर से गिरफ्तार कर लिए गए। और 31 अगस्त 1879 को आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी। बचाव में बासुदेब बलवन्त फड़के ने कहा कि भारतवासी आज मृत्यु के मुहाने पर खड़े हैं, परतंत्रता की इस लज्जापूर्ण स्थिति से मर जाना ही श्रेयस्कर है, मैं भगवान या सरकार से नहीं डरता क्योंकि मैंने कोई पाप नहीं किया है। दधीचि की तरह मैं अपने जीवन का बलिदान देकर अगर भारत की गुलामी की पीड़ा को थोड़ा भी कम कर सका तो अपने को धन्य समझूंगा।

आजीवन कारावास के जेल जीवन में बासुदेव ने सोचा कि क्या मेरा जन्म जेल में सड़ने के लिए हुआ है? एक रात कड़े पहरे के बीच जेल की दीवार फांदकर भाग गए। शक्तिहीनता की शारीरिक स्थिति में भी 17 मील तक बासुदेव भागते रहे। पीछा कर रही पुलिस से वे बच नहीं पाए और पुन: जेल भेज दिए गए। इस बार जेल के अधिकारी ने कठोर यातानाएं दीं। परिणाम स्वरूप 17 फरवरी, 1883 ई. को अदन की जेल में वीर बासुदेव बलवन्त फड़के ने अपना शरीर छोड़ दिया। उनकी मृत्यु पर प्रसिद्ध स्वदेशी नेता न्यायमूर्ति रानाडे ने कहा था कि बासुदेव बलवन्त फड़के ने देश की बलिवेदी पर अपने जीवन का सर्वस्व बलिदान कर दिया।

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#इंडिया #बिहार

17/02/2026

*📜 17 फरवरी 📜*

*🌹 स्वतंत्रता सेनानी एवं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री 'जननायक कर्पूरी ठाकुर' // पुण्यतिथि 🌹*

जन्म : 24 जनवरी, 1924
मृत्यु : 17 फरवरी, 1988

24 जनवरी, 1924 को समस्तीपुर के पितौंझिया (अब कर्पूरीग्राम) में जन्मे कर्पूरी ठाकुर बिहार में एक बार उपमुख्यमंत्री, दो बार मुख्यमंत्री और दशकों तक विधायक और विरोधी दल के नेता रहे। 1952 की पहली विधानसभा में चुनाव जीतने के बाद वे बिहार विधानसभा का चुनाव कभी नहीं हारे। राजनीति में इतना लंबा सफ़र बिताने के बाद जब वो मरे तो अपने परिवार को विरासत में देने के लिए एक मकान तक उनके नाम नहीं था। ना तो पटना में, ना ही अपने पैतृक घर में वो एक इंच जमीन जोड़ पाए।

>> ईमानदार नेता

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