21/08/2026
अविनाश झा ह'त्याकांड: चार साल की जांच पर कोर्ट सख्त, पुलिस की कार्यशैली पर उठाए गंभीर सवाल
164 के बयानों में सामने आए नामों की जांच पर सवाल; साक्ष्यों की पड़ताल और एसएसपी की निगरानी पर कोर्ट नाराज, जांच अधिकारी बदलने का निर्देश
बेनीपट्टी (मधुबनी)। पत्रकार सह आरटीआई कार्यकर्ता बुद्धिनाथ झा उर्फ अविनाश झा ह'त्याकांड की जांच को लेकर बेनीपट्टी अदालत ने पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। केस संख्या 243/2021 की सुनवाई के दौरान एसीजेएम प्रथम श्री बृजनाथ की अदालत ने जांच में देरी, महत्वपूर्ण साक्ष्यों की जांच और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की निगरानी को लेकर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत के आदेश की प्रति बिहार के डीजीपी और पटना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का निर्देश दिया गया है।
अदालत के आदेश में जांच की स्थिति पर कई गंभीर टिप्पणियां की गई हैं। मार्च 2022 में पहली चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी जांच के कई महत्वपूर्ण पहलू आगे नहीं बढ़ने पर कोर्ट ने चिंता जताई। आदेश के अनुसार, सूचनाकर्ता की ओर से पुलिस को उपलब्ध कराए गए दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की समुचित जांच नहीं की गई।
चार साल बाद भी जांच अधूरी, साक्ष्य प्रभावित होने की आशंका
कोर्ट ने जांच में हुई देरी को गंभीरता से लिया है। आदेश में यह चिंता जताई गई है कि समय बीतने के कारण महत्वपूर्ण साक्ष्य नष्ट हो सकते हैं अथवा उनकी उपयोगिता प्रभावित हो सकती है।
जिस मामले में चार साल का समय बीत चुका हो, वहां अदालत द्वारा साक्ष्यों के प्रभावित होने की आशंका व्यक्त किया जाना जांच की गति पर बड़ा सवाल है। सवाल यह है कि जब महत्वपूर्ण साक्ष्य पुलिस के सामने उपलब्ध कराए गए थे तो उनकी जांच में इतनी देरी क्यों हुई?
164 के बयानों में सामने आए नाम, पुलिस की जांच पर सवाल
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू धारा 164 के तहत दर्ज बयानों से जुड़ा है। अदालत के आदेश के अनुसार सह-आरोपियों तथा मृतक के माता-पिता के 164 के बयानों में कई अन्य व्यक्तियों के नाम सामने आए थे।
आदेश में बताया गया है कि इन नामों में कुछ चिकित्सकों, चिकित्सा संस्थानों से जुड़े लोगों तथा समाचार माध्यमों से जुड़े व्यक्तियों के नाम भी शामिल बताए गए।
अदालत के समक्ष इस पहलू को उठाए जाने के बाद सवाल यह है कि इन नामों की पुलिस ने स्वतंत्र रूप से जांच की या नहीं?
क्या संबंधित लोगों से पूछताछ की गई? क्या उनके मोबाइल और कॉल डिटेल की जांच हुई? क्या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को खंगाला गया? क्या घटनाक्रम से उनका कोई संबंध सामने आया? यदि जांच की गई तो उसका निष्कर्ष क्या रहा?
एसएसपी की मॉनिटरिंग पर कोर्ट की गंभीर टिप्पणी
अदालत ने केवल जांच अधिकारी की कार्यशैली पर ही नहीं, बल्कि वरिष्ठ स्तर पर जांच की निगरानी को लेकर भी असंतोष व्यक्त किया है।
कोर्ट ने पूर्व में जांच अधिकारी को साप्ताहिक और एसएसपी को प्रत्येक 15 दिन पर जांच की प्रगति की समीक्षा करने का निर्देश दिया था। अदालत के आदेश के अनुसार सितंबर के बाद नियमित समीक्षा की प्रक्रिया जारी नहीं रही।
ऐसे में अदालत का सवाल सीधे पुलिस प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर जाता है—जब न्यायालय ने जांच की समीक्षा के लिए स्पष्ट निर्देश दिए थे, तो नियमित मॉनिटरिंग क्यों नहीं हुई?
यदि समीक्षा हुई तो जांच में अपेक्षित प्रगति क्यों नहीं हुई और यदि समीक्षा नहीं हुई तो न्यायालय के निर्देश का पालन किस स्तर पर नहीं हुआ?
कोर्ट ने जांच पर बाहरी प्रभाव की आशंका पर भी सवाल उठाया
अदालत के आदेश में जांच के किसी बाहरी प्रभाव में होने की आशंका को लेकर भी सवाल उठाया गया है। यह टिप्पणी मामले की जांच की निष्पक्षता को लेकर न्यायालय की चिंता को दर्शाती है।
हालांकि, किसी अधिकारी या व्यक्ति के खिलाफ मिलीभगत अथवा किसी दबाव में काम करने का अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया और जांच के आधार पर ही तय होगा। लेकिन न्यायालय द्वारा स्वयं इस दिशा में सवाल उठाया जाना पुलिस प्रशासन के लिए गंभीर विषय है।
जिले से बाहर जांच कराने की नौबत
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने जांच को मधुबनी जिले से बाहर किसी सक्षम पुलिस अधिकारी को सौंपने की दिशा में निर्देश दिया है। दरभंगा के डीआईजी को अपने विवेक के अनुसार उचित अधिकारी को जांच सौंपने तथा इसकी जानकारी अदालत को देने का निर्देश दिया गया है।
चार साल से चल रही जांच में अब जांच अधिकारी बदलने और जिले से बाहर जांच कराने की जरूरत सामने आना अपने आप में महत्वपूर्ण है। इससे यह सवाल भी उठता है कि स्थानीय स्तर पर चल रही जांच को लेकर न्यायालय को किन परिस्थितियों में यह कदम उठाने की जरूरत पड़ी।
डीजीपी और हाईकोर्ट तक पहुंचा कोर्ट का आदेश
अदालत ने अपने आदेश की प्रति बिहार के पुलिस महानिदेशक तथा पटना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का निर्देश दिया है।
इससे अब मामला केवल स्थानीय पुलिस जांच तक सीमित नहीं रह गया है। पुलिस मुख्यालय और उच्च न्यायिक स्तर पर भी आदेश की जानकारी पहुंच चुकी है। ऐसे में आने वाले दिनों में जांच की दिशा और पुलिस प्रशासन की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।
अब सवाल सिर्फ जांच का नहीं, जवाबदेही का भी
अदालत के आदेश ने इस हत्याकांड की जांच को लेकर कई सवाल सामने रख दिए हैं।
चार साल बाद भी जांच अधूरी क्यों रही?
पुलिस को उपलब्ध कराए गए दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की समुचित जांच क्यों नहीं हुई?
164 के बयानों में सामने आए नामों की जांच कहां तक पहुंची?
एसएसपी की नियमित समीक्षा क्यों नहीं हुई?
अदालत के पूर्व निर्देशों की निगरानी व्यवस्था प्रभावी क्यों नहीं रही?
और आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनी कि जांच अधिकारी बदलने तथा मधुबनी जिले से बाहर जांच कराने का निर्देश देना पड़ा?
इन सवालों का जवाब अब पुलिस प्रशासन को अपनी कार्रवाई से देना होगा।
अविनाश झा हत्याकांड में न्यायालय का आदेश अब पुलिस जांच के लिए एक नई कसौटी बन गया है। देखना होगा कि नए जांच अधिकारी के हाथ में मामला पहुंचने के बाद 164 के बयानों, इलेक्ट्रॉनिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों और अब तक जांच से छूटे पहलुओं की कितनी गंभीरता से पड़ताल होती है। चार साल की देरी के बाद अब परिवार और आम लोगों की नजर सिर्फ आश्वासन पर नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई और जांच के परिणाम पर है।