07/06/2026
*पर्यावरण संरक्षण का भारतीय दर्शन: सनातन परंपरा ही है ग्लोबल वार्मिंग का स्थायी समाधान*
जितेंद्र कुमार सिंहा /पटना/ 07 जून 2026 :: विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जहाँ पूरी दुनिया तकनीकी समाधान और सरकारी नीतियों पर मंथन कर रही है, वहीं भारतीय सनातन संस्कृति का पर्यावरणीय दर्शन एक नई और स्थायी दिशा प्रदान कर रहा है। पटना के वरिष्ठ लेखक जितेन्द्र कुमार सिन्हा ने अपने लेख के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि पर्यावरण की रक्षा केवल पौधों के रोपण से नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर प्रकृति के प्रति सम्मान जागृत करने से होगी।
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#न्यूज़हाईलाइट्स:
*पर्यावरण प्रदूषण का असली कारण 'आंतरिक मन' का प्रदूषण है।*
*ऋग्वेद का भूमि सूक्त*: पृथ्वी संसाधनों का भंडार नहीं, माता है।
*तकनीकी समाधान के साथ नैतिक और आध्यात्मिक चेतना का विकास अनिवार्य।*
*भारतीय पर्व और संस्कृति*: प्रकृति के संरक्षण की वैज्ञानिक व्यवस्था।
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*प्रकृति*: संसाधन नहीं, देवत्व का स्वरूप*
लेखक जितेंद्र कुमार सिंहा ने इस बात पर जोर दिया गया है कि आधुनिक विज्ञान जिस जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से जूझ रहा है, उसका समाधान हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही ढूंढ लिया था। सनातन संस्कृति में पृथ्वी को 'माता' (माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः), नदियों को मातृस्वरूप और वृक्षों को देवताओं का निवास मानकर उनके प्रति श्रद्धा का भाव विकसित किया गया है। यह केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ सह-अस्तित्व की एक वैज्ञानिक जीवन पद्धति है।
*मन का प्रदूषण ही पर्यावरण असंतुलन का मूल*
लेख का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 'आंतरिक पर्यावरण' की अवधारणा है। जितेन्द्र कुमार सिन्हा का तर्क है कि बाह्य प्रदूषण (वायु, जल, मृदा) का मूल कारण मानव मन का प्रदूषण है। लालच, अहंकार, स्वार्थ और अत्यधिक उपभोग की मानसिकता ने ही प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया है। जब तक मनुष्य का मन सात्विक और निर्मल नहीं होगा, तब तक बाहरी तौर पर किए गए कोई भी अभियान स्थाई परिणाम नहीं दे पाएंगे।
*संस्कृति और जीवनशैली का संबंध*
भारतीय संस्कृति के पर्व—जैसे छठ, वट सावित्री, तुलसी विवाह और गोवर्धन पूजा—को प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाने वाला बताया गया है। लेखक का मानना है कि:
*संयमित जीवन*: अनावश्यक उपभोग पर अंकुश लगाना ही प्रकृति का सबसे बड़ा संरक्षण है।
*आध्यात्मिक चेतना*: 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' (इस जगत में कण-कण में ईश्वर व्याप्त है) का भाव मन में आने पर हिंसा और शोषण स्वतः समाप्त हो जाता है।
🌹*संपादकीय टिप्पणी: तकनीकी समाधान से परे, आत्मिक चेतना का जागरण*🌹
पर्यावरण आज एक गंभीर संकट है, लेकिन इस संकट का कारण केवल उद्योग या मशीनें नहीं हैं, बल्कि वे विचार हैं जिन्होंने प्रकृति को 'भोग की वस्तु' बना दिया है। जितेन्द्र कुमार सिन्हा का यह लेख हमें पुनः अपनी जड़ों की ओर लौटने का आह्वान करता है। तकनीकी समाधान हमें कुछ समय के लिए राहत दे सकते हैं, लेकिन पृथ्वी का भविष्य केवल उसी समय सुरक्षित होगा जब हम पुनः प्रकृति को 'माता' मानकर उसके प्रति कृतज्ञता का भाव अपनाएंगे। यह लेख 'पर्यावरण दिवस' को केवल एक औपचारिकता से ऊपर उठाकर 'जीवन दर्शन' बनाने की प्रेरणा देता है।
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