30/03/2026
बिहार की राजनीति की असली कहानी सत्ता के गलियारों से नहीं, बल्कि गांव की धूल और वंचितों के संघर्ष से शुरू होती है, जिसकी पहली प्रखर आवाज बने Jagdev Prasad। उन्होंने “सौ में नब्बे शोषित हैं” का नारा देकर सदियों से दबे समाज में अधिकार की चेतना जगाई और यह साफ कर दिया कि सत्ता किसी एक वर्ग की जागीर नहीं हो सकती। इसी संघर्ष की जमीन पर Bindeshwari Prasad Mandal और Daroga Prasad Rai जैसे नेता मुख्यमंत्री बने, जो सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक मोड़ था। इसके बाद Karpoori Thakur ने इस आंदोलन को नीति और व्यवस्था का रूप दिया—आरक्षण लागू कर उन्होंने वंचित वर्गों को शिक्षा और रोजगार में वास्तविक भागीदारी दिलाई और यह साबित किया कि राजनीति सेवा और समानता का माध्यम हो सकती है।
इसी वैचारिक परंपरा और संघर्ष की धारा से उभरकर आए Lalu Prasad Yadav, जिनका उदय कोई संयोग नहीं बल्कि इतिहास की अनिवार्यता था। लालू ने सत्ता को अभिजात्य वर्ग के हाथों से निकालकर गांव-गरीब, दलित-पिछड़े और अल्पसंख्यकों तक पहुंचाया। उनकी देसी भाषा और शैली दरअसल उस समाज की असली आवाज थी, जिसे वर्षों तक हाशिए पर रखा गया था; उन्होंने राजनीति को जनता की भाषा में ढाल दिया और आम आदमी को यह भरोसा दिलाया कि सरकार उसकी भी है। उनके दौर में सबसे बड़ा बदलाव आंकड़ों में नहीं, बल्कि मानसिकता में दिखा—दलित और पिछड़े वर्ग के लोग पहली बार बिना डर के अपनी बात कहने लगे, आत्मसम्मान के साथ जीने लगे। उन पर लगाए गए परिवारवाद के आरोप भी दरअसल उसी सामाजिक परिवर्तन को कमजोर करने की कोशिश हैं, क्योंकि जब सदियों तक सत्ता एक ही वर्ग के हाथों में रही तब कोई सवाल नहीं उठा, लेकिन जब वंचित समाज का प्रतिनिधित्व बढ़ा तो उसे आलोचना का विषय बना दिया गया। सच यह है कि लालू ने सत्ता के दरवाजे खोल दिए और उसे आम जनता का अधिकार बना दिया।
इस तरह यदि इतिहास को निष्पक्ष नजर से देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि Jagdev Prasad ने जो क्रांति की चिंगारी जलाई, Karpoori Thakur ने उसे नीति में बदला और Lalu Prasad Yadav ने उसे जन-जन तक पहुंचाकर एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप दे दिया। यही कारण है कि लालू प्रसाद यादव को केवल एक राजनेता के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि वे उस बदलाव के प्रतीक हैं जिसने सत्ता की परिभाषा बदल दी—जहां शासन विशेषाधिकार नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग का अधिकार बन गया; और इसी अर्थ में वे सामाजिक न्याय के सच्चे “मसीहा” सिद्ध होते हैं।