Bihar Chronicle

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कौन हैं राजन सिंह जो पटना में नरेंद्र मोदी का मंदिर बनवाना चाहते हैं? क्या वे फेक किन्नर हैं?..................पटना में ...
22/08/2026

कौन हैं राजन सिंह जो पटना में नरेंद्र मोदी का मंदिर बनवाना चाहते हैं? क्या वे फेक किन्नर हैं?..................

पटना में मोदी का मंदिर बनाने की मुहिम चलाने और दिल्ली के प्रेस क्लब में मोदी चालीसा गाने वाले राजन सिंह इन दिनों चर्चा में भी हैं और विवादों में भी. विवाद की एक वजह यह है कि लखनऊ में एक चर्चित ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट ने उन पर एफआईआर कर दिया है कि वे फेक किन्नर हैं, वे किन्नर हैं या नहीं इसकी जांच होनी चाहिए. और वे अपने व्यक्तिगत अभियान में किन्नरों का नाम जोड़कर पूरे किन्नर समुदाय को बदनाम कर रहे हैं. ऐसे में लोगों की यह जानने में स्वाभाविक इच्छा है कि आखिर राजन सिंह कौन हैं. इसे समझने के लिए मैंने आज खुद राजन सिंह से फोन पर लंबी बात की.

राजन सिंह फिलहाल बिहार राज्य किन्नर कल्याण बोर्ड के उपाध्यक्ष हैं और उनका कहना है कि 29 जुलाई को हुई किन्नर कल्याण बोर्ड की बैठक में उन्होंने बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक मंदिर बनाने का प्रस्ताव दिया था. बोर्ड के उस प्रस्ताव को सरकार के पास भेजा गया है, ताकि इसे कैबिनेट में स्वीकृति दी जा सके.

बिहार क्रोनिकल से बातचीत में राजन ने कहा, “देश में किसी पीएम ने ट्रांसजेंड़रों को अधिकार नहीं दिया, जैसा पीएम मोदी ने दिया है. इसलिए हम चाहते थे, अपने आराध्य का मंदिर बनाना. वही हमारे ईश्वर हैं. भगवान श्री नरेंद्र मोदी का पटना में मंदिर बने. इसका मैंने प्रस्ताव दिया और वहां मौजूद सभी लोगों ने इस पर सहमति जताई. यह पारित हुआ. हमारी मांग थी कि इसके लिए सरकार हमें पांच एकड़ जमीन और 112 करोड़ रुपये दे. प्रस्ताव को मंत्रिमंडल को फारवर्ड कर दिया गया है. अब सरकार इस मुदे से पीछे न हट जाये, इसलिए फिर हमने दिल्ली में मोदी चालीसा का पाठ किया. चालीसा मैंने लिखा है. इसा पाठ अब हर गुरुवार को होगा. अगले गुरुवार को पटना में होगा.”

जब उनसे पूछा गया कि क्या उनके मांग पर बीजेपी के बिहार या केंद्र के किसी बड़े नेता ने सहमति जताई है, प्रोत्साहन दिया है? तो उन्होंने मना कर दिया. कहा, “हां, ट्रांसजेडर समुदाय के बीच इसको लेकर आम सहमति है.”

हालांकि उनके दावे से उलट बिहार ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड की एक अन्य सदस्य अनुप्रिया कुछ और कहती हैं. उनका कहना है, “न ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड में ऐसा कोई फैसला हुआ है, न सोशल वेलफेयर विभाग में. यह उनका अपना विचार हो सकता है. हर आदमी की अपनी श्रद्धा होती है. मुझे इससे कोई दिक्कत नहीं है. हो सकता है, इस तरह से उन्हें बीजेपी का टिकट मिल जाये.” वहीं लखनऊ की ट्रांसजेडर एक्टिविस्ट प्रियंका ने तो उनके खिलाफ ट्रांसजेंडरों की छवि खराब करने का मुकदमा हजरतगंज थाने में दर्ज करा दिया है. वे बिहार क्रोनिकल से बातचीत में कहती हैं, “सबसे पहले तो वे कथित तौर पर किन्नर हैं. किन्नर हैं या नहीं इसकी जांच होनी चाहिए. दूसरी बात वह बिल्कुल पढ़े लिखे नहीं है. वह जो अभी अभियान चला रहा है उससे किन्नर समुदाय की छवि खराब हो रही है. इसके खिलाफ तत्काल एक्शन लिया जाना चाहिए.”

मगर जब राजन से इस बारे में पूछा जाता है तो वे कहते हैं, “प्रियंका रघुवंशी कांग्रेसी है. चूकि मैंने राहुल गांधी के परिवार पर सवाल उठाये थे, इसलिए वह मेरे खिलाफ अभियान चला रही हैं. बाकी मेरा तो ट्रांसजेंडर सर्टिफिकेट बना है, वह फेक कैसे हो सकता है. वह पोलिटिकल फायदे के लिए ऐसा कर रही है. वे क्लब चलाती हैं. मुझे मालूम है कि मंदिर बनाने में कई लोग रुकावट डालेंगे, मगर मंदिर तो बनेगा.”

यह पूछे जाने पर कि आरोप तो आप पर भी लग रहा है कि आप राजनीतिक फायदे के लिये पीएम मोदी की चालीसा पढ़ रहे हैं. वे कहते हैं, “मेरा पोलिटिकल फायदा तो पीएम कर चुके हैं.” यह पूछने पर कि अगर बिहार सरकार ने पीएम मोदी के मंदिर के लिए पैसे नहीं दिये तो.. राजन कहते हैं, “फिर हम किन्नर कल्याण बोर्ड से इस्तीफा दें देंगे.”

अगस्त, 2025 में किन्नर कल्याण बोर्ड का सदस्य बनने के बाद राजन एक बार और बोर्ड से इस्तीफा दे चुके हैं. मार्च, 2026 में जब संसद ने ट्रांसजेंडर प्रोटेक्शन बिल को पारित किया था. इस कानून के बनने पर कोई भी खुद को ट्रांसजेंडर घोषित नहीं कर सकता है, वह ट्रांसजेंडर है या नहीं इसका फैसला डॉक्टरी जांच से होगा. पूरे देश के एलजीबीटीक्यू समुदाय ने इसकी आलोचना की थी. तब राजन ने भी इस्तीफा दिया था. मगर उसके इस्तीफे को राज्यपाल ने स्वीकार नहीं किया.

जब उनसे इस मुद्दे पर सवाल किया गया तो राजन का कहना था, “देखिये, मेरे विरोध की वजह से ही वह बिल अब तक नोटिफाई नहीं हुआ है. बिल रुका हुआ है.” यह याद दिलाने पर कि पूरे देश के ट्रांसजेंडर इसे काला कानून कहते हैं, यह तो पीएम मोदी और भाजपा ने कराया. फिर भी आप उनके समर्थन में हैं. इस पर वे कोई साफ बात नहीं कहते.

हालांकि वे कहते हैं कि बिहार में वे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कहने पर सक्रिय हुए हैं. जब उन्होंने दिल्ली में केजरीवाल के खिलाफ चुनाव लड़ा तो अमित शाह ने उन्हें बुलाकर बिहार में सक्रिय होने कहा था. वे कहते हैं, “8 अगस्त, 2025 को अमित शाह जब जानकी मंदिर के उद्घाटन के लिए सीतामढ़ी आये. उसी दिन समाज कल्याण ने किन्नर कल्याण बोर्ड का मुझे उपाध्यक्ष बनाया.” इस तरह वे खुद पर अमित शाह की सरपरस्ती की तरफ इशारा करते हैं.

राजन मूलतः बिहार के सारण जिले के एकमा के मड़बा बसैया गांव के हैं. उनका कहना है कि 2026 में वे बीए करने के लिए दिल्ली विवि के आर्यभट्ट कालेज गये थे. वहां उन्हें इस आधार पर हटा दिया गया कि वे ट्रांसजेंडर हैं. उन पर इस जानकारी को छिपाने के आरोप थे. उन्होंने फिर मेरठ से पढ़ाई की. कुछ दिन संस्थाओं में काम किया और फिर राजनीति में सक्रिय होने लगे.

लोग यह भी बताते हैं कि वे बिहार के राजनेता नागमणि कुशवाहा के साथ भी काम कर चुके हैं. संभवतः उनके पीए के तौर पर. उन दिनों वे उनके पिता जगदेव प्रसाद के विचारों को आगे बढ़ाने का भी अभियान चलाते थे. वे कहते हैं कि उन्होंने दिल्ली में ट्रांसजेंडरों के लिए अगल टॉयलेट की लड़ाई लड़ी और 2024 लोकसभा चुनाव में दक्षिण दिल्ली सीट से चुनाव लड़ा. वोट उन्हें 324 मिले मगर मीडिया अटेंशन खूब मिला. तभी उनकी पहुंच अमित शाह तक हुई.

चंपारण के बाद जमुई में भी बच्चों को कंधे पर बिठाकर स्कूल पहुंचाने की नौबत------ --------पिछले दिनों चंपारण में बच्चों को...
21/08/2026

चंपारण के बाद जमुई में भी बच्चों को कंधे पर बिठाकर स्कूल पहुंचाने की नौबत
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पिछले दिनों चंपारण में बच्चों को कंधे पर बैठाकर नदी पार कराने का वीडियो वायरल हुआ था, मगर उस वक्त भी यह नहीं सोचा था कि जमुई जैसे दक्षिण बिहार के जल संकट वाले जिले में ऐसे हालात होंगे. मगर यह जमुई जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर खैरा प्रखंड की हरणी पंचायत के जतहर गांव की हकीकत है.

करीब 50 घरों वाले इस गांव का बरसात में मुख्य सड़क से संपर्क लगभग कट जाता है. पुल नहीं होने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, वहीं गर्भवती महिलाओं, मरीजों और बुजुर्गों को नदी पार कराना बड़ी चुनौती बन जाता है. ग्रामीणों का दावा है कि इलाज के अभाव में कई लोगों की जान भी जा चुकी है.

ग्रामीणों के मुताबिक, उन्होंने वर्षों से जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से पुल की मांग की, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ. पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने मतदान बहिष्कार का फैसला करने का मन बनाया था. अधिकारियों और सिकंदरा विधायक प्रफुल मांझी के आश्वासन के बाद ग्रामीणों ने मतदान किया, लेकिन चुनाव के बाद भी स्थिति नहीं बदली.

अब ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर सामाजिक लोगों और रीजेनेरेटिव बिहार टीम की मदद से किऊल नदी पर बाँस का पुल बनाना शुरू कर दिया है. चंपारण के वायरल वीडियो के बाद जमुई की यह तस्वीर भी ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं और सरकारी तंत्र की पहुंच पर बड़ा सवाल खड़ा करती है.

बिहार के राज्यपाल को यह अधिकार है कि वह बिहार विधान परिषद में 12 सदस्यों का मनोनयन कर सकता है. मगर इसके साथ क्लाउज है. भ...
06/08/2026

बिहार के राज्यपाल को यह अधिकार है कि वह बिहार विधान परिषद में 12 सदस्यों का मनोनयन कर सकता है. मगर इसके साथ क्लाउज है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 171(5) के अनुसरा राज्यपाल सिर्फ ऐसे व्यक्तियों को ही मनोनीत कर सकता है, जिनकी साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन या समाज सेवा में विशेष ज्ञान या अनुभव हो. मकसद यह था कि विधान परिषद में ऐसे विशेषज्ञों और समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को जगह मिले जो चुनावी राजनीति के इतर(यानी उस दबाव से मुक्त होकर) अपने अनुभव के आधार कानून निर्माण की प्रक्रिया में योगदान दे सके. संविधान में यह भी जिक्र है कि राजनीति या किसी राजनीतिक दल में योगदान को मनोनयन का आधार नहीं माना जायेगा.

अगर कम शब्दों में समझें तो राजनेताओं से इतर समाज के बुद्धिजीवियों, कलाकारों को भी विधान परिषद में जगह देने की बात थी. शर्त यह भी रखी गई थी कि जिनका मनोनयन हो उसके आगे इनमें से किसी योग्यता का जिक्र हो.

कल मैं दीपक प्रकाश के मनोनयन को लेकर जारी गजट देख रहा था. उसमें कहीं इस बात का जिक्र नहीं था कि वे साहित्यकार हैं, कलाकार हैं, वैज्ञानिक हैं, सहकारिता आंदोलन से जुड़े हैं या समाज सेवी. हालांकि समाज सेवी ऐसा टर्म है, जिसके भीतर कोई भी आ जाता है. आपने गरीबों में कभी कंबल बांट दिया तो हो गये समाज सेवी. मगर दीपक प्रकाश समाज सेवी हैं, यह भी नहीं कहा गया.

सच यह है कि मसला सिर्फ दीपक प्रकाश का नहीं है. बिहार विधान परिषद में इस वक्त उन्हें मिलाकर जो 12 सदस्य हैं, उनमें छह जदयू के हैं और अब तक छह भाजपा के थे, मगर अब दीपक प्रकाश अपनी पिता के पार्टी के सदस्य हैं. इनमें अगर बहुत खींच तान कर निकाला जाये तो दो लोग मिलते हैं, जो संविधान की भावना के अनुरूप हैं. उनमें एक रामवचन राय हैं, जो साहित्यकार हैं और दूसरे डॉ. राज्यवर्धन आजाद हैं, जो एक ख्याति प्राप्त आंखों के डॉक्टर हैं. शेष खांटी राजनेता है. कैसे, यह नामों की सूची पढ़कर देख लें.

1. अशोक चौधरी
2. जनक राम
3. राज्यवर्धन आजाद
4. राम वचन राय
5. संजय कुमार सिंह
6. ललन कुमार सर्राफ
7. राजेंद्र प्रसाद गुप्ता
8. संजय सिंह
9. प्रमोद कुमार चंद्रवंशी
10. घनश्याम ठाकुर
11. निवेदिता सिंह
12. दीपक प्रकाश

अब इनमें कोई इन दोनों के अलावा साहित्यकार, वैज्ञानिक हो तो मुझे नहीं मालूम. मगर इतना समझ आता है कि मनोनयन के मामले में राजनीतिक दलों ने मिलकर संविधान की भावना का कचरा कर दिया है. 12 सीटों को सत्ताधारी दलों ने अपने हिसाब से बांट लिया है और अपने लोगों को उपकृत करने का जरिया बना लिया है. इनमें भी ज्यादातर पोलिटिकल लोगों को भरा गया है.

हैरत की बात है कि इसी विधान परिषद में बटुकेश्वर दत्त जैसे स्वतंत्रता सेनानी, बाबूलाल मधुकर जैसे मगही कवि और सियाराम तिवारी जैसे तबला वादक का मनोनयन हुआ था. मगर ये गिने चुने नाम हैं. इस कोटे का ज्यादातर इस्तेमाल सत्ताधारी दल ही करते हैं. अगर ऐसा ही है तो क्यों न इस कोटे को खत्मकर दिया जाये और इसे भी चुनाव के जरिये भरा जाये? अगर नेता ही आयें तो चुन कर आयें. उन्हें मनोनयन की सुविधा क्यों मिले?

इस पोस्ट के साथ लगे पोस्टर में आप एक स्कूल का फोटो देख रहे होंगे, यह मधेपुरा का रास बिहारी उच्च माध्यमिक विद्यालय है. सर...
19/07/2026

इस पोस्ट के साथ लगे पोस्टर में आप एक स्कूल का फोटो देख रहे होंगे, यह मधेपुरा का रास बिहारी उच्च माध्यमिक विद्यालय है. सरकार ने इसे मॉडल स्कूल बनाने की घोषणा की है और अब इसका नाम सरस्वती विद्या निकेतन(मॉडल स्कूल) होगा.

इस स्कूल का अपना इतिहास है. स्वंतंत्रता सेनानी औऱ गोप जातीय महासभा(1910) के संस्थापक रास बिहारी मंडल के नाम पर यह स्कूल बना था. उनके वंशज डॉ. सूरज मंडल अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखते हैं, “रास बिहारी मंडल के पुत्रों ने इस जमीन के लिए पहले पांच और फिर 25 बीघा जमीन मधेपुरा शहर के बीचो-बीच वाले इलाके में दी थी.” रास बिहारी मंडल का नाम बिहार में शुरुआती पिछड़ा आंदोलन से जोड़ा जाता है, उन्होंने 1911 में जनेऊ आंदोलन चलाया था और यादवों को भी जनेऊ धारण करने का अधिकार मिले, इसकी वकालत की थी. उनके ही पुत्र बीपी मंडल की अगुआई में मंडल कमीशन का गठन हुआ था, जिसकी सिफारिशों पर ओबीसी आरक्षण लागू हुआ. ऐसे में आप रास बिहारी मंडल का महत्व समझ सकते हैं.

सूरज मंडल ने इस स्कूल का नाम सरस्वती विद्या निकेतन करने पर घोर आपत्ति दर्ज की है. उन्होंने लिखा है, “आरएसएस ने हमारे गढ़ में हमको अपमानित करने के लिए यह कदम उठाया है. हम इस अपमान और अन्याय को चुनौती देने के लिए कृतसंकल्प हैं. हम किसी भी कीमत पर रासबिहारी उच्च विद्यालय का नाम बदलने नहीं देंगे.”

दरअसल आरएसएस से जुड़ी संस्था विद्या भारती के स्कूलों के नाम सरस्वती शिशु मंदिर, सरस्वती विद्या मंदिर और सरस्वती विद्या निकेतन हुआ करते हैं. माना जा रहा है कि इसी वजह से बिहार सरकार राज्य के हर प्रखंड और जिला मुख्यालय में जिन मॉडल स्कूलों की शुरुआत करने जा रही है, उनका नाम सरस्वती विद्या निकेतन रखने जा रही है. ऐसे 572 स्कूल खुल रहे हैं.

दिलचस्प है कि नीतीश कुमार की सरकार में पहली बार इन मॉडल स्कूलों के खुलने की घोषणा की गई थी. तब सरकार दस्तावेजों में इनका नाम आदर्श विद्यालय मिलता है. मगर जून, 2026 के बाद इसे सरस्वती विद्या निकेतन कहा जाने लगा.

मगर ऐसा क्यों? विद्या भारती के स्कूलों में ऐसा क्या आदर्श है, जिसकी वजह से सरकार अपने स्कूलों का नाम उसके स्कूलों पर रख रही है?

अगर आप पता करें तो सीबीएसई बोर्ड में बेहतर रिजल्ट देने वाले स्कूलों में इन स्कूलों का नाम कहीं नहीं मिलेगा. सबसे बेहतर रिजल्ट केंद्रीय विद्यालयों का है, उसके बाद जवाहर नवोदय विद्यालयों का, फिर डीपीएस आरके पुरम, सरदार पटेल विद्यालय, दून स्कूल, नेशनल पब्लिक स्कूल, डीएवी, रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ जैसे स्कूल आते हैं. बिहार में भी बेहतर रिजल्ट देने वालों में सिमुलतल्ला जैसे स्कूलों का नाम आता है. फिर मॉडल स्कूल का नाम सरस्वती विद्या निकेतन क्यों? सवाल यह भी है कि कहीं इन मॉडल स्कूलों में विद्या भारती का सिलेबस तो नहीं चलेगा?

आज बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में राजद प्रत्याशी रेखा गुप्ता जनसंपर्क के लिए निकली तो हर जगह उन्हें ऐसा कचरा और पानी जमा ...
13/07/2026

आज बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में राजद प्रत्याशी रेखा गुप्ता जनसंपर्क के लिए निकली तो हर जगह उन्हें ऐसा कचरा और पानी जमा मिला। इससे पहले जनसुराज की टीम भी ऐसी तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट करती रही हैं।

एक इंटरव्यू में प्रशांत किशोर खुद कह चुके हैं कि जब वे जनसंपर्क के लिए घूमने लगे तो समझ आया कि बांकीपुर विधानसभा का 50 से 60 हिस्सा स्लम ही है। जरा सी बारिश में पानी घरों में घुस जाता है।

हम सब जानते हैं कि इसमें अतिरेक नहीं है। मगर ऐसा क्यों है?

जहां हाईवे पर 8.5 हजार करोड़ की एलिवेटेड सड़कों बन रही हैं वहीं राजधानी क्षेत्र के मोहल्लों में सड़कें और नालियां बेहतर क्यों नहीं हो पा रहीं?

पिछले वर्षों में नीतीश कुमार की सरकार ने गांवों के लिये नाली- गली योजना बनाई थी, वैसी योजना शहरों के लिए क्यों नहीं बनी?

पटना या बिहार के दूसरे किसी शहर के लोगों को इस हाल में जीने के लिए क्यों छोड़ दिया गया है? उनके यहां गली तभी पक्की होती है, जब कोई सांसद या विधायक अपना फंड दे। सरकार क्यों नहीं इस बारे में सोचती है?

जिस शहर में दो म्यूजियम को जोड़ने के लिए टनल बन रहा है, वहां शहर की गलियां सीमेंटेड भी नहीं है और नालियों का कोई इंतजाम नहीं है। मुसल्लहपुर हाट या महेन्द्रू की गलियां घूम आइए या मीठापुर के इलाके में चले जाइए तो समझ आता है कि कहां आ गए। वहीं बेली रोड और आसपास की सड़कें साल में बिना टूटे चार बार पलस्तर होती हैं।

कल जब अभिषेक बंटी के नामांकन वापस लेने की खबर आई तो तत्काल बाद अरुण सिंहा के पुत्र आशीष सिंहा को उम्मीदवार बनाए जाने की ...
11/07/2026

कल जब अभिषेक बंटी के नामांकन वापस लेने की खबर आई तो तत्काल बाद अरुण सिंहा के पुत्र आशीष सिंहा को उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा तेज हो गई। उसके बाद अजय आलोक का नाम सामने आया, फिर ऋतुराज सिंहा के नाम की खबरें बनने लगीं।

तब तक भाजपा ने नीरज सिंहा का नाम घोषित कर दिया था, लेकिन लोग ऋतुराज सिंहा का ही नाम ले रहे थे। नीरज सिंहा का नाम जब आया तो लोग पता करने लगे कि आखिर ये हैं कौन। गूगल सर्च में पता चला कि एक नीरज सिंहा हैं जो नितिन नवीन के बचपन के मित्र हैं। नितिन नवीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद एक चैनल ने उनसे बातचीत की थी। बड़े सोबर नजर आ रहे थे।

मगर तब तक नीरज सिंहा का बायोडाटा भी आ गया और पता चला कि ये अलग ही हैं। इन्होंने बूथ अध्यक्ष से शुरुआत की और अभी ये मंडल अध्यक्ष ही हैं। मतलब बीजेपी में इनकी स्थिति अभिषेक बंटी से भी कमजोर है। ऐसा लगता नहीं है कि बीजेपी ऐसे कार्यकर्ताओं को सिर्फ इस वजह से चुनाव लड़ा रही है कि वह ऐसे जमीनी कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाना चाहती है।

इनके चयन से यह लगभग साफ है कि बीजेपी बांकीपुर उपचुनाव में किसी मजबूत प्रत्याशी को मैदान में उतारना ही नहीं चाहती। इस सीट के लिए उसके पास एक से बढ़कर एक चेहरे हैं। अजय आलोक हो, ऋतुराज सिंहा हो या आशीष सिंहा। खबर तो यह थी कि धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष रणबीर नन्दन भी इस सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं। नवीन सिंहा के करीबी नील रतन घोष का नाम तो चल ही रहा था। वे भी इन दोनों से मजबूत प्रत्याशी साबित होते।

ये सबके सब बांकीपुर से चुनाव लड़ने के लिए तैयार होंगे। क्योंकि बांकीपुर सीट ऐसी है कि यह एक बार आ जाने के बाद उनकी विधायकी कई टर्म के लिए पक्की होती। यह बिहार में बीजेपी की सबसे मजबूत सीटों में से एक है।

फिर क्यों इन पर दांव नहीं खेला गया?

क्या इसलिए कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन इस पारिवारिक सीट पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं?

या फिर इसलिए कि बीजेपी कहीं यह चुनाव हारने के लिए तो नहीं लड़ रही? कहीं बीजेपी पीके को वॉक ओवर तो नहीं दे रही?

सवाल कई हैं। जवाब आने वाले समय में मिलेगा।

नवीन तिवारी ग्रेजुएट हैं लेकिन नौकरी नहीं मिली तो ऑटो चलाकर जीविकोपार्जन करते हैं। इन्होंने अपनी पार्टी सोशलिस्ट पार्टी ...
09/07/2026

नवीन तिवारी ग्रेजुएट हैं लेकिन नौकरी नहीं मिली तो ऑटो चलाकर जीविकोपार्जन करते हैं। इन्होंने अपनी पार्टी सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) से कहा कि वे बांकीपुर उपचुनाव लड़ना चाहते हैं। इनके अलावा इस पार्टी के तीन और लोग चुनाव लड़ना चाहते थे।

पार्टी ने अपने 17 जिले के 203 सदस्यों से गुप्त मतदान करवाया। इस गुप्त मतदान में सबसे ज्यादा वोट नवीन को मिले। अब वे पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार हैं।

अब जरा सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के बारे में जान लीजिए। जैसा कि मुझे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष धनंजय कुमार सिंहा ने बताया। एक सोशलिस्ट पार्टी थी जो जेपी और लोहिया ने शुरू की थी। जो बाद में 1977 के चुनाव में जनता पार्टी हो गई। उसमें कई पार्टियां मर्ज़ हो गईं।

2011 में रिटायर जस्टिस राजेंद्र सच्चर और पत्रकार कुलदीप नैयर ने इसे फिर से रजिस्टर करने की कोशिश की। पुराना नाम तो नहीं मिला, यह नाम मिल गया।

अब सामाजिक संगठनों से जुड़े कई लोग इस पार्टी के साथ हैं। मैग्सेसे अवॉर्ड पाने वाले संदीप पांडे इसे उत्तर भारत में लीड करते हैं। यह पार्टी भले चुनावी जीत हासिल नहीं कर पा रही है, मगर पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को जिंदा करने की कोशिश कर रही है।

यह प्रयोग उसी का हिस्सा है। आखिर पार्टी के सारे निर्णय आलाकमान या दो या चार लोगों की टीम ड्राइंग रूम में बैठकर क्यों ले। क्यों यह फैसला पार्टी के फोरम पर सार्वजनिक रूप से लिया जाए।

अब सोशलिस्ट पार्टी चुनावी मुकाबलों में सफल हो पाती है या नहीं यह तो आगे देखना होगा। मगर उसके काम काज का यह तरीका देश की दूसरी पार्टियों को सीखना ही चाहिए।

किस्सा ए बांकीपुर- 1............................ब्रिटिश लेखक ई.एम. फॉर्स्टर के मशहूर उपन्यास ‘अ पैसेज टू इंडिया’ में जो ...
09/07/2026

किस्सा ए बांकीपुर- 1............................
ब्रिटिश लेखक ई.एम. फॉर्स्टर के मशहूर उपन्यास ‘अ पैसेज टू इंडिया’ में जो चंद्रपुर है, वह दरअसल बांकीपुर है. ऐसा फार्स्टर ने भी कबूल किया है. इस नॉवेल में ब्रिटेश से एक युवती अपने फ्यूचर हसबैंड को समझने के लिए भारत आती है. वह बांकीपुर आती है और वहां एक मुस्लिम फिजीशियन डॉ. अजीज से उसकी मुलाकात होती है. फिर कई लोग एक साथ घूमने के लिए बराबर की पहाड़ियों की तरफ जाते हैं, जिसे फार्स्टर ने नॉवेल में माराबर लिखा है. वहां कुछ ऐसा घटता है कि वह युवती डॉ. अजीज पर छेड़खानी का आरोप लगा देती है. डॉ. अजीज के पास खुद को निर्दोष साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं हैं. वह एक विदेशी युवती के आरोपों की यंत्रता झेलता है. हालांकि बाद में युवती को लगता है कि यह उसका भ्रम था. मगर डॉक्टर अजीज फिर कभी किसी अंगरेज पर भरोसा नहीं कर पाता है.

फार्स्टर ने यह उपन्यास हिंदुस्तान के बारे में प्रचलित उस पूर्वाग्रह को तोड़ने के लिए लिखा था, जिसमें हमें अविकसित और जंगली समझा जाता था. उन्होंने इस नॉवेल को अपने भारतीय मित्र सैयद रॉस महमूद को समर्पित किया था, जो पटना में वकालत करते थे. खैर, यह तो मशहूर नॉवेल ए पैसेज टू इंडिया में बांकीपुर के जिक्र की कहानी है. मगर मुगलों के अजीमाबाद और आजाद भारत के पटना के बीच के तकरीबन दो सौ साल के दर्म्यान उरोज पर रहने वाले शहर बांकीपुर के कई दूसरे रंग भी है. पहले इसके पैदा होने की कहानी.

वैसे तो मगध के इलाके में गंगा के किनारे बसा यह शहर आज का नहीं है. कम से कम 2500 साल पुराना है. मगध के राजा अजातशत्रु ने जब अपना साम्राज्य गंगा के उत्तर के इलाके में बढ़ाने का मन बनाया तो उसने राजगृह से थोड़ी दूर के इस इलाके को पाटलीपुत्र नाम देकर बसाया. उनकी नजर दुनिया के ऐश्वर्यशाली शहरों में से एक वैशाली पर थी, जिससे गौतम बुद्ध को अगाध प्रेम था. बाद में उनके पुत्र उदयन ने पाटलीपुत्र को मगध की राजधानी बनाया. यह इलाका तकरीबन 12वीं सदी तक भारत की राजधानी रहा. फिर 16वीं सदी में भारत के मशहूर बादशाहों में से एक शेरशाह ने इस शहर को फिर से संवारा.

तुर्क-अफगान और मुगलों के जमाने में हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली रही और सूबा-ए-बेहार(बिहार) की राजधानी अजीमाबाद. जिसे एक नबाब अजीमुश्शान का नाम दिया गया था. वह इलाका वही है, जिसे आज पटना सिटी कहा जाता है. मगर जब अंगरेजों ने बिजनेस के बाद राजकाज भी शुरू किया तो उन्हें लगा कि तंग-गलियों वाले अजीमाबाद से अलग कोई इलाका होना चाहिए, उन्हें अपने ठिकाने के लिए. जहां उनके अफसर रहें, उनके दफ्तर हों और दूसरे कारोबार भी हो. ऐसे में वे अजीमाबाद से पश्चिम की तरफ पसरने लगे. उस इलाके में जहां गंगा नदी की चाल बांकी हो जाती थी. यानी आड़ी-तिरछी. नया शहर बांकीपुर कहलाने लगा.

उस इलाके में डच लोगों ने अफीम के कारखाने और गोदाम पहले से बनवा रखे थे. अंगरेजों ने अपनी कोठियां बनाई. राज दरभंगा की कोठियां बनीं. प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज और खुदाबख्श ओरियंटल लाइब्रेरी जैसे ऑर्गेनाइजशनों की इमारतें तामीर हुईं. फिर पटना कॉलेज बना. आइकॉनिक गोलघर बना.

इस बीच 1912 का साल आया, जह बंगाल से अलग होकर बिहार नया राज्य बना. तब बांकीपुर का इलाका और पश्चिम की तरफ पसरा. पूरा मैंग्ल्स जोन बना, जिसमें विधान मंडल, राजभवन, पुराना सचिवालय और दूसरी इमारतें हैं. कदमकुआं मोहल्ला बसा. जहां प्रतिष्ठित शहरियों ने अपनी कोठियां बनवाईं. मौलाना मजहरूल हक ने कांग्रेस को जमीन दी तो बिहार विद्यापीठ और सदाकत आश्रम बने. फ्रेजर रोड और डॉक बंगला रोड के किनारे इमारतें खड़ी हुईं. यह सब अंग्रेजों के जमाने की बातें हैं. तब इन सबके बीच एक बड़ा सा मैदान था, बांकीपुर मैदान, जिसे वायसरीगल लॉन भी कहते थे. जो बाद में इसलिए गांधी मैदान कहा जाने लगा, क्योंकि साल 1947 के मार्च से मई महीनों के बीच महात्मा गांधी ने वहां तकरीबन रोज प्रार्थना सभा की थी. वे यहां पिछले साल फैले भीषण दंगों की आग बुझाने आये थे. वह दंगा कोलकाता और नोआखली के दंगों की प्रतिक्रिया में भड़का था.

इस बीच भारत आजाद हुआ. बांकीपुर शहर अब पटना कहा जाने लगा था. बांकीपुर स्टेशन का नाम भी पटना जंक्शन हो गया था. शहर पश्चिम की तरफ लगातार फैल रहा था और दीघा और दानापुर के इलाकों को छूने के लिए बेताब था. सचिवालय के इलाकों में क्वार्टर बन रहे थे. कंकड़बाग, राजेंद्र नगर औऱ पाटलीपुत्र जैसे मोहल्ले खड़े हो रहे थे. बोरिंग रोड का इलाका आकार ले रहा था. मगर बांकीपुर नाम कहीं खो गया था. मैंने आखिरी बार पटना शहर में उसका नाम देखा था, गांधी मैदान के उत्तरी किनारे में एक बांकीपुर टमटम पड़ाव था. वहां आज शायद एक छोटा सा बस पड़ाव है, जहां ऑटो और गाड़ियां खड़ी होती हैं. कारगिल चौक के ठीक उत्तर...

इनको कुछ लोग जानते होंगे मगर मुझे लगता है ज्यादातर लोग पहचानते नहीं होंगे। इनका नाम लालू यादव है, सारण जिले के मढ़ौरा के...
08/07/2026

इनको कुछ लोग जानते होंगे मगर मुझे लगता है ज्यादातर लोग पहचानते नहीं होंगे। इनका नाम लालू यादव है, सारण जिले के मढ़ौरा के रहने वाले हैं। काम चुनाव लड़ना है। यही इनकी आजीविका भी। कैसे आगे बताएंगे।

फिलहाल खबर यह है कि इन्होंने भी आज बांकीपुर से नॉमिनेशन कर दिया है। पीके और अभिषेक और राजद की रेखा गुप्ता के मुकाबले में ये आ डटे हैं। यह इनका 25 वाँ चुनाव होगा। 46 साल के हैं। लालू के हमनाम होने को इन्होने आजीविका का साधन बना लिया है।

दरअसल यह हर मीडिया अटेंशन वाले चुनाव में लड़ जाते हैं और लालू के हमनाम होने की वजह से इन्हें वोट भी मिल जाते हैं। ऐसे में कई बार इन्हें राजद के लोग बिठाने की कोशिश करते हैं।

फिर नॉमिनेशन कर दिया तो इन्हें बॉडीगार्ड मिल जाते हैं फिर से अपने ब्लॉक में झांकी जमाते हैं। लोगों का पैरवी वाला काम कराते हैं। अफसरों से नजदीकी हो जाती है। 2024 में इनसे मिला था तो इन्होंने चुपके से कहा था, रोजी रोटी चल जाती है, भाई साहब। अब कैसे चलती है, यह आज तक समझ नहीं आया।

बहरहाल अब पीके या अभिषेक यह तो कह ही सकते हैं कि इन्होंने लालू यादव के खिलाफ चुनाव लड़ा था।

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