07/06/2026
जिस नाम का टिकट हर बार किसी न किसी विवाद में फंस जाता था, वही नाम आज बीजेपी की सूची में सबसे बड़ा सरप्राइज बन गया। अब सवाल यह है क्या पवन सिंह ने आखिरकार राजनीति की सबसे कठिन परीक्षा पास कर ली?
"हर बार टिकट के रास्ते में खड़ा हो जाता था कोई विवाद... लेकिन इस बार पवन सिंह ने आखिर बाजी कैसे मार ली?बिहार की राजनीति में शायद ही कोई ऐसा चेहरा होगा, जिसके टिकट की चर्चा उतनी बार हुई हो जितनी बार पवन सिंह के नाम की हुई। लेकिन हर बार जब लगता था कि अब पवन सिंह की राजनीतिक एंट्री पक्की है, तभी कोई न कोई ऐसा विवाद खड़ा हो जाता था कि मामला पटरी से उतर जाता था।इस बार कहानी अलग है। इस बार न कोई शोर था, न कोई बड़ी लॉबिंग की चर्चा, न समर्थकों का हंगामा। सब कुछ शांत था। और फिर अचानक बीजेपी की सूची आई और उसमें नाम था — पवन सिंह।
यही वजह है कि आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पवन सिंह को टिकट मिला, बल्कि यह है कि आखिर इस बार ऐसा क्या बदल गया कि हर बार रुकने वाला टिकट इस बार मिल गया?
दरअसल, पवन सिंह की राजनीतिक यात्रा विवादों और इंतजार की लंबी कहानी रही है।
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें पश्चिम बंगाल के आसनसोल से उम्मीदवार बनाया था। लेकिन टिकट मिलने की खुशी ज्यादा दिन नहीं टिक सकी। उनके पुराने भोजपुरी गीतों को लेकर विवाद खड़ा हो गया। विपक्ष हमलावर हुआ, पार्टी असहज हुई और अंततः पवन सिंह ने चुनाव लड़ने से ही इनकार कर दिया।
उसके बाद उन्होंने काराकाट से निर्दलीय चुनाव लड़कर सबको चौंका दिया। न खुद जीत पाए, न एनडीए उम्मीदवार को जीतने दिया। राजनीतिक गलियारों में इसे बीजेपी लाइन से अलग कदम माना गया। नतीजा यह हुआ कि रिश्तों में दूरी बढ़ी और पार्टी ने भी सख्त रुख दिखाया।
फिर बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हुईं। एक बार फिर चर्चा चली कि बीजेपी पवन सिंह को बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है। लेकिन तभी उनकी पत्नी ज्योति सिंह के साथ विवाद सुर्खियों में आ गया। मामला मीडिया और सोशल मीडिया में छाया रहा। जिस समय राजनीतिक पुनर्वास की संभावना बन रही थी, उसी समय यह विवाद उनके लिए सबसे बड़ी बाधा बन गया।
हालांकि इसके बावजूद पवन सिंह ने बीजेपी के खिलाफ रास्ता नहीं चुना। उन्होंने सार्वजनिक रूप से एनडीए और बीजेपी के समर्थन का ऐलान किया। कई जगह प्रचार भी किया और यह संदेश देने की कोशिश की कि उनकी राजनीतिक मंजिल अब भी बीजेपी के साथ ही जुड़ी है।
फिर राज्यसभा चुनाव आया। समर्थकों ने फिर उम्मीदें बांध लीं। सोशल मीडिया पर माहौल बनाया गया कि इस बार पवन सिंह राज्यसभा जाएंगे। लेकिन टिकट किसी और को मिल गया। एक बार फिर समर्थकों को निराशा हाथ लगी।
लेकिन राजनीति में कभी-कभी सबसे बड़ा खेल वहीं होता है, जहां सबसे कम चर्चा होती है।
इस बार न कोई शोर था, न कोई दावेदारी की खुली लड़ाई। पवन सिंह का नाम कहीं चर्चा में नहीं था। राजनीतिक विश्लेषक भी दूसरे नामों पर बहस कर रहे थे। और तभी बीजेपी ने ऐसा फैसला लिया जिसने सबको चौंका दिया।
ऐसा लगता है कि पार्टी ने इस बार शोर-शराबे से दूर रहकर फैसला किया। शायद बीजेपी यह भी देख रही थी कि तमाम विवादों और उतार-चढ़ाव के बावजूद पवन सिंह का जनाधार खत्म नहीं हुआ। भोजपुरी क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है। लाखों युवाओं के बीच उनकी पकड़ है। और सबसे महत्वपूर्ण बात, पिछले कुछ समय से उन्होंने पार्टी नेतृत्व के प्रति सार्वजनिक रूप से टकराव का रास्ता नहीं अपनाया।
यानी जिस पवन सिंह को लेकर हर बार कोई न कोई विवाद खड़ा हो जाता था, इस बार उन्होंने खुद को विवादों से दूर रखा और शायद यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक जीत बन गई।