Kumar Jha

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10/05/2026

साउथ इंडिया के लोग खाने के मामले में हमसे भी आगे हैं भाई साहब

09/05/2026

कोई समझा सकता है कि ये धुआं क्यों निकल रहा है ✈️

कभी मत खाना ट्रेन का खाना — वंदे भारत के खाने का लैब टेस्टिंग के बाद हुआ बवाल। जब से वंदे भारत ट्रेन के खाने का लैब टेस्...
09/05/2026

कभी मत खाना ट्रेन का खाना — वंदे भारत के खाने का लैब टेस्टिंग के बाद हुआ बवाल। जब से वंदे भारत ट्रेन के खाने का लैब टेस्टिंग हुआ है तब से रेलवे के खाने को लेकर काफी बवाल हो रहा है। एक तरफ़ कोई कह रहा है कि ये सब बस IRCTC को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है। और एक तरफ़ लोग बोल रहे हैं कि आखिर इतने पैसे लेने के बाद भी खाने की क्वालिटी ऐसी क्यों है?

अब जहां तक रेलवे के खाने की बात है तो आपने ध्यान दिया होगा कि ट्रेन में मिलने वाला खाना कई बार अच्छा होता है, लेकिन कई बार वही खाना इतना खराब होता है कि लोग फोटो और वीडियो डालकर सोशल मीडिया पर वायरल कर देते हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि वंदे भारत जैसी प्रीमियम ट्रेन में लोग उम्मीद करते हैं कि खाना भी प्रीमियम मिलेगा। क्योंकि टिकट का किराया भी सामान्य ट्रेनों से ज्यादा होता है। लेकिन जब लैब टेस्टिंग जैसी खबर सामने आती है तो लोगों का भरोसा टूट जाता है।

अब सच क्या है ये तो पूरी जांच के बाद ही पता चलेगा। लेकिन इतना जरूर है कि रेलवे को खाने की क्वालिटी पर और ज्यादा ध्यान देना चाहिए। क्योंकि करोड़ों लोग रोज ट्रेन से सफर करते हैं और बाहर का खाना खाने के अलावा उनके पास दूसरा विकल्प भी नहीं होता।

और अब तो ट्रेन में सबसे ज्यादा डर सीट का नहीं, खाने का होने लगा है। 🚆🍱

IRCTC वेंडर, अंडा बिरयानी 90₹ — लेकिन बाहरी, वेंडर अंडा बिरयानी 50₹ ऐसा क्यों?   ट्रेन के अंदर अगर खाने की बात हो तो IRC...
09/05/2026

IRCTC वेंडर, अंडा बिरयानी 90₹ — लेकिन बाहरी, वेंडर अंडा बिरयानी 50₹ ऐसा क्यों?

ट्रेन के अंदर अगर खाने की बात हो तो IRCTC ने अपने खाने का एक फिक्स प्राइस रखा है कि कौन सी चीज़ कितने रुपए में मिलेगी। जैसे:

वेज थाली — 80₹
वेज बिरयानी 80₹
अंडा बिरयानी 90₹

लेकिन वही दूसरी तरफ स्टेशन से जो बाहरी वेंडर ट्रेन के अंदर खाना बेचने आते हैं तो उस खाने का प्रयास IRCTC के खाने से सीधा आधा होता है। ये खाना मैंने आंध्र प्रदेश के ओंगोल रेलवे स्टेशन पर लिया था। जो कि मुझे 50₹ में ही मिल गया। लेकिन जल्दी मैं बाहर से खाना नहीं खरीदता ट्रेन के अंदर का ही खाना लेता हूं नहीं तो ऑनलाइन कहीं से आर्डर करता हु। लेकिन उस दिन ट्रेन के अंदर जो खाना बेच रहे थे उनसे जब मैंने पूछा तो मुझे मना कर दिया कि खाना खत्म हो चुका है तो मजबूरन मुझे बाहर से ही खाना लेना पड़ा अंडा बिरयानी जो कि मुझे ₹50 में मिला।


लेकिन यही खाना अगर मैं ट्रेन के अंदर लेता तो मुझे 90₹ का मिलता। ऐसा क्यों लोग हमेशा सस्ती चीज़ों के पीछे भागते हैं कि उन्हें सस्ते से सस्ता चीज मिल जाए लेकिन सस्ते के चक्कर में वह अपने आप को ही नुकसान पहुंचाते हैं। बाहर से जो खाना खरीदते हैं और खाते हैं। उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता पता नहीं वह खाना कितने दिन का होगा। वह खाना खाने से कभी-कभी लोग बीमार भी पड़ जाते हैं। जब भी ट्रेन से यात्रा करें तो कोशिश करें कि अपने घर का ही खाना ले जाए नहीं तो ट्रेन के अंदर जो खाना बेच रहे हो उनसे ही खाना ले।

09/05/2026

Civic Sense किसे कहते हैं वो जरा केरल के लोगों से पूछो

पाकिस्तानी झंडा — केरल में पाकिस्तान का झंडा फहराया गया। इंस्टाग्राम पर एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है जिसमें केरल राज्य...
08/05/2026

पाकिस्तानी झंडा — केरल में पाकिस्तान का झंडा फहराया गया। इंस्टाग्राम पर एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है जिसमें केरल राज्य में खुलेआम पाकिस्तानी झंडा फहराया जा रहा है। लेकिन सच तो कुछ और है?

जितने भी लोग वह वीडियो देख रहे हैं सभी लोग कह रहे हैं कि यह पाकिस्तान का झंडा इंडिया में क्यों फहराया जा रहा है। तो जिनको भी वह झंडा पाकिस्तान का लग रहा है तो मैं उन सबको बता दूं वह पाकिस्तान का झंडा नहीं है वह झंडा Indian Union Muslim League यानी IUML पार्टी का है। जो एक राजनीतिक पार्टी है और खासकर केरल में काफी प्रभावशाली मानी जाती है।

अब सोशल मीडिया पर कई बार इसका फोटो या वीडियो वायरल हो जाता है और लोग इसे किसी दूसरे देश के झंडे से जोड़ने लगते हैं क्योंकि इसका रंग और चांद-तारा वाला डिजाइन कुछ लोगों को पाकिस्तान के झंडे जैसा लगता है। लेकिन दोनों अलग हैं।

IUML का झंडा आमतौर पर पूरा हरा होता है जिसमें सफेद चांद और तारा रहता है, जबकि Pakistan के राष्ट्रीय झंडे में एक सफेद पट्टी भी होती है और उसका डिजाइन अलग होता है।


याद नहीं आ रहा — आखिर बनारस में दाल बाटी चूरमा कहां खाए थे। यह बात 2 साल पहले की है हमारे एक मित्र हमको बनारस ले गए थे औ...
08/05/2026

याद नहीं आ रहा — आखिर बनारस में दाल बाटी चूरमा कहां खाए थे। यह बात 2 साल पहले की है हमारे एक मित्र हमको बनारस ले गए थे और बनारस में उन्होंने कहा कि चलो मैं तुमको राजस्थान का फेमस दाल बाटी चूरमा खिलाता हूं।

साल 2024 में हम उस जगह गए थे और आज साल 2026 का है और हम पूरी तरह भूल चुके हैं कि आखिरकार वह जगह कौन सी थी। और रेस्टोरेंट स्पेशल राजस्थानी तौर तरीकों से चलता था एकदम वहां Culture पूरा अलग था जो चीज भी बनाई जाती थी बिल्कुल ऑर्गेनिक तरीके से खुद के द्वारा। वहां का जो मसाला भी होता था वह भी खुद के द्वारा वहां के लोग बनाते थे। और दाल बाटी का जो स्वाद था बहुत कमाल का था पहली बार बनारस में हमने राजस्थान का प्रसिद्ध दाल बाटी चूरमा खाया था। और

एक बार और जाने का मन हो रहा है लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि वह लोकेशन कहां है मैं कैसे जाऊं क्या आप मुझे बता सकते हैं उस जगह के बारे में?

संपूर्ण क्रांति सुपरफास्ट एक्सप्रेस — जनरल कोच में बैग लटकाने का सबसे बड़ा हथियार।अब ट्रेन के जनरल कोच में यात्रा करना इ...
08/05/2026

संपूर्ण क्रांति सुपरफास्ट एक्सप्रेस — जनरल कोच में बैग लटकाने का सबसे बड़ा हथियार।
अब ट्रेन के जनरल कोच में यात्रा करना इतना आसान नहीं होता कई चीजों को देखना पड़ता है हर जगह परेशानी ही परेशानी होती हैं। लेकिन फिर भी इस परिस्थिति में किसी तरह लोग जनरल कोच से यात्रा कर लेते हैं और हम भी करते हैं।

अब कई बार क्या होता है कि अगर आपके पास कोई बैग है और जनरल कोच में भीड़ इतनी ज्यादा है कि आप गेट के आसपास ही फंस चुके हैं तो बड़ी परेशानी होती है और कई बार मेरे साथ तो ऐसा हो भी चुका है खासकर पटना से दिल्ली जाते वक्त संपूर्ण क्रांति सुपरफास्ट एक्सप्रेस से। इस ट्रेन में इतनी ज्यादा भीड़ होती थी की ट्रेन के अंदर घुसाना पॉसिबल नहीं हो पता था गेट के आसपास ही खड़े रह जाते थे। और हर किसी के पास अपना-अपना बैग होता था इस वजह से भीड़ और ज्यादा बढ़ जाती थी और बैग रखने के लिए भी कोई जगह भी नहीं होती थी। कई लोग अपने सर के उपर बैग रखते थे तो कई लोग नीचे फर्श पर रखते थे।

लेकिन मैं हमेशा अपने पास एक जुगाड़ लेकर चलता था अपने बैग में एक हुक जैसा लोहे का टुकड़ा क्योंकि मुझे पता था कि जनरल कोच में जल्दी सीट नहीं मिलती है जिस वजह से बैग टांगने के लिए मुझे परेशानी होगी इसीलिए वह हुक मैं अपने बैग से निकलता था और जहां पर मैं खड़ा हूं वहीं के आसपास कहीं पर मैंने हुक फसाया और अपना बैग टांग दिया।

कई लोग यह देखकर दंग रह जाते थे। कहते थे कि वाह भाई तुम तो कमाल कर दिए मेरा भी बैग टांग दो इसमें प्लीज। और आज भी कभी ऐसी परिस्थिति आ जाती है तो उस हुक का इस्तेमाल मैं कहीं भी कर लेता हूं।

पाटलिपुत्र वंदे भारत एक्सप्रेस — फ्लॉप होने का सबसे बड़ा कारण? जब शुरुआत में इस वंदे भारत ट्रेन को लॉन्च किया गया था और ...
08/05/2026

पाटलिपुत्र वंदे भारत एक्सप्रेस — फ्लॉप होने का सबसे बड़ा कारण?
जब शुरुआत में इस वंदे भारत ट्रेन को लॉन्च किया गया था और जिस रूट पर यह वंदे भारत ट्रेन चल रही थी हम उसी दिन समझ गए थे कि यह वंदे भारत एक्सप्रेस आने वाले दिनों में खाली ही चलेंगी ।

और आज इसका जीता जागता सबूत आपके सामने है।
यह 8 कोच वाली वंदे भारत एक्सप्रेस है, जिसमें 7 कोच Chair Car (CC) के हैं और 1 कोच Executive Chair Car (EC) का है। आपने ध्यान दिया होगा कि एक Chair Car कोच में कुल 78 सीट होती हैं। यानी 7 कोच मिलाकर हुए:

78 × 7 = 546 सीट

वहीं Executive Chair Car के एक कोच में कुल 56 सीट होती हैं।

यानि पूरी ट्रेन में कुल:
• Chair Car — 546 सीट
• Executive Chair Car — 56 सीट

लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी आधुनिक और प्रीमियम ट्रेन होने के बावजूद रोजाना बड़ी संख्या में सीटें खाली रह जाती हैं। Chair Car में हर दिन लगभग 100 से 150 सीट खाली चलती हैं, जबकि Executive Chair Car में भी 20 से 30 सीट रोजाना खाली रहती हैं।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च करके चलाई गई इस ट्रेन में लोग सफर क्यों नहीं कर रहे? कहीं इसकी सबसे बड़ी वजह ज्यादा किराया, गलत रूट Route या फिर Timing तो नहीं?

08/05/2026

कैमरा देखते ही रेट बदल गया | स्वतंत्रता सेनानी सुपरफास्ट एक्सप्रेस

यह सीट मेरी है और पूरे पैसे इस सीट के मैंने दिए हैं कृपया आप अपनी सीट पर जाएं। ऐसा आपको भी सुनने को कभी ना कभी जरूर मिला...
07/05/2026

यह सीट मेरी है और पूरे पैसे इस सीट के मैंने दिए हैं कृपया आप अपनी सीट पर जाएं। ऐसा आपको भी सुनने को कभी ना कभी जरूर मिला होगा —

ट्रेन के सबसे ऊपर वाले सीट और बीच वाले सीट पर जिन लोगों का बर्थ रहता है उन लोगों का दिन में अधिकार होता है कि वह नीचे वाले सीट पर आराम से बैठ सके। लेकिन जिन लोगों का सीट नीचे होता है वह कभी-कभी ऊपर वाले लोगों को बैठने नहीं देते वह कहते हैं यह सीट हमारी है हमको लेटना है, हमको सोना है तो आप अपनी सीट पर चले जाएं नहीं तो आप किसी और सीट पर बैठ जाएं।

जबकि रेलवे खुद कहती है कि सुबह के 6:00 से रात के 10:00 बजे तक ऊपर वाले सीट और बीच वाले सीट पर जिस व्यक्ति का बर्थ है वह व्यक्ति नीचे वाले सीट पर आराम से बैठ सकता है उसको कोई रोक-टोक नहीं कर सकता। लेकिन रेलवे का यह नियम कहां से मानने वाले है यह लोग। सबसे ज्यादा दिक्कत तो तब होती है जब नीचे वाले सीट पर अगर कोई महिला बैठी हो और उस महिला का ही नीचे वाला सीट हो और आप एक पुरुष यात्री हो और आपका सबसे ऊपर वाला सीट हो तब तो मुश्किल ही होता है कि वह महिला आपको अपने सीट पर नीचे बैठने दे। लेकिन ऐसा हर हमेशा नहीं होता बहुत सारी महिलाएं समझदार भी होती हैं वह नीचे वाले सीट पर बैठने देती है लेकिन बहुत सारी महिलाएं ऐसे भी होती हैं जो इस नियम को नहीं मानती और वह आपको नहीं बैठने देती। चाहे उसके लिए आपको लड़ना पड़े झगड़ना पड़े या कुछ भी करना पड़े।

अगर आपके साथ भी ऐसा हो तो उस महिला से या जिसका भी वह सीट हो उससे बहस करने से अच्छा हो कि आप सीधा 139 पर शिकायत कर दें तुरंत में इसका समाधान हो जाएगा और वह महिला जो अकड़ के बात कर रही थी वह भी ठीक हो जाएगी।

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