Rooh E Gulzar

Rooh E Gulzar GULZAR sahab is my ideal

नज़्म                           ** सालग़िरह **तुम्हारी पिछली सालग़िरह की ही तो बात है सोंचा था तुम्हारे अगले  ' बथ॓ डे '...
18/08/2024

नज़्म

** सालग़िरह **

तुम्हारी पिछली
सालग़िरह की ही तो
बात है
सोंचा था
तुम्हारे अगले ' बथ॓ डे ' पर
तुम्हें अपनी
एक नज़्म
नज़र करुँगा
पर
कोई नज़्म
सुझते भी तो नहीं
लफ़्ज़ों की
क़िल्लत जो
कर दी है तुमने
ज़ेहन में
बचे-खुचे
कुछ लफ़्ज़ तो हैं
पर वो भी
सारे के सारे
बेमानी से
उन्हें तो
तुम्हारे कलम की
आदत लग चुकी है
कमबख़्त
मेरी सुनते ही कहाँ
समझ में नहीं आता
इन कमज़ोर , बीमार
लफ़्ज़ों से
तुम्हारी
सालग़िरह का नज़्म
मैं लिखूं भी तो कैसे
लगता है
इस मत॓बा भी
उन्हीं घिसे-पीटे
लफ़्ज़ों से ही
तुम्हारी सालग़िरह का जश्न
मनाना पड़ेगा
बुरा तो नहीं
लगेगा तुम्हें
चलो फ़िर
मेरा ' विश '
क़बूल तो करो
' 90 वीं सालग़िरह
बहुत - बहुत मुबारक़ हो
' गुलज़ार साहब ' ... !!!

@ कुन्दन श्रीवास्तव

28/06/2021

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.....
...... You

..
.

.

आखिरकार मिल ही गए तुम दिल , जिस पल का ख्वाहिशमन्द रहा करता थाअब मुझे तुमसे मिलने के लिए कोई तरक़ीब भी ढ़ुंढ़ना नहीं पड़े...
18/08/2020

आखिरकार
मिल ही गए तुम
दिल , जिस पल का
ख्वाहिशमन्द रहा करता था
अब मुझे
तुमसे मिलने के लिए
कोई तरक़ीब भी
ढ़ुंढ़ना नहीं पड़ेगा
दिल जब भी चाहेगा
जी भर
तुम्हारी तस्वीरों से ही
बातें कर लिया करूंगा
बातें कर लिया करूंगा ....

@ कुन्दन श्रीवास्तव

सफ़ेद लिबासों में अब्र का टुकड़ा नज़र आता है बिजलियाँ भी कड़काता है जब उसके ख़्याल लफ्ज़ से टकराते हैं बरसता भी है कभी ग...
08/12/2019

सफ़ेद लिबासों में
अब्र का टुकड़ा
नज़र आता है
बिजलियाँ भी कड़काता है
जब उसके ख़्याल
लफ्ज़ से टकराते हैं
बरसता भी है
कभी गज़लों तो
कभी नज़्मों की शक़्ल में
त्रिवेणी की
बारिशों से
जाने कितनी ही
आंखों में
सैलाब ले आता है
किताबों की
दुनिया का वो
शहंशाह भी है
उसकी रियासत में
नज़्म, गज़ल हो
या फिर त्रिवेणी
जब भी देखो
गुलज़ार ही रहते हैं
गुलज़ार ही रहते हैं
@ कुन्दन श्रीवास्तव

अच्छा ही हुआ जो तक़सीम के तूफ़ानों ने मुझे इस जानिब लाकर खरा कर दिया लड़कपन के उस ऊम्र में हीमादरे-वतन से दूर मेरी सुबहो...
30/04/2019

अच्छा ही हुआ
जो
तक़सीम के तूफ़ानों ने
मुझे
इस जानिब लाकर
खरा कर दिया
लड़कपन के
उस ऊम्र में ही
मादरे-वतन से दूर
मेरी
सुबहो शाम
कैसी गुज़री ?
ये
सोंच कर
आज भी
मेरी रुह
कांपने लग जाती हैं
पूर्णमासी की रातें भी
अमावस
नज़र आती हैं
लगता
सबकुछ छुट गया
उस दिना में
सियासतदानों की सियासत में
सबकुछ
तहस नहस करके
रख दिया था मेरा
पिछली बार
गया तो था वहाँ
सबकुछ
बदल चुका था
मगर
लोग अब भी
अपने ही
लग रहे थे
धुंधली पड़ चुकी
यादें भी
उस रोज़
जाने कैसे?
रिवाइंड के मूड में
आ गयी थीं
बाबू जी , अम्मा
और जाने
कितने ही लोगों से
मुलाक़ातें
करा दिया था
कुछ वक़्फ़े में ही
उन यादों ने!
लेक़िन , जो
सोंधी ख़ुश्बू
छोड़ कर गया था
वो ही
गुम थीं
जाने कैसे
उसकी जगह
बारूदों की गंधों ने
ले ली थीं
सुना है अब वहां
सरसों , मक्कों की जगह
असलाहों की
पैदाईश होने लगी हैं
किसानों की जगह
जब दहशतग़दो॓ ने
ले ली हों तो
फ़सलें तो
ऐसी ही
उगेगी न
ऐसी ही फ़सलें
उगेगी न.... !!!

@ कुन्दन श्रीवास्तव

22/04/2019
नज़्म                      *  मुंबई के किसी कोने में रख दूं...  *मेरी इन आंखों के सामने सेमाज़ी एक-एक करके रिवाइंड होते ...
12/01/2019

नज़्म

* मुंबई के किसी कोने में रख दूं... *

मेरी इन
आंखों के सामने से
माज़ी
एक-एक करके
रिवाइंड
होते चले जा रहे थे
ख़्याल तो आया था कि
बासठ-तिरसठ साल पहले के
उन पुरानी
यादों को
पाैज ही कर दूँ
पर वहाँ तो
तमाशबीन की
पूरी जमात ही
खड़ी थी
उस मिट्टी की
उस पैदाईश को
देखने के लिए
जो
सरहद उस पार से
आया था
हां
सबकुछ कितना ही
अच्छा लगा था
मगर
जहाँ मेरी पैदाईश थी
वो ख़ित्ता
अब कहाँ था मेरा ?
किसी और मुल्क़ की
जाग़िर जो बन चुकी थी
पर वक़्त
मुझे
ये अहसास
ज़रूर करा रहे थे
कि
उस दहलीज़ से
मुझे अब
वापस लौटना भी है
मन मसोस कर
रह गया था मैैं
उस रोज़
जी में तो आया था
उस ख़ित्ते को ही
अपने कंधों पर
उठाकर
मुंबई के
किसी कोने में रख दूं
और
हर रोज़
उसकी आग़ोश में बैठकर
घंटो
सुक़ून की सांसें
ले सकूं . . . .!!!

@ कुन्दन श्रीवास्तव

शोहरतयाफ़्ता शायर , नग़्मानिग़ार गुलज़ार साहब के एहसासात मेँ जीती , मेरी लिखी एक और नज़्म . . .     ¤ babu ji ¤babu jiuus roz...
12/01/2019

शोहरतयाफ़्ता शायर , नग़्मानिग़ार गुलज़ार साहब के एहसासात मेँ जीती , मेरी लिखी एक और नज़्म . . .

¤ babu ji ¤

babu ji
uus roz
mai.n
aayaa to thaa
aap se milne
par
mujhey aap
kahi.n diikhey hii nahi.n
ghanto.n
aapkii chhadii kii khakhataahat
suunney ko betaab
aapkey
aaney kaa
mai.n besabri se
bas yuu.n hii
aa.ngan mei.n biichey
chaarpaayee par baithaa
iintazaar kartaa rahaa
kahaan rah gaye they aap babu jee ?
naa jaaney
kaise kaisey khyaalaat
merii dhadkanei.n
badhaa de rahii thi.n
aisaa
pahlii martabaa huaa
mai.n
bagair aap se miiley
deena kii dahleez se
apnii uudaas
aa.nkhei.n liiye
waapas aahistaa aahistaa
qadmo.n se
uus diin
laut aayaa thaa
beshaq
mai.n kuuchh der
wahaa.n rooktaa zaroor
par
pau fatney ke saath
parii.ndo.n kii
chhachhaahto.n ne
merey suunahrey khwaab
jo chhiin liiye they mujh se . . . . . . . !!!

@- kundan shrivastava

नज़्म                           ** सालग़िरह **तुम्हारी पिछली सालग़िरह की ही तो बात है सोंचा था तुम्हारे अगले  ' बथ॓ डे '...
12/01/2019

नज़्म

** सालग़िरह **

तुम्हारी पिछली
सालग़िरह की ही तो
बात है
सोंचा था
तुम्हारे अगले ' बथ॓ डे ' पर
तुम्हें अपनी
एक नज़्म
नज़र करुँगा
पर
कोई नज़्म
सुझते भी तो नहीं
लफ़्ज़ों की
क़िल्लत जो
कर दी है तुमने
ज़ेहन में
बचे-खुचे
कुछ लफ़्ज़ तो हैं
पर वो भी
सारे के सारे
बेमानी से
उन्हें तो
तुम्हारे कलम की
आदत लग चुकी है
कमबख़्त
मेरी सुनते ही कहाँ
समझ में नहीं आता
इन कमज़ोर , बीमार
लफ़्ज़ों से
तुम्हारी
सालग़िरह का नज़्म
मैं लिखूं भी तो कैसे
लगता है
इस मत॓बा भी
उन्हीं घिसे-पीटे
लफ़्ज़ों से ही
तुम्हारी सालग़िरह का जश्न
मनाना पड़ेगा

बुरा तो नहीं
लगेगा तुम्हें
चलो फ़िर
मेरा ' विश '
क़बूल तो करो
' 84 वीं सालग़िरह
बहुत - बहुत मुबारक़ हो
' गुलज़ार साहब ' ... !!!

@ कुन्दन श्रीवास्तव

NAZM

¤ SAALGIRAH ¤

tuumhaari piichli
saagirah ki hii to
baat hai
sochaa thaa
agley ' birth day ' par
tuumhei.n
ek nazm nazar karuu.ngaa
par
koii nazm
suujhtey bhii to nahi.n
lafzo.n kii
qiillat
jo kar dii hai tuum ne
haa.n
zehan mei.n
bachhey khuuchhey
kuchh
lafz to hai.n
par wo bhii
saarey ke saarey
bemaani se
uunhei.n to
tuumhaarey qalam kii
aadat
lagg chhuukii hai
kambakht
merii suuntey hii kahaa.n ?
samajh mei.n nahi.n aataa
inn kamzod , biimaar
lafzo.n se
tuumhaarii
saalgirah kaa nazm
mai.n
liikhu.n bhii to kaisey ?
lagtaa hai
iis martabaa bhii
uunhi.n
ghiisey piitey
juumlo.n se hii
tuumhaarii
saalgiirah kaa jashn
manaana padegaa
buuraa to nahi.n
lagegaa tuumhei.n !
chhalo phiir
meraa ' wish '
quubool to karo
' saalgiirah bahuut bahuut muubaaraq ho
' GULZAR ' SAHAB . . . !!!

@ - kundan shrivastava

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