20/07/2012
इन दिनों भारत में भ्रष्टाचार सर्वाधिक चर्चा का विषय बना हुआ हैं। ऐसा लगता है कि भारत की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार ही है। रामदेव जी के अनशन और अन्ना हजारे के आंदोलन ने इस विषय को और भी ज्यादा गंभीर बना दिया है। हर आदमी इस बीमारी की चर्चा करने लगा है। लेकिन क्या वर्तमान व्यवस्था में रहते हुए हम भ्रष्टाचार से मुक्ति पा सकते हैं? क्या आदर्श राज्य व्यवस्था कभी इस देश में लागू हो पायेगी? बजरंग मुनि मानते हैं कि वर्तमान व्यवस्था के रहते न तो भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल सकती है और न ही गांधी के आदर्शों का रामराज्य देश में कभी आ सकता है.
भारतीय राजनीति का एक सर्वमान्य चरित्र है कि वह (1) समाज रूपी बिल्लियो के बीच स्वयं को बंदर के रूप मे मानती है (2) राजनीति किसी भी समस्या का समाधान विपरीत आचरण वाली व्यवस्था से खोजती है। बिल्लियों के बीच बंदर की भूमिका इस प्रकार होती है कि वह बिल्लियों की रोटी को कभी बराबर नही होने देता किन्तु बंदर इतना चालाक होता है कि वह हमेशा बिल्लियों की रोटी बराबर करता हुआ दिखना चाहता है भले ही रोटी कभी बराबर न हो। बंदर यह भी प्रयास करता है कि छोटी रोटी वाली बिल्ली के मन मे असमानता रूपी असंतोष की ज्वाला निरंतर जलती रहे। भारतीय राजनीति पूरी इमानदारी से तीनो प्रयत्न करती रहती हैं। स्वतंत्रता के तत्काल बाद ही समाजवाद के नाम पर आर्थिक विषमता दूर करने के गंभीर प्रयत्न शुरू हुए जो अब तक जारी है किन्तु आर्थिक विषमता लगातार बढती रही। साथ ही हमारे राजनेताओ ने गरीबों के मन मे सम्पन्नों के विरूद्ध असंतोष की ज्वाला भी लगातार सफलतापूर्वक जलाए रखी। इसी तरह भारतीय राजनीति ने प्रयत्न किया कि आर्थिक समस्याओं का आर्थिक समाधान, प्रशासनिक समस्याओं का प्रशासनिक समाधान तथा सामाजिक समस्याओ का सामाजिक समाधान किसी भी परिस्थिति मे न हो। राजनैतिक व्यवस्था निरंतर सक्रिय रही कि आर्थिक समस्याओं का सामाजिक प्रशासनिक समाधान हो, सामाजिक समस्याओ का आर्थिक प्रशासनिक समाधान हो तथा प्रशासनिक समस्याओ का सामाजिक आर्थिक समाधान हो। आर्थिक असमानता आर्थिक समस्या है। भारतीय राजनैतिक व्यवस्था आर्थिक असमानता कालेधन अथवा भ्रष्टाचार को प्रशासनिक तरीके से हल करना चाहती है जबकि आतंकवाद नक्सलवाद को आर्थिक सामाजिक तरीके से हल तथा दहेज, बाल विवाह, शराब, जुआ आदि को आर्थिक प्रशासनिक तरीके से हल करने की कोशिश करती है।
इन सबके साथ साथ राज्य का यह भी चरित्र होता है कि वह समस्याओ को हल करता हुआ तो दिखे किन्तु होने न दे। राज्य हमेषा ऐसे समाधान की कोषिष करता है कि उक्त सामाधान से ही एक नई समस्या का जन्म हो और राज्य उक्त नई पैदा समस्या के समाधान मे इस तरह सक्रिय हो कि उससे एक और नई समस्या पैदा हो। नई नई समस्याए पैदा होती रहे और राज्य उन समस्याओ के समाधान के नाम पर समाज के अधिकारों मे थोडी थोडी कटौती करता रहे। स्वतंत्रता के बाद के साठ बासठ वर्षो से यही क्रम चल रहा है जो आज भी यथावत जारी है। आर्थिक विषमता आर्थिक प्रयत्नों के आधार पर दूर होनी चाहिये थी किन्तु राज्य ने आर्थिक विषमता दूर करने के लिये समाजवाद का नारा देकर प्रशासनिक कानून बनाने शुरू कर दिये। प्रशासनिक व्यवस्था यदि आर्थिक समस्याओ के समाधान मे सक्रिय होती है तो भ्रष्टाचार के अवसर पैदा करती है। भ्रष्टाचार का एक ऐसा चक्र चल पडता है कि दोनो एक दूसरे के पूरक बन जाते है। अन्डे से मुर्गी और मुर्गी से अन्डा। राजनीतिज्ञ कभी यह निर्णय नही होने देता कि अन्डा या मुर्गी में से मारने की पहल कहॉ से करे?
जब संपूर्ण विष्व जानता है कि भ्रष्ट व्यवस्था समाजवाद नही ला सकती। इसके विपरीत भ्रष्टाचार आर्थिक विषमता दूर करने मे सबसे बडी बाधा है। ये इतने पढे लिखे नेता नेहरू, अम्बेडकर, लोहिया आदि इस बात को क्यो नही समझ सके कि पहले भ्रष्टाचार कम करना होगा और उसके बाद समाजवाद की दिषा में बढ सकते है। स्वतंत्रता के बाद तत्काल ही भ्रष्टाचार बढने लगा। हमारे नेता गण समाजवाद की दिषा मे तेजी से चलने लगे। ये लोग जितनी ही समाजवाद की दिषा मे तेज छलांग लगाते उससे कई गुना अधिक तेज गति से भ्रष्टाचार बढता और भ्रष्टाचार के परिणाम स्वरूप आर्थिक विषमता बढती जाती। मै नही कह सकता कि ये बडे बडे नेता इस बात को समझ नही पा रहे थे अथवा समझना नही चाहते थे। पुरानी बातों को तो छोडिये। आज सोनियॉ जी, दिग्विजय सिंह, सुषमा स्वराज्य, प्रकाश करात, आदि भ्रष्टाचार दूर करने की बात बहुत करते है किन्तु समाजवाद के प्रयत्न साथ मे लेकर। स्पष्ट है कि ऐसा होना बिल्कुल असंभव है। आर्थिक विषमता दूर करने के कोई भी प्रयत्न तंत्र को अधिक अधिकार सम्पन्न बनायेंगे ही और तंत्र की यह अधिकार वृद्धि ही भ्रष्टाचार रूपी विष बेल की खाद पानी का काम करती है। एक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बना दी गई है । यह परिषद नित नये नये समाजवादी प्रस्ताव लाती है। गरीबों को इतना अनाज दो, इतनी सुविधा दो, अमीरों पर इतना क्रय विक्रय कर लगाओ। यह सुविधा यह कारारोपण किसके माध्यम से होगा? क्या इससे तंत्र का लोक मे हस्तक्षेप नही बढेगा? क्या इससे भ्रष्टाचार नही बढेगा? ये कहते है कि भ्रष्टाचार रोको। इनसे पूछा जाय कि भ्रष्टाचार रोकने के लिये क्या यही भ्रष्ट तंत्र सफल होगा? पहले भ्रष्टाचार दूर करें कि पहले तुम्हारा समाजवाद लावे? दोनो साथ साथ संभव नही क्योकि दोनो एक दूसरे के पूरक है।
समस्याओ के समाधान की शुरूआत इसीसे संभव है कि कुछ समय के लिये आर्थिक विषमता की छूट कर दी जावे, जनकल्याण के कार्यो पर खर्च न्यूनतम हो, अधिकतम निजीकरण कर दे, टैक्स वसूली के प्रयत्न कम कर दे, इन्कम टैक्स न्यूनतम कर दे। साथ ही राष्ट्रीय सलाहकार परिषद जैसी परजीवी संस्थाओ को कुछ समय के लिये रोक दे या उसका स्वरूप बदल दे। यदि हमने ऐसे कुछ कदम उठा लिये तो अनेक समस्याएं अपने आप सुलझनी शुरू हो जायगी।
एक है बाबा रामदेव। इन्हे शरीर विज्ञान का क्या ज्ञान हो गया कि ये अपने को समाजशास्त्र राजनीति शास्त्र का भी ज्ञाता समझने लगे। जबकि सच्चाई यह है कि इन्हे राजनीति शास्त्र का तो ज्ञान शून्य ही है किन्तु समाजशास्त्र का ज्ञान भी न के बराबर है। भारत के विदेशो से काला धन वापस लाया जावे। इस बात के पीछे पडे है। इन्हे यह भी पता नही कि काला धन क्या है, कैसे बनता है, क्या परिणाम होता है तथा वर्तमान मे बनकर बाहर जा रहा है कि नही? भारत मे स्वतंत्रता के बाद काला धन उसी दिन से बनना शुरू हुआ जबसे समाजवाद की धुन सवार हुई। स्वतंत्रता के बाद भारत मे सन सैतालीस मे दो हजार रू वार्षिक आय पर उन्नीस प्रतिशत तथा बीस हजार से अधिक पर छियासी प्रतिशत इन्कम टैक्स लगता था। हमारे नेताओ ने सन बावन तक यह टैक्स रेट बढाकर चार हजार की आय पर सवा बाइस प्रतिशत तथा चालीस हजार से उपर की आय पर बान्नवे प्रतिशत कर दिया। इस कर के उपर सरचार्ज भी लगाया गया। कुल इन्कम टैक्स पंचान्नवे प्रतिशत तक हो गया। आप कल्पना कर सकते है कि समाजवाद के नाम पर पागल सरकार ने यह नही सोचा कि इतने कराधान से भारत मे भ्रष्टाचार बढेगा, कालाधन बढेगा, अव्यवस्था हो जायगी। इन्हे तो बस निकम्मे प्रशंसकों तथा रूस चीन की वाहवाही मात्र चाहिये थी। परिणाम हुआ कि भ्रष्टाचार बढा, कालाधन बढा, अव्यवस्था बढी। इन लोगो ने समाज मे यह धारणा भी फैलाई कि न परिश्रम से धन बढ सकता है न बुद्धि से। धन तो सिर्फ धूर्तता या अपराध से ही बढ सकता है। इस प्रचार का परिणाम हुआ कि धूर्तता और अपराध की ओर आम लोग अधिक बढे। सरकार के पास पैसा बढा तो उसके पास चापलूस निकम्मे परजीवियों की फौज इकट्ठी हुई जो समाजवाद की माला जपती रही और बिना मेहनत के सरकारी मेहमान बन गई।
भ्रष्टाचार राजनैतिक व्यवस्था की सबसे बडी बीमारी है। इसके साथ साथ यह भी स्पष्ट है कि जब तक समाज की सामाजिक समस्याओ के समाधान मे तंत्र की भूमिका नही घटती तब तक भ्रष्टाचार कम हो ही नहीं सकता। हमारे पास आर्थिक विषमता रोकने का तब तक कोई उपाय नही जब तक भ्रष्टाचार न घटे। यदि भ्रष्टाचार के रहते आर्थिक विषमता रोकने के प्रयत्न जारी रहे तो भष्टाचार बढना निष्चित है। हमे कुछ समय के लिये भ्रष्टाचार और आर्थिक विषमता मे से एक को चुनकर उस के समाधान मे ताकत लगानी होगी और स्पष्ट है कि ऐसी हालत मे भ्रष्टाचार को रोकना ज्यादा कारगर कदम होगा। कालाधन आज भी बन रहा है और बाहर जा रहा है। नासमझ लोग कालाधन लाने का आंदोलन कर रहे है। पहले भारत मे कालाधन बनना तो रोको। कालाधन बनता रहे, विदेशी बैको मे जाता रहे और हम वापस लाने की लडाई लडते रहे। काले धन का बनना भी रूक सकता है और बाहर जाना भी यदि हम एक बार कुछ समय के लिये सुरक्षा और न्याय को छोडकर सारे खर्च रोक दें। इससे इन्कम टैक्स का रेट घटकर पांच प्रतिशत तक का हो सकता है या शून्य भी संभव है। देखिये कि कालाधन भारत मे लौटता है कि नही। देखिये कि भ्रष्टाचार घटता है कि नही। मै मानता हॅू कि इस कदम से गरीब और अमीर के बीच की खाई बहुत चौडी होगी। किन्तु हम दोनो काम एक साथ कर ही नही सकते। ऐसी हालत मे हमें कुछ स्पष्ट निर्णय तो लेने ही होगें। यदि टैक्स खतम करने से सारी समस्या दूर हो सकती है तो हमारे दो महत्वपूर्ण प्राण अन्ना जी और रामदेव जी की जान जोखिम मे क्यों डाली जाय। यदि साठ वर्ष तक समाजवाद नही आया ,गरीब अमीर के बीच की खाई बढती रही तो पांच वर्ष और झेल लेंगें। कम से कम भ्रष्टाचार और कालेधन से तो छुटकारा मिलेगा। अन्ना जी की टीम तो इस दिशा मे कुछ समझ भी रही है किन्तु रामदेव जी तो इस लाइन पर सोचना ही नहीं चाहते। सरकार में भी मनमोहन सिंह जी की टीम इस लाइन पर काम करना चाहती है किन्तु राहुल गांधी की टीम इसके ठीक विपरीत सोच रही है। परिणाम यह होगा कि न समाजवाद आयगा न ही भ्रष्टाचार और कालाधन रूकेगा। भारत की राजनैतिक व्यवस्था मे इतनी ताकत नही कि वह समाजवाद का इतना बडा पत्थर पैर मे बांधकर सरपट दौड़ लगा सके।