Vijay Dhawaj

Vijay Dhawaj Subki Khabar Le, Subko Khabar de

02/05/2018

प्रधान मंत्री कहते है ‘‘न खायेंगे न खाने देंगे,’’
इसलिए रेल मंत्री पियुष गोयल पूरा निगल रहे है।
पटना जंक्शन के सामने खुलेआम हो रहा कच्ची ईटों से जुड़ाई.......

महान सम्राट अशोक की 2362वीं जन्माष्टमी महोत्सव 24 मार्च महान सम्राट अशोक जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन गत् वर्षों की भाँति...
18/03/2018

महान सम्राट अशोक की 2362वीं जन्माष्टमी महोत्सव 24 मार्च
महान सम्राट अशोक जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन गत् वर्षों की भाँति इस वर्ष भी चैत्र शुक्ल पक्ष 24 मार्च को ‘‘दी बुद्धिस्ट सोसायटी आॅफ इण्डिया’’ बिहार शाखा के नेतृत्व में सम्राट अशोक फाउंडेशन, अखिल भारतीय युवा कुशवाहा समाज (भारत), लार्ड बुद्धा चेरिटेबुल ट्रष्ट, आँल इण्डिया भिक्खु संघ, अखिल भारतीय सम्राट अशोक विचार मंच एवं समता सैनिक दल आदि संगठनों के सहयोग से किया गया है।
आज विश्व के सभी देश जातिय एवं धार्मिक उन्माद एवं आतंक से प्रभावित है जबकि हर आम आदमी शांति एवं भाईचारा का वातावरण पसंद करता है। आज से 23 सौ वर्ष पूर्व मौर्य शासन काल में सम्पूर्ण एशिया जब अखण्ड भारत का हिस्सा था किसी के घर में ताले नहीं लगते थे, लोग मिल जुल कर रहते थे एवं एक दूसरे की आवश्यकताओं जरूरतों का ख्याल रखते थे, सम्पूर्ण एशिया बुद्धमय, था, तथागत बुद्ध की करूणा, मैत्री, भाईचारा एवं आपसी सौहाद्र की रसधार बहती थी।
सन् 2009 में बुद्धिस्ट सोसायटी के प्रदेश अध्यक्ष श्रीनाथ सिंह बौद्ध की पहल पर निरंजन कुशवाहा ‘‘पप्पू’’ ब्रज किशोर सिंह कुशवाहा आदि द्वारा महान सम्राट अशोक जन्माष्टमी का आयोजन महान अशोक की जन्मभूमि, कर्मभूमि एवं राजधानी रही पाटलिपुत्रा (पटना) में किया गया। कारवाँ बढ़ता गया लोग जुटते गये, अमन पसंद लोगों का जुड़ाव बढ़ता गया। अब लोग अशोक की शासन व्यवस्था की खुबियों को ढूंढ़ने लगे है। कार्यक्रम आयोजन का प्रतिफल आज आपके सम्मुख है। जन्माष्टमी के दिन छुट्टी सम्राट अशोक कन्वेंशन सेंटर, नालंदा अन्तराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना से लेकर राज्य के 40 शहरों में सम्राट अशोक सामुदायिक भवनों का निर्माण प्रारम्भ है। हमारी कुछ माँगे अभी लम्बित है।
आयोजन की तैयारी पूरी हो चुकी है। आयोजन समिति के लोग राज्य भर का दौरा कर पटना लौट आये है। कार्यक्रम की शुरूआत कुम्हरार पार्क (अशोक किला) से गौतम बुद्ध विहार, पटना तक शोभा यात्रा से होगी जिसमें सम्राट अशोक कालीन भव्य झाँकी, बैंड बाजा, ढ़ोल तासा बौद्ध भिक्खु संघ, स्कूली छात्र-छात्रा, मोटर साईकिल सवार एवं देश भर से आ रहे मौर्य शाक्य वंश के अतिथि के साथ लाखों नागरिक सम्मिलित रहेंगे। मुख्य समारोह गौतम बुद्ध विहार, दारोगा राय पथ पटना में 3ः00 बजे से प्रारम्भ होगा।
क्रार्यक्रम आयोजन का मुख्य उद्देश्य फिर से अखण्ड भारत का निर्माण एवं विश्व के आम नागरिकों के बीच आपसी प्रेम और सौहाद्र को बढ़ावा देना है।

श्रीनाथ सिंह बौद्ध
अध्यक्ष
भारतीय बौद्ध महासभा, बिहार शाखा

18/03/2018
हर वश की भाती 2018 में महान सम्राट अशोक अन्माष्टमी का आयोजन किया जाना है जिसकी तैयारी अभी से आरम्भ हो गई है। आपको बता दे...
31/08/2017

हर वश की भाती 2018 में महान सम्राट अशोक अन्माष्टमी का आयोजन किया जाना है जिसकी तैयारी अभी से आरम्भ हो गई है। आपको बता दे कि इस बार 25 मार्च 2018 को गौतम बुद्ध विहार, दारोगा राय पथ अपना में आयोजन किया जाना है। जिसमें पुरे बिहार से एवं अन्य राज्यो से अनेको बौद्ध भिक्क्षु गण एवं माननीय लोग आते है।

गुगल की ओर से सम्मानित हुए आईकेान पब्लिक स्कूल के डाईरेक्टर डा॰ मुकेश कुमार एवं अन्य
31/08/2017

गुगल की ओर से सम्मानित हुए आईकेान पब्लिक स्कूल के डाईरेक्टर डा॰ मुकेश कुमार एवं अन्य

समता सैनिक दल को कमजोर वर्गो के उत्थान तथा सामाजिक सदभावना हेतु ‘डाॅ॰ अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार’राकेश कुमार वर्मा, दौस...
31/08/2017

समता सैनिक दल को कमजोर वर्गो के उत्थान तथा सामाजिक सदभावना हेतु ‘डाॅ॰ अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार’
राकेश कुमार वर्मा, दौसा (राजस्थान)
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार द्वारा कमजोर वर्गो के उत्थान तथा सामाजिक सदभावना हेतु ‘‘डाॅ॰ अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार’’ भारतीय संविधान के निर्माता भारत रत्न डाॅ॰ बी॰आर॰ अम्बेडकर जी द्वारा स्थापित ‘‘समता सैनिक दल’’ को महामहिम राष्ट्रपति माननीय श्री प्रणव मुखर्जी द्वारा प्रदान किया गया।
विज्ञान भवन नई दिल्ली में आयोजित समारोह की अध्यक्षता श्री थावर चन्द्रमहलोत (सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री, भारत सरकार) ने की इस अवसर पर केन्द्रीय श्रममंत्री श्री रामदास आठवले, निदेषक डाॅ॰ अम्बेडकर प्रतिष्ठान समारोह में मंवासिन थे।
समता सैनिक दल केक राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय ए॰आर॰ओषी जी को महामहिम राष्ट्रपति मानननीय प्रणब मुखर्जी ने ‘‘डाॅ॰ अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार’’ प्रदान किया जिसमे स्मृति चिन्ह अभिलेख पट्ट दस लाख रूप्ये नगद सम्मान स्वरूप दिया गया।
दिल्ली बिहाहर राजस्थान, उत्तर पद्रेष, हरियाणा, महाराष्ट्र पंजाब, व छत्तिसगढ़ हिमाचल मध्य प्रदेष में दलित आन्दोदन, धरनाा, प्रर्दषन, आमरण अनसन, महिला अधिकारो, दलित अत्याचारो के विरूद्ध आवाज उठाने एवमं सरकार, प्रषासन से सहि मायने में दलितो के सामाजिक, आर्थिक विकास के लिए संर्घषरत समता सैनक दल को यह सम्मान प्रदान किया गया।
समता सैनिक दल के पुर्नधारक एवं मुख्य संरक्षक माननीय श्री उम्मेद सिंह गौतम, मुख्य सचेतक माननीय जे॰पी॰ नागंवषी, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ॰ सी॰पी॰ सिंह जी, एन॰पी॰ निषान्त, गुरू चरण सिंह जी एवम राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री ए॰आर॰जोषी जी, श्री बी॰डी॰ सुजात जी, खगीर्य श्रीमती कुसुमलता गौतम, श्री राजन गौतम विधायक माननीय एडवोकेट राजेन्द्र गौतम, बिहार से श्रीनाथ सिंह बौद्ध, राजस्थान से राकेष कुमार वर्मा उत्तर प्रदेष से टेक सिंह गौतम, हरियाणा से विजेन्द्र सिंह जी, आदी क्षेत्रो के दलित समता सैनिक जिन्होने सम्पूर्ण भारतवर्ष में दल के प्रयोजित कार्यक्रमो के माध्यम से जनमानस पर आप छोड़कर समता सैनिक दल को बाबा साहेब अम्बेडकर की मृत्यू के बाद स्थापित कर कमजोर व दबे कुचले, दलितो, महिलाओ पर होने वाल अत्याचारो को रोकने का सफल कार्य व समता मूलक समाज की स्थापना में अहम भूमिका अदा की साथ ही न्यायपूर्ण समाज के विकास के नये आयाम स्थापित कर बाबा साहेब के मिषन व कारवा को गति प्रदान की।
समता सैनिक दल में सम्पूर्ण भारतवर्ष में सम्मानित भाीम सैनिक जो ग्रामीण व शहरी क्षेत्र में दलित उत्थान पर कार्य कर रहे है उनकी भी भूमिका को हमद ल के माध्यम से प्रसारित कर राष्ट्र की एकता व अखण्डता को अक्षुण्ण रखने में सक्रिय कार्य कर रहे है और यह प्रतिफल उसी का है।
(राकेष कुमार वर्मा)
राष्ट्रीय प्रधान महासचिव, समता सैनिक दल आदर्ष विधामन्दिर के सामने, पूनम टाकिज के पीछे, दौसा

स्वाधीनता दिवसः जष्ने आजादी(श्रीनाथ सिंह) टंग्रेजों की गुलामी मुक्त कहुकए 70 वर्ष पूरे हो गये। सम्पूर्ण राष्ट्र आजादी की...
31/08/2017

स्वाधीनता दिवसः जष्ने आजादी
(श्रीनाथ सिंह)
टंग्रेजों की गुलामी मुक्त कहुकए 70 वर्ष पूरे हो गये। सम्पूर्ण राष्ट्र आजादी की 71 वाँ वर्ष गाँठ मनाने की तैयारी में लगा है। विविधता में एकता का देष भारत अपने आप में अनूठा माना जाता है क्योंकि विभिन्न धर्मो, जातियों एवं वर्ण के लोग यहाँ रहते हैं, छोटी-छोटी घटनाओं को दर किनार कर दें, तो आजादी के बाद यहाँ कोई बड़ी साम्प्रदायिक घटना या जातिय दंगे नहीं हुए। लोगों के अन्दर आपसी टकराव कभी इस तरह नहीं हुए कि किसी अन्य देष को दखल देने की स्थिति पैदा हो। यानि हम सीमा की सुरक्षा एवं पड़ोसी देष से वर्ताव के मामले में हमारी भावनाएं एवं राष्ट्र प्रेम समान है।
अंग्रेजों को भारत से भगाने में सभी धर्मों एवं जातियों का समान योगदान था। किसी एक जाति या धर्म के भरोसे आजादी नहीं मिली है। देष को आजाद कराने में सबका योगदान समान था। आज देष के अन्दर साम्प्रदायिकता के नाम पर आपस में लड़ाने की कोषिस हो रही है। कुछ लोग राष्ट्रीयता के नाम पर उलूल जुलूल वयान दे रहे है।
देष की राष्ट्रीय सत्ता के केन्द्र बिन्दु में आजदी के बाद पैदा हुए लोग अब करीब करीब हर शीर्ष दद पर पहुँच चुके है। जंगे आजादी में अपनी भूमिका का निर्वहन करने वाले कुछ ही लोग बचे है जो शारीरिक रूप से सत्ता संचालन में भूमिका निर्वहन के लायक नहीं है किन्तु आजादी के 70 वर्षों बाद जब हम यह विष्लेषण करने बैठते है कि इतने दिनों में हम कहाँ पहुँचे, तो पाते है कि जंगे आजादी मेकं कूदने वाले लोग अपने जीवन के अन्तिम दिनों में हताष और निराष है। उन लोगों के दिलों में जो सपना था, देष की उन्नति एवं समृद्धि का खाका था वह उनकी सोच और योजना से मिन्न है।
भारतीयों केा सत्ता सौंपने से पूर्व अंग्रेजों के साथ भारतय नेताओं की बैठकें हुयी। सत्ता सौंपने से पूर्व अंग्रेजों के साथ बनीं, बाबा साहब ने दलितों के लिए दो वोट देने का अधिकार माँगा था, अंग्रेज उस पर सहमत थे, यानि दलित वोटर एक मत दलित उम्मीदवार को देंगे जो सुरक्षित सीट से चुना जानो वाला है, उनके चमन का अधिकार शीर्फ दलितों को होगा, दूसरा वोट वे सामान्य उम्मीदवारों को देंगे। गाँधी जी इससे सहमत नहीं थे उन्होंने पून जेल में आमरण अनरान प्रारम्भ कर दिया। अन्ततः बाबा साहब को गाॅधी जी के जीवन रक्षा के लिए झुकना पड़ा। पूना जेल के अन्दर हिन्दु नेता मदन मोहन मालवीय, बाल गंगाधर तिलक आदि के साथ पूना पैक्ट समझौता सम्पन्न हुआ। गाँधी जी के प्राण बच गये किन्तु दलित सदा के लिए गुलाम बनकर रह गये। आज हमारे सामने जो स्थिति है उसे देख रहे है। दलित प्रतिनिधि सुरक्षित सीटों से लोक सभा, विधान सभा पहुँच अवष्य रहे है किन्तु उनकी प्रतिबद्धता दलितों के बजाय सामान्य वर्ग के प्रति ज्यादा रहती है। दलित चाहकर भी अपना मनपसन्द उम्मीदवार कभी भी जितवाने में सफल नहीं होते। बाबा साहब स्वयं लोक सभा चुनाव इन्हीं कारणों से हार गये थे।
टाजादी के पूर्व जो कमजोर वर्ग के मेहन मजदूरी करते थे वे आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी उस दंष को झेलने को मजदूर है। आजादी के बाद देष उन्नति किया हैं इसमें कोई दो राय नहीं है किन्तु अमीर और अमीर होते जा रहे है गरीब और गरीब। समृद्धि उन्नति का मूल मंत्र षिक्षा है। गाँव स्तर पर देष भर में प्राथमिक विद्यालय खोले गये है किन्तु उनकी षिक्षण व्यवस्था का स्तर इसी बात से समझाा जा सकता है कि षिक्षा विभाग का अदना कर्मचारी भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाते। गरीब के बच्चे जो कल तक गाँव के जमींदारों के ढ़ोर डाँगर चराते थें। सुबह में बासी खाना कटोरा में लेकर गाँय, भैंस चराने जाते थे। आज वे स्कूल जा तो रहे है किन्तु मात्र दोपहर का खाना मिलने के लालच में। कटोरा तब भी उनके हाथ था कटोरा आज भी है। बच्चों को पढ़ाने वाले षिक्षक भी उन्हें हीन भावना से देखते है।
प्ंचायत स्तर पर स्वास्थ्य सुविधा पहुँचाने के नाम पर प्रा॰ स्वास्थ्य केन्द्र खोले गये हैं, उनमें डाक्टर नर्स कम्पाउंडर की पोस्टींग नहीं की जाती जहाँ की जाती हैं वहाँ डाक्टर जाते भी नहीं किन्तु उन अस्पतालों में प्रतिवर्ष लाखों करोड़ो की दवायें कागज पर ही वितरित कर दी जाती है। आरक्षण एवं हर सुविधा के वावजूद गरीब का बेटा डाक्टर नहीं बन सकता क्योंकि डाक्टर की पढ़ाई में होने वाला खर्च उनके अमिभावक के बस की बात नहीं है।
टाजादी के सत्तर साल बाद भी जिस देष की आधी से ज्यादा आबादी दो जून की रोटी की कवायद कर रही है। वे यदि आजादी का जष्न मनायेंगे तो शाम में उनके घर का चूल्हा कैसे जलेगा। कूड़े कचरे के ढ़ेर से रोटी का जुगाड़ करने वाले मेहनता मजदूरी कर पेट पालने वालों को आजादी से क्या मिला यह यक्ष प्रष्न हमारे सामने खड़ा है किन्तु इस पर सोचने के लिए क्या किसी को फुर्सत है। अब देष के अन्दर एक नई परिवारी प्रारम्भ कर दी गयी है। वहीं कोई फरमान जारी कर रहे है, वहीं सरकार राष्ट्रगान एवं राष्ट्रगीत गान अनिवार्य किया जा रहा है। क्या हम कभी भी नियम बनाकर राष्ट्रभावना अनिवार्य किया जा रहा है। क्या हम कभी भी नियम बनाकर राष्ट्रभावना जगा सकते है। राष्ट्र भावना तो अनुभूति की चीज है, उसे हम प्रेम से सौहाद्र से जन जागरनकता से पैदा कर सकते है। वह हम आज भी नही कर रहे किसी के प्रतिघृणा, विद्वेष एवं तिरस्कार का भाव रखकर जबर्दस्त राष्ट्रभावना नहीं जगा सकते। आजादी के सत्तर वर्षों बाद भी जिन्हें जिनकी जिन्दगी दो जून की रोटी व्यवस्था में ही कट जा रही है उनसे हम किसी तरह की राष्ट्रभक्ति की अपेक्षा कर रहे है। सरकार की योजनाएं गरीबों के उत्थान की बनती है फिर भी उनका उत्थान क्यों नहीं हो रहा इसके लिए हम मिलजुल कर मार्ग बनाना होगा।

उत्तर प्रदेषअराजकता की ओर बढ़ता प्रदेष(डा॰ विरेन्द्र कुमार सिंह)योगी का विरोध देषद्रोहसाम्प्रदायिक एवं जातिय दंगे में बढ़ो...
31/08/2017

उत्तर प्रदेष
अराजकता की ओर बढ़ता प्रदेष
(डा॰ विरेन्द्र कुमार सिंह)
योगी का विरोध देषद्रोह
साम्प्रदायिक एवं जातिय दंगे में बढ़ोत्तरी
दिखने लगा योगी का असली एजेंडा।
उत्तर प्रदेष मंे योगी आदित्यनाथ सरकार को सत्ता सम्भालें 100 दिन पूरे हो गये हैं। अपनी सरकार के सौ दिन पूरे होने पर मुख्यमंत्री ने जो रिपोर्ट कार्ड जारी किया है उसे धरातल पर खोजने की कोषिस में निराषा ही हाथ लगती है। दर असल भाजपा ने मुख्य मंत्री के चयन में ही अपनी असली मंषा जाहिर कर चुकी है। चुनाव प्रचार में जिस तरह का प्रचार किया गया ठीक उसके विपरीत मुख्यमंत्री का चयन हुआ। शपथ ग्रहण के बाद इलेक्ट्रानिक मीडिया सहित तमाम प्रचार माध्यमों से योगी को जिस तरह महिमा मंडित किया गया। योगी आदित्यनाथ द्वारा जिस तरह की घोषणायें की गयी उनमें से किसी पर अमल होता नजर नहीं आ रहा है। बदलाव सिर्फ एक ही नजर आ रहा है कि कानून व्यवस्था को अपने पाकेट में लेकर चलने वाले सपा के गुण्ड़ों की जगह भाजपा समर्थित हिन्दु वाहिनी बजरंग दल एवं तथा कथित गो रक्षक दल के गुण्डों ने ली है।
लोकतंत्र में सत्ता का विरोध सत्याग्रह प्रदष्नि एवं धरना के माध्यम से करना उसके मजबूती का घोतक है किन्तु योगी आदित्यनाथ का विरोध देष द्रोह की श्रेणी में माना जा रहा है। इलाहाबाद विष्वविद्यालय सहित कई स्थानों पर योगी आदित्यनाथ को काला झंडा दिखाने वाले छात्रों पर देष द्रोह का मुकद्दमा दायर किया गया है। भारतीय संविधान में यहाँ के हर नागरिक को अभिव्यक्ति का अधिकार प्राप्त है। अपनी समस्याओं के प्रति सरकार का ध्यान आकृर्षित कराने एवं अपनी माँग की पूर्ति के लिए शांति पूर्ण ढ़ग से धरना प्रदर्षन करने का हर संगठन को अधिकार है। सरकार विराधी संगठनों पर बर्बरता पूर्ण कार्यवाई कहीं से न्यायोचित नहीं कहा जा सकता।
भारतीय परम्परा में गृहस्थ जीवन से संयास लेकर अध्यात्म के जरिये जन कल्याण करने का लम्बा इतिहास रहा है। किसी भी धार्मिक संत, महात्मा का सीधे सत्ता में दखल या सत्ता संचालन का उदाहरण देखने को नहीं मिलता। भाजपा जब सीधे-सीधे अपनी विचार धारा को जनता पर थोपने या सहानुभूति प्राप्त करने में विफल रही तो उसने देष भर के साधु संयासियों को आगे का सत्ता में आयी है। सीधे सत्ता की चाह रखना या सत्ता संचालन करने वाला व्यक्ति योगी या सन्यासी की श्रणी में नहीं आता। भारत एक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देष है। यहाँ सभी धर्मो के मानने वालों को समान अधिकार प्राप्त हैं हर धार्मिक को अपनी विचार धारा मान्यता एवं उसके गतिविधियों का प्रचार प्रसार का समान अवसर भारतीय संविधान प्रदान करता है किन्तु जब किसी धर्म सम्प्रदाय के संचालक/संगठक को किसी प्रदेष देष का सत्ता शीर्ष बना दिया जाय तो वह अपनी विचार धारा को थोपने की कोषिस करेगा।
देष में अब एक नयी परम्परा का सूत्र पात हो चुका है जो झुठ फरेब और अंध विष्वास के माध्यम से देष को धार्मिक कट्टर पंथ की ओर ढ़केल रहा है। सन्यास या योग ग्रहण करने का मतलब होता है कि वह व्यक्ति अपनी आध्यत्मिक ज्ञान, अनुभव के माध्यम से मानव कल्याण करते हुए अपनी मुक्ति का मार्ग प्रसस्त करता है। किसी भी धर्म के संयासी या योगी से हर धर्म की उन्नति विकास की बात सोचना बेमानी है वह जिस पंथ में संयास लेता है उसकी प्रतिबद्धता उस धर्म के साथ रहती है और अवसर मिलने पर अपनी विचार धारा थोपने का प्रयास करेगा। सही मायने में संयासी, योगी सत्ता मोह से दूर होता है जिसे सत्ता का लोभ हो गया वह योगी या सन्यासी नहीं रह जाता। सिर्फ गेरूये वस्त्र धारण कर गृहत्याग करने वाले को योगी या संयासी नहीं माना जा सकता।
सत्ता में आने पर लड़कियों, महिलाओं की सुरक्षा के लिए योगी जी ने रोमियों आपरेषन अभियान चलाया था, कुछ दिनों तक कुछ लफंगों को पुलिस जेेल भेजी थी किन्तु अब भाजपा के सहयोगी संगठन उसकी बधिया उधेड़ रहे है जगह-जगह ये संगठन पुलिस को नीचा दिखाने से बाज नहीं आ रहे है। इन संगठनों के कार्यकर्ता अपने को कानून से उपर मानकर चल रहे है। बरेली आदि कई स्थानों पर पुलिस से दुब्र्यवहार करते इन संगठनों के कार्यकर्ताओं को देखा गया है।
उत्तर प्रदेष में भाजपा किसानों की ऋण माफी, विधिव्यस्था में सुधार, सबको समान अवसर, षिक्षा चिकित्सा एवं परिवहन की स्थिति में सुधार, अवाध विजली सप्लाई आदि अनेकांे मुद्दों को लेकर चुनाव फलस्वरूप बहुमत की सरकार बनी किन्तु उन वादों का हस्य क्या हुआ। यह जनता के समक्ष है। आवे ंदेखते है उत्तर प्रदेष की वर्तमान स्थिति।
किसानों की ऋण माफीः- चुनाव पूर्व किसानों का कर्ज दस दिन में सरकार बनते माफ करने की घोषणा हुयी थी। सरकार बनने पर हर कर्जदार किसान के ऋण में एक लाख माफी की घोषणा हुयी । बैंकों से सरकार ऋणी किसानों की सूची माँगी। अभी तक किसी के खाते में सरकार बनने के सौ दिनों बाद भी एक पैसा नहीं आया है। ऋण खाते में वसूली दर्ज नहीं होने से खरीफ फसल के लिए ऋण मिलना मुष्किल है। किसान हताष निराष एवं ठगा महसूस रहा है।
विद्युत आपूर्तिः- देष के प्रधान मंत्री चुनाव प्रचार में भीड़ सेपूछते थे, आपके यहाँ बिजली आती है। लोग कुछ बोले उससे पहले उनके भाड़े वाले तोते नही! नही! का आवाज बुलन्द करते थे। अब योगी जी की सरकार में विजली चैबीसों घंटे सप्लाई हो रही है, बनारस से इलाहाबाद तक के क्षेत्रों में पहले जितना समय बिजली रहती थी, अब वह नहीं रहती बल्कि अब ये निष्चित नहीं है कब आयेगी और कब जायेगी इनका कोई समय निर्धारित नहीं है।
सड़क मरम्मत- सरकार बनने पर योगी जी ने 15 जून तक सभी सड़को के गड्ढ़े भरे जाने का दिषा निर्देष दिया था। योगी जी का रिर्पोट कार्ड कहता है कि सभी गड़ढ़े भर दिये गये। वास्तविक पड़ताल करना है तो कोई भी किसी भी जिले के ग्रामीण सड़को को देख सकता है। अब जब सरकार ने मान लिया कि गड़ढ़े भर दिये गये तो समझ लिजिये गड़ढ़े भर दिये गये यानि फाइलों पर करोड़ो अरबों का वारा न्यारा हो गया। जनता का क्या जनता तो पाँच वर्ष बाद हिसाब लेगी उससे पहले अब उसे पूछता कौन है। वैसे उत्तर प्रदेष ने एक नयी परिपाटी शुरू कर दी है। पाँच वर्षों में चेहरा ही नहीं पार्टी का भी सरकार से सफाया कर दे रही है। अपराजेय मायावती, अखिलेष के आगे योगी का भी स्थान सुरक्षित रहेगा।
विधि व्यवस्थाः- सरकार में आते योगी जी कई थानों में अचानक पहुँचें। कई दिषा निर्देष दिये किन्तु उनके आदेषों पर पुलिस प्रषासन के पेषानी पर कोई षिकन नहीं देखा जा रहा है। पुलिस तब सपा के गुण्ड़ों के दबाब में रहती थी, अब भगवा गुण्डे हाबी है। गो रक्षा के नाम पर मुस्लिम मवेषी व्यवसायी जगह-जगह प्रताडित किये जा रहे है कई जगहों पर प्राण लेवा हमले के साथ हत्या तक हो चुकी है। योगी के तीन महीने में दर्जनों जातिय एवं साम्प्रदायिक दंगे हो चुके है। लगता है सम्पूर्ण प्रदेष दंगों की चपेट में आ जायेगा। अल्पसंख्यक वर्ग एवं दलित समाज भयभीत है। कब किस पर कहाँ हमला हो जायेगा। कहा नहीं जा सकता।
षिक्षा चिकित्सा व्यवस्था में सुधार- षिक्षा के क्षेत्र में सुधार का कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया बल्कि पुरानी ठर्रें पर ही चल रहा है। ग्रामीण इलाकों में स्थित अस्पताल के चिकित्सक पूर्व की भाँति माह दो माह पर ही कभी नजर आते है वरना वे पहले की तरह अपना निजि प्रैक्टिस जारी रहेख हुए है। योगी के गोरखपुर अस्पताल दौरे के दिन से तीन दिन में 36 मौतें हो चुकी है। यह कैसा निरीक्षण है।
उत्तर प्रदेष साम्प्रदायिक उन्याद की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। तथाकथित भगवा गुण्डे जगह-जगह गोरक्षा के नाम पर अपराधिक घटनाओं को अंजाम दे रहे है। प्रषासन इनके दबाव मं चल रहा है। ये गुण्डे अब विरोध करने पर पुलिस की पिटाई करने से बाज नहीं आ रहे है।

किसान आक्रोषित क्यों? देष के दो बड़े राज्यों के किसान आन्दोलन कर रहे है। कर्ज की बोझ से देष भर के किसान तंगो तबाह है। मौस...
31/08/2017

किसान आक्रोषित क्यों?
देष के दो बड़े राज्यों के किसान आन्दोलन कर रहे है। कर्ज की बोझ से देष भर के किसान तंगो तबाह है। मौसम की वेरूखी से कही सूखा एवं कही बाढ़ से फसलें बर्बाद हो जा रही है। खेती का पारम्परिक स्वरूप् बदल चुका है। भारतीय किसान प्रतिवर्ष जुआ खेलता है, यानि घर की पूँजी बीज खाद दवा के रूप में खेतों में डाल देता है यदि प्रकृति ने साथ दिया तो फसल लौटी बर्ना डूब गयी। फिर दूसरे वर्ष भी वही सिलसिला अपनाया जाता है।
कृषि कार्य अब काफी मँहगा हो चुका है। आजादी के बाद से ही किसान संगठनों द्वारा कृषि को उद्योग का दर्जा देने की माँग उठते रही है। कृषि के क्षेत्र में कई कदम उठाये भी गये किन्तु आजादी के बाद से अब तक सही मायने में उद्योगों में उत्पादित वस्तुओं की किमत की तरह वृद्धि कृषि उपज को नहीं मिली। आजादी के बाद से औद्योगिक एवं सरकारी कर्मियों के वेतन आदि में जो वृद्धि अब तक हुयी है उसके अनुपात में कृषि उपज की किमतों में बढ़ोत्तरी नहीं हुयी। दो तीन दषक से पूरे देष में सिचाई की कोई परियोजना नहीं बनायी गयी। अन्धाधुंध रासायनिक खाद एवं दवा के प्रयोग से उत्पादन दर बढ़ता जा रहा है।
लोक सभा चुनाव पूर्व प्रधान मंत्री ने देष भर में घूम-घूम कर किसानों की दुखती रग पर हाथ रख कर सहानुभूति बटोरी। गुजरात महाराष्ट्र आदि प्रांतो में कर्ज में डूबे किसानों द्वारा किये जा रहे आत्म हत्या को हथियार के रूप में प्रयोग किया। अन्नदाता की बदहाली पर घडियाली आँसू बहाकर उनके भारी मतों को अपनी झोली में डलवाने का कार्य किया। उनका वादा था किसानों को नयी तकनीक प्रोद्योगिकी से प्रषिक्षित किया जायेगा। कृषि लागत से डेढ़ गुना ज्यादा किमत दिया जायेगा आज मोदी जी की सरकार के तीन वर्ष बीत गये। अपने कार्यों का ढ़ोल पूरे देष में पिटवा रहे है। मगर अन्नदाता से किये वादे तो दूर अब उनके जले पर नमक छिड़कने का कार्य भी कर रहे है। शब्द जाल के जादूगर प्रधानमंत्री जी अपनी पीठ खुद ठोक रहे है। किन्तु किसानों के फसल का वास्तविक किमत कब मिलेगा यह नहीं बता रहे। आत्महत्या की सर्वाधिक घटनांए किसानों के बीच घट रहीं है। कर्ज से बोझिल किसानों के घरों में लड़कियों की शादी रूकी हुयी है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित है। खेतों में पैदा होने वाला अनाज से लागत भी वसूल नहीं हो रहा फिर वे कर्ज की भरपाई कहाँ से करेंगे।
मध्य प्रदेष में षिवराज सिंह चैहान ने किसानों के हित में कई कदम उठाये बंजर परती रहने वाली मध्य प्रदेष की अधिकांष भूमि में यदि लहलहाती फसलें नजर आती है तो उसके पीछे षिवराज सिंह की अहम भूमिका है। 2016 में जब उत्तर प्रदेष एवं बिहार झारखण्ड के अधिकांष खेत परती रह गये थे तब मध्य प्रदेष के खेतों में अच्छी फसले लगी थी कारण था खेत-खेत में पहुँचा बिजली का पोल एवं उसके लिए निर्वाध उर्जा की व्यवस्था। वहाँ के किसानों की जो समस्या अब सामने आयी है उसका हल षिवराज सिंह नहीं बल्कि प्रधानमंत्री ही निकाल सकते हैं क्योंकि उत्पादित अन्न की किमत का निर्धारण केन्द्र सरकार के जिम्मे है।
समय समय पर किसानों की कर्जमाफी भी होती रहती है किन्तु यह स्थायी हल नहीं है। विधान सभा चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेष में कर्ज माफी की घोषणा की थी जो अब तक किसानों के खाते में नहीं आया है किन्तु उसी तर्ज पर कर्ज माफी एवं फसल के उचित किमत की माँग को लेकर महाराष्ट्रएवं मध्य प्रदेष के किसान आन्दोलित हो गये जगह-जगह सड़कों पर सब्जी एवं दूध फेंके गये। मध्य प्रदेष के मंदसौर में आन्दोलन कर रहे किसानों पर गोली चलाई गयी जिससे छः किसानों की मौत हो गयी। तीन वर्षो के शासन काल में मोदी सरकार ने किसानों के हित में कई फैसले लिये और उसे प्रचारित कर उसका लाभ लेना चाहती है किन्तु किसानों के समझ में अब उनकी चाल आने लगी है कि मोदी जी सिर्फ लोभ एवं लालच के भरोसे वोट किसानों का लेना चाहते है किन्तु वे सदैव उद्योगपतियों के लाभ के लिए कार्य करते है।
मोदी सरकार के कृषि मंत्री फसल बीमा का देष भर में प्रचार कर रहे है किन्तु वे यह नहीं बताते कि वीमा कम्पनियाँ राज्यों से एक वर्ष जितना प्रिमियम ले रही है उसके अनुपात में राज्यों में कितना भरपाई कर रही है। सरकार की मंषा साफ है तो कम्पनियों को प्रिमियम देने के बजाय उस राज्य के फसल मुआवजा फंड के रूप में रखे है। जिन क्षेत्रों के किसान की फसल मारी जाती उन्हें तत्काल राहत पहुँचाने का कार्य किया जाता। ओला पाला या बाढ़ सुखाड़ की स्थिति में तुरंत भुगतान होता। दो वर्ष बीत गये अभी उत्तर प्रदेष में ओला एवं वर्षा से मारी गयी खरीफ फसल का मुआवजा नहीं मिला।
कहावत है- ‘‘का वर्षा जब कृषि सुखानी।’’ उत्तर प्रदेष में येागी सरकार ने एक लाख तक किसानों के ऋण माफ करने की ंघोषणा की है। अब धान बुआई का मौसम आ गया। बैंक खातों में न किसानों ने खुद पैसा जमा किया न सरकार ने । जिन किसानों को बीज खाद खरीदना है और उनके घर पैसा नहीं है वे कैसें खरीदेंगे खाद, बीज बैंक वगैर पैसा जमा हुये फिर ऋण तो दे नहीं रहें।
इस देष की विडम्बना है कि मुट्ठी भर उद्योगपतियों के कल कारखाने से निकलने वाली उपभोक्ता वस्तुओं की किमते वे स्वयं तय करते है किन्तु किसानों के खेत से निकलने वाले अनाज की किमत सरकार निर्धारित करती है। सरकार जो दर निर्धारित करती है वह भी किसानों को नहीं मिलते किसान विवष हो कर औने-पौने में सेठ साहुकार के हाथ बेच देते है। इस देष में कई खेल चल रहे है उसमें प्रबल खेल है किसानों को जातिय खेमों में बाँटकर आपस में लड़वाना और सहानुभति के शब्द जाल में फँसाकर उनका वोट हासिल करना।
खेती के कार्य में सहायक आवष्यक यंत्रों ट्रैक्टर, पम्पसेट, रोटावेटर, थ्रेषर आदि के दामों को यदि देखा जाये तो उनकी किमत वर्ष दो-तीन बार बढ़ायी जाती हैं। रासायनिक खाद बीज यंत्र आदि के दाम-आसमान छू रहे है। क्या फसलों का मूल्य निर्धारण करते समय सरकार ने कभी उसके लागत अनुपात का जहमत उठाने की कोषिस की। पूरे देष के किसानों पर बकाया ऋण से ज्यादा की राषि उद्योग पतियों के कर्ज की माफी सरकार द्वारा की गयी उसे लेकर किसी बैंक ने चू तक नहीं की किन्तु किसानों की ऋण माफी पर बैक भी एतराज कर रहे है। सरकार आखिर कब उनके फसलों का वाजिब किमत निर्धारित करेेगी। सबसे अच्छी खबर यह है कि जातिय खेमे में बटे किसान अब आपसी समझ से एकजुट हो रहे है एवं सरकार की दोरंगकी नीतियों के विरूद्ध आवाज उठाने लगे है।

मोदी सरकार का फंडाः किसान तबाह कम्पनी मालामाल मोदी सरकार का हर कदम निजि कम्पनियों को लाभ पहुँचाने एवं आम अवाम केा तबाह क...
31/08/2017

मोदी सरकार का फंडाः किसान तबाह कम्पनी मालामाल
मोदी सरकार का हर कदम निजि कम्पनियों को लाभ पहुँचाने एवं आम अवाम केा तबाह करने वाली साबित हो रही हैै। मोदी सरकार जिस फसल बीमा का ढ़ोल प्रिंट मिडिया इलेक्ट्रानिक मीडिया से लेकर अपने तमाम कार्यक्रमों के माध्यम से पीट रही है। उसका सीधे-सीधे लाभ नीजि कम्पनियाँ उठा रही है। इस वर्ष धान की रोपनी समाप्ति पर है मक्का, अरहर आदि की बुआई हो चुकी है किन्तु किसानों को पिछले रबी एवं खरीफ फसल में हुये नुकषान का छति पूर्ति अभी तक नहीं मिला है। मामला केन्द्र राज्य के बीच प्रीमियम भुगतान को लेकर है।
योजना का नाम प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना है। वैसे इस योजना का नाम प्रधान मंत्री फसल लूट योजना होना चाहिए आप कह सकते है क्यों? इसे ऐसे समझे। पिछले वर्ष का केन्द्र राज्य एवं किसान को मिलाकर बीमा कम्पनियों को कुल 1119.99 करोड़ बीमा कम्पनियों को मिलना है इतनी राषि मिलने के बाद बीमा कम्पनिया किसानों को 347.04 करोड़ रूपये किसानों को देंगी। भ्रष्टाचार मुक्त भारत का अभियान चलाने वाले भारत के प्रधान मंत्री क्या यह बता सकते है कि जब केन्द्र सरकार के अन्तर्गत कई बीमा कम्पनियाँ काम कर रही है ऐसे में यह कार्य नीजि कम्पनियों को क्यों दिया गया है। क्या इसके एवज में कोई डील नही हुयी हे यदि नही ंतो फिर सवाल है कि यह कार्य नीजि कम्पनियों को क्यो?
उपरोक्त आॅकड़ा सिर्फ बिहार का है किन्तु देष के किसी भी राज्य में प्रिमियम भुगतान एवं कम्पनियों से भुगतान का अन्तर दो गुना तीगुना से ज्यादा है। उससे भी ज्यादा दुखदाई यह है कि नीजि कम्पनिया खुद के प्रीमियम वसूली में जितना तत्पर है उतना किसानों के भुगतान में नहीं। 2015 खरीफ मौसम की प्रीमियम राषि लगभग 249 करोड़ केन्द्र सरकार ने बीमा कम्पनियों केा भुगतान नहीं किया, जबकि 2016 का प्रीमियम राषि राज्य सरकार ने नहीं दिया है। केन्द्र और राज्य सरकार के आरोप प्रत्यारोप के बाद राज्य में पिछले साल खरीफ मौसम में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू हुई।
केन्द्र राज्य के रगड़े में बीमित किसान 2016 और 2017 में हुई फसल नुकषान की क्षतिपूर्ति के इंतजार में टकटकी लगाये है। योजना के अनुसार किसान को फसल नुकषान के तुरंत बाद छतिपूर्ति देना है 2015 में बिहार में खरीफ फसल के लिए राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना लागू की गयी थी सरकारी बीमा कम्पनी एग्रीकल्चर इंष्योरेंस कम्पनी ने बीमा किया था। इस योजना के तहत खरीफ मौसम में किसानों को ढ़ाई प्रतिषत प्रीमियम देना पडा था। किसानों को 510 करोड़ का भुगतान करना है। इसमें केन्द्र और राज्य को आधा-आधा देना है।
बिहार सरकार ने भी केन्द्र पर नीजि कम्पनियों को लाभ पहुँचाने का आरोप लगाया था साथ ही केन्द्रांष 50 प्रतिषित के बजाय 90 प्रतिषत करने की माँग रखी थी। राज्य की आपत्ति के बाद केन्द्र ने बिहार सरकार को स्वयं बीमा कम्पनी चुनने की छूट दे दी गयी है।
केन्द्र और राज्य सरकारें मिल कर प्रत्येक वर्ष जितनी राषि प्रीमियम के नाम पर भुगतान कर रही हे उसका एक तिहाई या चैथाई राषि बीमा कम्पनियों को मुआवजा के रूपा में किसानों को दिया जा रहा है। इस राषि केा यदि राज्यों में किसान सहायता कोष में प्रतिवर्ष रखाजाय एवं राज्य सरकार अपनी मशीनरी के माध्यम से किसानों को फसल नुकषान के समय सहायता के रूप में उपलब्ध कराया जाय। राज्यों के अधीन यह कार्य रहने से किसानों को सहायता पहुँचाने में देरी की गुँजाईष कम होगी।

आवरण कथाक्यों टूटा महागठबंधन{2015 बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान उक नारा काफी हिट हुआ था। चाय पान की दुकानों से लेकर नगर...
31/08/2017

आवरण कथा
क्यों टूटा महागठबंधन
{2015 बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान उक नारा काफी हिट हुआ था। चाय पान की दुकानों से लेकर नगर कस्बों के नुक्कड़ों पर सर्वत्र इसी की चर्चा देखने को मिलती थी। नारा था- फिर नीतीषे कुमार तब इसके लिए राज्य के आम अवाम में काफी अपनापन देखा गया। अपनापन का कारण था देष के प्रधानमंत्री द्वारा नीतीष कुमार के डीएनए में गड़बड़ी होने का लगाया गया आरोप। नीतीष कुमार 2005 के नवम्बर में मुख्यमंत्री बनये थे तब से अबतक बिहार के लिए उल्लेखनीय कार्य किये हैं बिहार की विधि व्यवस्था पटरी से उतरी हुयी थी सर्वत्र अराजकता की स्थिति थी, राज्य की सड़कें चलने लायक भी नहीं रह गयी थी षिक्षा चिकित्सा सहित विकास के सारे कार्य ठप्प थे। तब सरकार एनडीए की बनी थी। 2013 में नरेन्द्र भाई मोदी को भाजपा द्वारा प्रधान मंत्री उम्मीदवार घोषित किये जाने पर नीतीष कुमार ने अपने को एनडीए से अलग कर भाजपा मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया, बिहार की जनता तब भी इनके साथ थी। 2014 लोक सभा चुनाव में भाजपा के हाथों भारी सिकस्त मिलने पर नैतिकता के नाम पर इस्तीफा देकर जीतन राम माझी को मुख्यमंत्री मनोतीत किया किन्तु कुछ ही दिनों में इन्हें यह महषुस होने लगा कि जीतन राम माझी भाजपा की लाईन पर जा रहे हैं आनन फानन में जीतन राम माझी को मजबूर कर इस्तीफा दिलवाया गया फिर से नीतीष कुमार मुख्यमंत्री बने तब भाजपा को रोकने के नाम पर बाहर से समर्थन दे रहे लालू प्रसाद की पार्टी एवं कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर 2015 के चुनाव में उतरे। आवें देखते है। कौन सी ऐसी परिस्थिति आ गयी थी कि नीतीष कुमार को इस्तीफा देना पड़ा एवं इस्तीफे के बाद रात भर कार्यकारी मुख्यमंत्री रह दूसरे दिन फिर शपथ ग्रहण किये।}
विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाने वाला भारत आजादी के बाद से ही कई तरह के विरोधाभाषाओं का सामना कर रहा है। आजादी की लड़ाई लड़ने वाले नेताओं के अन्दर सत्ता की लालच नहीं थी। सरकार बनने पर विकास के कई उल्लेखनीय कार्य हुए किनतु उस समय भी नेहरू सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे जिसे सिरे से नकार कर पर्दा डाल दिया गया तब से धीरे-धीरे सत्ता पक्ष द्वारा किया गया भ्रष्टाचार आरोप प्रत्यारोप बन कर ही रह गये। अमूमन आजादी के बाद केन्द्र में अधिकांष समय कांग्रेस की ही सरकार रही इससे भ्रष्टाचार के आरोप उस पर सर्वाधिक है। बीच में 77 से 80 जनतापार्टी की सरकार रही 89 से 90 वी.पी. सिंह, चन्द्रषेखर 95 से 96 तक देवगोड़ा गुजराल एवं 98 से 2004 तक अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार रही। वी.पी. सिंह के कार्यकाल को छोड़ कर हर सरकार पर भ्रष्टाचार एवं घोटाले के आरोप लगे यह बात दिगर है कि तब वे आरोप सिद्ध नहीं हो सके या सफाई से उन्हें दबा दिया गया। बाजपेयी की सरकार में नीतीष कुमार रेल मंत्री बने थे। रेल मंत्री के रूप में बिहार के लिए इन्होंने कई उल्लेखनीय कार्य किये किन्तु उस समय इनपर भी जैक खरीद घोटाला, स्लीपर घोटाला एवं रेलकर्मी भर्ती घोटाला का आरोप लगा था किन्तु तब आडवानी जी की महिमा से फाईल दबा दी गयी। कुछ सामाजिक कार्यकर्ता कोर्ट भी गये किन्तु पर्याप्त सबूत के आभाव में नीतीष कुमार बेदाग बच गये।
नीतीष कुमार ने अपनी छवि एक ईमानदार नेता की स्थापित की है जीरो टोलरेस की नीति पर चलते हुए सहयोगियों पर जब भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे इस्तीफा ले लिया। 2005 में राजग सरकार की कमान हाथ में आते ही विकास के प्रति पूर्ण समर्पित नेता के रूप में कार्य किया। नीतीष कुमार ने अपना वोट आधार लालू प्रसाद से नाराज पिछड़ो एवं दलितों में खड़ा किया वहीं सरकार चलाने के लिए सबसे उपमुक्त एवं सक्षम सवर्णो को मान कर संतुलन बैठाया जिससे इनकी सरकार तो अवाध गति से चलती रही किन्तु उसका खामियाजा गरीबों एवं शोषितों को भोगना पड़ा।
तथागत बुद्ध ने अपने संदेष में कहा था जो दिखता है वही सदैव सत्य नही होता। ये कहावत नीतीष कुमार के कार्यो एवं उसके परिणामों में पूरी तरह परिलक्षित होता है।
लालू प्रसाद एवं नीतीष कुमार की राजनैतिक यात्रा साथ-साथ शुरू हुयी थी दोनों ही जय प्रकाष आन्दोलन की उपज है। सन् 1977 को लोकसभा चुनाव जीतकर लालू प्रसाद कम उम्र के सांसद के रूप में चर्चा के केन्द्र में आ गये थे किन्तु नीतीष कुमार 77 एवं 80 का विधान सभा चुनाव हार गये थे। प्रथम बार 1985 में विधायक बने नीतीष कुमार 1989 में बाढ़ से प्रथम बार लोक सभा चुनाव जीतकर वी.पी. सिंह मंत्रिमण्डल में मत्री बने। 1990 में लालू प्रसाद जब मुख्यमंत्री बने तो नीतीष कुमार उनके सबसे निकटस्थ सहयोगियों मेंमाने जाते थे किन्तु चार वर्ष बीतते-बीतते जहाँ लालू प्रसाद सोहरत की सीढ़ी पर तेजी से बढ़ रहे थे, पार्टी एवं सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर अपने स्वजातियों का स्थापित करने में लगे थे वही अन्य वर्ग के पार्टी नेता अपने को उपेक्षित महसूस करने लगे। दोनों के बीच दूरी खुल कर तब देखने को मिली जब सदन नेता के रूप में जार्ज फर्नाडिज के विरूद्ध लालू प्रसाद शरद यादव को खड़ा कर जीताया एवं केन्द्रिय राजनीति में भी अपना दबदबा कायम कर लिया। लालू प्रसाद से नाराज लोगों को ईकट्ठा कर नीतीष कुमार ने 1994 में समता पार्टी का गठन किया किन्तु 1995 के चुनाव में विधान सभा में मात्र 7 विधायकों को ही ला पाये।
लालू प्रसाद को अपदस्थ करने के लिए नीतीष कुमार लगातार संघर्षरत रहे, लालू प्रसाद के सारे विरोधियों को एक प्लेटफार्म पर इकट्ठा करने में लगे रहे। जार्ज फनांडिज के स्वभाव के विपरित उन्हें मानाकर राजग का गठन करने में सफल हुए। बिहार में इन्हें जहाँ भाजपा के रूप में एक संगठित समर्पित कार्यकर्ताओं की पार्टी मिली वहीं साथ में सवर्णों का एक भुष्त वोट साथ आया तब तक लवकुष समीकरण के भी सर्वमान्य नेता बन चुके थे। सतीष प्रसाद एवं उपेन्द्र कुषवाहा जैसे विष्वसनीय संगठनकर्ता साथ थे।
राजनैतिक सत्ता के षिखर की ऊचाईयों की ओर बढ़ते नीतीष् कुमार ने विद्रोह करने या भविष्य में चुनौती पैदा करने वाले नेताओं को बड़ी सफाई से किनारे लगा दिया। लालू प्रसाद की तरह जातिय गोलबंदी कर जातिय छत्र पैदा करने के बजाय भविष्य में चुनौती बनने वाली जातियों के सामाजिक संगठनों को तोड़ फोड़ कराकर नेस्तनाबूद करवा दिया। सन् 2000 के विधान सभा चूनाव में राजग बहुमत से दूर था। बड़ा गठबंधन के रूप में नीतीष कुमार मुख्य मंत्री एवं शुषील कुमार मोदी उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले चुके थे। विधान सभा में बहुमत साबित करने के लिए एक सप्ताह का समय मिला था। बहुमत लायक निर्दलीय विधायकों के जुगाड़ की कमान तब के वीपीण नेता आनन्द मोहन सम्भाले हुए थें किन्तु अन्दर-अन्दर आनन्द मोहन पल्टीमार गये। अपने पाले के विधायकों को राबड़ी देवी की ओर षिफ्ट करा दियें। 2005 में आनन्द मोहन से पुनः दोस्ती हुयी। दुर्भाग्यवष 13वीं विधान सभा चुनाव जीते विधायकों के शपथ ग्रहण से पूर्व ही विधान सभा भंग कर दिया गया। बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। 14वीं विधान सभा चुनाव में लालू राबड़ी सरकार से उब चुकी जनता राजग के पक्ष में एकजुट हो गयी। हवा का रूख नहीं पहचान पाये आनन्द मोहन अपनी उपेक्षा बर्दास्त नहीं कर पाये बगावत कर पुनः पार्टी बनायी किन्तु देर हो चुका था। आज आनन्द मोहन एक ऐसे गुनाह की सजा भुगत रहे है जिसमें उनका दूर-दूर तक कोई हाथ नहीं था किन्तु परिस्थिति ने उन्हें गुनहगार साबित कर दिया।
बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में नीतीष कुमार ने काफी ख्याति अर्जित की। बिहारियों में स्वभिमान जगया। सड़कों का जाल राजधानी पटना से दूरस्थ छोटे-छोटे टोलों तक फैलाया। पंचायतों में महिलाओं को पच्चास प्रतिषत आरक्षण देकर महिलाओं का दिल जीत। अस्पताओं की बदहाल स्थिति में सुधार लाया। सरकारी अस्पतालों में लटके ताले खोले गये। अस्पताल भवनों में सुधार किया गया। जगह-जगह प्रखण्ड अंचल भवन के साथ पंचायत सरकार का निजि भवन बनाया गया। प्राथमिक एवं मध्य विद्यालयों को उत्क्रमित कर आधुनिक भवन बनाये गये। विद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति बढ़ाने के लिए छात्र/छात्राओं को पोषाक, पुस्तक एवं साईकिल मुफ्त वितरण किया गया। बिहार विकास का डंका विष्व में बजने लगा। देष भर में बदनाम बिहार एवं बिहारी सम्मान की दृष्टि से देखे जोने लगे।
कहावत है कि इतिहास अपने आपको दोहराता है। आज जो प्रष्न नीतीष कुमार एवं राजग से राजद एवं कांग्रेस के लोग कर रहे है। वही प्रष्न 2013 में भाजपा वाले नतीष कुमार से कर रहे थे। 2013 में जब नरेन्द भाई मोदी को प्रधान मंत्री उम्मीदवार घोषित किये जाने से खफाा नीतीष कुमार ने भाजपा मंत्रियों को बरर्वादत कर दिया था तब भाजपा वाले पूछते थे। जनादेष राजग को मिला था, आप हमारी बदौलत मुख्यमंत्री बने यदि अलग होना है तो सरकार भंग कर फिर से चुनाव करायें। तब भाजपा को नीतीष कुमार का आचरण अनैतिक लग रहा था। आज जदयू, राजद एवं कांग्रेस महागठबंधन को मिले जनादेष को छत्ता दिखाकर इस्तीफा देने वाले नीतीष कुमार को सरकार बनाने के लिए भाजपा का समर्थन करना और उनके सरकार में सम्मिलित होना नैतिक है? तेजस्वी यादव ने विस्वास मत के समय सुषील मोदी से ठीक ही पूछा कि आपको शर्म नहीं आती। नीतीष कुमार अपना अकेले का ताकत दो बार आजमा चुके है। पहला 1995 एवं दूसरा लोकसभा चुनाव 2014।
देष विदेष मंे नीतीष कुमार की छवि एक स्थापित सुलझे हुए नेता के रूप में बन रही थी। भाजपा जिस तरह से येन-केन प्रकारेण नरेन्द्र भाई मोदी एवं अमित साह के नेतृत्व में देष पर अपना कब्जा जमाने की ओर अग्रसरर है उसकी झोली में बिहार के आ जाने के बाद 18 राज्यों पर उसका कब्जा हो चुका है। कांगे्रस हताष निराष है लालच भय दबाव में कांग्रेस नेताओं का पलायन जारी है। लोग कयास यह भी लगा रहे है कि नीतीष कुमार भी भय से अपनी छवि बरकरार रखने के लिए भाजपा के पाले में गये।
नीतीष के अन्दर भाजपा विरोधी धारा के लोग एक कद्दावर नेता की छवि देख रहे थे। अभी एक सपताह पूर्व ही राजनैतिक टिप्पणीकार रामचन्द्र गुहा ने अपने एक लेख में लिखा था कि कांग्रेस की बागडोर नीतीष कुमार जैसे व्यक्ति के हाथ में होना चाहिए। नरेन्द्र भाई मोदी एवं अमित साह की जोडी को चुनौती देने वाले नेताओं के रूप में इनकी छवि बन रही थी किन्तु अचानक जब परिद्दष्य सामने उभर कर आया उससे बिहार ही नहीं देष भर के विपक्षी मुहिम को धक्का लगा है। नरेन्द्र भाई मोदी एवं नीतीष कुमार दोनों ही महत्वाकांक्षी एं जुझारू नेता है। दोनो राजग में साथ थे दोनों का सपना एक था। मोदी सफल हो गये क्योकि उनके पास भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी थी जबकि नीतीष कुमार के पास क्षेत्रीय पार्टी है। जिसका वजूद बिहार के बाहर शुन्य है। 2014 लोक सभा चुनाव पूर्व नीतीष कुमार हवा का रूख पहाचानने में भूल कर गये अपने विकास के अहंकार में इतने डूबे थे कि चुनाव प्रचार में पार्टी नेताओं को दरकिनार कर अकेले दौरा करते रहे। परिमाण आते ही भावुकता में त्याग पत्र देकर जीतन राम माझी को मुख्यमंत्री बनाकर विधान सभा चुनाव की तैयारी में लगना चाहते थे। परिस्थितिवष लालू प्रसाद के साथ गठबंधन बनाना पड़ा।
समय की नजाकत एवं राजनैतिक हवा के रूख को पहचानने वाले नीतीष कुमार को महागठबंधन का नेतृत्व करते हुए बीस माह में ही समझ आ गया कि केन्द्र में बैठी भाजपा सरकार खुलकर उन्हें विकास नहीं करने देगी। सरकार में सहयोगी दल के कारनामें उन्हें कभी भी कटघरे में खड़ा कर सकती थी।
2019 चुनाव की तैयारी में अभी से जुट चुकी भाजपा भले ही 2014 में बिहार से 32 सीटें जीत गयी थी किन्तु इस बार एकजुट विपक्ष के कारण अष्वमेघ के घोड़े को दिल्ली से चलने पर बिहार में विराम लगने की प्रबल सम्भावना थी। भाजपा को बिन्दुवार जबाब देने में नीतीष कुमार ही सक्षम नजर आ रहे थे जिसकी चादर भाजपा नेताओं से ज्यादा स्वच्छ एवं धवल हैं वैसा व्यक्ति भाजपा के पक्ष में आ जाता है तो उसके लिए गुजरात चुनाव में पाटिदार आंदोलन शांत करने में आसानी होगी। भाजपा के मुख्य दो एजेंडें़ धारा 370 की समाप्ति एवं अयोध्या में राम मंदिर निर्माण जो 2019 चुनाव से पूर्व पूरा करना उसकी सेहत के लिए आवष्यक है। उसमें नीतीष कुमार की छवि का लाभ मिलेगा। भाजपा जिस तरह से भ्रष्टाचार उन्मूलन के नाम पर विपक्षी (खासकर पिछड़े वर्ग) नेताओं के विरूद्ध अभियान चला रही थी, नेपथ्य से स्वच्छ छवि के प्रचारित नेताओं के लिए भी चेतावनी है। उत्तर प्रदेष में 65 अपराधिक मुकद्दमों का सामना कर रहे योगी आदित्यनाथ को मुख्य मंत्री बनाकर एवं योगी के माध्यम से अखिलेष सरकार द्वारा कराये गये कार्यों की हो रही जाँच से स्पष्ट है कि भाजपा देष में विकास से ज्यादा विपक्ष के नेताओं को बदनाम करने की मुहिम को ज्यादा तरजीह दे रही है। अठारह राज्यों की सत्ता के साथ प्रधानमंत्री राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति जैसे महत्वपूर्ण पदों पर काबिल हो चुकी है। संघ की मंषा संविधान परिवर्तन के अनुरूप अब उसकी पूर्ण तैयारी हो चुकी है।
नीतीष कुमार सीधे तौर पर किसी भ्रष्टाचार में अभी तक संलिप्त नहीं पाये गये है, उनके संज्ञान में भ्रष्टाचार के मामले आने पर उस पर कार्यवाई भी हुयी है किन्तु इनके कार्यकाल में हुए सड़क, स्वास्थ्य, षिक्षा एवं नौकरियों में भर्ती घोटाले की गाज इन पर भी गिराने से भाजपा बाज नही आती। उपेन्द्र कुषवाहा के माध्यम से एवं उत्तर प्रदेष के उपमुख्य मंत्री केषव प्रसाद मौर्य से बिहार में दस्तक दिलाकर उनके जनाधार को तोड़ने की मुहिम भी भाजपा प्रारम्भ कर चुकी थी। कुषवाहा नेता उपेन्द्र कुषवाहा के साथ जिस तरह से एकजुट होना प्रारम्भ कर चुके थे। इससे इनको अपना जनाधार खिसकते भी नजर आ रहा था। लालू प्रसाद की पार्टी जिस तरह दबाब की राजनीति कर रही थी उससे भी देर सबेर अपने लिए खतरा महसूस रहे थे। भाजपा ने नित्यानन्द को प्रदेष अध्यक्ष बनाकर यादव समाज में संेधमारी की नाकाम कोषिस भी प्रारम्भ की थी किन्तु तेजस्वी यादव के उपमुख्यमंत्री रहते उसे कोई खास लाभ मिलता नजर नहीं आ रहा था जिससे आनन फाानन में मुहिम चलाकर तेजस्वी यादव पर एफ.आई.आर दर्ज हुआ। जीरो टालरेंस छवि के नाम पर नीतीष कुमार को पाला बदलने का अवसर उत्पन्न किया गया।
भ्रष्टाचार के नाम पर लालू प्रसाद के परिवार को जिस तेजी से घेरा जा रहा है उसका निहितार्थ देष के समक्ष एक विकट स्थिति पैदा करती हुयी नजर आ रही है। कहावत है दुष्मन से दुबारा दोस्ती घातक सिद्ध होती है। क्या भाजपा आने वाले चुनावों में नीतीष कुुमार को उसी तरह तरजीह देगी जैसा कि वे उसके साथ पूर्व में करते रहे है। भाजपा में भी पुराना परिदृष्य बदल चुका है। केन्द्र में अब कोई ऐसा नेता नहीं बचा है जो नरेन्द्र भाई मोदी एवं अमित साह के सामने नीतीष कुमार की तरफदारी कर सके। देखना यह है कि नीतीष कुमार विकास के नाम पर अपने जनाधार को बरकरार रख पाते है, भाजपा के साथ पूर्व की भाँति अपनी मनमर्जी से सरकार चला पाते हैं या नहीं? लोक सभा चुनाव 2019 तक भाजपा इन्हें तरजीह देगी किन्तु विधान सभा चुनाव के समय यदि भाजपा से रार बढ़ता हे तो फिर इनके लिए मुष्किल पैदा होगी क्योंकि तब इनके साथ विपक्ष की कोई अदना पार्टी भी चुनाव में उतरने के लिए तैयार नहीं होगी।

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