23/07/2026
बचपन का दौर 1900
एक दौर था, जब बच्चों के हाथों में मोबाइल नहीं, बल्कि 'चंदामामा' और 'विक्रम-बेताल' की कहानियाँ होती थीं। हर कहानी के साथ जो चित्र बच्चों की कल्पना को जीवंत बना देते थे, वे किसी जादू से नहीं, बल्कि महान चित्रकार के.सी. शिवशंकर की अद्भुत कला से जन्म लेते थे।
जब भी राजा विक्रम अपने कंधे पर बेताल को लेकर घने जंगल से गुजरते दिखाई देते थे, तो लगता था जैसे कहानी हमारी आँखों के सामने सचमुच घट रही हो। यही उनकी कला की सबसे बड़ी ताकत थी। उन्होंने केवल चित्र नहीं बनाए, बल्कि उन पात्रों को हमेशा के लिए जीवित कर दिया।
1952 में चंदामामा पत्रिका से जुड़ने के बाद उन्होंने लगभग छह दशकों तक लाखों बच्चों की कल्पनाओं को रंग दिए। रामायण, महाभारत, पुराण और लोककथाओं के हजारों चित्र बनाकर उन्होंने भारतीय संस्कृति को नई पीढ़ियों तक पहुँचाया।
उनका मानना था कि किसी भी पात्र की तस्वीर बनाने से पहले उसके चरित्र, इतिहास और भावनाओं को समझना ज़रूरी है। शायद यही कारण है कि उनके बनाए चित्र आज भी लोगों के दिलों में वैसे ही बसे हुए हैं।
29 सितंबर 2020 को वे इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनकी कला अमर हो गई। 2021 में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्मश्री से सम्मानित किया। यह सम्मान केवल एक कलाकार का नहीं था, बल्कि उन करोड़ों भारतीयों की यादों का सम्मान था, जिनका बचपन उनके चित्रों के साथ बीता।
कुछ कलाकार समय के साथ भुला दिए जाते हैं, लेकिन के.सी. शिवशंकर उन कलाकारों में थे जिन्होंने सिर्फ तस्वीरें नहीं बनाईं, बल्कि करोड़ों बच्चों के सपनों और कल्पनाओं को हमेशा के लिए रंगों में अमर कर दिया।