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Arjun topics 90s बॉलीवुड की यादें | फिल्मों के अनसुने किस्से | पर्दे के पीछे की कहानियाँ Entertainment + knowledge in one place 👉 Follow for daily updates .

एक तरफ 90s की मीठी मेलोडी का दौर था… दूसरी तरफ ए.आर. रहमान की नई संगीत क्रांति।और इन दोनों के बीच एक युवा संगीतकार खड़ा ...
25/09/2026

एक तरफ 90s की मीठी मेलोडी का दौर था… दूसरी तरफ ए.आर. रहमान की नई संगीत क्रांति।
और इन दोनों के बीच एक युवा संगीतकार खड़ा था... राम संपत। सवाल सिर्फ एक गाना बनाने का नहीं था…सवाल था... क्या कोई नई आवाज़ और नई धुन उस दौर के बड़े नामों के बीच अपनी अलग पहचान बना सकती है?

साल 2004… फिल्म थी ‘खाकी’। अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, अजय देवगन और ऐश्वर्या राय जैसे बड़े सितारों से सजी एक गंभीर एक्शन-थ्रिलर फिल्म। लेकिन इसी फिल्म में एक ऐसा रोमांटिक गीत आया, जिसने कहानी के तनाव के बीच अचानक माहौल को बदल दिया...

“वादा रहा प्यार से प्यार का…
अब हम ना होंगे जुदा…”

और यहीं से शुरू होती है इस गाने की असली कहानी। राम संपत उस समय विज्ञापन जगत के चर्चित संगीतकारों में शामिल हो चुके थे। खाकी उनके शुरुआती बड़े फिल्म प्रोजेक्ट्स में से थी। लेकिन संगीत तैयार करते वक्त उनके सामने एक दिलचस्प चुनौती थी। राम संपत के मुताबिक, प्रोड्यूसर भूषण कुमार चाहते थे कि संगीत में उस समय के बेहद लोकप्रिय नदीम-श्रवण जैसा पारंपरिक और कमर्शियल मेलोडी टच हो।

वहीं निर्देशक राजकुमार संतोषी एल्बम में ए.आर. रहमान जैसा आधुनिक और अलग म्यूजिकल फ्लेवर चाहते थे। राम संपत खुद बताते हैं कि वे इन दो अलग-अलग उम्मीदों के बीच फंस गए थे। लेकिन उन्होंने किसी की नकल करने के बजाय अपनी संगीत पहचान तलाशने की कोशिश की। न रहमान बनने की कोशिश…न नदीम-श्रवण की। बल्कि... राम संपत बनने की। और इसी सोच ने खाकी के संगीत को एक अलग दिशा दी।

उस समय बॉलीवुड में बड़े और स्थापित गायकों का दबदबा था। लेकिन राम संपत ने अर्णब चक्रवर्ती जैसी अपेक्षाकृत नई आवाज़ पर भरोसा किया। अर्णब पहले विज्ञापन जिंगल्स और दूसरे संगीत प्रोजेक्ट्स में काम कर चुके थे। खाकी का “वादा रहा” उनके लिए बड़ा बॉलीवुड ब्रेक साबित हुआ। और उनके सामने थीं—श्रेया घोषाल। एक नई पुरुष आवाज़ और एक उभरती हुई, लेकिन तेजी से अपनी जगह बना रही महिला आवाज़…दोनों की आवाज़ जब एक साथ मिली, तो गाने में एक अलग ही नर्मी और भावुकता पैदा हुई।

“ मेरी धड़कनें…सुन रहा है खुदा…” इन शब्दों में प्रेम सिर्फ इज़हार नहीं था… यह किसी ऐसे रिश्ते का एहसास था, जिसमें इंसान अपने प्यार को सिर्फ सामने वाले से नहीं... ऊपरवाले से भी जोड़ देता है।गीतकार समीर के सरल और सीधे दिल तक पहुंचने वाले बोलों ने इस एहसास को और गहरा कर दिया। गाने के आधिकारिक क्रेडिट्स में संगीत राम संपत, बोल समीर और आवाज़ें अर्णब चक्रवर्ती व श्रेया घोषाल की दर्ज हैं।

और फिर स्क्रीन पर दिखाई दिए अक्षय कुमार और ऐश्वर्या राय। एक ऐसी फिल्म, जिसमें पुलिस, अपराध, आतंक और तनाव कहानी के केंद्र में थे… उसी फिल्म में यह गीत कुछ देर के लिए दर्शकों को उस दुनिया से बाहर ले जाता है। एक सपना…एक प्यार…दो चेहरे…और एक ऐसा वादा, जिसे सुनकर लगा जैसे वक्त कुछ पल के लिए ठहर गया हो। यही वजह है कि खाकी का “वादा रहा” सिर्फ एक रोमांटिक गीत बनकर नहीं रह गया।यह उन गानों में शामिल हो गया, जिन्हें सुनते ही एक पूरा दौर याद आ जाता है—

सीडी का जमाना…टी-सीरीज़ के म्यूजिक कवर…FM रेडियो पर बजते प्रेमगीत…और 2000s के उस दौर की मासूम मोहब्बत…आज भी जब आवाज़ आती है... “वादा रहा प्यार से प्यार का…”तो लगता है जैसे 2004 फिर से लौट आया हो। शायद यही पुराने बॉलीवुड संगीत की सबसे बड़ी खूबसूरती थी…गाना खत्म हो जाता था, लेकिन उसका एहसास नहीं। आपके लिए “वादा रहा” सिर्फ एक गाना है…या 2000s की मोहब्बत की एक पूरी याद?

“मैं एक गर्वित भारतीय हूँ…” साल 2006 में पाकिस्तान की जमीन पर खड़े होकर यह बात कहने वाला शख्स कोई राजनेता नहीं था…वह हिं...
25/09/2026

“मैं एक गर्वित भारतीय हूँ…” साल 2006 में पाकिस्तान की जमीन पर खड़े होकर यह बात कहने वाला शख्स कोई राजनेता नहीं था…वह हिंदी सिनेमा का वो सितारा था, जिसकी पहचान थी... काउबॉय हैट, सिगार, कड़क आवाज़ और बेखौफ अंदाज़।

नाम था... फिरोज़ खान।

जब उन्होंने पाकिस्तान जमीन पर भारत के बारे में अपनी बात कही, तो उनके शब्दों में किसी दिखावे की चमक नहीं थी…बल्कि अपने देश के लिए एक ऐसा आत्मविश्वास था, जिसे उन्होंने खुलकर दुनिया के सामने रखा। उन्होंने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश बताते हुए कहा था कि यहां अलग-अलग मजहबों के लोग तरक्की कर रहे हैं।

शायद यही फिरोज़ खान की सबसे खास बात थी... पर्दे पर वे जितने बेखौफ थे, जिंदगी में भी अपनी बात कहने से उतना ही नहीं डरते थे। लेकिन फिरोज़ खान को सिर्फ उनके रौबदार अंदाज़ से समझना आसान नहीं था। क्योंकि इस कड़क आवाज़ और सख्त चेहरे के पीछे एक बेहद भावुक इंसान भी था। अपने परिवार के लिए… अपने दोस्तों के लिए… और उन लोगों के लिए, जिनसे उनका दिल जुड़ जाता था।

उनकी दोस्ती की बात हो और विनोद खन्ना का नाम न आए... ऐसा हो ही नहीं सकता। कुर्बानी ने दोनों को सिर्फ एक फिल्म में साथ नहीं लाया… इस फिल्म के दौरान बनी दोस्ती धीरे-धीरे ऐसे रिश्ते में बदल गई, जिसे लोग सगे भाइयों जैसा बताते थे। और फिर जिंदगी ने एक ऐसा संयोग दिखाया, जिसे सुनकर आज भी यकीन करना मुश्किल लगता है… 27 अप्रैल 2009 ... फिरोज़ खान का निधन।
और ठीक आठ साल बाद, 27 अप्रैल 2017 — विनोद खन्ना का निधन।

दो दोस्त…दो महान कलाकार…और दोनों की विदाई की तारीख भी एक ही थी।
लेकिन फिरोज़ खान की कहानी का सबसे भावुक हिस्सा उनकी आखिरी इच्छा थी। जब वे फेफड़ों के कैंसर से जूझ रहे थे और इलाज मुंबई में चल रहा था, तब जिंदगी के आखिरी दिनों में उन्होंने अस्पताल की चार दीवारों में रहना स्वीकार नहीं किया। वे अपने बेंगलुरु वाले फार्महाउस लौटना चाहते थे।

वही जगह…जहां उन्होंने जिंदगी के खूबसूरत पल बिताए थे। वही जमीन…वही पेड़…वही खुला आसमान…और उनके प्यारे घोड़े। वे नहीं चाहते थे कि उनकी जिंदगी का आखिरी अध्याय किसी अस्पताल के आईसीयू में बंद हो। वे अपनी आखिरी सांस अपनी मिट्टी में लेना चाहते थे। और आखिरकार…

27 अप्रैल 2009 को फिरोज़ खान ने उसी बेंगलुरु स्थित फार्महाउस में अंतिम सांस ली। जिस शहर ने उन्हें जन्म दिया था…उसी शहर की मिट्टी ने उन्हें आखिरी विदाई दी। शायद यही उनके जीवन की सबसे खूबसूरत तस्वीर है... एक ऐसा इंसान जिसने दुनिया देखी, शोहरत देखी, सिनेमा की ऊंचाइयां देखीं… लेकिन आखिरी वक्त में उसे तलाश थी तो सिर्फ़ अपने घर की… अपने लोगों की… और अपनी मिट्टी की।

फिरोज़ खान सिर्फ अपने अंदाज़ के लिए याद नहीं किए जाएंगे। वे इसलिए भी याद रहेंगे कि उन्होंने विदेशी जमीन पर खड़े होकर कहा था... “मैं एक गर्वित भारतीय हूँ।” और जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर भी उन्होंने साबित कर दिया कि
दुनिया कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए… इंसान का दिल आखिरकार अपनी मिट्टी में ही लौटना चाहता है।

जन्मदिन पर उस बेबाक, भावुक और अपने देश से प्यार करने वाले कलाकार को दिल से सलाम। फिरोज़ खान ... भारतीय सिनेमा का वो अंदाज़, जिसे वक्त कभी पुराना नहीं कर सकता। 🇮🇳❤️

साल 1990 में महेश भट्ट की ‘आशिकी’ रिलीज़ हुई और राहुल रॉय रातों-रात देश के सबसे चर्चित रोमांटिक सितारों में शामिल हो गए।...
25/09/2026

साल 1990 में महेश भट्ट की ‘आशिकी’ रिलीज़ हुई और राहुल रॉय रातों-रात देश के सबसे चर्चित रोमांटिक सितारों में शामिल हो गए। लंबे बाल, मासूम चेहरा और नदीम-श्रवण के सुपरहिट गानों ने उन्हें युवाओं का नेशनल क्रश बना दिया था।

अब सवाल था...क्या ‘आशिकी’ वाला जादू दोबारा दोहराया जा सकता है? इसी उम्मीद के साथ निर्देशक वी. एन. मेनन और निर्माता बाबूभाई थीबा ने राहुल रॉय की लोकप्रियता को केंद्र में रखकर एक ऐसी कहानी तैयार की, जिसमें था...
म्यूजिकल लव ट्रायंगल, रोमांस और ढेर सारा संगीत। फिल्म थी ‘दिलवाले कभी ना हारे’।

मेकर्स जानते थे कि दर्शक राहुल रॉय को एक रोमांटिक हीरो के रूप में देखना पसंद करते हैं। इसलिए संगीत की जिम्मेदारी भी उस दौर की बेहद लोकप्रिय जोड़ी नदीम-श्रवण को दी गई। दांव साफ था...राहुल रॉय + रोमांटिक कहानी + नदीम-श्रवण = एक और ‘आशिकी’?

फिल्म में राहुल रॉय के साथ थीं नगमा और वर्षा उसगांवकर, जबकि दूसरे मुख्य अभिनेता के रूप में पृथ्वी नजर आए। कहानी में रोमांस था, रिश्तों की उलझन थी और एक ऐसा प्रेम त्रिकोण था, जिसमें भावनाएं लगातार करवट लेती थीं। फिल्म में वह स्टार पावर तो थी, लेकिन कमजोर कहानी दर्शकों को लंबे समय तक बांध नहीं सकी। जिस लोकप्रियता को बॉक्स ऑफिस की सफलता में बदलने की उम्मीद थी, वह उम्मीद पूरी नहीं हुई और फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई।

फिल्म भले ही नहीं चली, लेकिन इसके गाने लोगों के दिलों तक पहुंच गए। कुमार सानू और अलका याग्निक की आवाज़ में “हम प्यार करते हैं” और “तू मेरी है” जैसे गाने उस दौर के रेडियो और कैसेट्स पर खूब सुनाई देते थे। यानी जिस फिल्म से बॉक्स ऑफिस पर ‘आशिकी’ जैसा तूफान खड़ा करने की उम्मीद थी, वही फिल्म असफल हो गई… लेकिन उसका संगीत अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब रहा।

शायद यही वजह है कि 90s का सिनेमा सिर्फ फिल्मों की सफलता या असफलता की कहानी नहीं है। कुछ फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हार जाती हैं…लेकिन उनके गाने लोगों की यादों में जीत जाते हैं।

आपको क्या लगता है... राहुल रॉय की ‘आशिकी’ वाली लोकप्रियता को दोबारा दोहराने की कोशिश क्यों सफल नहीं हो पाई? और अगर आपने इस फिल्म के गाने सुने हैं, तो आपका पसंदीदा गाना कौन-सा था? 🎵

साल 1990 की ‘आशिकी’ में उनका किरदार हो, ‘हम हैं राही प्यार के’ में उनकी मौजूदगी हो, या फिर ‘वेलकम’ का बल्लू… मुश्ताक खान...
25/09/2026

साल 1990 की ‘आशिकी’ में उनका किरदार हो, ‘हम हैं राही प्यार के’ में उनकी मौजूदगी हो, या फिर ‘वेलकम’ का बल्लू… मुश्ताक खान जब पर्दे पर आते थे, तो सीन में उनकी मौजूदगी महसूस होती थी। और ‘वेलकम’ का वह अंदाज तो शायद ही कोई भूल पाएगा...

“मेरी एक टांग नकली है…”

एक साधारण-सा संवाद… लेकिन मुश्ताक खान की अदायगी ने उसे यादगार बना दिया। उनका फिल्मी सफर कई दशकों तक चला। उन्होंने कॉमेडी से लेकर गंभीर और सहायक भूमिकाओं तक कई तरह के किरदार निभाए। ‘गदर: एक प्रेम कथा’ और ‘गदर 2’ में गुल खान के किरदार से भी उन्होंने दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाई।

लेकिन पर्दे के पीछे एक और लड़ाई चल रही थी… मुश्ताक खान पिछले कुछ समय से कैंसर से जूझ रहे थे। उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके बिजनेस पार्टनर ने उनके निधन की पुष्टि की।

56 साल की उम्र…एक ऐसा पड़ाव, जहां जिंदगी में अभी कई किरदार बाकी हो सकते थे, कई कहानियां बाकी हो सकती थीं और दर्शकों के लिए कई यादें बननी बाकी थीं। लेकिन जिंदगी की पटकथा कभी-कभी अचानक उस जगह खत्म हो जाती है, जहां दर्शक अभी अगला दृश्य देखने का इंतजार कर रहा होता है।

मुश्ताक खान चले गए…लेकिन ‘वेलकम’ का बल्लू, ‘आशिकी’ और ' गदर ' का उनका किरदार और पर्दे पर छोड़ी उनकी वह खास छाप शायद लंबे समय तक दर्शकों की यादों में जिंदा रहेगी।

सिनेमा के उस कलाकार को भावपूर्ण श्रद्धांजलि, जिसने बड़े सितारों के बीच भी अपनी पहचान बनाई। 🙏

ॐ शांति। 🕊️

1999 का दौर था…गोविंदा अपने करियर के बेहद सफल दौर में थे। कुली नं. 1, हीरो नं. 1 और बड़े मियां छोटे मियां जैसी फिल्मों क...
24/09/2026

1999 का दौर था…गोविंदा अपने करियर के बेहद सफल दौर में थे। कुली नं. 1, हीरो नं. 1 और बड़े मियां छोटे मियां जैसी फिल्मों की कामयाबी ने उन्हें उस दौर के सबसे बड़े स्टार्स में शामिल कर दिया था। लेकिन इसी चमकते दौर में एक निर्देशक अपनी पहली स्वतंत्र फिल्म बनाने का सपना लेकर आगे बढ़ रहा था।

नाम था - नभ कुमार ‘राजू’।

राजू इससे पहले सूरज आर. बड़जात्या की हम आपके हैं कौन..! जैसी फिल्म में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम कर चुके थे। अब बारी थी खुद निर्देशक बनने की। फिल्म थी ... ‘हम तुम पे मरते हैं’। निर्माता चीता यज्ञेश शेट्टी और निर्देशक नभ कुमार ‘राजू’ इस फिल्म के लिए गोविंदा को मुख्य भूमिका में देखना चाहते थे।

फिल्म में उनके साथ उर्मिला मातोंडकर थीं और कहानी के पीछे की पूरी जिम्मेदारी भी नभ कुमार ‘राजू’ की थी—उन्होंने फिल्म की कहानी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग लिखे थे। लेकिन असली दिलचस्प कहानी तब शुरू हुई…जब गोविंदा को फिल्म की स्क्रिप्ट सुनाने का वक्त आया।

उस समय गोविंदा लगातार फिल्मों में काम कर रहे थे और काफी थके हुए थे। एक किस्से के मुताबिक, जब नभ कुमार ‘राजू’ उनके पास कहानी लेकर पहुंचे, तो गोविंदा सोफे पर लेटे हुए थे। उन्होंने कहा कि वह लेटे-लेटे ही कहानी सुनेंगे।
शायद किसी और निर्देशक के लिए यह पल थोड़ा मुश्किल होता…लेकिन नभ कुमार ‘राजू’ ने कहानी शुरू की।

एक-एक सीन…एक-एक किरदार…और कहानी जिस तरह आगे बढ़ती गई, गोविंदा उसमें डूबते चले गए। कहानी ने उनका ध्यान ऐसा खींचा कि जो अभिनेता कुछ देर पहले थकान के कारण सोफे पर लेटा था, वह आखिरकार उठकर बैठ गया। और फिर…कहानी खत्म होने से पहले ही गोविंदा ने फिल्म के लिए हाँ कह दी।यही वह भरोसा था, जिसकी एक नए निर्देशक को जरूरत थी।

और फिर बनी ‘हम तुम पे मरते हैं’ ... गोविंदा और उर्मिला मातोंडकर की यह फिल्म 24 सितंबर 1999 को रिलीज हुई थी। फिल्म का निर्देशन नभ कुमार ‘राजू’ ने किया था और संगीत उत्तम सिंह ने दिया था।

फिल्म की कहानी दो पड़ोसी परिवारों के बीच के तनाव और उनके बच्चों राहुल और राधिका की प्रेम कहानी के इर्द-गिर्द घूमती थी। गोविंदा के साथ उर्मिला मातोंडकर, डिंपल कपाड़िया, परेश रावल, निर्मल पांडे, जॉनी लीवर और गुलशन ग्रोवर जैसे कलाकार भी फिल्म का हिस्सा थे।

उत्तम सिंह का संगीत और आनंद बख्शी के बोल। ‘हम तुम पे मरते हैं’, ‘प्यार में दूर क्या’ और ‘जा रहे हो तुम’ जैसे गाने उस दौर की यादों में आज भी अपनी जगह बनाए हुए हैं। आज जब 24 सितंबर आता है, तो 1999 का वो दौर याद आता है…एक तरफ अपने करियर के शिखर पर खड़ा गोविंदा… और दूसरी तरफ अपनी पहली फिल्म के साथ खुद को साबित करने निकला एक निर्देशक।

फिल्में सिर्फ पर्दे पर नहीं बनतीं…कभी-कभी एक कहानी, एक मुलाकात और किसी अभिनेता का उस कहानी पर भरोसा भी फिल्म बनने की शुरुआत होता है।

24 सितंबर 1999 ... ‘हम तुम पे मरते हैं’ को रिलीज हुए आज 27 साल हो गए।

आपको इस फिल्म का कौन-सा गाना या सीन आज भी याद है?
कमेंट में जरूर बताइए।

एक फिल्म… जिसे आपने हंसते हुए देखा होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ‘दीवाना मस्ताना’ जैसी फिल्म बनने के पीछे एक ऐसी कहान...
23/09/2026

एक फिल्म… जिसे आपने हंसते हुए देखा होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ‘दीवाना मस्ताना’ जैसी फिल्म बनने के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी थी, जो शायद ही बहुत कम लोग जानते हैं... आज जिसे हम 90s की सबसे यादगार कॉमेडी फिल्मों में गिनते हैं, उसकी शुरुआत बिल्कुल अलग तरह से हुई थी।

फिल्म को पहले ‘बॉडीगार्ड’ नाम से एक सीरियस एक्शन फिल्म के तौर पर प्लान किया गया था। इसमें अनिल कपूर, सनी देओल और पाकिस्तानी अभिनेत्री जेबा बख्तियार मुख्य भूमिकाओं में होने वाले थे। लेकिन फिर कहानी ने अचानक एक ऐसा मोड़ लिया, जिसने पूरी फिल्म की दिशा बदल दी।

जेबा बख्तियार को वीजा से जुड़ी परेशानियों के कारण भारत छोड़ना पड़ा। इसके बाद निर्देशक डेविड धवन ने इस प्रोजेक्ट की कहानी ही बदलने का फैसला किया और एक गंभीर एक्शन फिल्म की जगह इसे रोमांटिक कॉमेडी का रूप दे दिया। इसके बाद सनी देओल भी इस प्रोजेक्ट से अलग हो गए।

और कहानी में एक और दिलचस्प मोड़ आया...फिल्म में गोविंदा के निभाए ‘बन्नू’ के किरदार के लिए शुरुआत में शाहरुख खान को साइन किया गया था। लेकिन डेट्स की समस्या के कारण शाहरुख इस फिल्म का हिस्सा नहीं बन सके। इसके बाद डेविड धवन ने अपने पसंदीदा अभिनेता गोविंदा को इस किरदार के लिए चुना।

और शायद यहीं से शुरू हुई उस जोड़ी की वो कॉमेडी, जिसे 90s के दर्शक आज भी नहीं भूल पाए हैं। फिर आया ‘पप्पू पेजर’...सतीश कौशिक ने इस किरदार के बोलने के अंदाज और मुंबईया टपोरी भाषा को अपनी शैली से एक अलग पहचान दी। ‘खल्लास’, ‘फिनिश’ और ‘अपुन’ जैसे शब्दों के साथ पप्पू पेजर का अंदाज ऐसा बना कि किरदार फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के दिमाग में रह गया।

लेकिन सबसे दिलचस्प बात शायद यह थी कि पप्पू पेजर और बन्नू के कई सीन सिर्फ लिखे हुए डायलॉग्स का खेल नहीं थे। दोनों कलाकार सेट पर एक-दूसरे की कॉमिक टाइमिंग पकड़ते हुए मौके पर संवादों को आगे बढ़ाते थे। उनकी केमिस्ट्री और इम्प्रोवाइजेशन ने इन सीन को वो सहजता दी, जिसकी वजह से आज भी उन्हें देखकर हंसी आ जाती है।

यही वो दौर था जब गोविंदा की कॉमिक टाइमिंग, अनिल कपूर की एनर्जी, जूही चावला की स्क्रीन प्रेजेंस और पप्पू पेजर का अलग अंदाज मिलकर ‘दीवाना मस्ताना’ को 90s की खास फिल्मों में शामिल कर रहे थे। फिल्म का संगीत भी अपने आप में खास था।

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत और आनंद बख्शी के गीतों ने फिल्म के माहौल में कॉमेडी, रोमांस और डांस का रंग भर दिया। गोविंदा के अतरंगी कपड़े और उनके डांस स्टेप्स उस दौर के युवाओं के बीच चर्चा का हिस्सा बन गए थे। वहीं ‘हैड कउं कउं’ जैसे गाने में गोविंदा, जूही चावला और अनिल कपूर की जोड़ी और अनोखी कोरियोग्राफी ने 90s के दर्शकों को खूब एंटरटेन किया।

फिल्म रिलीज हुई और बॉक्स ऑफिस पर भी शानदार प्रदर्शन किया। जिस प्रोजेक्ट की शुरुआत एक सीरियस एक्शन फिल्म के रूप में हुई थी, वही बदलते-बदलते ऐसी कॉमेडी फिल्म बन गई, जिसके किरदार और डायलॉग आज भी 90s की यादों का हिस्सा हैं।

यही तो 90s के सिनेमा की खूबसूरती थी...कभी-कभी किसी फिल्म की सबसे यादगार कहानी वो नहीं होती, जो पर्दे पर दिखाई जाती है... बल्कि वो होती है, जो पर्दे के पीछे अचानक बदल जाती है। ‘दीवाना मस्ताना’ आपको आज भी याद है?
पप्पू पेजर और बन्नू में आपका फेवरेट किरदार कौन था?

साल था 1994 ... निर्देशक समीर मल्कान एक ऐसी एक्शन-कॉमेडी फिल्म बनाना चाहते थे, जिसमें पुलिस की सख्ती, फिल्मी दुनिया की च...
23/09/2026

साल था 1994 ... निर्देशक समीर मल्कान एक ऐसी एक्शन-कॉमेडी फिल्म बनाना चाहते थे, जिसमें पुलिस की सख्ती, फिल्मी दुनिया की चमक, दोस्ती, एक्शन और कॉमेडी... सब कुछ एक साथ हो। इस फिल्म को बनाने के लिए 1991 की हॉलीवुड फिल्म ‘The Hard Way’ का आधार लिया गया।

लेकिन हिंदी फिल्म की कहानी को उसी रूप में पर्दे पर उतारने के बजाय, लेखक सचिन भौमिक और संवाद लेखक कादर खान ने इसे पूरी तरह बॉलीवुड के मसाला अंदाज़ में ढाल दिया। फिल्म का नाम पहले "एक अनाड़ी एक खिलाड़ी" तय किया गया था, जिसे बाद में बदलकर 'मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी' कर दिया गया।

अब बारी थी कास्टिंग की। एक तरफ था सख्त और बेखौफ पुलिस इंस्पेक्टर करण जोगलेकर, तो दूसरी तरफ था फिल्मी दुनिया का सुपरस्टार दीपक कुमार।
कास्टिंग के दौरान इस फिल्म की कहानी में एक दिलचस्प मोड़ भी आया। दीपक कुमार के किरदार के लिए मेकर्स की नजर शाहरुख खान पर भी थी और शाहरुख खुद भी इस रोल को लेकर उत्साहित थे।

लेकिन जब उन्हें पता चला कि पुलिस अफसर का रोल अक्षय कुमार कर रहे हैं, तो उन्होंने इस प्रोजेक्ट से पीछे हटना पसंद किया। फिर करण के किरदार के लिए अक्षय कुमार तय हुए और दीपक कुमार का किरदार सैफ अली खान ने निभाया। और शायद यहीं से इस फिल्म की सबसे खास जोड़ी तैयार हुई... अक्षय कुमार और सैफ अली खान। शिल्पा शेट्टी ने फिल्म में मोना और बसंती के दोहरे किरदार निभाए। और फिल्म की दूसरी अभिनेत्री थीं रागेश्वरी, जिन्होंने शिवांगी जोगलेकर का किरदार निभाया। वहीं विलेन गोली के किरदार में थे शक्ति कपूर।

दिलचस्प बात यह थी कि अक्षय कुमार और सैफ अली खान दोनों इससे पहले उसी साल ‘ये दिल्लगी’ में साथ दिखाई दे चुके थे। इसलिये ‘ये दिल्लगी’ के बाद दोनों की जोड़ी को फिर से पर्दे पर लाने का फैसला हुआ और इस बार कहानी कहीं ज्यादा मसालेदार थी। एक पुलिसवाला…एक फिल्म स्टार…और दोनों की बिल्कुल अलग दुनिया। यही टकराव आगे चलकर फिल्म की जान बन गया।

फिल्म का संगीत अनु मलिक ने तैयार किया और देखते ही देखते इसका संगीत 90s के सबसे यादगार फिल्मी एल्बमों में शामिल हो गया। एल्बम में कुल 8 गाने थे। इनमें से कुछ गाने फिल्म के अंतिम संस्करण में इस्तेमाल नहीं हुए, लेकिन ऑडियो कैसेट में वे मौजूद रहे।

“चुरा के दिल मेरा…” अक्षय कुमार और शिल्पा शेट्टी पर फिल्माया गया यह गाना आज भी 90s की रोमांटिक यादों का हिस्सा है। “मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी…” अक्षय और सैफ की जोड़ी को जैसे इसी एक गाने ने पहचान दे दी। एक तरफ अक्षय का एक्शन…दूसरी तरफ सैफ का फिल्मी अंदाज़…और दोनों के बीच दोस्ती और नोकझोंक। साउंडट्रैक में “पास वो आने लगे”, “दिल का दरवाजा”, “My Adorable Darling” जैसे गाने भी शामिल थे।

आखिरकार 23 सितंबर 1994 को फिल्म सिनेमाघरों में पहुंची। और फिर जो हुआ, उसने इस जोड़ी को 90s की यादगार जोड़ियों में जगह दिला दी। ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’ बॉक्स ऑफिस पर सफल रही और उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भारतीय फिल्मों में शामिल हुई। अक्षय कुमार और सैफ अली खान की जोड़ी ने दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।

आज ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’ को रिलीज हुए 32 साल हो गए। अक्षय और सैफ की वो जोड़ी आज भी याद है, शिल्पा शेट्टी का “चुरा के दिल मेरा” आज भी सुनाई देता है, और “मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी” की धुन आज भी 90s की यादों में वही पुराना एहसास जगा देती है। शायद यही वजह है कि कुछ फिल्में सिर्फ अपने समय की हिट नहीं होतीं…वो समय बीत जाने के बाद भी लोगों की यादों में चलती रहती हैं। उनके गाने, उनके किरदार और उनकी जोड़ियां लोगों की यादों का हिस्सा बन जाती थीं।

आपको ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’ का कौन-सा गाना आज भी सबसे ज्यादा पसंद है ?

“प्रेम नाम है मेरा… प्रेम चोपड़ा।” सिर्फ चार-पाँच शब्द…लकिन इन शब्दों ने हिंदी सिनेमा के एक ऐसे चेहरे को अमर कर दिया, जि...
23/09/2026

“प्रेम नाम है मेरा… प्रेम चोपड़ा।” सिर्फ चार-पाँच शब्द…लकिन इन शब्दों ने हिंदी सिनेमा के एक ऐसे चेहरे को अमर कर दिया, जिसे पर्दे पर देखते ही कभी डर महसूस होता था… और पर्दे के बाहर वही इंसान अपनी शालीनता और सादगी के लिए जाना जाता था। आज प्रेम चोपड़ा का जन्मदिन है।

और उनकी कहानी सिर्फ एक विलेन की कहानी नहीं है…यह उस अभिनेता की कहानी है, जिसने हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई का रुख किया था… लेकिन किस्मत ने उसे हिंदी सिनेमा का सबसे यादगार खलनायक बना दिया।

कहानी शुरू होती है एक हीरो से…साल 1960। फिल्म थी ‘चौधरी करनैल सिंह’।
यह पंजाबी फिल्म प्रेम चोपड़ा की शुरुआती फिल्मों में से थी और इसमें उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई। फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। लेकिन हिंदी सिनेमा में वह मुकाम अभी बहुत दूर था।

मुंबई में फिल्मों के लिए संघर्ष करते हुए प्रेम चोपड़ा ने The Times of India के सर्कुलेशन डिपार्टमेंट में नौकरी भी की। नौकरी चलती रही… और साथ-साथ फिल्मों के लिए कोशिश भी। यानी एक तरफ रोज़गार की जिम्मेदारी…और दूसरी तरफ आंखों में अभिनेता बनने का सपना।फिर धीरे-धीरे तस्वीर बदलने लगी।

उनकी कुछ फिल्मों में हीरो या सकारात्मक भूमिकाएं थीं, लेकिन जब वे फिल्में अपेक्षित सफलता नहीं पा सकीं, तो उन्होंने खलनायक के किरदार स्वीकार करने शुरू किए। बाद में ‘Upkar’ जैसी फिल्मों ने उनके करियर को निर्णायक मोड़ दिया। और फिर…जिस किरदार को उन्होंने कभी अपने सपने का हिस्सा नहीं माना था, वही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया।

1973 — ‘बॉबी’ राज कपूर की इस फिल्म में प्रेम चोपड़ा का रोल छोटा था। इतना छोटा कि अभिनेता खुद इस बात को लेकर आशंकित थे कि कहीं इतना छोटा रोल उनके करियर की दिशा न बदल दे। लेकिन राज कपूर ने उन्हें सिर्फ एक लाइन दी... “प्रेम नाम है मेरा… प्रेम चोपड़ा।”शूटिंग के दौरान प्रेम चोपड़ा ने अपनी हंसी और कुछ अंदाज़ खुद जोड़े… और वही एक लाइन इतिहास बन गई।

फिल्म रिलीज हुई…और थिएटर से बाहर निकलने वाले दर्शकों की जुबान पर फिल्म के कई संवादों के साथ एक नाम भी था... प्रेम चोपड़ा। राज कपूर ने बाद में मज़ाक में उनसे कहा था कि उन्होंने सिर्फ एक डायलॉग से पूरी फिल्म को “हाइजैक” कर लिया। यही वह पल था जब प्रेम चोपड़ा सिर्फ एक अभिनेता नहीं रहे… वह एक सिनेमाई पहचान बन गए।

उनकी आवाज़… उनका अंदाज़… और उनके संवाद... आज भी सिनेमा प्रेमियों की यादों में जिंदा हैं। “कर भला तो हो भला… ”फिल्म - राजा बाबू (1994)...“बात जब मौत और ज़िंदगी की हो…तो शर्तें नहीं लगाई जाती।” ऐसे संवादों में सिर्फ शब्द नहीं थे…उनकी आवाज़ का ठहराव, चेहरे के भाव और बोलने का अंदाज़ उन्हें यादगार बना देता था।

आज जब हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार खलनायकों का जिक्र होता है, तो प्रेम चोपड़ा का नाम सिर्फ एक नाम नहीं…एक पूरा दौर है। एक ऐसा दौर, जब विलेन भी फिल्मों की कहानी का उतना ही जरूरी हिस्सा हुआ करता था जितना हीरो और हीरोइन। और प्रेम चोपड़ा ने उस दौर को अपनी आवाज़, अपने अंदाज़ और अपनी अदाकारी से एक अलग पहचान दी।

91वें जन्मदिन पर हिंदी सिनेमा के इस दिग्गज अभिनेता को दिल से सलाम।आपने पर्दे पर न जाने कितने किरदार निभाए…लेकिन दर्शकों के दिल में हमेशा एक ही नाम गूंजता रहेगा... “प्रेम नाम है मेरा… प्रेम चोपड़ा।”

🎂 जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं, प्रेम चोपड़ा जी।

शाहरुख खान, काजोल और रानी मुखर्जी जैसे बड़े सितारों की कास्टिंग हो चुकी थी। कहानी तैयार थी… कैमरा तैयार था… लेकिन एक किर...
22/09/2026

शाहरुख खान, काजोल और रानी मुखर्जी जैसे बड़े सितारों की कास्टिंग हो चुकी थी। कहानी तैयार थी… कैमरा तैयार था… लेकिन एक किरदार अभी भी करण जौहर की तलाश को पूरा नहीं कर पा रहा था। वह किरदार था - राहुल यानी शाहरुख खान की छोटी बेटी ‘अंजलि’।

इस रोल के लिये एक ऐसी बच्ची चाहिए थी, जो सिर्फ डायलॉग न बोले… बल्कि अपने चेहरे से कहानी कह सके। इस भूमिका के लिए करीब 200 बच्चों के ऑडिशन लिए गए और आखिरकार जिस बच्ची पर करण जौहर की नजर ठहरी, वह थीं ... सना सईद। सना उस वक्त सिर्फ 8 साल की थीं। लेकिन कैमरे के सामने वह बिल्कुल नई नहीं थीं।

वह लगभग 3 साल की उम्र से विज्ञापनों के लिए ऑडिशन दे रही थीं, इसलिए कैमरे के सामने सहज रहने की आदत उन्हें बचपन से ही थी। और फिर शुरू हुआ उस छोटी-सी अंजलि का ऐसा सफर… जिसे शायद सना खुद भी उस उम्र में पूरी तरह समझ नहीं सकती थीं।

फिल्म का एक सीन आज भी याद आते ही आंखें नम कर देता है। स्कूल का वह मंच…सैकड़ों लोगों के सामने खड़ी छोटी अंजलि…विषय था — ‘मां’। लेकिन जैसे ही मां का जिक्र आता है, अंजलि बोल नहीं पाती… उसकी आंखें भर आती हैं… और वह रो पड़ती है। आज यह सीन देखकर लगता है कि यह सब बहुत सहजता से हुआ होगा। लेकिन कैमरे के पीछे कहानी इतनी आसान नहीं थी।

सना ने बाद में बताया कि वह ग्लिसरीन लगाने से डरती थीं। इसलिए करण जौहर को एक बच्चे से कैमरे के सामने असली भाव निकालने का दूसरा रास्ता तलाशना पड़ा। सना ने यह भी बताया कि उन्हें अपनी मां से दूर होने की कल्पना करवाई जाती थी, ताकि उनके आंसू स्वाभाविक रूप से आ सकें।

और फिर आता है वह पल…जब छोटी अंजलि रो रही होती है और राहुल यानी शाहरुख खान दौड़कर मंच पर आते हैं और उसे गले लगा लेते हैं। एक तरफ 8 साल की बच्ची का असली दर्द…दूसरी तरफ शाहरुख खान का पिता वाला भाव…
और कैमरे के पीछे करण जौहर। यही वह क्षण था, जब एक फिल्मी सीन सिर्फ ‘सीन’ नहीं रहा…वह एक ऐसा भाव बन गया, जिसे दर्शकों ने अपनी यादों में हमेशा के लिए रख लिया।

16 अक्टूबर 1998 को ‘कुछ कुछ होता है’ सिनेमाघरों में रिलीज हुई। यह करण जौहर की पहली निर्देशित फिल्म थी और रिलीज के समय वह महज 25 साल के थे। फिल्म ने जबरदस्त व्यावसायिक सफलता हासिल की और आगे चलकर हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में गिनी जाने लगी। और इस पूरी कहानी में एक छोटी-सी बच्ची भी अचानक पूरे देश की पहचान बन चुकी थी…सना सईद।

‘अंजलि’ के रूप में सना ने ऐसा असर छोड़ा कि उस दौर में शायद ही कोई दर्शक उन्हें भूल पाया हो। लेकिन… फिल्म खत्म होने के बाद सना की असली जिंदगी की कहानी शुरू हुई। बाल कलाकार के रूप में ‘कुछ कुछ होता है’, फिर ‘बादल’ और ‘हर दिल जो प्यार करेगा’ जैसी फिल्मों में नजर आने के बाद सना ने आगे चलकर टेलीविजन और रियलिटी शोज में भी काम किया।

लेकिन पर्दे पर दिखाई देने वाली इस चमक के पीछे उनकी जिंदगी का एक ऐसा अध्याय भी था, जिसके बारे में दुनिया को बहुत बाद में पता चला। 2026 में सना सईद ने अपनी जिंदगी के एक बेहद निजी संघर्ष के बारे में खुलकर बात की उन्होंने बताया कि वह करीब छह साल तक bulimia नाम के eating disorder से जूझती रहीं, लेकिन लंबे समय तक उन्हें यह पता ही नहीं था कि वह जिस चीज से गुजर रही हैं, उसका कोई नाम भी है।

उन्हें लगता था कि यह उनकी कोई बुरी आदत है। इस वजह से उनके भीतर शर्म और अकेलेपन की भावना भी रही। सना ने बताया कि बाद में उन्हें एक ऐसी किताब मिली, जिसने उन्हें समझने में मदद की कि आखिर वह किस स्थिति से गुजर रही थीं। और इसके बाद शुरू हुई उनकी असली recovery ... जिसे पूरी तरह होने में करीब चार साल लगे।

शायद जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यही है… जिस लड़की ने बचपन में लाखों दर्शकों को रोते हुए मुस्कुराना सिखाया था… उसे अपनी जिंदगी में भी कई साल अपने ही दर्द को समझने में लग गए। लेकिन सना वहीं नहीं रुकीं।

उन्होंने मुंबई से निकलकर अपनी जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू किया और 2021 में लॉस एंजेलिस चली गईं। आज वह अमेरिका में अपने अभिनय के साथ प्रोडक्शन के क्षेत्र में भी काम कर रही हैं और अपनी प्रोडक्शन कंपनी चला रही हैं। एक तरफ वह छोटी-सी ‘अंजलि’, जो 1998 में स्टेज पर अपनी मां को याद करके रो रही थी…और दूसरी तरफ आज की सना सईद, जिसने अपनी जिंदगी के एक मुश्किल दौर से बाहर निकलकर खुद के लिए एक नई राह बनाई है।

कभी-कभी किसी कलाकार की सबसे बड़ी कहानी उसकी फिल्मोग्राफी में नहीं होती…वह उस जिंदगी में छिपी होती है, जो कैमरा बंद होने के बाद वह जीता है।
आज 22 सितंबर को सना सईद अपना जन्मदिन मना रही हैं। ‘कुछ कुछ होता है’ की उस छोटी-सी अंजलि से लेकर आज की अपनी पहचान बनाने वाली सना तक…उनकी इस पूरी यात्रा को याद करते हुए उन्हें जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं। ❤️

हैप्पी बर्थडे, सना सईद। आपकी जिंदगी का अगला अध्याय भी उतना ही खूबसूरत हो…जितना कभी पर्दे पर ‘अंजलि’ का वह मासूम चेहरा था।

साल 2000 में प्रियदर्शन की 'हेरा फेरी' ने हिंदी सिनेमा में कॉमेडी का एक नया अंदाज़ पेश किया था। फिल्म की सफलता के बाद 20...
21/09/2026

साल 2000 में प्रियदर्शन की 'हेरा फेरी' ने हिंदी सिनेमा में कॉमेडी का एक नया अंदाज़ पेश किया था। फिल्म की सफलता के बाद 2006 में इसका सीक्वल 'फिर हेरा फेरी' आया, लेकिन इस बार निर्देशन की कमान प्रियदर्शन के हाथों में नहीं, बल्कि नीरज वोरा के पास थी।

प्रियदर्शन उस वक्त दूसरे प्रोजेक्ट्स में व्यस्त थे। लेकिन शायद उनके दिमाग में एक और कहानी आकार ले रही थी…एक ऐसी कहानी, जिसे हिंदी दर्शक पहले देख चुके थे—लेकिन प्रियदर्शन को लगता था कि उस कहानी के साथ अभी तक पूरा न्याय नहीं हुआ है। कहानी थी 1990 की मलयालम फिल्म 'इन हरिहर नगर' की। इसका हिंदी रूपांतरण 1992 में 'पर्दा है पर्दा' नाम से बनाया गया था, लेकिन फिल्म दर्शकों के बीच अपनी पहचान नहीं बना सकी।

प्रियदर्शन ने उसी कहानी में छिपी संभावनाओं को पहचाना। उन्होंने सोचा…अगर इसी कहानी को नए अंदाज़, नए किरदारों और अपने खास कॉमेडी ट्रीटमेंट के साथ हिंदी दर्शकों के सामने लाया जाए तो? और यहीं से शुरू हुई 'ढोल' की कहानी। इस बार प्रियदर्शन को बड़े सुपरस्टार्स नहीं चाहिए थे। उन्हें चाहिए थे ऐसे किरदार…जो हीरो कम और नाकामयाब दोस्त ज़्यादा लगें।

चार बेरोज़गार, सुस्त और निकम्मे दोस्त... समीर उर्फ सैम, पंकज उर्फ पक्या, गौतम उर्फ गोटी और मार्तंड उर्फ मारू। चारों की जिंदगी में कोई खास मकसद नहीं था। लेकिन एक दिन उन्हें लगा कि अमीर बनने का सबसे आसान रास्ता शायद उनके सामने ही खड़ा है…रितु। एक अमीर लड़की। चारों तय करते हैं कि किसी तरह रितु को प्रभावित करके उससे शादी कर ली जाए।

लेकिन… रितु वहां अपने लापता भाई राहुल की तलाश में थी। और यहीं से एक साधारण-सी कॉमेडी…धीरे-धीरे एक रहस्यमयी कहानी में बदलने लगती है। रितु को प्रभावित करने के लिए बोले गए झूठ…चार दोस्तों को एक ऐसे जाल में खींच लाते हैं, जिसकी उन्हें खुद कोई खबर नहीं थी।

और फिर सामने आता है एक खतरनाक नाम... ज़िकोमो। अब मामला सिर्फ लड़की को पटाने का नहीं था। मामला था एक लापता इंसान, एक खतरनाक अपराधी और एक मर्डर मिस्ट्री का। और चारों दोस्तों की सबसे बड़ी समस्या यही थी…उन्हें पता ही नहीं था कि वे जिस खेल का हिस्सा बन चुके हैं, उसमें अगला मोहरा कौन है।

फिल्म में तुषार कपूर, शरमन जोशी, कुणाल खेमू, राजपाल यादव, तनुश्री दत्ता और ओम पुरी जैसे कलाकार नजर आए। और 21 सितंबर 2007 को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई 'ढोल'। रिलीज़ के समय फिल्म का बॉक्स ऑफिस सफर बहुत बड़ा नहीं रहा। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। असल सफर तो इसके बाद शुरू हुआ।

टीवी पर बार-बार प्रसारण…फिर इंटरनेट और YouTube का दौर…और धीरे-धीरे 'ढोल' उन फिल्मों में शामिल हो गईं, जिन्हें दर्शकों ने थिएटर से नहीं, बल्कि सालों तक बार-बार देखकर अपना बनाया। इसके संवाद याद किए गए। इसके कॉमेडी सीन्स मीम्स बने। और सैम, पक्या, गोटी और मारू जैसे किरदार…एक पूरी पीढ़ी की यादों का हिस्सा बन गए।

शायद यही सिनेमा की सबसे दिलचस्प बात है... हर फिल्म अपनी रिलीज़ के दिन अपनी किस्मत तय नहीं करती। कुछ फिल्में वक्त के साथ बड़ी होती हैं। और 'ढोल' भी उन्हीं फिल्मों में से एक है। आज 21 सितंबर 2026 को 'ढोल' को रिलीज़ हुए 19 साल हो चुके हैं। 19 साल बाद भी जब इसके किसी सीन का ज़िक्र होता है…तो चेहरे पर मुस्कान अपने आप आ जाती है।

क्योंकि कभी-कभी कोई फिल्म सिर्फ कहानी नहीं होती…वो आपकी यादों का एक हिस्सा बन जाती है। और शायद यही वजह है कि…19 साल बाद भी 'ढोल' की आवाज़ सुनाई देती है।

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