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9 महीने की गर्भवती को उसके पति ने समुद्र में मरने छोड़ा, साथ खड़ी प्रेमिका मुस्कुराती रही... लेकिन एक गुप्त फोन ने 10 सा...
31/08/2026

9 महीने की गर्भवती को उसके पति ने समुद्र में मरने छोड़ा, साथ खड़ी प्रेमिका मुस्कुराती रही... लेकिन एक गुप्त फोन ने 10 साल पुराना सच खोल दिया!

रात के 11 बजे गोवा के एक सुनसान बीच पर ठंडी हवाएं चल रही थीं।

9 महीने की गर्भवती रिया मेहरा की आंखें जैसे ही खुलीं, उसके सामने भयानक अंधेरा था।

उसकी दोनों कलाई एक छोटी नाव के लोहे के हैंडल से कसकर बंधी हुई थीं।

सामने एक तेज रफ्तार मोटरबोट खड़ी थी, जिससे जुड़ी रस्सी रिया की नाव को गहरे पानी की तरफ खींच रही थी।

रिया का शरीर दर्द से कांप रहा था।

उसने सामने देखा।

किनारे पर उसका पति विक्रम मेहरा खड़ा था।

उसके ठीक बगल में उसकी सेक्रेटरी तान्या शर्मा खड़ी होकर मुस्कुरा रही थी।

— विक्रम! यह क्या कर रहे हो? रिया चिल्लाई।

— मुझे बचाओ! डॉक्टर ने कहा है कि मुझे किसी भी वक्त दर्द उठ सकता है!

विक्रम ने अपनी जेब में हाथ डाला और ठंडे स्वर में बोला।

— रिया, तुम्हें क्या लगा था? मैं जिंदगी भर तुम्हारे एहसानों तले दबा रहूंगा?

— एहसान? रिया की आंखों से आंसू बहने लगे।

— 10 साल से मैंने तुम्हारे साथ हर तंगी झेली है।

— जब तुम्हारे पास 100 रुपये भी नहीं थे, तब मैंने अपना हर सपना छोड़ दिया था।

विक्रम ने हंसते हुए तान्या का हाथ पकड़ लिया।

— लेकिन तुमने मुझे कभी अपनी असली औकात नहीं बताई।

— तुम राजस्थान के सबसे बड़े उद्योगपति देवराज राठौड़ की इकलौती बेटी हो, यह बात तुमने 10 साल तक मुझसे छिपाई!

तान्या ने बीच में कहा।

— और अब जब हमें सच पता चल चुका है, तो इस कंपनी और संपत्ति पर हक सिर्फ विक्रम का होगा।

— तुम्हारे इस बच्चे और तुम्हारा अब इस दुनिया में कोई काम नहीं है।

रिया को समझ आ गया कि यह कोई हादसा नहीं, बल्कि उसकी हत्या की सोची-समझी साजिश थी।

3 घंटे पहले विक्रम ने उसे प्यार से एक ग्लास जूस दिया था।

— रिया, थकावट दूर हो जाएगी, यह दवाई पी लो।

रिया ने अपने पति पर अंधा भरोसा किया था।

उसे नहीं पता था कि उस जूस में बेहोशी की दवा मिलाई गई थी।

समुद्र की ऊंची लहरें नाव से टकरा रही थीं।

पानी नाव के अंदर आने लगा था।

रिया का पेट दर्द से फटने लगा था।

— विक्रम! मेरे बच्चे का क्या कसूर है? रिया ने गिड़गिड़ाते हुए कहा।

विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसने मोटरबोट के ड्राइवर को इशारा किया।

ड्राइवर ने एक्सीलेटर दबाया और रस्सी खिंचने लगी।

रिया की नाव तेजी से गहरे समुद्र की तरफ बढ़ने लगी।

विक्रम और तान्या किनारे पर खड़े होकर यह भयानक मंजर देख रहे थे।

तभी रिया को अपनी कलाई पर बंधी पुरानी स्मार्टवॉच का ध्यान आया।

वह साधारण घड़ी नहीं थी।

उसके पिता देवराज राठौड़ ने रक्षा मंत्रालय के विशेष इंजीनियरों से उसे बनवाया था।

उसमें एक गुप्त जीपीएस और इमरजेंसी पैनिक बटन लगा हुआ था।

रिया ने अपने बंधे हुए हाथों की उंगलियों को मोड़कर घड़ी का बटन 3 सेकंड तक दबाया।

घड़ी में एक हल्की बीप की आवाज हुई।

दूर दिल्ली के एक बंगले में देवराज राठौड़ का फोन बज उठा।

स्क्रीन पर लाल रंग की इमरजेंसी लोकेशन ब्लिंक कर रही थी।

— रिया? देवराज राठौड़ की भारी आवाज आई।

— पापा... रिया की आवाज कांप रही थी।

— विक्रम और तान्या मुझे गोवा के समुद्र में मार रहे हैं... पापा, मेरे बच्चे को बचा लीजिए!

फोन पर 2 सेकंड के लिए सन्नाटा छा गया।

देवराज राठौड़ देश के पूर्व रक्षा सलाहकार रह चुके थे।

उनकी आवाज में एक कठोरता आ गई।

— बेटी, आंखें बंद मत करना।

— 10 मिनट में मेरी टीम तुम्हारे पास होगी।

किनारे पर खड़ा विक्रम अपनी जीत का जश्न मना रहा था।

तभी आसमान में अचानक 3 कोस्ट गार्ड हेलीकॉप्टरों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।

समुद्र में चारों तरफ से सर्चलाइट की तेज रोशनी पड़ी।

विक्रम और तान्या का चेहरा एकदम पीला पड़ गया।

— यह हेलीकॉप्टर कहां से आए? तान्या घबराकर बोली।

कुछ ही सेकंड में कोस्ट गार्ड के गोताखोरों ने समुद्र में छलांग लगाई और रिया की नाव को सुरक्षित किनारे पर खींच लिया।

रिया को तुरंत स्ट्रेचर पर लिटाया गया।

उसकी सांसें बहुत धीमी चल रही थीं।

जैसे ही विक्रम उसके पास आने का नाटक करने लगा, रिया ने अपना हाथ उठाया और पुलिस अधिकारी की तरफ देखा।

— इस आदमी को गिरफ्तार करो... इसने मुझे मारने की कोशिश की है।

अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के बाहर सन्नाटा था।

डॉक्टरों ने बाहर आकर खबर दी कि रिया और उसकी बच्ची दोनों सुरक्षित हैं।

लेकिन रिया के दिल में 10 साल के प्यार का वजूद हमेशा के लिए खत्म हो चुका था।

अगली सुबह देवराज राठौड़ अपनी बेटी के पास पहुंचे।

उनके हाथ में एक पुरानी सीक्रेट फाइल थी, जो विक्रम के लॉकर से मिली थी।

उस फाइल के पन्नों पर एक नाम लिखा हुआ था— "रुद्रा ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्रीज"।

रिया ने कांपते हाथों से कागज पलटे।

उसमें लिखा था— "पता लगाओ कि रुद्रा ग्रुप का असली मालिक कौन है।"

रिया की सांसें थम गईं।

विक्रम सालों से उसकी पीठ पीछे उसकी पहचान और उसकी गुप्त संपत्ति की जांच कर रहा था।

लेकिन सवाल यह था कि विक्रम को यह सब किसने बताया?

और उसके पीछे असली मास्टरमाइंड कौन था?

पूरे परिवार के सामने देवर ने ज़मीन पर गिराकर हँसते हुए कहा “चिंता मत करो, मैं धीरे से करूँगा, तुम तो माँ हो”, लेकिन 6 से...
31/08/2026

पूरे परिवार के सामने देवर ने ज़मीन पर गिराकर हँसते हुए कहा “चिंता मत करो, मैं धीरे से करूँगा, तुम तो माँ हो”, लेकिन 6 सेकंड बाद जो सच सामने आया उसने सबको हिला दिया!

लखनऊ के पास स्थित एक बड़े फार्महाउस में मेहरा परिवार का सालाना मिलन समारोह चल रहा था।

हँसी, संगीत और तरह-तरह के पकवानों की महक से पूरा बगीचा सजी-धजी रौनक़ों से भरा हुआ था।

परिवार में सबसे ज़्यादा दबदबा था करण मेहरा का।

करण पूर्व में सेना का विशेष प्रशिक्षण ले चुका था और हर पारिवारिक समारोह में अपनी ताक़त और पुराने क़िस्सों का रोब झाड़ना उसकी आदत थी।

सब उसकी बहादुरी की झूठी-सच्ची बातें सुनकर तालियाँ बजाते थे।

उस दिन भी उसने अपनी ताक़त का प्रदर्शन करने का फ़ैसला किया।

उसकी नज़रों के सामने उसकी भाभी, नीलम शर्मा खड़ी थीं।

नीलम मेहमानों के लिए ठंडा पानी और शरबत की ट्रे सजा रही थीं।

नीलम हमेशा शांत रहती थीं।

परिवार के हर सदस्य की मदद के लिए सबसे आगे खड़ी मिलती थीं।

बीमारी हो, बच्चों का ध्यान रखना हो, या फिर पैसों की तंगी, नीलम ने हमेशा हाथ बढ़ाया था।

लेकिन नीलम का अतीत किसी को नहीं मालूम था।

करण ने नीलम की तरफ़ देखकर ज़ोर से ठहाका लगाया।

“देखो तो सही, हमारी भाभी कितनी सीधी हैं। इन्हें थोड़ा साहसी बनना चाहिए।”

कुछ रिश्तेदार हँस पड़े।

नीलम ने कोई जवाब नहीं दिया, बस ट्रे मेज़ पर रख दी।

करण आगे बढ़ा।

“आओ भाभी, आज सब रिश्तेदारों को दिखाता हूँ कि आत्मरक्षा कैसे की जाती है।”

उसने हाथ आगे बढ़ाया।

नीलम दो कदम पीछे हटीं।

“नहीं करण, यह सब मत करो।”

लेकिन करण ने उसकी मनाही को मज़ाक़ समझा।

“अरे डरो मत, बस खेल है!”

कुछ लोगों ने अपने मोबाइल फ़ोन निकालकर वीडियो बनाना शुरू कर दिया।

करण की पत्नी सीमा भी हँसते हुए बोली, “ध्यान रखना करण, दीदी के कपड़े ख़राब मत कर देना!”

बगीचे में ठहाके गूँज उठे।

सिर्फ़ नीलम की 15 साल की बेटी, रिया चुपचाप कोने में खड़ी थी।

रिया अपनी माँ को बहुत अच्छी तरह जानती थी।

उसने ध्यान दिया था कि उसकी माँ कभी कमरे में दरवाज़े की तरफ़ पीठ करके नहीं बैठती थीं।

अचानक हुई तेज़ आवाज़ से चौंक जाती थीं।

रात को अक्सर किसी ख़ौफ़नाक ख़्वाब से जाग जाती थीं, लेकिन कभी कुछ नहीं बताती थीं।

नीलम ने करण की आँखों में आँखें डालकर कहा, “मैंने तुमसे 2 बार कहा है, मुझे यह मज़ाक़ पसंद नहीं।”

करण हँसा, “इतना गंभीर क्यों हो रही हो? सब देख रहे हैं।”

“मैंने कहा हट जाओ।”

लेकिन करण ने आगे बढ़कर नीलम का कंधा पकड़ने की कोशिश की।

नीलम के चेहरे पर कोई ग़ुस्सा नहीं था।

अजीब सी नीरव शांति थी।

उन्होंने अपनी गर्दन से सोने की एक पतली सी चेन उतारी और रिया के हाथ में थमा दी।

“इसे ध्यान से रखना।”

रिया घबरा गई, “माँ, क्या कर रही हो?”

नीलम ने बस एक हल्की सी मुस्कान दी।

वह खाली जगह पर आ गईं।

करण ने हँसते हुए नीलम को ज़मीन पर गिराने के लिए हाथ आगे बढ़ाया और ज़ोर से बोला, “चिंता मत करो, मैं धीरे से करूँगा, तुम तो माँ हो!”

लेकिन अगले ही पल पूरी फ़िज़ा बदल गई।

नीलम ने बिना गुस्सा किए सिर्फ़ एक कदम उठाया।

उन्होंने अपनी कलाई का घुमाव बदला, शरीर का संतुलन स्थानांतरित किया और इतनी तेज़ प्रतिक्रिया दी कि किसी को कुछ समझ ही नहीं आया।

6 सेकंड के भीतर करण ज़मीन पर पड़ा दर्द से कराह रहा था।

पूरा बगीचा सन्नाटे में डूब गया।

जो आदमी परिवार का सबसे बलवान सदस्य माना जाता था, वह अब हरी घास पर पड़ा उठने की कोशिश कर रहा था।

दूर कुर्सी पर बैठे एक बुजुर्ग मेहमान के हाथ से चाय का कप छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा।

उन्होंने काँपते हुए नीलम को देखा।

“यह दाँव... यह तरीक़ा... यह तो मुमकिन ही नहीं है!”

नीलम ने मुड़कर उनकी तरफ़ देखा।

वह बुज़ुर्ग व्यक्ति आगे आए, उनकी आवाज़ काँप रही थी, “तुम नीलम शर्मा नहीं हो... तुम नीलम वर्मा हो! नौसेना की अत्यंत गुप्त विशेष विंग की पूर्व अधिकारी!”

रिया का चेहरा फ़ाख़्ता हो गया, “माँ... यह दादाजी आपको कैसे जानते हैं?”

नीलम ने कोई जवाब नहीं दिया।

14 साल पहले छुपा हुआ रहस्य उनके दरवाज़े पर दस्तक दे चुका था।

उन बुज़ुर्ग का नाम ब्रिगेडियर मेहरा था, जो सेना में बड़े पद पर रह चुके थे।

14 साल पहले सरकारी कागज़ात में लिखा गया था कि नीलम ने व्यक्तिगत कारणों से सेवा त्याग दी है।

लेकिन हक़ीक़त कुछ और थी।

वह एक अत्यंत गोपनीय अभियान का हिस्सा थीं, जिसका कोड नाम था “ऑपरेशन अग्निछाया”।

सीमा चिल्लाई, “आपने इतने 14 सालों तक हमसे इतना बड़ा सच छुपाया?”

नीलम ने रिया का हाथ पकड़ा, “अभी बहस का वक़्त नहीं है।”

तभी मेज़ पर रखा नीलम का फ़ोन बज उठा।

ब्रिगेडियर मेहरा ने स्क्रीन पर नंबर देखते ही कहा, “फ़ोन मत उठाना!”

नीलम ने उनसे पूछा, “क्यों?”

उनकी आवाज़ धीमी हो गई, “क्योंकि किसी ने 'ऑपरेशन अग्निछाया' की सीलबंद फाइलें दोबारा खोल दी हैं... तुम्हारी पुरानी टीम के 2 अफ़सर पिछले 10 दिनों में संदिग्ध हालात में मारे जा चुके हैं!”

नीलम ने फ़ोन उठाकर कान से लगाया।

दूसरी ओर से एक अजनबी, भारी आवाज़ आई, “नीलम वर्मा... तुम्हें 14 साल पहले ही ख़त्म हो जाना चाहिए था।”

कॉल कट गया।

तुरंत एक मेसेज आया—उसमें रिया की स्कूल के बाहर की एक तस्वीर थी, और नीचे लिखा था: “तुम हमारी असली मंज़िल नहीं थीं।”

नीलम ने मुड़कर देखा, रिया गायब हो चुकी थी!

8 महीने की गर्भवती को बारिश में बेसहारा छोड़कर पति दूसरी औरत के साथ भागा, लेकिन अस्पताल में खुली 12 महीने पुरानी गुप्त फ...
31/08/2026

8 महीने की गर्भवती को बारिश में बेसहारा छोड़कर पति दूसरी औरत के साथ भागा, लेकिन अस्पताल में खुली 12 महीने पुरानी गुप्त फाइल ने पूरा सच बदल दिया!

दिल्ली की मूसलाधार बारिश में रात के 11:00 बजे 8 महीने की गर्भवती मीरा सड़क के किनारे गिर पड़ी।

उसकी साड़ी पूरी तरह भीग चुकी थी और पेट में उठती तेज टीस उसकी सांसें रोक रही थी।

उसका पति विक्रम अपनी चमचमाती काली कार में बैठकर जा रहा था।

उसके ठीक बगल वाली सीट पर बैठी थी उसकी बिजनेस पार्टनर नीतू मेहरा।

— विक्रम… रुक जाओ… मुझे अस्पताल ले चलो…

मीरा ने गाड़ी के बोनट पर हाथ रखकर गिड़गिड़ाने की कोशिश की।

विक्रम ने गाड़ी का शीशा थोड़ा सा नीचे किया।

उसके चेहरे पर कोई हमदर्दी नहीं थी।

— अब मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं है मीरा, अपना ड्रामा बंद करो।

— ड्रामा? विक्रम, हमारा बच्चा आने वाला है!

मीरा की आवाज बारिश के शोर में दब रही थी।

नीतू ने कार के अंदर से घड़ी देखी और विक्रम की बांह पर हाथ रखा।

— विक्रम, हमें फ्लाइट पकड़नी है, देर हो रही है।

विक्रम ने बिना मुड़े मीरा का हाथ झटक दिया।

— एम्बुलेंस बुला लो, मैं अपने करियर का सबसे बड़ा सौदा छोड़कर तुम्हारे नखरे नहीं सह सकता।

उसने एक्सीलेटर पर पैर दबा दिया।

गाड़ी की तेज रफ्तार से निकला पानी मीरा के चेहरे पर आ लगा।

वह सड़क पर घुटनों के बल बैठ गई।

शादी के 6 साल बाद आज उसे अहसास हुआ कि जिस इंसान को उसने अपना सब कुछ माना, वह एक पत्थर था।

3 घंटे पहले तक मीरा वसंत कुंज के अपने फ्लैट में बच्चे के आने की तैयारियां कर रही थी।

छोटे-छोटे खिलौने, अलमारी में सजाए गए छोटे कपड़े और अस्पताल का बैग।

तभी पेट में अचानक असहनीय दर्द उठा।

मीरा ने तुरंत विक्रम को कॉल किया था।

— विक्रम, घर आ जाओ… शायद डिलीवरी का वक्त हो गया है।

विक्रम 20 मिनट बाद आया जरूर, लेकिन उसके हाथ में दो बड़े ट्रैवल बैग थे।

— मैं जयपुर जा रहा हूं, 1 हफ्ते के लिए।

— इस हालत में?

मीरा ने तड़पते हुए उसका हाथ पकड़ा था।

— काम जरूरी है मीरा, तुम हर बात में अड़चन मत डाला करो।

तभी मीरा ने उसके फोन की स्क्रीन पर नीतू का मैसेज देखा था।

"कैब नीचे खड़ी है विक्रम, जल्दी आओ।"

सच सामने आते ही मीरा का दिल टूट गया।

जब वह विक्रम को रोकने नीचे उतरी, तो विक्रम ने उसे धक्का देकर गाड़ी चालू कर दी थी।

सड़क पर बेसुध पड़ी मीरा को देखकर पास की सोसायटी के गार्ड रामसिंह दौड़े आए।

— बिटिया, उठो! मैं डॉक्टर को फोन करता हूं।

रामसिंह ने तुरंत अपने फोन से मदद मांगने की कोशिश की।

तभी सड़क पर 3 बड़ी गाड़ियों का काफ़िला आकर रुका।

सबकी नज़रें उस काली एसयूवी पर टिक गईं।

गाड़ी का दरवाजा खुला।

काले कोट में एक रोबदार आदमी बाहर निकला।

आदित्य मेहरा।

दिल्ली का मशहूर और सख्त बिजनेसमैन।

उसकी आँखों में ऐसी चमक थी कि बड़े-बड़े लोग उसके सामने बोलने से कतराते थे।

वह सीधे मीरा के पास पहुंचा।

— इन्हें कब से दर्द हो रहा है?

आदित्य नेGuard रामसिंह से पूछा।

— लगभग 40 मिनट से साहब, इसका पति इसे छोड़कर भाग गया।

आदित्य की आंखें सख्त हो गईं।

उसने अपने ड्राइवर को इशारा किया।

— गाड़ी का पिछला दरवाजा खोलो, तुरंत हॉस्पिटल चलो।

तभी वहां विक्रम की कार वापस मुड़ी, शायद वह अपना छूटा हुआ पासपोर्ट लेने लौटा था।

विक्रम ने आदित्य को देखा तो उसके कदम ठिठक गए।

— आदित्य सर? आप यहाँ? यह मेरी पत्नी है…

आदित्य ने विक्रम को सिर से पांव तक देखा।

— पत्नी? जो सड़क पर तड़प रही है और तुम गाड़ी में बैठे हो?

विक्रम की हिम्मत जवाब दे गई।

— सर, यह हमारा पारिवारिक मामला है…

— अब नहीं है।

आदित्य ने ठंडे स्वर में कहा और मीरा को सहारा देकर गाड़ी में बैठाया।

विक्रम बस देखता रह गया।

आदित्य ने गाड़ी में बैठते हुए अपने सेक्रेटरी से कहा।

— मैक्स अस्पताल के चीफ सर्जन को फोन करो, ओटी तैयार रखें।

मीरा ने दर्द से कराहते हुए आदित्य की तरफ देखा।

— आप… आप मेरी मदद क्यों कर रहे हैं?

आदित्य ने अपनी कीमती जैकेट मीरा के कंधों पर रख दी।

— क्योंकि मैं कुछ कर्ज चुका रहा हूं, जो बहुत साल पहले लिखे गए थे।

गाड़ी अस्पताल की तरफ उड़ चली, जबकि विक्रम बारिश में अकेला खड़ा रह गया।

बीमार बेटी को लेकर अस्पताल से लौटी तो मां-बाप ने बारिश में सामान फेंक दिया, बोलीं “2,500 दो या बाहर निकलो”! लेकिन 3 साल ...
31/08/2026

बीमार बेटी को लेकर अस्पताल से लौटी तो मां-बाप ने बारिश में सामान फेंक दिया, बोलीं “2,500 दो या बाहर निकलो”! लेकिन 3 साल पुराना सच सामने आते ही पूरा घर हिल गया!

रात के 9 बजे कावेरी अपनी 5 साल की बेटी पीहू को लेकर ऑटो से उतरी।

मुंबई में तेज बारिश हो रही थी।

पीहू को तीन दिन से तेज बुखार था और वह अभी-अभी अस्पताल से डिस्चार्ज होकर आई थी।

कावेरी ने बेटी को गोद में कसकर पकड़ा और अपने मायके के दरवाजे की तरफ बढ़ी।

तीन साल पहले पति से अलग होने के बाद कावेरी अपनी बेटी के साथ अपने पिता हरिशंकर और मां सुलोचना के घर रहने आई थी।

लेकिन जैसे ही वह गेट के पास पहुंची, उसके कदम थम गए।

घर का मुख्य दरवाजा खुला था।

सड़क के किनारे बारिश के कीचड़ में उसकी और पीहू की सारी चीजें बिखरी पड़ी थीं।

कपड़े पानी में तैर रहे थे।

पीहू की स्कूल की किताबें भीग चुकी थीं।

उसका प्लास्टिक का खिलौना कीचड़ में दबा हुआ था।

कावेरी ने भागकर चीखते हुए सामान उठाने की कोशिश की।

— मम्मी! यह सब क्या है?

घर के बरामदे में सुलोचना हाथ बांधकर खड़ी थी।

उसके चेहरे पर जरा सा भी मलाल नहीं था।

— तुम्हारे पास सिर्फ 30 मिनट हैं। जो 2,500 रुपये पिछले महीने के रखरखाव के बाकी हैं, वो अभी दो वरना यहां से अपना बोरिया-बिस्तर समेटो।

कावेरी हैरान रह गई।

— रखरखाव के पैसे? मां, मैंने इस महीने का पूरा राशन दिलवाया है। घर का बिजली का बिल 4,000 रुपये भरा है।

उसने अपने गीले बैग से तुरंत फोन निकाला और डिजिटल पेमेंट के मैसेज दिखाने लगी।

— मेरे पास एक-एक पैसे का हिसाब है। मैंने कभी इस घर में मुफ्त का खाना नहीं खाया।

सुलोचना ने मुंह फेर लिया।

— मुझे हिसाब मत सिखाओ। तुमने हमारे घर को धर्मशाला समझ रखा है।

पीहू रोते हुए कावेरी की साड़ी पकड़कर छिपने लगी।

— मम्मी, नानी गुस्सा क्यों कर रही हैं? मुझे ठंड लग रही है।

कावेरी की नजर पीछे खड़े पिता हरिशंकर पर पड़ी।

वह वही पिता थे जो बचपन में उसे अपनी साइकिल पर बैठाकर घुमाया करते थे।

— पापा, आप तो कुछ कहिए! पीहू की तबीयत ठीक नहीं है, उसे तेज बुखार है।

हरिशंकर ने अपनी आंखें फेर लीं।

— अपनी मां की बात सुनो कावेरी। इस घर में रहना है तो नियम मानने होंगे।

कावेरी का गला सूख गया।

— कौन से नियम? क्या अपनी ही बेटी और नातिन को सड़क पर फेंकना आपका नियम है?

हरिशंकर का चेहरा लाल हो गया।

वह आगे बढ़े और उन्होंने कावेरी के मुंह पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया।

थप्पड़ की गूंज शांत सड़क पर फैल गई।

कावेरी संतुलन खोकर गीली जमीन पर गिर पड़ी।

पीहू जोर-जोर से चिल्लाने लगी।

— मम्मी!

कावेरी ने जमीन से उठते हुए अपने गाल पर हाथ रखा।

उसने अपने आंसू तुरंत पोंछ लिए।

सुलोचना ने ठंडी आवाज में कहा।

— अब समझ आया कि इस घर का मालिक कौन है? चुपचाप 2,500 रुपये निकालो वरना हमेशा के लिए रास्ता नापो।

कावेरी धीरे-धीरे खड़ी हुई।

उसने अपनी रोती हुई बेटी को गोद में उठाया।

उसने कोई बहस नहीं की।

उसकी नजर दरवाजे के ऊपर लगे सीसीटीवी कैमरे पर गई, जिसे उसने ही छह महीने पहले अपने पैसों से लगवाया था।

साथ ही उसके हाथ में पकड़े फोन में पिछले दस मिनट की पूरी ऑडियो रिकॉर्डिंग चालू थी।

कावेरी ने अपने पिता और मां को देखा।

— ठीक है। मैं जा रही हूं। लेकिन आज जो आपने किया है, उसकी कीमत आप दोनों को चुकानी पड़ेगी।

हरिशंकर हंसा।

— तू हमारा क्या बिगाड़ लेगी? तेरे पास रहने के लिए छत तक नहीं है।

कावेरी ने कुछ नहीं कहा।

वह भीगती हुई सड़क पर अपनी बेटी को लेकर आगे बढ़ गई।

उसे पता था कि हरिशंकर और सुलोचना जिसे अपनी जीत समझ रहे थे, वह उनकी सबसे बड़ी भूल थी।

क्योंकि कावेरी के पास सिर्फ यह वीडियो और ऑडियो नहीं था, बल्कि 3 साल पुराना एक ऐसा राज था जो पूरे परिवार की बुनियाद हिलाने वाला था।

जब 5 साल की मासूम सीया कमरे में रोती मिली और उसके शरीर पर निशान थे, तब ननद हंसी। पिता अस्पताल पहुंचा और रिपोर्ट ने सच खो...
31/08/2026

जब 5 साल की मासूम सीया कमरे में रोती मिली और उसके शरीर पर निशान थे, तब ननद हंसी। पिता अस्पताल पहुंचा और रिपोर्ट ने सच खोल दिया!

लखनऊ के एक बड़े से बंगले में 5 साल की मासूम सीया का जन्मदिन मनाया जा रहा था।

हर तरफ सजावट थी और मेहमानों की भीड़ जमा थी।

रवि एक साधारण व्यापारी था जो दिन-रात मेहनत करके अपनी बच्ची को हर खुशी देना चाहता था।

सीया ने लाल रंग की सुंदर फ्रॉक पहनी हुई थी।

वह पूरे घर में खुशी से दौड़ रही थी।

उसके छोटे से हाथ में अपने चचेरे भाई के लिए एक खिलौना था।

शाम के 7:00 बजे केक कटने का समय हुआ।

सब लोग हॉल में इकट्ठा हो गए।

लेकिन सीया कहीं दिखाई नहीं दी।

रवि ने चारों तरफ देखा।

— सीया कहां है?

उसने अपनी बहन पूनम से पूछा।

पूनम ने चाय की चुस्की ली और हंसते हुए कहा।

— कहीं छिपकर खेल रही होगी, इतनी चिंता क्यों करते हो?

लेकिन रवि को तसल्ली नहीं हुई।

उसने घर का हर कोना छान मारा।

बगीचा, ऊपर के कमरे, बालकनी—सीया कहीं नहीं थी।

रवि का दिल जोर से धड़कने लगा।

वह गलियारे के आखिरी कोने की तरफ बढ़ा।

वहां एक छोटा स्टोर रूम था जो आमतौर पर बंद रहता था।

दरवाजा थोड़ा सा खुला हुआ था।

अंदर एकदम अंधेरा था।

रवि ने दरवाजा पूरा खोला।

सामने का नजारा देखकर उसकी चीख निकल गई।

सीया जमीन पर सिकुड़ी हुई बैठी थी।

उसके कपड़े गंदे थे और वह बिना आवाज किए रो रही थी।

उसके नन्हे हाथों और कलाइयों पर गोल-गोल गहरे लाल निशान बने हुए थे।

उसके चेहरे पर भी सूजन थी।

रवि तुरंत घुटनों के बल बैठ गया।

— मेरी बच्ची! यह क्या हुआ?

सीया ने रवि का कुर्ता कसकर पकड़ लिया।

वह थर-थर कांप रही थी।

रवि ने अपने फोन का कैमरा चालू किया।

उसने तुरंत सीया की हालत और हाथों के निशानों की 3 तस्वीरें लीं।

— तुम्हें यहां किसने बंद किया बेटा?

सीया ने डरते-डरते गलियारे की तरफ उंगली उठाई।

— बुआ पूनम… उन्होंने कहा कि रोने वाले बच्चों को अंधेरे में बंद कर दिया जाता है।

रवि का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

वह सीया को अपनी गोद में उठाकर सीधे हॉल में पहुंचा।

हॉल में संगीत बज रहा था और लोग केक काटने का इंतजार कर रहे थे।

रवि की एंट्री होते ही सन्नाटा छा गया।

— यह किसने किया मेरी बेटी के साथ?

रवि की आवाज पूरे हॉल में गूंज उठी।

पूनम सोफे पर बैठी थी।

उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई।

— अरे भाई, तुम हर छोटी बात का बतंगड़ क्यों बनाते हो?

— यह तो बस एक छोटा सा मजाक था।

— बच्ची को थोड़ा सख्त बनाना जरूरी है।

रवि की मां ने नजरें फेर लीं।

पिता रामनाथ ने कड़क आवाज में कहा।

— रवि, मेहमानों के सामने तमाशा मत खड़ा करो।

रवि ने अपनी बहन और पिता को देखा।

किसी को भी 5 साल की रोती हुई मासूम बच्ची की फिक्र नहीं थी।

सबको बस अपनी प्रतिष्ठा और पार्टी की चिंता थी।

पूनम ने प्लेट में केक लेते हुए कहा।

— 2 मिनट रोएगी और भूल जाएगी।

रवि ने सीया का चेहरा देखा जो अभी भी उसके सीने से चिपकी कांप रही थी।

— यह मजाक नहीं है।

रवि ने अपने जेब से फोन निकाला।

उसने डॉक्टर का नंबर डायल किया।

— मैं सीया को अस्पताल ले जा रहा हूं।

— और वहीं से पुलिस को कॉल करूंगा।

रामनाथ कुर्सी से खड़े हो गए।

पूनम के चेहरे की रंगत अचानक उड़ गई।

रवि ने मुड़कर दरवाजा खोला और सीधे अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया।

5 साल बाद विदेश से लौटे पति ने अपनी मासूम पत्नी को आंगन में अपमानित और बेहाल देखा, जबकि परिवार उसके 120,000 डॉलर से बने ...
30/08/2026

5 साल बाद विदेश से लौटे पति ने अपनी मासूम पत्नी को आंगन में अपमानित और बेहाल देखा, जबकि परिवार उसके 120,000 डॉलर से बने बंगले में ऐश कर रहा था!

आदित्य वर्मा 5 साल बाद बिना किसी को बताए जब अपने घर लौटा, तो उसकी खुशी सन्नाटे में बदल गई।

उसने अपनी पत्नी स्नेहा को आंगन की ठंडी जमीन पर घुटनों के बल बैठे देखा।

उसका सिर पूरी तरह मुंडा हुआ था।

उसका शरीर सूखकर कंकाल बन चुका था।

उसकी आंखों में अपने ही घर के लोगों को लेकर खौफ भरा था।

आदित्य के हाथ से ट्रॉली बैग छूटकर जमीन पर गिर गया।

वह जिस आलीशान 3 मंजिला बंगले को देखकर मुस्कुरा रहा था, उसकी बुनियाद उसकी पत्नी के दर्द पर टिकी थी।

आदित्य मुंबई से हजारों मील दूर दुबई में एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में साइट इंजीनियर था।

शादी के तुरंत बाद उसने अपनी मां सुमित्रा और छोटे भाई वरुण को बेहतर जिंदगी देने के लिए विदेश जाने का फैसला किया था।

वह तपती धूप में रोज 14 घंटे काम करता था।

उसका सिर्फ एक ही सपना था — अपनी पत्नी स्नेहा, मां और भाई के लिए एक शानदार घर बनाना।

वह हर महीने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा घर भेजता था।

कभी 2,500 डॉलर तो कभी 3,000 डॉलर।

इन 5 सालों में उसने कुल 120,000 डॉलर यानी लगभग 1 करोड़ रुपये घर भेजे थे।

उसकी मां फोन पर हमेशा कहती थी कि पैसे से नया बंगला बन रहा है और स्नेहा रानी की तरह रह रही है।

आदित्य अपनी पत्नी को सरप्राइज देना चाहता था।

लेकिन जब वह घर के पिछले हिस्से में पहुंचा, तो उसकी दुनिया बिखर गई।

स्नेहा जमीन पर पड़े सूखे पत्तों और कचरे को साफ कर रही थी।

उसकी साड़ी फटी हुई और पुरानी थी।

उसके हाथों पर जलने और खरोंच के निशान थे।

जब स्नेहा ने आदित्य को देखा, तो वह खुशी से उसकी तरफ नहीं भागी।

वह कांपते हुए पीछे हट गई।

उसने अपने हाथों से चेहरे को छिपा लिया।

जैसे उसे डर हो कि कोई उसे दोबारा पीटने आ रहा है।

— स्नेहा… यह सब क्या है?

आदित्य का गला सूख गया।

स्नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया।

वह सिर्फ कांप रही थी।

आदित्य ने आगे बढ़कर स्नेहा के सिर पर ढका हुआ मैला कपड़ा हटाया।

उसकी चीख गले में ही अटक गई।

स्नेहा के सिर पर एक भी बाल नहीं था।

उसकी चमड़ी पर जगह-जगह जख्मों के निशान थे।

तभी बंगले का मुख्य दरवाजा खुला।

उसकी मां सुमित्रा बाहर आई।

उसने सिल्क की महंगी साड़ी पहनी हुई थी।

उसके गले में भारी सोने का हार और हाथों में सोने की भारी चूड़ियां चमक रही थीं।

उसके पीछे भाई वरुण निकला।

उसके हाथ में 1,500 डॉलर का नया आईफोन था और पैरों में महंगे ब्रांडेड जूते थे।

— आदित्य! तुम अचानक? सुमित्रा ने सामान्य आवाज में कहा।

— मां… स्नेहा की यह हालत किसने की? आदित्य ने चिल्लाकर पूछा।

सुमित्रा ने अपने चेहरे पर कोई शिकन नहीं आने दी।

— इस औरत का नाटक मत देखो आदित्य। यह खुद अपनी इस हालत की जिम्मेदार है।

— क्या बकवास कर रही हो मां?

— मैं सच कह रही हूं, वरुण ने बीच में बोलते हुए कहा। भैया, यह हमेशा बीमार रहने का नाटक करती है। घर का कोई काम नहीं करती। इसे छुआछूत की बीमारी हो गई थी, इसलिए इसके बाल काटने पड़े।

स्नेहा ने अपना सिर और नीचे झुका लिया।

उसने कोई सफाई नहीं दी।

आदित्य को लगा कि जैसे स्नेहा ने बोलने की ताकत ही खो दी है।

तभी आदित्य की नजर कचरे के डिब्बे में पड़े एक पुराने सूती थैले पर गई।

थैले से कुछ कागजात बाहर निकल रहे थे।

आदित्य ने उस थैले को उठाया।

अंदर एक सरकारी अस्पताल की पुरानी पर्चियां, दवाइयों की रसीदें और एक बैंक पासबुक थी।

पासबुक के पन्नों पर स्नेहा का नाम लिखा था।

आदित्य ने पासबुक खोली।

उसमें लिखा था कि हर महीने स्नेहा के खाते में आने वाले पैसे तुरंत किसी दूसरे खाते में ट्रांसफर कर दिए जाते थे।

और अस्पताल की पर्चियों पर गंभीर कुपोषण और शारीरिक प्रताड़ना की बात लिखी थी।

आदित्य ने अपनी मां और भाई की तरफ देखा।

वे दोनों चेहरे पर बेफिक्री मुखौटा पहने खड़े थे।

आदित्य को समझ आ गया कि मुंह से सच उगलवाना आसान नहीं होगा।

उसने अपने गुस्से को दबाया।

उसने अपना फोन निकाला और एक फर्जी मैसेज अपने भाई और मां के सामने जोर से पढ़ा।

— कंपनी ने मेरे 5 साल के बेहतरीन काम के लिए मुझे 50,000 डॉलर का बोनस मंजूर किया है। यह पैसा अगले हफ्ते मेरे खाते में आएगा।

यह सुनते ही सुमित्रा की आंखों में लालच चमक उठा।

वरुण के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

— सच में भैया? वरुण ने पूछा।

— हां, आदित्य ने शांत आवाज में कहा। लेकिन मैं यह पैसा उसी को दूंगा जो इस घर को सही मायने में चला रहा है।

आदित्य ने आंगन में बेधड़क बैठी स्नेहा को देखा।

उसकी आंखों में अब आंसू नहीं थे, बल्कि एक खामोश तूफान था।

बहन की शादी में सबने मुझे पीछे धकेला, क्योंकि मेरे झुलसे हाथ तस्वीरें खराब करते! पर जब 12 साल पुराना मेडिकल रिकॉर्ड खुला...
30/08/2026

बहन की शादी में सबने मुझे पीछे धकेला, क्योंकि मेरे झुलसे हाथ तस्वीरें खराब करते! पर जब 12 साल पुराना मेडिकल रिकॉर्ड खुला, तो पूरा मंडप सन्न रह गया!

उदयपुर के भव्य रिसॉर्ट में चारों तरफ रोशनी जगमगा रही थी।

शहनाई की गूंज और मेहमानों की चहल-पहल के बीच काव्या शर्मा की शादी का जश्न चरम पर था।

मंडप के पास एक किनारे पर बैठी 30 साल की रिया शर्मा चुपचाप सब देख रही थी।

रिया ने गहरे हरे रंग का सूट पहना था।

उसकी लंबी आस्तीनें उसके हाथों और गर्दन पर बने गहरे निशानों को छिपाने की कोशिश कर रही थीं।

12 साल पुराने वो निशान आज भी साफ दिखते थे।

जब भी कोई मेहमान रिया की तरफ देखता, तो उसकी नजरें चेहरे से पहले उन झुलसी हुई सांसों और जख्मों पर टिक जातीं।

रिया जानती थी कि समाज ऐसी आकृतियों को दया या असहजता से देखता है।

लेकिन रिया के लिए ये निशान किसी मेडल से कम नहीं थे।

12 साल पहले जोधपुर के उनके पुराने पैतृक मकान में एक दर्दनाक हादसा हुआ था।

शॉर्ट सर्किट के कारण रात 2 बजे घर में भीषण आग लग गई थी।

रिया तब 18 साल की थी और उसकी छोटी बहन काव्या सिर्फ 6 साल की।

आग इतनी तेजी से फैली कि माता-पिता नीचे के कमरे में ही फंस गए।

ऊपरी मंजिल पर काव्या अकेली रह गई थी।

आग की भयंकर लपटों के बीच काव्या की चीखें गूंज रही थीं।

पड़ोसी बाहर खड़े थे, लेकिन अंदर जाने की हिम्मत किसी में नहीं थी।

रिया एक पल भी नहीं रुकी।

वह गीला कपड़ा चेहरे पर बांधकर जलती सीढ़ियों पर चढ़ गई।

कमरे का दरवाजा जल रहा था।

रिया ने आग की लपटों को पार किया और अंदर छिपी छोटी काव्या को अपने सीने से लिपटा लिया।

वापस लौटते वक्त जलता हुआ शहतीर रिया के हाथों और चेहरे पर गिर गया था।

उसने खुद को जलाकर 6 साल की काव्या को एक खरोंच तक नहीं आने दी।

रिया को 8 महीने तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था।

3 मेजर स्किन ग्राफ्टिंग सर्जरी हुई थीं।

उस वक्त पिता रमेश शर्मा और मां नीलम शर्मा रोते हुए कहते थे, "रिया हमारी रक्षक है।"

काव्या भी रिया के गले लगकर कहती थी, "दीदी, आप मेरी जान हो।"

लेकिन समय बीतने के साथ सब कुछ बदल गया।

काव्या बड़ी हुई, शहर के बड़े कॉलेज में पढ़ी और बड़े सपने देखने लगी।

जैसे-जैसे काव्या का सामाजिक दायरा बढ़ा, रिया के निशान उसे असहज करने लगे।

पारिवारिक आयोजनों की तस्वीरों में रिया को पीछे खड़ा किया जाने लगा।

घर आने वाले मेहमानों के सामने रिया को कमरे में रहने का इशारा दिया जाने लगा।

रिया ने कभी शिकायत नहीं की।

वह सोचती थी कि छोटी बहन की खुशी के लिए थोड़ा पीछे हटना कोई बड़ी बात नहीं है।

लेकिन आज काव्या की शादी थी।

उदयपुर के जाने-माने बिजनेसमैन रोहन खन्ना के साथ शादी तय हुई थी।

काव्या लाल जोड़े में बेहद खूबसूरत लग रही थी।

तस्वीरें खींचने का समय आया।

स्टेज पर पूरा परिवार जमा हो रहा था।

रिया धीरे-धीरे स्टेज की तरफ बढ़ी।

काव्या ने जैसे ही रिया को आते देखा, उसके चेहरे पर खिंचाव आ गया।

काव्या तुरंत स्टेज से नीचे उतरी और रिया के पास आई।

काव्या की आवाज में मिन्नत कम और हुक्म ज्यादा था।

"रिया दीदी, आप प्लीज पीछे जाकर बैठ जाइए।"

रिया के कदम रुक गए।

"क्यों काव्या? फोटोग्राफर सबको बुला रहा है।"

काव्या ने आसपास देखा और धीमी लेकिन कड़वी आवाज में कहा,

"आज मेरी लाइफ का सबसे इम्पोर्टेंट दिन है।"

"बड़े-बड़े फोटोग्राफर आए हैं, फोटो सोशल मीडिया पर जाएंगी।"

"आपके ये निशान... सब तस्वीरें खराब कर देंगे।"

"लोग मेरी शादी के बजाय आपके जख्मों को देखेंगे।"

रिया ने अपनी बहन को देखा, जिसकी जान बचाने के लिए उसने अपनी जवानी अस्पताल में काट दी थी।

"काव्या... मैं तुम्हारी सगी बहन हूं।"

"दीदी, प्रैक्टिकल बनिए," काव्या ने मुंह फेरकर कहा। "आप बस कुछ घंटों के लिए कैमरे के सामने मत आइए।"

पास खड़े पिता रमेश शर्मा ने सुन लिया।

उन्होंने रिया से आंखें चुरा लीं और दूसरी तरफ देखने लगे।

मां नीलम शर्मा ने धीरे से कहा, "रिया बेटी, काव्या की बात मान ले, आज उसका दिन है।"

12 साल पहले जिस परिवार ने उसे सिर आंखों पर बिठाया था, आज वही परिवार उसे दाग समझ रहा था।

रिया ने अपने बैग की ज़िप खोली।

उसने बैग से एक पुरानी, पीली पड़ चुकी फाइल निकाली।

वह 12 साल पुरानी मेडिकल डिस्चार्ज समरी और पुलिस की एफआईआर रिपोर्ट थी, जिसे वह हमेशा अपने पास रखती थी।

लेकिन इससे पहले कि रिया कुछ बोलती, मंडप के मुख्य गेट से दूल्हे की मां सुचित्रा देवी आगे बढ़ीं।

सुचित्रा देवी जोधपुर के उसी सिविल अस्पताल की ट्रस्टी रह चुकी थीं।

उनकी नजरें रिया के हाथ में मौजूद फाइल पर पड़ीं और फिर काव्या के घमंडी चेहरे पर।

सुचित्रा देवी की कड़क आवाज पूरे रिसॉर्ट में गूंज उठी,

"काव्या, जिस लड़की के निशानों से तुम्हें शर्म आ रही है, वही निशान तुम्हारी सांसों की वजह हैं!"

माँ के फर्जी दस्तखत लेकर बेटे ने बेची 50,00,000 की जमीन, पर बेटी ने जब छुपा डिब्बा खोला तो कोर्ट के सामने उड़े सबके होश!...
30/08/2026

माँ के फर्जी दस्तखत लेकर बेटे ने बेची 50,00,000 की जमीन, पर बेटी ने जब छुपा डिब्बा खोला तो कोर्ट के सामने उड़े सबके होश!

अंजली सुबह 6:00 बजे लखनऊ से बनारस आने वाली पहली ट्रेन से उतरी।

उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा, माँ के लिए रेशमी साड़ी और एक पुराना फ्रेम था।

वह अपनी 78 साल की माँ शांति देवी का जन्मदिन मनाने आई थी।

पिछले 8 महीनों से उसकी बात माँ से सिर्फ फोन पर हुई थी।

हर बार शांति देवी यही कहती थीं कि वे ठीक हैं।

लेकिन उनकी कांपती आवाज अंजली को परेशान कर देती थी।

जब अंजली ने अपने पुराने पुश्तैनी मकान का दरवाजा खटखटाया, तो दरवाजा उसके बड़े भाई विकास ने खोला।

विकास के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी।

"तुम बिना बताए यहाँ क्यों आ गईं?" विकास ने रूखे स्वर में पूछा।

"मैं माँ को जन्मदिन पर सरप्राइज देना चाहती थी," अंजली ने कहा।

तभी अंदर से विकास की पत्नी नीतू बाहर आई।

नीतू ने नए गहने पहने हुए थे और उसके चेहरे पर एक अजीब सा घमंड था।

"अब 78 साल की उम्र में शांति देवी जी को किसी सरप्राइज की जरूरत नहीं है," नीतू ने कहा।

"उन्हें आराम की जरूरत है, ऐसे अचानक आकर उनका दिमागी संतुलन मत बिगाड़ो।"

अंजली दंग रह गई।

"यह क्या बोल रही हो तुम नीतू? मैं अपनी माँ से मिलने आई हूँ।"

विकास ने आगे आकर अंजली का रास्ता रोका।

"हम पिछले 3 सालों से दिन-रात इनकी सेवा कर रहे हैं, तुम साल में एक बार आकर हक मत जमाओ।"

तभी गलियारे के मोड़ पर शांति देवी आकर खड़ी हो गईं।

उनका शरीर बहुत कमजोर हो चुका था।

मई की तपती गर्मी में भी उन्होंने एक मोटा सूती शॉल ओढ़ रखा था।

अंजली को देखते ही शांति देवी की आँखों में आँसू आ गए।

"अंजली..." उन्होंने बहुत धीमी आवाज में पुकारा।

अंजली अपनी माँ की तरफ भागी।

लेकिन नीतू तुरंत बीच में आ गई और उसने शांति देवी का हाथ कसकर पकड़ लिया।

"चलिए अंदर माँ जी, डॉक्टर ने कहा है कि आपको ज्यादा बोलना मना है।"

अंजली ने देखा कि शांति देवी का शरीर नीतू के छूते ही कांपने लगा।

उनकी आँखों में गहरा डर था।

दोपहर में विकास ने मेज पर 4-5 फाइलें रखीं।

"अंजली, तुम दूर रहती हो इसलिए तुम्हें बता दूँ कि हमने माँ के सारे बैंक खाते और जायदाद के कागज सही करवा लिए हैं," विकास ने कहा।

नीतू ने एक कागज अंजली के सामने फेंका।

"माँ जी अब खुद कोई फैसला नहीं ले सकतीं, इसलिए उन्होंने अपनी मर्जी से सब कुछ विकास के नाम लिख दिया है।"

अंजली ने वो वसीयत उठाई।

कागज पर लिखा था कि शांति देवी अपनी पूरी 80,00,000 रुपये की संपत्ति और घर विकास को सौंप रही हैं।

नीचे शांति देवी के टेढ़े-मेढ़े दस्तखत थे।

"माँ, क्या आपने इन कागजों पर साइन किए हैं?" अंजली ने पूछा।

शांति देवी ने अपना सिर नीचे कर लिया।

वे एक शब्द भी नहीं बोलीं।

"बिल्कुल किए हैं, अब क्या तुम माँ से पुलिस की तरह पूछताछ करोगी?" नीतू चिल्लाई।

रात 10:00 बजे जब विकास और नीतू सो गए, अंजली चुपके से अपनी माँ के कमरे में गई।

शांति देवी बिस्तर पर जाग रही थीं।

अंजली ने उनका हाथ अपने हाथ में लिया।

"माँ, मुझे सच बताओ, यहाँ क्या हो रहा है?"

अंजली ने माँ का शॉल हटाना चाहा।

"नहीं! इसे मत हटाओ!" शांति देवी डर से चीख पड़ीं।

"शांत हो जाओ माँ, कोई नहीं है यहाँ," अंजली ने दरवाजा अंदर से बंद किया।

उसने धीरे से शॉल हटाया।

अंजली का कलेजा कांप गया।

शांति देवी के हाथों और कंधों पर नीले और काले चोटों के निशान थे।

कलाई पर रस्सी से बांधने जैसे गहरे निशान थे।

"यह सब किसने किया माँ?" अंजली की आँखों से आँसू बहने लगे।

शांति देवी रोने लगीं।

"विकास और नीतू ने... वे मुझसे जबरदस्ती दस्तखत करवाते थे।"

"मुझे कमरे में बंद रखते थे, खाना नहीं देते थे।"

"इन्होंने मेरे बैंक से 3,00,000 रुपये निकाल लिए और मुझे कहा कि अगर मैंने किसी को बताया तो वे मुझे वृद्धाश्रम छोड़ आएंगे।"

"वे कहते हैं कि अब मुझे कुछ समझ नहीं आता, मैं पागल हो चुकी हूँ।"

अंजली ने तुरंत अपने फोन से सारे चोटों के निशान की फोटो ली।

उसने माँ की आवाज रिकॉर्ड की।

और अलमारी के निचले हिस्से से कुछ छिपे हुए कागज निकाले।

वहाँ 3,00,000 रुपये के बैंक ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड और एक पुराना बिना भेजा हुआ पत्र मिला।

अंजली ने बनारस की एक वरिष्ठ महिला वकील और सीनियर सिटीजन हेल्पलाइन को फोन मिलाया।

"मुझे सुबह 8:00 बजे तक कानूनी मदद चाहिए, मेरी माँ की जान खतरे में है।"

उधर से वकील ने कहा, "तुम सारे सबूत संभाल कर रखो, हम सुबह पुलिस बल के साथ पहुँच रहे हैं।"

बाहर से नीतू ने दरवाजे पर जोर-जोर से दस्तक दी।

"अंदर क्या कर रही हो अंजली? दरवाजा खोलो!"

अंजली ने माँ का हाथ कसकर पकड़ा।

अब वह खामोश रहने वाली नहीं थी।

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