24/11/2025
*बिहार की राजनीति: 'B-Team' का शोर और हार का असली सच (एक विश्लेषण)*
राजनीति में हार-जीत एक सिक्के के दो पहलू हैं, लेकिन बिहार में हार के बाद 'आत्मचिंतन' की जगह 'ठीकरा फोड़ने' की रवायत बन गई है। शिक्षित होने के बावजूद, कुछ लोग और राजनीतिक दल अपनी रणनीतिक विफलताओं को स्वीकारने के बजाय अपनी हार का जिम्मेदार किसी तीसरी पार्टी को ठहराने लगते हैं। आज जरूरत है कि हम भावनाओं से ऊपर उठकर आंकड़ों की कसौटी पर पिछले 15 सालों के चुनावी इतिहास को परखें। क्या वाकई AIMIM जैसी पार्टियां किसी को हराने के लिए लड़ रही हैं, या फिर तथाकथित 'सेक्युलर' दलों की जमीन ही खिसक चुकी है? आइए, तथ्यों के आईने में हकीकत देखते हैं।
*2010 का आईना: जब ओवैसी नहीं थे, तब कौन जिम्मेदार था?
चलिए फ्लैशबैक में चलते हैं। साल 2010, केंद्र में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार थी। बिहार विधानसभा चुनाव में AIMIM का कोई नामो-निशान नहीं था। मैदान में कांग्रेस, राजद, लोजपा, और एनडीए (भाजपा-जदयू) थे। परिणाम क्या हुआ? एनडीए को 206 (जदयू+भाजपा) सीटों पर प्रचंड बहुमत मिला। वहीं, राजद महज 22 सीटों पर सिमट गई। जिस सीमांचल को आज राजद अपना गढ़ मानती है, वहां की 24 सीटों में से राजद को सिर्फ 1 सीट (कोचाधामन) मिली थी। दिलचस्प बात यह है कि वो एक सीट जीतने वाले कोई और नहीं, बल्कि वर्तमान AIMIM प्रदेश अध्यक्ष जनाब अख्तरुल ईमान ही थे (जो तब राजद में थे)। कांग्रेस ने सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा और मात्र 4 सीटें जीतीं (जिसमें 3 सीमांचल से थीं)। उस वक्त सीमांचल में भाजपा ने 13 सीटें जीती थीं। अब सवाल यह है कि 2010 में तो ओवैसी साहब चुनाव लड़ने नहीं आए थे, फिर राजद और कांग्रेस की इतनी बुरी दुर्गति क्यों हुई? तब "वोट कटवा" कौन था?
• 2015 का चुनाव: जब 'B-Team' का प्रोपेगेंडा फेल हो गया
साल 2015 का चुनाव इस बहस का सबसे बड़ा अपवाद और सबूत है। इस चुनाव में राजद, जदयू और कांग्रेस का महागठबंधन बना। दूसरी तरफ, असदुद्दीन ओवैसी ने पहली बार सीमांचल की 6 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे। ओवैसी बंधुओं (असदुद्दीन और अकबरुद्दीन) ने जमकर प्रचार भी किया। तर्क के हिसाब से तो भाजपा को जीतना चाहिए था, लेकिन हुआ क्या? महागठबंधन ने प्रचंड जीत हासिल की। सीमांचल की 24 में से 18 सीटें महागठबंधन (कांग्रेस-8, जदयू-6, राजद-4) ने जीतीं। भाजपा की लहर के बावजूद और AIMIM के मैदान में होने के बावजूद, अगर जनता को विकल्प दिखा तो उन्होंने महागठबंधन को वोट दिया। यह साबित करता है कि अगर आपकी रणनीति और गठबंधन मजबूत है, तो किसी के चुनाव लड़ने से आप नहीं हारते।
• 2020 का जनादेश: अलग राहें, अलग नतीजे
2020 में समीकरण फिर बदले। राजद ने 144 सीटों पर लड़कर 75 सीटें जीतीं (जो एक शानदार प्रदर्शन था), जबकि कांग्रेस 70 सीटों पर लड़कर महज 19 पर सिमट गई। सीमांचल में AIMIM ने अपनी ताकत दिखाई और 5 सीटें जीतीं। इसके बावजूद राजद राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। अगर ओवैसी की वजह से ही हार होती, तो राजद 75 सीटें कैसे जीतती? सच्चाई यह है कि चिराग पासवान की लोजपा ने जदयू को नुकसान पहुंचाया, जिसका फायदा राजद को मिला, न कि ओवैसी ने राजद को हराया।
• 2025 के नतीजे और रणनीतिक दिवालियापन
अब आते हैं वर्तमान यानि 2025 के चुनाव परिणामों पर जिसमें भाजपा 89, जदयू 85, लोजपा 19, HAM 5, RLM 4 , राजद: 25 सीटें कांग्रेस: 6 सीटें, माले 2, IIP 1, AIMIM 5 सीटें जीतने में कामयाब हुई । राजद 25 सीटों पर आ गई है, जो कि तकनीकी रूप से एक बड़ी हार है। लेकिन विडंबना देखिए, बुद्धिजीवी वर्ग अभी भी यही कह रहा है कि AIMIM के लड़ने से जमानत जब्त हुई। यह विश्लेषण हास्यास्पद है। जब पार्टी का जनाधार ही खिसक गया हो, तो 5 सीटों पर जीतने वाली पार्टी को पूरे राज्य में हार का जिम्मेदार बताना अपनी कमियों पर पर्दा डालने जैसा है। यह स्पष्ट रूप से राजद और कांग्रेस की रणनीतिक विफलता (Strategic Failure) है।
• 18% बनाम 82%: डर की राजनीति कब तक?
एक नैरेटिव यह चलाया जाता है कि "अगर कोई मुस्लिम नेतृत्व उभरेगा, तो बहुसंख्यक समाज (82%) एकजुट हो जाएगा।" यह तर्क भारतीय लोकतंत्र की धर्मनिरपेक्षता पर एक तमाचा है। अगर हम इसी डर (Compromising Attitude) के साथ जीते रहे कि 'कहीं वो नाराज न हो जाएं', तो मुसलमान कभी भी 'डिसीजन मेकिंग' की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाएंगे। हम हमेशा सिर्फ दरी बिछाने और वोट देने के लिए रह जाएंगे।
क्या हमारा संविधान किसी धर्म विशेष को सीएम बनने से रोकता है? अगर नहीं, तो फिर यह डर क्यों? 2005 का इतिहास गवाह है—जब रामविलास पासवान ने राजद के सामने शर्त रखी थी कि "किसी मुस्लिम को सीएम बना दो, मैं समर्थन दे दूंगा।" तब लालू यादव ने मुस्लिम सीएम बनाने के बजाय सत्ता गंवाना मंजूर किया। नतीजतन, बिहार में एनडीए का रास्ता खुला। भाजपा को सत्ता में लाने का रास्ता परोक्ष रूप से उसी जिद ने खोला था।
• निष्कर्ष: बदलाव का वक्त
राजद और कांग्रेस का यह विलाप कि EVM में गड़बड़ी है या ओवैसी 'B-Team' हैं, अब पुराना हो चुका है। 2005 में भी लालू जी ने परिणामों को 'रहस्यमयी' बताया था, जबकि केंद्र में कांग्रेस थी। 2025 में भी वही राग अलापा जा रहा है। समय की मांग है कि बिहार की राजनीति में अब 'आमूलचूल परिवर्तन' (Radical Change) हो। मुस्लिम समाज और धर्मनिरपेक्ष लोगों को उस "कॉम्प्रोमाइजिंग एटीट्यूड" से बाहर निकलना होगा। जब तक हम अपनी शर्तों पर राजनीति नहीं करेंगे, तब तक हमें कभी 'वोट बैंक' और कभी 'वोट कटवा' कहकर इस्तेमाल किया जाता रहेगा।
हकीकत यह है कि भाजपा की B-Team वो नहीं जो चुनाव लड़ रही है, बल्कि B-Team वो है जिसने अपनी जिद और परिवारवाद के लिए 2005 में एक मुस्लिम को सीएम बनने से रोका और भाजपा को सत्ता की चाबी सौंप दी।
विद्यार्थी: राजनीतिक शास्त्र (स्नाकोत्तर)
Copy- Riyaz Rahi