22/06/2026
रात के बारह बज रहे थे। इंस्पेक्टर विक्रम अपनी मेज पर झुके हुए थे, जहाँ एक पुरानी, धूल से भरी फाइल खुली थी।
यह फाइल 10 साल पुराने 'मल्होत्रा मर्डर केस' की थी,
जिसे आज बंद किया जाना था क्योंकि कोई सुराग नहीं मिला था।
तभी उनके फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था, सिर्फ लिखा था—'अज्ञात'।
विक्रम ने फोन उठाया, "हेलो?"
दूसरी तरफ से एक गहरी, ठंडी आवाज आई,
"फाइल बंद मत करना, इंस्पेक्टर। कातिल अभी मरा नहीं है... और न ही वह सुरागरहित है।"
विक्रम के कान खड़े हो गए। "तुम कौन हो? और तुम्हें इस केस के बारे में क्या पता है?"
"मैं वही हूँ जो उस रात वहाँ था," आवाज ने कहा। "मल्होत्रा की हवेली के पीछे जो पुराना कुआं है, उसके अंदर झांक कर देखो। तुम्हें तुम्हारा जवाब मिल जाएगा। लेकिन याद रहे, सच जानने की एक कीमत होती है।" फोन कट गया।
हवेली का रहस्य
विक्रम ने बिना वक्त गंवाए अपनी जीप उठाई और मल्होत्रा हवेली की तरफ निकल पड़े। हवेली सालों से सुनसान पड़ी थी, चारों तरफ सन्नाटा और घने पेड़ थे। टॉर्च की रोशनी में उन्होंने हवेली के पिछले हिस्से में मौजूद उस पुराने कुएं को ढूंढा।
कुएं के पास पहुंचते ही उन्हें एक अजीब सी सड़न की बदबू आई। विक्रम ने टॉर्च की रोशनी नीचे डाली। कुएं का पानी सूख चुका था, लेकिन नीचे कुछ चमक रहा था।
उन्होंने तुरंत अपनी टीम को बैकअप के लिए बुलाया।
घंटों की मशक्कत के बाद, कुएं से जो निकला उसने सबके होश उड़ा दिए:
• एक पुराना, जंग लगा हुआ लोहे का संदूक।
• मल्होत्रा की डायरी, जो प्लास्टिक में लिपटी होने के कारण सुरक्षित थी।
• एक सोने की चेन, जिस पर 'V' अक्षर खुदा हुआ था।
डायरी का आखिरी पन्ना
विक्रम ने संदूक से डायरी निकाली और उसके पन्ने पलटने लगे। आखिरी पन्ने पर मल्होत्रा की कांपती हुई लिखावट में लिखा था:
"वह मेरे बहुत करीब है। जिसे मैं अपना सबसे वफादार दोस्त समझता था, वही मेरी जान का दुश्मन बन गया है। उसने मेरी सारी संपत्ति के कागजात चुरा लिए हैं। अगर कल सुबह मैं जिंदा न बचूं, तो समझ जाना कि 'V' नाम का वह शख्स..."
पन्ना वहीं फट गया था। नाम अधूरा था।
विक्रम गहरी सोच में डूब गए। 'V' से कौन हो सकता था? मल्होत्रा का बिजनेस पार्टनर विवेक? या उनका भतीजा वरुण?
असली कातिल
तभी विक्रम के फोन पर दोबारा उसी अज्ञात नंबर से मैसेज आया:
"पीछे देखो।"
विक्रम ने जैसे ही मुड़कर देखा, उनके सिर पर किसी भारी चीज से वार हुआ। वह लड़खड़ाकर गिर पड़े। उनकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा, लेकिन धुंधली रोशनी में उन्होंने हमलावर का चेहरा देख लिया।
वह कोई और नहीं, बल्कि खुद उनका सीनियर ऑफिसर, कमिश्नर विजय था!
विजय के हाथ में एक बंदूक थी और उसके गले में ठीक वैसी ही सोने की चेन थी, जैसी कुएं से मिली थी।
विजय मुस्कुराया, "तुमने बहुत देर कर दी विक्रम। 10 साल पहले मल्होत्रा को मैंने ही मारा था क्योंकि उसने मेरी बेइमानी पकड़ ली थी। और आज, इस राज को जानने वाले तुम आखिरी इंसान हो।"
विजय ने बंदूक तानी। लेकिन इससे पहले कि वह ट्रिगर दबाता, चारों तरफ से पुलिस के सायरन की आवाज गूंज उठी।
विक्रम ने गिरते-गिरते भी अपने वायरलेस का 'ऑन' बटन दबा दिया था, जिससे उनकी और विजय की सारी बातचीत हेडक्वार्टर में रिकॉर्ड हो रही थी। बैकअप टीम ने समय रहते विजय को चारों तरफ से घेर लिया।
विजय के हाथों से बंदूक छूट गई। 10 साल पुराना सस्पेंस आखिरकार खत्म हो चुका था, लेकिन इस सच ने पुलिस महकमे की बुनियाद हिला कर रख दी थी।