09/06/2026
दायाँ-बायाँ | कहानी (कथा-कहानियाँ)
भी नहीं था। सिर्फ़ एक सलाखों वाला दरवाज़ा था जहाँ से पहरेदार आकर खाने की थाली रखता और लौट जाता। दोनों चाहते थे किसी तरह निवाला तोड़कर राजा के मुँह में डालें। लेकिन राजा बहुत गुस्से में था। दायाँ, बायाँ अपनी उँगली भींच के रह जाते। राजा की मजबूरी पर दोनों को बड़ी तकलीफ़ होती।
एक रोज़ दोनों ने मिलकर दरवाज़े के कोने वाली सलाख पकड़ी और राजा से कहा कि तुम भी ज़ोर लगाओ। और टेढ़ी करके दो सलाख बाहर निकाल ली। उस रोज़ जब पहरेदार दाखिल हुआ तो बाएँ ने झटके से उसकी पगड़ी पैर की ओर गिरा दी और दाएँ ने सलाख उसके सर पे दे मारी। जैसे ही पहरेदार ने चीखने के लिए मुहँ खोला, बाएँ ने उसका मुँह बंद किया और दाएँ ने जल्दी से उसकी पगड़ी उसी के मुँह में ठूंस के औंधा कर दिया। दोनों ने मिल के उसी की पगड़ी से उसे गठरी की तरह बाँध दिया। दोनों ने कंधे-कुहनी तक का ज़ोर लगा के राजा के पैर की ज़ंजीर खोल दी। राजा के लिए मौका था। वह दरवाज़े से बाहर निकला और ऊपर की छत पर चढ़ के किले के पीछे वाली नदी में कूद गया। दाएँ-बाएँ ने भी खूब हाथ चलाए और राजा को लेकर दूसरे किनारे पर पहुँच गए।
फिर क्या था! पास ही घास चरता एक घोड़ा दिखा। दोनों ने उसकी गर्दन पे हाथ फेरा, फुसलाया और राजा को उसकी पीठ पर लेकर, गाँव पार करके सल्तनत की हद से बाहर निकल गए।
राजा का रसूख पड़ोसी राजाओं के साथ अच्छा था। महीने भर में राजा पड़ोसी की फौजें लेकर लौटा और गद्दार वज़ीर को निकाल बाहर किया।
फ़तह के बाद जब राजा रथ पे सवार शहर से गुज़रा तो फ़तेह का झंडा उसने दाएँ-बाँए के हाथ में थमा दिया था। दोनों बारी-बारी उसको लहरा-लहरा कर लोगों की जय-जयकार का जवाब दे रहे थे तो राजा मुस्कुरा-मुस्कुराकर यही काम कर रहे थे।
Credit - गुलज़ार