01/05/2026
जब बच्चे जिंदा थे, सिस्टम गूंगा-बहरा बना था,
अब ला*शों पर सियासत का मेला क्यों सजा है?
जिनकी खामोशी ने ये हाल बनाया, वही आज बोल रहे हैं—
सच ये है, यहां गुनाहगार सिर्फ कातिल नहीं, पूरा सिस्टम खड़ा है।
हजारीबाग कांड: चुप जनप्रतिनिधि, जागी सियासत — आखिर जिम्मेदार कौन?
हजारीबाग की धरती पर हुई ये घटना सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी का काला सच है। दो मासूम बच्चियों और एक बच्चे की बेरहमी से हत्या कर शव को तालाब में फेंक दिया गया — और कई दिनों तक प्रशासन और जनप्रतिनिधि सोते रहे।
4–5 दिन बाद जब सड़ी-गली हालत में लाशें बरामद होती हैं, तब जाकर हलचल मचती है। सवाल ये है — जब बच्चे गायब थे तब ये सिस्टम कहाँ था?
स्थानीय सांसद और विधायक — जो जनता के वोट से कुर्सी तक पहुंचे — पूरी तरह खामोश रहे। न कोई बयान, न कोई पहल। क्या उनकी जिम्मेदारी सिर्फ चुनाव तक ही सीमित है?
इसी बीच झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी मौके पर पहुंचते हैं, पुलिस प्रशासन से बात करते हैं, कार्रवाई तेज करने को कहते हैं और पीड़ित परिवार को सहारा देते हैं।
लेकिन हैरानी देखिए — काम करने वाले पर ही सवाल उठने लगे!
कुछ मौकापरस्त नेता, जो आम दिनों में दिखाई नहीं देते, अचानक बाहर आकर राजनीति चमकाने में जुट गए। असली मुद्दा — मासूमों को इंसाफ — पीछे छूट गया, और आगे आ गई सस्ती बयानबाजी।
सच ये है कि अगर स्थानीय जनप्रतिनिधि समय पर जाग जाते, तो शायद किसी दूसरे नेता को हस्तक्षेप करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
डॉ. इरफान अंसारी पर सवाल उठाने वाले ये भी याद रखें — ये वही नेता हैं जिन्होंने कई जगहों पर बिना धर्म-जाति देखे जरूरतमंदों की मदद की है, गरीब परिवारों के शव तक बिना पैसे दिए हॉस्पिटल से घर घर पहुंचाने में मदद की है
आज जरूरत राजनीति की नहीं, जिम्मेदारी की है।
जरूरत है जवाब की —
बच्चों की जान गई, जिम्मेदार कौन?
सिस्टम फेल हुआ, जवाबदेह कौन?
और जो चुप रहे, क्या वो दोषी नहीं?