17/08/2026
1947–50 के राजनीतिक माहौल को देखना जरूरी है। भारत को हिंदू राष्ट्र न बनाने का फैसला केवल गांधी या नेहरू का व्यक्तिगत फैसला नहीं था, बल्कि संविधान सभा में बनी व्यापक सहमति का परिणाम था।
गांधी और नेहरू भारत को हिंदू राष्ट्र क्यों नहीं बनाना चाहते थे?
1. गांधी की सोच — भारत सभी धर्मों का देश रहे
गांधी का मानना था कि भारत में हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन देश केवल हिंदुओं का नहीं है। विभाजन के बाद भी वे चाहते थे कि भारत में मुसलमान, सिख, ईसाई और अन्य समुदाय बराबर नागरिक रहें। उनके लिए धर्म व्यक्तिगत आस्था था, राज्य की नागरिकता का आधार नहीं।
2. नेहरू — आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र की कल्पना
नेहरू चाहते थे कि भारतीय राज्य नागरिकों को धर्म के आधार पर अलग-अलग राजनीतिक अधिकार न दे। उनका विचार था कि अगर पाकिस्तान ने स्वयं को मुस्लिम राष्ट्र बनाया है, तो भारत को उसका धार्मिक प्रतिबिंब बनने के बजाय समान नागरिकता वाला लोकतांत्रिक राष्ट्र बनना चाहिए।
3. विभाजन के बाद की हिंसा
1947 में हिंदू-मुस्लिम हिंसा और बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ। ऐसे समय में भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने से भारत में बचे मुसलमानों की सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता पर गंभीर असर पड़ सकता था। गांधी विशेष रूप से इस खतरे को लेकर चिंतित थे।
4. संविधान सभा में धार्मिक राज्य के बजाय मौलिक अधिकार
संविधान सभा ने नागरिकों के लिए समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और धर्म के आधार पर भेदभाव न करने के सिद्धांतों को स्वीकार किया। यही आगे भारतीय गणराज्य की संवैधानिक पहचान बनी।
लेकिन उस समय हिंदू राष्ट्र के पक्ष में कौन थे?
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है: “हिंदू राष्ट्र” चाहने वाले सभी लोग एक ही राजनीतिक दल या एक ही विचार के नहीं थे।
विनायक दामोदर सावरकर — हिंदुत्व की राजनीतिक अवधारणा के सबसे प्रमुख विचारकों में थे। वे भारत को हिंदू राष्ट्र की सांस्कृतिक-राजनीतिक अवधारणा में देखते थे।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी — वे हिंदू महासभा से जुड़े प्रमुख नेता थे और विभाजन के समय हिंदू हितों के मजबूत राजनीतिक प्रतिनिधि थे। हालांकि उनके विचारों को सीधे सावरकर के हिंदू राष्ट्र सिद्धांत के समान मानना ठीक नहीं होगा।
हिंदू महासभा के अनेक नेता और कार्यकर्ता — वे भारत को हिंदू सभ्यता और हिंदू राजनीतिक पहचान वाला राष्ट्र बनाने की मांग करते थे।
आरएसएस की विचारधारा — उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत को हिंदू सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में देखता था। हालांकि RSS स्वयं उस समय चुनावी राजनीतिक दल नहीं था।
सबसे महत्वपूर्ण बात
पाकिस्तान का मुस्लिम राष्ट्र बनना और भारत का धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनना दो अलग संवैधानिक रास्ते थे।
विभाजन के बाद भारत के सामने एक विकल्प यह था कि:
“पाकिस्तान मुस्लिम राष्ट्र है, इसलिए भारत हिंदू राष्ट्र हो।”
लेकिन संविधान सभा में प्रभावशाली नेतृत्व ने दूसरा रास्ता चुना:
“भारत की पहचान किसी एक धर्म के राज्य के रूप में नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के समान अधिकार वाले लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में होगी।”
और ध्यान रखें—1950 के मूल संविधान में “सेक्युलर” शब्द नहीं था। “धर्मनिरपेक्ष” शब्द प्रस्तावना में 1976 में 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया।