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25/12/2022

दिल लगा कर क्या मिला, यह बड़ा सवाल है। तवांग से प्रारंभ करता हूं। पंडित नेहरू के हिंदी चीनी भाई भाई

16/09/2022

मधुमेह की आर्युवैदिक दवा का पेटेंट कराया

1. मुरादाबाद के प्रोफसर दंपती का शोध सफल
2. चूहों पर किया गया परीक्षण सफल साबित
3. अनुमति के बाद होगा क्लीनिकल ट्रायल
4. पास हुआ तो बदल जाएगी ईलाज पद्धति
राष्ट्रीय खबर
रांचीः निरंतर शोध के बाद एक प्रोफसर दंपती ने मधुमेह का स्थायी उपचार करने वाली दवा खोज लेने का दावा किया है। प्रारंभिक शोध के आधार पर ही उन्होंने इस दवा का पेटेंट कराया है। मुरादाबाद के इस दंपती की कहना है कि यह मधुमेह की आयुर्वैदिक दवा है और चूहों पर इसका प्रयोग पूरी तरह सफल रहा है।
वहां के आइएफटीएम विवि ने इसका पेटेंट कराया है और पेटेंट के बाद दवा बनाने के लिए कंपनी से अनुबंध करने की प्रक्रिया चल रही है। इसके बाद ही इसका इंसानों पर परीक्षण का दौर प्रारंभ होगा, जिसे ह्युमैन क्लीनिकल ट्रायल कहा जाता है। काफी अधिक संख्या में मरीजों पर इसके उपयोग और उसके प्रभाव को देख समझ लेने के बाद ही वैज्ञानिक प्रक्रिया में किसी दवा के प्रयोग की मंजूरी दी जाती है। इसके पहले क्लीनिकल ट्रायल के आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया जाता है और यह देखा जाता है कि इस दवा का कोई साइड एफेक्ट तो नहीं है। इस परीक्षा में पास होने के बाद ही इसे मरीजों के लिए उपलब्ध कराने की अनुमति मिलती है और दवा व्यापारिक तौर पर बाजार में उपलब्ध हो पाती है। प्रोफसर दंपती ने औषधीय गुणों वाले पौधे पत्थरचट्टा का उपयोग डायबिटीज नियंत्रण में पहली बार करने की बात कही है। प्रोफेसर डॉ अभिषेक तिवारी व वर्षा तिवारी को शोध के दौरान पता लगा कि इसमें मधुमेह को नियंत्रित करने का भी गुण है। वैसे हम सभी ने प्रचलित ग्रामीण परिवेश में इस पत्थरचट्टा का नाम सुन रखा है। इस पौधे की पत्तियों का आयुर्वेदिक उपयोग अभी तक पथरी सहित कई रोगों के इलाज में होता रहा है। अब यह मधुमेह जैसे बीमारियों में भी कारगर होगा। आइएफटीएम विश्वविद्यालय के फार्मेसी विभाग के प्रोफेसर दंपती ने पत्थरचट्टा व जिंक सल्फेट से मधुमेह (डायबिटीज) को नियंत्रित करने की दवा खोज निकाली है। शोध में बनाई गई दवा का चूहों पर उपयोग सफल होने पर पेटेंट करा दिया गया है। इसके बाद पत्थर चटा पौधे व जिंक सल्फेट का मिक्चर तैयार करके चूहो पर उपयोग किया गया। शोध जून 2022 में पूरा हुआ। पांच जुलाई को पेटेंट हो गया है। डा.अभिषेक तिवारी बताते हैं कि इस शोध पर करीब तीन लाख रुपये खर्च हुए हैं। चूहों पर शोध के लिए सबसे पहले उन्हें मधुमेह का रोगी बनाया गया। इसके लिए इंसुलिन को खत्म करने के लिए स्ट्रेप्टो जोटोसिन को चूहों में इंजेक्ट किया गया। इससे चूहों में बीटा सेल कमजोर पड़े तो चूहों में इंसुलिन बनना बंद हो गयी। इसके बाद पत्थर चट्टा के पौधे के पत्ते को सुखाया गया। इन्हें पीसने के बाद जिंक सल्फेट मिलाकर चूहों के मुंह में कैनुला लगाकर दिया गया।
जिससे बीटा सेल विकसित होने से इंसुलिन बनना शुरू हो गई और चूहों में मधुमेह रोग नियंत्रित पाया गया। शोध में 21 दिन का समय लगा। शोध के दौरान समय-समय पर चूहों का वजन भी किया गया। मधुमेह नियंत्रित होने पर चूहों का वजन सामान्य हो गया। आयुर्वेद प्रणाली की इस दवा से कोई साइड इफेक्ट नहीं हैं। शोध पूरा करने के बाद वैज्ञानिक स्वीकृति के लिए इससे दस्तावेज तैयार किए गए। फिर शोध भारत सरकार के पेटेंट आफिस यानि भारतीय पेटेंट विभाग नई दिल्ली भेजा गया। यहां से पेटेंट प्रकाशित हुआ।
इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में इस बीमारी से पीड़ित होने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। वर्ष 2019 में हुई मौतों में से मधुमेह से होने वाली मौतों का नंबर नौंवा था। इसी वजह से इसकी रोकथाम के लिए एलोपैथिक दवाइयों का बाजार भी बहुत बड़ा हो गया है। अगर ऐसी आयुर्वैदिक दवा क्लीनिकल ट्रायल में पास हो जाती है तो चिकित्सा जगत में इस मधुमेह की बीमारी के ईलाज की पूरी पद्धति ही बदल जाने की उम्मीद है।

16/09/2022

पूर्वी भारत का पहला वाइन मॉल कोलकाता में बनेगा

1. दक्षिण कोलकाता में पांच मंजिला केंद्र बनेगा
2. दुनिया के हर ब्रांड की शराब उपलब्ध होगी
3. प्रस्ताव को सरकार की स्वीकृति का इंतजाम
4. शराब की आमदनी को पर्यटन से जोड़ने की कवायद
राष्ट्रीय खबर
कोलकाताः कोलकाता में शीघ्र ही एक पूरा मॉल ही शराब के लिए बनने जा रहा है। मिली जानकारी के मुताबिक इस पांच मंजिली व्यापारिक भवन में सिर्फ शराब की ही बिक्री होगी। इस प्रस्ताव पर अभी विचार चल रहा है और अगर इसे मंजूरी मिल जाती है तो यह पूर्वी भारत का पहला वाइन मॉल बनेगा।
वैसे इस किस्म के मॉल भारत में मुंबई और बेंगलुरु में हैं। बेंगलुरु के इस वाइन मॉल का नाम टनिक है, जिसे एशिया का सबसे बड़ा शराब मॉल माना जाता है। अब पश्चिम बंगाल सरकार शराब के कारोबार से होने वाले राजस्व की आमदनी को बढ़ाने के साथ साथ इस विदेशी पर्यटन के साथ जोड़ने के प्रस्ताव पर विचार कर रही हैं। अगर इस प्रस्ताव को सरकार की मंजूरी मिल जाती है तो देश के अलावा विदेश मे मिलने वाले सारे ब्रांड के शराब यहां शौकिनों के लिए उपलब्ध होंगे। इस जरिए देश और विदेश के पर्यटन भी यहां आना चाहेंगे। इससे सरकार के खजाने में अतिरिक्त आमदनी होगी। वैसे पश्चिम बंगाल सरकार यह जानती है कि पहले बिहार की शराब बंदी की वजह से उसके खजाने में अधिक आमदनी आती रही है। अब झारखंड सरकार की नई शराब नीति की वजह से भी उसे और फायदा हो रहा है। शराब के शौकिनों को अलग अलग किस्म के शराब के ब्रांडों की जानकारी होती है। यह सक्षम लोगों के बीच बांटा जाने वाला एक बेहतर उपहार भी माना जाता है। अंदरखाने से मिली जानकारी के मुताबिक कोलकाता के ही एक बड़े शराब कारोबारी ने देश विदेश का दौरा करने के बाद राज्य सरकार को यह प्रस्ताव दिया है। सरकार तक प्रस्ताव पहुंचने के बाद आबकारी विभाग में इस पर चर्चा सार्थक रही है लेकिन अपने किस्म का नया प्रयोग होने की वजह से इसके लिए राज्य सरकार की मंजूरी जरूरी है। खबर के मुताबिक अगर यह प्रस्ताव स्वीकार होता है तो अगले साल के मध्य तक कोलकाता के दक्षिणी हिस्से में इस पांच मंजिली शराब मॉल को खोला जाएगा। देश-विदेश के अनेक शहरों में कपड़ा सहित अन्य उपयोग सामानों के मॉल पहले से हैं, जहां एक ही छत के नीचे उस किस्म के सारे सामान उपलब्ध होते हैं। इसी व्यापारिक पद्धति को अब बेंगलुरु की तर्ज पर कोलकाता में आजमाने की कोशिश हो रही है। इसके लिए दुनिया भर के प्रसिद्ध ब्रांडों को यहां उपलब्ध कराना कोई आसान काम नहीं होगा। लेकिन इसकी शुरुआत होने पर तमाम विदेशी पर्यटक भी अपनी पसंद के ब्रांड की तलाश में यहां आयेंगे, जो राजस्व की आमदनी को बढ़ाने का नया रास्ता बनायेगा। प्रस्तावित योजना के मुताबिक पांच मंजिले इस मॉल के हर तल्ले पर एक बार सह रेस्टोरेंट भी होगा, जहां लोग अपने हिसाब से सुरापान करने के साथ साथ भोजन ले सकेंगे।
इस बीच यह भी खबर आय़ी है कि पिछले साल विदेशी शराब की कीमतों में कमी किये जाने के बाद इस बार दाम बढ़ाने की तैयारी चल रही है। वैसे राज्य के आबकारी विभाग के सूत्र बताते हैं कि कीमतों में बढ़ोत्तरी होने के बाद भी उनकी कीमत पिछले नवंबर के पहले से काफी कम रहेंगे और नया रेट आगामी 15 सितंबर से लागू कर दिया जाएगा।

03/09/2022

मॉक्सी यंत्र मंगल ग्रह पर ऑक्सीजन पैदा कर सकेगा

1. प्रिजरवेंस रोवर के यंत्र से एक और बड़ी सफलता मिली
2. प्रतिकूल वातावरण में प्राणवायु पैदा करने में सफल
3. कई दौर के परीक्षणों में यह सफल साबित हुआ है
4. एक पेड़ के जितना ऑक्सीजन बना सकता है
राष्ट्रीय खबर
रांचीः अब अधिक दूरी के अंतरिक्ष अभियानों की तकनीक शायद भविष्य में बदल जाएगी। साथ ही मंगल ग्रह पर ऑक्सीजन तैयार करने की विधि की सफलता से वहां नये किस्म के प्रयोग भी किये जा सकेंगे।
उम्मीद की जा रही है कि इस शोध को और अधिक सटीक कर लेने के बाद भविष्य में इंसान मंगल ग्रह पर भी अपने पैर रख सकेगा। दरअसल यह काम संभव हुआ है प्रिजरवेंस रोवर में लगे एक यंत्र से। इस यंत्र को मार्स ऑक्सीजन इन सिटू रिसोर्स यूटिलाइजेशन एक्सपेरिमेंट कहा गया है। संक्षेप मे इसे मॉक्सी कहा गया है। यह यंत्र मंगल ग्रह के अत्यधिक कॉर्बन डॉईऑक्साइड वाले वातावरण में ऑक्सीजन पैदा करने में सफल हुआ है। वैसे तो यह प्रयोग फरवरी 2021 में ही प्रारंभ हो गया था। उसी समय इस रोवर ने मंगल ग्रह पर खुद को उतारा था। वहां इस रोवर के उतर जाने के बाद मॉक्सी ने कई दौर में लगातार प्रयोग किया है। अप्रैल 2021 से प्रारंभ हुआ यह अनुसंधान अब लगभग सफल साबित हो चुका है।
कई बार इस मॉक्सी ने वहां ऑक्सीजन प दा किये हैं। वहां का वातावरण धरती से बिल्कुल अलग है। इसलिए इस यंत्र की मदद से वहां ऑक्सीजन पैदा करने में सफलता मिलने की वजह से ही माना जा रहा है कि भविष्य में अंतरिक्ष यात्री इस ग्रह पर कदम रख सकते हैं। रोवर के चारों तरफ घूमकर जायजा लेने से यह भी पता चल गया है कि वहां भी धरती की तरह मौसम बदलता है। साथ ही दिन और रात के तापमान में भी बदलाव होता है। पृथ्वी से वहां का एक मूल फर्क यह है कि वहां के मौसम पृथ्वी से अधिक समय के होते हैं क्योंकि वह सूर्य का चक्कर काटने में अधिक समय लेता है। वहां पर जब जब इस मॉक्सी मशीन को काम पर लगाया गया है तो उसने प्रति घंटे छह ग्राम ऑक्सीजन तैयार किया है। इस आधार पर यह माना जा रहा है कि वह मंगल ग्रह पर किसी छोटे आकार के पेड़ के जितनी ऑक्सीजन हर दिन पैदा कर सकता है।
किसी दूसरे ग्रह के अलग वातावरण में उपलब्ध संसाधनों की उपयोग कर ऑक्सीजन पैदा करना कोई आसान काम नहीं था। अब चूंकि ऐसा हो रहा है इसलिए यह माना जा सकता है कि भविष्य में इस मशीन की मदद से इंसान उस ग्रह पर भी पैर रख सकेगा और उसके ऑक्सीजन की जरूरत यह मशीन पूरी करेगी।
इस मशीन के बारे में बताया गया है कि यह एक टोस्टर के आकार की मशीन है, जो प्रिजरवेंस रोवर में लगायी गयी थी। उसे खास तौर पर कम समय के उपयोग के लिए बनाया गया है। वह चालू होने के बहुत कम समय के भीतर खुद ही बंद हो जाती है। इस तकनीक के सफल होने के बाद इसी मशीन का बड़ा आकार शायद अधिक ऑक्सीजन पैदा करने वाला साबित होगा जो सुदूर अंतरिक्ष के अभियानों में अंतरिक्ष यात्रियों को भी सांस लेने के लिए प्राणवायु प्रदान कर सकेगा। साथ ही अगर इसे निरंतर चालू रखने की तकनीक से जोड़ा गया तो उसके और भी फायदे होंगे। हो सकता है कि बडे आकार की मशीन मंगल ग्रह पर ही कई बड़े पेडों के जितना ऑक्सीजन का उत्पादन कर वातावरण में भी ऑक्सीजन उपलब्ध करा दे। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि इस मशीन के तकनीक में संशोधन कर उसे कई सौ पेड़ों के बराबर ऑक्सीजन पैदा करने लायक भी बनाया जा सकता है। इससे अंतरिक्ष अभियानों के रॉकेटों को ईंधन भी मिल सकेगा और अंतरिक्ष की यात्रा अधिक सुगम होगी। अभी ईंधन की वजह से भी ऐसे यानों का वजन बहुत अधिक हो जाता है, जिसे गुरुत्वाकर्षण के बाहर भेजने में अतिरिक्त ऊर्जा का व्यय होता है।

28/08/2022

बिना प्राकृतिक पद्धति के ही फिर से भ्रूण पैदा करने में सफलता मिली

1. इस भूण में दिमाग और धड़क रहा दिल भी है
2. तीन स्टेम सेलों की मदद से हुआ काम
3. जेनेटिक विज्ञान की तरक्की का नया काम
4. भविष्य में इंसानी अंग भी ऐसे तैयार हो सकेंगे
राष्ट्रीय खबर
रांचीः चूहों पर निरंतर जारी प्रयोग में एक और कामयाबी मिली है। इस बार इस कामयाबी का सेहरा यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के शोध दल के सर पर बंधा है। इस दल ने भी निरंतर कोशिशों के बाद अंततः प्रयोगशाला में एक चूहे का भ्रूण पैदा किया है, जिसे बनाने के लिए किसी भी प्राकृतिक पद्धति का सहारा नहीं लिया गया था।
यानी इसके विकसित होने में नर और मादा के संपर्क अथवा किसी किस्म गर्भ का उपयोग नहीं किया गया है। यह पूरी तरह कृत्रिम है और सब कुछ कृत्रिम तरीके से प्रयोगशाला में ही तैयार किया गया है। इस प्रयोग से अब चूहे का जो भ्रूण पैदा हुआ है, उसमें दिमाग और एक दिल भी है। इस दिल को धड़कता हुआ भी वैज्ञानिक देख रहे हैं। इस शोध दल का नेतृत्व प्रोफसर मैगडालेना जेरनिका गोइट्ज ने किया है। अब तक यह भ्रूण पूरी तरह सही ढंग से विकसित हो रहा है और अगर उसे यूं ही विकसित किया गया तो वह अपने किस्म का पहला जीवित प्राणी होगा, जिसके पैदा होने में किसी माता पिता की भूमिका नहीं होगी।
इस काम को अंजाम देने के लिए वैज्ञानिकों ने स्टेम सेलों का ही सहारा लिया। जेनेटिक विज्ञान के विकसित होने की वजह से यह काम दिनोंदिन आसान होता चला जा रहा है। इस प्रयोग के सफल होने की वजह से फिर से यह दावा मजबूत हुआ है कि शरीर के किसी भी अंग को इस पद्धति से तैयार किया जा सकता है। दरअसल सारे वैज्ञानिक इंसानी अंगों को प्रयोगशाला में उगाने के बाद उन्हें किसी बीमार के शरीर में प्रत्यारोपित करने की योजना पर ही काम कर रहे हैं। इसके पीछे की सोच यह है कि इस प्रयोग के सफल होने पर दुनिया के अरबों लोगों को फायदा होगा, जो किसी न किसी अंग के खराब होने की वजह से परेशान है। इसमें स्टेम सेल की सबसे प्रमुख भूमिका है, जिसे अब किसी भी शरीर का आधार माना जाने लगा है। इसके विकसित होने के कारण ही धीरे धीरे पूरा शरीर विकसित होता है।
जेनेटिक एडिटिंग का सहारा लेते हुए शोध दल ने तीन किस्म के स्टेम सेलों से यह काम प्रारंभ किया था। इस दल ने पहले इन स्टेम सेलों को आपस में संपर्क स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ाया। इनके बीच संवाद स्थापित होने के बाद इन्होंने आपसी सहयोग से कई जीन पैदा किये और विकास की प्रक्रिया को और विस्तार दिया। इनके विकास के लिए प्रयोगशाला में सारा माहौल बिल्कुल वैसा ही रखा गया था, जैसा प्राकृतिक तौर पर होता है। धीरे धीरे इस भ्रूण के दिल और दिमाग को विकसित होते हुए भी देखा गया। इस आधार पर शोधदल इस नतीजे पर पहुंचा है कि तीन किस्म के स्टेम सेल ही आपस में संवाद स्थापित कर लेने के बाद आपस में रासायनिक और विद्युतीय संकेतों का आदान प्रदान कर आगे का काम पूरा करते हैं। लिहाजा इस पद्धति को और अधिक विकसित किये जाने की तमाम बारिकियों को समझ लेने के बाद किसी खास अंग को भी प्रयोगशाला में तैयार कर पाना संभव होगा। अभी यह परीक्षण चूहों पर चल रहा है। यह तकनीक पूरी तरह विकसित और सुरक्षित साबित होने के बाद जाहिर तौर पर इंसानी स्टेम सेलों की मदद से इंसानी भ्रूण के जरिए अंग उगाने की तकनीक पर काम होगा।

27/08/2022

भीषण सूखे में नदी का जलस्तर घटा तो बर्कशायर का इतिहास मिला

1. प्राचीन ब्रिटेन के एक व्यापारिक केंद्र का पता चला
2. नाव से ही होता था सारा कारोबार
3. माल लाने और ले जाने का इलाका है
4. वहां आने जाने के लिए कई सड़कों भी दिखी
राष्ट्रीय खबर
रांचीः ब्रिटेन में भीषण सूखा का दौर चला, यह अब पुरानी बात हो गयी। इस बीच देश के कई हिस्सों में बारिश की वजह से अब जलसंकट थोड़ा दूर हुआ है। दूसरी तरफ तापमान में कमी आने की वजह से लोगों की परेशानियां भी कम हुई हैं। इसके बीच ही प्रमुख नदी टेम्स के किनारे एक प्राचीन व्यापारिक केंद्र को खोजा गया है।
यह कूकहैम, बर्कशायर में है। इसे शोधकर्ता सदियों की खोज बता रहे हैं। इस अनुसंधान में यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के लोग शामिल थे। टेम्स नदी के किनारे स्थित इस प्राचीन व्यापारिक केंद्र को देखकर यह प्रारंभिक अनुमान लगाया गया है कि इसका इस्तेमाल नदियो के जरिए होने वाले कारोबार के लिए किया जाता था। बता दें कि मध्यकाल में देश विदेश में व्यापार का सबसे बेहतर साधन नौ परिवहन ही थी। अब तक जो कुछ समझा जा सका है, उसके मुताबिक इसी केंद्र पर बाहर से आने वाले सामान लाये जाते थे और यही से निर्यात का काम भी चलता था।
विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के मुताबिक नौंवी सदी में किसी कारण से इसे छोड़ दिया गया था। वहां से कारोबार बंद होने की वजह से यह वीरान होता चला गया था। शहर के होली ट्रिनिटी चर्च के बगल में खुदाई का काम प्रारंभ करने के बाद ही वहां प्राचीन कोई ढांचा होने के संकेत मिले थे। दरअसल वहां आठवीं सदी के किसी मॉनेरस्टरी की खोज हो रही थी। दरअसल इतिहास के पन्नो में उस मध्यकाल के इतिहास के कई विवरण दर्ज हैं। इसी वजह से शोधकर्ता ब्रिटेन के अलग अलग जगहों पर इन भूला दिये गये स्थानों की खोज करते हैं, ताकि उनका संरक्षण किया जा सके। इस स्थान पर अब तक माल ढुलाई के लिए वे स्थान देखे गये हैं, जहां से नाव पर सामान लादा जाता था या आने वाले नावों से सामान उतारा जाता था। वहां पर धातु से संबंधित काम के लिए भी कुछ स्थान दिखे हैं जबकि लोगों के भोजन के लिए वहां ब्रेड बनाने के ओवन भी नजर आये हैं।
इन तथ्यों के आधार पर यह भी माना जा रहा है कि उस काल में यह इलाका शायद लंदन और साउथम्पटन के जितना ही बड़ा था और महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। इस शोध दल के नेता गैबर थॉमस ने कहा कि यह दरअसल एक पीढ़ी की खोज है। न सिर्फ वहां के धार्मिक केंद्र का पता चला है बल्कि नये स्थानों की पहचान होने के प्राचीन इतिहास को अब बेहतर तरीके से समझने का रास्ता भी दिखा है। नदी के ठीक किनारे यह इलाका स्थित था। जहां आस पास से आने जाने के लिए सड़कों का जाल भी था। उस दौर के हिसाब से यहां के निर्माण ही बताते हैं कि यह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था। साथ ही यह भी प्रमाणित हो गया है कि ब्रिटेन के व्यापार का मूल हिस्सा टेम्स नदी पर ही आधारित था। ब्रिटेन के इस हिस्से पर उस काल में एंग्लो सैक्सन रानी सिंनेथिरिंथ का शासन था, ऐसा इतिहास के पन्नों में दर्ज है। वैसे अब इस बात को समझने की कोशिश हो रही है कि यह चहल पहल वाले व्यापारिक केंद्र को अचानक उजाड़ हो जाने की वजह दरअसल क्या थी।

27/08/2022

इस ग्रह के पास दो सूर्य और एक बहुत ही गहरा समुद्र भी है

1. हमारी धरती से करीब एक सौ प्रकाश वर्ष दूर है
2. टेस सैटेलाइट ने पहली बार इसे देखा है
3. वजन में पृथ्वी से पांच गुणा अधिक है
4. दो सूर्यों की परिक्रमा अलग अलग है
राष्ट्रीय खबर
रांचीः पृथ्वी के जैसे ग्रहों की तलाश लंबे समय से जारी है। इस क्रम में कई ऐसे ग्रहों का पता भी चला है जहां के मौसम के बारे में अनुमान है कि वे पृथ्वी के जैसे ही हो सकते हैं। लेकिन यह सिर्फ वैज्ञानिक आकलन भर है।
अब तक का खगोल विज्ञान इतना विकसित नहीं हुआ है कि वहां तक कोई अंतरिक्ष यान भेजकर उसकी वास्तविक जांच कर सके। इसके बाद भी पृथ्वी के जैसे ग्रहों को खोजने का क्रम जारी है और उसके साथ ही यह सिलसिला भी जारी है कि क्या धरती के बाहर भी कहीं किसी रुप में कोई और जीवन मौजूद है। इस कड़ी में एक और पृथ्वी के जैसे ग्रह का पता चला है। आकार में यह शायद पृथ्वी से बड़ा है। प्रारंभिक अनुमान के मुताबिक इस ग्रह के दो दो सूर्य हैं और उसके पास एक बहुत ही गहरा समुद्र भी है।
यहां से करीब एक सौ प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित इस ग्रह का नाम टीओआई-1452 बी रखा गया है। यह ग्रह एक साथ दो तारों का चक्कर लगा रहा है। यह शायद धऱती से सत्तर प्रतिशत अधिक बड़ा है। इसका पता चलने के बाद अब खगोल दूरबीनों के सहारे इस पर और अनुसंधान किया जा रहा है। इसके दो सूरज होने की वजह से भी वैज्ञानिकों की उत्सुकता बढ़ी है। हमारी धरती सिर्फ एक ही सूर्य के चक्कर लगाती है। इसलिए सूर्य के मामले में यह हमारी धरती से थोड़ा भिन्न है। यूनिवर्सिटी ऑफ मॉंट्रियल के शोध दल ने कहा कि अभी पक्के तौर पर यह नहीं माना जा सकता है कि वहां का समुद्र बहुत ही गहरा है लेकिन वहां के बाकी आंकड़े वहां पानी मौजूद होने का संकेत देते हैं और वजन में पृथ्वी से पांच गुणा अधिक भारी होने की वजह से ही उसमें ढेर सारा पानी होने का यह अनुमान लगाया गया है।
इस बारे में नासा द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया है कि कई अन्य ग्रहों पर भी पानी मौजूद होने की जानकारी मिली है जो दूसरे स्वरुप में है। यहां तक कि चांद की गहराई में भी बर्फ के रूप में पानी है। यह ग्रह अपने एक तारे का चक्कर मात्र ग्यारह दिनों में लगाता है। यानी धरती के नियमों के मुताबिक वहां का एक साल मात्र 11 दिन का होता है। यह ग्रह जिस तारे का चक्कर ग्यारह दिन में लगाता है उसकी गर्मी सूर्य से कम है और उस तारा से जो ताप इस ग्रह तक पहुंचता है, वह शायद हमारे सूर्य से शुक्र ग्रह तक पहुंचने वाले ताप के बराबर हो सकता है। इसलिए वहां पानी अगर रहा था तो अब भी मौजूद है।
मजेदार बात यह है कि यह ग्रह जिस दूसरे तारे का चक्कर लगाता है वह चक्कर चौदह सौ वर्षों में पूरा होता है। इसलिए यह भी माना जा रहा है कि यह शायद एक बड़ा पत्थऱ जैसा हो, जिसमें कोई वायुमंडल ही नहीं हो अथवा यह पत्थरों का खंड हो जो हाईड्रोजन और हिलियम गैस से भरा हो। टेस सर्वे सैटेलाइट से मिले आंकड़ों के बाद धरती पर स्थापित वेधशालाओं से उसे देखा गया है। अब उम्मीद की जा रही है कि जेम्स वेब टेलीस्कोप से इसके बारे में और अधिक जानकारी मिल सकेगी।

26/08/2022

भीषण सूखे की चपेट में चीन के कारखाने बंद और लोडशेडिंग जारी

बीजिंगः चीन के कुछ इलाकों में भीषण गर्मी पड़ रही है, यह अब पुरानी बात है। अब जो कुछ पानी वहां के जलागारों में बचा है, उसे बचाये रखने के लिए जलविद्युत केंद्र बंद कर दिये गये हैं। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि लोगों को कमसे कम पीने का पानी उपलब्ध कराया जा सके। अब बिजली उत्पादन बंद होने की वजह से हजारों कारखानों को भी बंद करना पड़ा है क्योंकि उनमें उत्पादन करने के लिए बिजली ही उपलब्ध नहीं है। कोरोना वायरस के लॉकडाउन के बाद यह चीन के कई इलाकों के लिए अब सबसे बड़ा संकट लेकर सामने आ गया है। फिलहाल वहां गर्मी से मुक्ति अथवा बारिश की कोई उम्मीद नहीं है। इससे पहले वहां कृत्रिम बारिश कराने की भी कोशिश हुई थी लेकिन बादल बहुत कम होने की वजह से यह प्रयोग असफल साबित हुआ है। इससे चीन की अर्थव्यवस्था पर फिर से चोट पहुंच रहा है क्योंकि उसकी उत्पादकता तेजी से घटती जा रही है। यहां के शिचुआन प्रारंत में सबसे अधिक औद्योगिक गतिविधियां होती हैं। अब यह प्रांत पूर तरह सूखे की चपेट में है। अब वहां के डैमों में जो थोड़ा पानी बचा है, उसे लोगों के पीने के लिए सुरक्षित रखा गया है। इसी वजह से अनेक जलविद्युत केंद्र बंद होने की वजह से अब सभी इलाकों में लगातार लोडशेडिंग की जा रही है। इसका असर चीन के सबसे बड़े व्यापारिक शहर शंघाई तक पहुंच रहा है। नदियों के लगातार सूखते चले जाने की वजह से डैमों में पानी की आमद भी तेजी से कम हो रही है जबकि तेज गर्मी की वजह से हर स्थान पर पानी तेजी से भाप बन रहा है। शिचुआन के अलावा चोंगक्विंग और हुबेई प्रांत तक इसका असर हो रहा है। चीन के इस इलाके की सबसे प्रमुख नदी यांग्टेज में कम बारिश की वजह से 45 प्रतिशत कम पानी एकत्रित हुआ था। अब अगले एक सप्ताह तक यही स्थिति कायम रहने की आशंका है। इस बीच सरकार की तरफ से बताया गया है कि वहां की 66 नदियां पूरी तरह सूख चुकी है। अब जिन नदियों से नौ परिवहन होता था, वह भी कम पानी की वजह से बंद करना पड़ा है। उम्मीद की गयी है कि एक सप्ताह के भीतर बारिश होने के बाद ही स्थिति में कुछ सुधार संभव है।

25/08/2022

कृत्रिम मानव भ्रूण तैयार करने की तैयारी में हैं इजरायल के वैज्ञानिक

1. अंग प्रत्यारोपण के लिए नया अंग उगाना है मकसद
2. चूहों पर किया प्रयोग सफल रहा है
3. डीएनए की मदद से विकसित होगा
4. सिर्फ अंग तैयार करने के लिए प्रयोग
राष्ट्रीय खबर
रांचीः इजरायल की एक बॉयोटेक फर्म अब इंसानी डीएनए की मदद से कृत्रिम भ्रूण तैयार करना चाहती है।
कंपनी की तरफ से साफ किया गया है कि इनका उपयोग दरअसल चिकित्सा शास्त्र में विधिसम्मत अंग प्रत्यारोपण के लिए किया जाएगा। इसके जरिए कृत्रिम मानव पैदा करने की कंपनी की कोई योजना नहीं है। चूहों के कृत्रिम भ्रूण तैयार करने में मिली सफलता के बाद अब इसे आजमाया जाने वाला है। इस कंपनी का नाम रिन्यूअल बॉयो है जो अपनी जेनेटिक तकनीक की विशेषज्ञता से उनलोगों को मदद पहुंचाना चाहती है जो किसी न किसी वजह से किसी आंतरिक अंग की खराबी की वजह से परेशान है। ऐसे अंगों को नये अंग से बदल देने के बाद ऐसे मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद है। वैसे किसी भी बाहरी अंग को इंसानी शरीर की आतंरिक व्यवस्था सहज स्वीकार नहीं करती। इसलिए उसके लिए अलग से व्यवस्था का जरूरत पड़ती है ताकि प्रत्यारोपित अंगों क इंसानी शरीर अस्वीकार ना कर दे।
वैसे कंपनी का यह एलान होते ही दुनिया भर के वैज्ञानिक समुदाय में एक बहस छिड़ गयी है। अनेक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में कृत्रिम इंसानी भ्रूण तैयार करने की इस योजना का विरोध कर रहे हैं और यह कह रहे हैं कि इसके सफल होने के बाद अगले चरण में लोग कृत्रिम इंसान भी बनाने की दिशा में काम कर सकते हैं। ऐसा प्रयोग न तो नैतिक होगा और न ही प्राकृतिक संरचना के अनुकूल होगा। इसके भीषण परिणाम भी हो सकते हैं। चूहों पर ऐसा प्रयोग सफल होने के बाद अब इजरायल की यह कंपनी इंसानी स्टेम सेल की मदद से इंसानी भ्रूण प्रयोगशाला में तैयार करने की बात कह रही है। इससे पहले वेइजमैन जेनेटिक्स विभाग के वैज्ञानिकों ने चूहों पर यह प्रयोग किया था। बिना किसी गर्भाशय के इन चूहों के भ्रूणों को प्रयोगशाला में तैयार किया गया था। जिसके लिए वहां गर्भाशय जैसा माहौल बनाकर स्टेम सेलों को विकसित किया गया था। यह प्रयोग पूरी तरह सफल रहा। वैसे वैज्ञानिकों ने इन भ्रूणों से पूरा चूहा नहीं बनाया और बीच में ही यह प्रक्रिया रोक दी क्योंकि ऐसा पहले से ही तय था।
प्रयोग को बीच में ही छोड़ने के बाद भी इस शोध दल के प्रमुख जैकब हान्ना ने कहा कि चूहों के भ्रूणों में दिल धड़कने लगा था, खून का संचालन सही हो रहा था और दिमाग के विकास की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी थी। साथ ही इनमें आंत की श्रृंखला भी बनने लगी थी। अब चूहों पर यह प्रयोग सफल होने के बाद वैज्ञानिक इंसानी डीएनए पर भी यह जेनेटिक अनुसंधान करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि भ्रूण ही सबसे कारगर अंग विकसित करने वाली मशीन और थ्री डी प्रिंटर भी है। रिन्युअब बॉयो ने कहा है कि पहले भी कई अनुसंधान इस दिशा में हो चुके हैं। एमआईटी के शोध दल ने पाया है कि ऐसे भ्रूण से जो रक्त कोष पैदा होता है वह कई बीमारियों का ईलाज भी कर सकता है। अभी दुनिया में बहुत तेजी से लोगों के उम्र दराज होने तथा जन्मदर की कमी के बाद ऐसा करना समय की मांग है। जो लोग अपने शरीर के आंतरिक अंगों की खराबी की वजह से परेशान है, उन्हें यह तकनीक नये इंसानी अंग देकर बेहतर जीवन प्रदान कर सकती है। कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ओमरी एमिराव ड्रोरी ने कहा कि हम दुनिया को डराना नहीं चाहते हैं। हम सिर्फ एक कोशिश कर रहे हैं, जो अगर सफल रहा तो आने वाले दिनों में मानवजाति को इससे फायदा ही होगा।

23/08/2022

विलुप्त हो चुके तासमानियान टाईगर को पुनर्जीवित करना है

1. साल 1930 में अंतिम बार दिखा था
2. कुत्ते जैसा आकार लेकिन बाघ जैसी धारियां
3. जेनेटिक तकनीक से सब कुछ एक एक कर होगा
राष्ट्रीय खबर
रांचीः इस बार यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबोर्न के शोधकर्ताओं ने अपनी नई परियोजना की जानकारी देकर वैज्ञानिकों को चौंका दिया है। उनलोगों ने धरती से विलुप्त हो चुकी एक प्रजाति को फिर से पैदा करने की योजना पर काम करना प्रारंभ किया है।

तासमानियान टाईगर की प्रजाति इस धरती से करीब एक सौ वर्ष पूर्व ही पूरी तरह विलुप्त हो चुकी है। अब जेनेटिक विज्ञान की मदद से उसे फिर से धरती पर जीवित करने की तैयारी चल रही है। इस जीव को अंतिम बार वर्ष 1930 में जीवित अवस्था में देखा गया था। उसके बाद से दुनिया के किसी भी इलाके में इस प्राणी को नहीं देखा गया है। यह जीव मूल रूप से ऑस्ट्रेलिया के तासमानिया इलाके का था। इसी कारण उसका ऐसा नामकरण भी हुआ है। इस काम को करने के लिए इस विश्वविद्यालय के एक खास रिसर्च लैब ने एक जेनेटिक इंजीनियरिंग की कंपनी के साथ तालमेल किया है।
इस विश्वविद्यालय को इसी वर्ष पांच मिलियन डॉलर का दान मिला है। इसी पैसे से इस परियोजना को अमल में लाया जा रहा है। इससे जुड़े लोगों को उम्मीद है कि यह प्रयोग सफल होने के बाद धरती से विलुप्त हो चुके अन्य वैसे प्राणियों को भी फिर से जीवित किया जा सकेगा, जिसके डीएनए नमूने उपलब्ध होंगे। इस काम में टेक्सास की एक कंपनी कोलोसाल बॉयोसाइंस उनकी मदद करेगी। यह कंपनी पहले से ही प्राचीन वूली मैमोथ को बदले हुए स्वरुप में लाने की योजना पर काम कर रही है। इसके लिए भी वूली मैमोथ के प्राचीन अवशेषों से प्राप्त डीएनए के आधार पर काम चल रहा है। सुनने में बहुत आसान लगने के बाद भी यह काम दरअसल बहुत पेचिदा है और फिलहाल इसके पूरी तरह सफल होने की कोई गारंटी भी नहीं है। यह प्रक्रिया इसलिए आजमायी जा रही है क्योंकि अब वैज्ञानिकों के पास जीन एडिटिंग की तकनीक है।
विश्वविद्यालय के प्रोफसर एंड्र्यू पास्क ने बताया कि इस परियोजना पर वैज्ञानिकों की एक बहुत बड़ी टीम काम कर रही है। प्रोफसर पास्क इस दल के नेता है। इस काम को अंजाम देने के लिए स्टेम सेल तैयार करने के बाद भ्रूण बनाना और उसे जीवित करने के लिए कृत्रिम गर्भाशय तैयार करना कोई आसान काम नहीं है। अलग अलग दलों को इसकी अलग अलग जिम्मेदारी दी गयी है। वैसे शोधदल को उम्मीद है कि क्रमवार तरीके से यह काम अगर सही ढंग से चला तो अगले दस वर्षों में इसे सफलता मिल जाएगी। इस तासमानियान टाईगर के पैदा होने के बाद भी उसकी निगरानी होगी। उसे ऑस्ट्रेलिया में भी बहुत बड़े खुले पिंजरे में रखा जाएगा क्योंकि वहां का वातावरण स्वाभाविक तौर पर उसके अनुकूल होगी। इसके जरिए यह देखा जाएगा कि वह अपने प्राकृतिक माहौल में सही तरीके से रच बस जाए। विलुप्त् हो चुके प्राणी के अवशेष से जो कुछ मिल सकता है, उसके आधार पर ही इस काम को आगे बढ़ाया जाएगा। सब कुछ अगर सही रहा तो बाद में कृत्रिम तरीके से पैदा इस जानवर तथा उस प्रजाति के कुछ और जानवरों को जंगल में छोड़ दिया जाएगा ताकि वे स्वतंत्र रुप से जीवित रह सकें।
इस प्राणी की कुत्ते जैसी आकृति होने के बाद भी उसकी पीठ पर बाघ जैसी धारियां होती हैं। इसी वजह से उसे टाईगर का नाम मिला है। मवेशियों पर हमला करने की वजह से ही इंसानों ने उनका काफी शिकार किया। नतीजा हुआ है यह प्राणी ही धरती से विलुप्त हो गया। इस बारे में ऑस्ट्रेलियन सेंटर फॉर एनिशियेंट डीएनए के एसोसियेट प्रोफसर जेरेमी ऑस्टिन ने कहा कि यह सुनने में तो किसी परिकथा के जैसा लगता है लेकिन विज्ञान के पास ऐसी परियोजनाओं के अलावा भी विश्व कल्याण के लिए बहुत कुछ करने लायक है।

13/07/2022

श्रीलंका के राष्ट्रपति आवास की अलमारी में था सुरंग का दरवाजा

कोलंबोः श्रीलंका के राष्ट्रपति आवास के तमाम गोपनीय तथ्य अब सार्वजनिक होने लगे हैं। वहां से मिले लाखों रुपयों की गिनती भी हो चुकी है। दूसरी तरफ राष्ट्रपति आवास यानी टेंपल ट्री में आंदोलनकारियों ने भोजन भी पकाया है। पूरे राष्ट्रपति भवन की जांच करने के क्रम में लोगों ने पाया है कि एक कमरे में बनी आलमारी के अंदर ही गुप्त सुरंग का रास्ता था। बाहर से देखने पर यह अलमारी का पल्ला ही दिखता है। जब इसे खोला गया तो लोगों ने देखा कि वहां से सीढ़ियां नीचे गयी है। इस सीढ़ी से नीचे उतरने वालों ने नीचे एक लोहा का दरवाजा पाया था, जो बंद था। समझा जाता है कि इसी लोहे के दरवाजे के पीछे वह गुप्त सुरंग है, जिससे राष्ट्रपति चुपके से भाग निकले हैं। इस बीच श्रीलंका के स्पीकर ने अपना बयान बदलते हुए कहा है कि राष्ट्रपति अब भी देश में ही है। पूर्व में उन्होंने राष्ट्रपति के देश से चले जाने का बयान दिया था। वैसे राष्ट्रपति गोतावाया राजपक्षे के बारे में अनुमान लगाया जा रहा है कि वह नौसेना के जहाज पर हैं। राष्ट्रपति भवन से जो रुपये मिले थे, उनकी गिनती हो चुकी है। वहां से करीब एक करोड़ 78 लाख 50 हजार रुपये पाय गये हैं। पुलिस ने इसे अदालत में जमा करा दिया है। इस राष्ट्रपति भवन में पुलिस के विरोध को नजरअंदाज कर प्रवेश करने वाले आंदोलनकारियों ने वहां के बगीचे में भोजन भी पकाया है। इसके पहले स्वीमिंग पुल के भीतर भी लोगों को देखा गया था। लोगों ने कहा था कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का इस्तीफा होने तक वे यहां पर बने रहेंगे। दोनों का इस्तीफा होने के बाद लोग यहां से चले जाएंगे। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों ने इस्तीफा देने का एलान कर रखा है। समझा जाता है कि आगामी 13 जुलाई को वे पदत्याग करेंगे। इस बीच सभी राजनीतिक दल आपस में मिलकर एक काम चलाऊ सरकार के गठन के मुद्दे पर बात कर रहे हैं। इधर देश के पास विदेशी मुद्रा का भंडार ही नहीं होने की वजह से वह कुछ भी आयात नहीं कर पा रहे हैं। इससे देश में हर जरूरी सामान की जबर्दस्त किल्लत हो गयी है।

13/07/2022

जेनेटिक संशोधित विधि से गेहूं का उत्पादन होगा दोगुणा

1. भारत जैसे देश के किसानों को होगा लाभ
2. गरीब दुनिया को सस्ते दर पर भोजन मिलेगा
3. किसानों को बहुआयामी फायदा होगा इस विधि से
राष्ट्रीय खबर
रांचीः दुनिया में रोटी की समस्या को दूर करने में भी जेनेटिक विज्ञान एक कारगर हथियार बनकर उभरा है। इसके जरिए पहले भी कई किस्म के बदलाव और सुधार किये गये हैं। अब कृषि वैज्ञानिक मान रहे हैं कि गेंहू की फसल में भी अगर जेनेटिक संशोधन कर दिया जाए तो उसकी उपज अभी के मुकाबले दोगुणी हो सकती है। अगर ऐसा हुआ तो दुनिया में जहां कहीं भी भूखमरी है, वहां के लोगों को बेहतर तरीके से दो वक्त का भोजन तो मिल पायेगा। जेनेटिक्स से जुड़े कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक इसके लिए गेहूं की जिनोम श्रृंखला में आवश्यक सुधार करने होंगे। भारत जैसे कई देशों में अब गेहूं का उत्पादन किसानों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। अनेक स्तरों पर प्रयास तथा सिंचाई एवं उर्वरक के अधिक इस्तेमाल की वजह से भी खेतों की उर्वरा शक्ति कम हो गयी है। इस वजह से किसानों को कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
इन तमाम विषयों को जानने वाले कृषि वैज्ञानिक इसी सोच की वजह से अब गेंहू की जिनोम श्रृंखला में सुधार कर उसकी उपज बढ़ाने की सोच पर काम कर रहे हैं। यह भी समझा गया है कि अगर गेंहू की उपज को दोगुणा किया जा सका तो किसानों को इससे बहुआयामी लाभ होगा। इससे वे कम इलाके में इसकी खेती करेंगे तो बाकी खेतों को लगातार हो रहे दोहन से उबरने का मौका मिल जाएगा। दूसरी तरफ कम जमीन पर अधिक अनाज उगाने की लागत कम होने से किसानों की आर्थिक आमदनी भी बढ़ जाएगी। दूसरी तरफ पूरी दुनिया में जब इसका उत्पादन बहुत अधिक हो जाएगा तो गरीबों को भी यह सस्ते दर पर मिल पायेगा क्योंकि मांग और आपूर्ति की कमी बहुत कम रह जाएगी। यह जान लें कि किसी भी सामान की कीमत तभी बढ़ती है जब उसकी मांग अधिक हो और आपूर्ति कम हो। इसके अलावा सिंचाई के लिए कम पानी और कम उर्वरक की जरूरत से भी उत्पादन लागत कम हो जाएगी।
सिर्फ भारत की बात करें तो वर्ष 2021-22 में गेंहू का उत्पादन का लक्ष्य 106.41 मिलियन टन तय किया गया था। वास्तव में यह उत्पादन 3.8 मिलियन टन कम हो पाया। इसके कई कारण भी थे, जिनमें पानी की कमी एक बड़ी वजह थी। अब अगर ऐसी फसल तैयार हो जो कम पानी में भी अधिक उत्पादन दे सकें तो देश के साथ साथ पूरी दुनिया में गेंहू उत्पादन की पूरी तस्वीर ही बदल जाएगी। शोध वैज्ञानिक गेंहू के जिनोम में आवश्यक संशोधन करने की दिशा में काम कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि सैद्धांतिक तौर पर जो बातें सही लगी है, वे परीक्षण मे भी सही प्रमाणित होगी। यानी तकनीकी जांच में इस विधि को पारित कर दिये जाने के बाद शीघ्र ही पूरी दुनिया में इस विधि से गेंहू का उत्पादन होने लगेगा। अब समझा जा सकता है कि अगर एक मौसम में भारत में गेहूं का उत्पादन दो सौ मिलियन टन से ऊपर पहुंच जाए और कम जमीन पर इसकी खेती हो तो इसके कितने लाभ होंगे। किसानों को भी खाली जमीन पर दूसरा अनाज अथवा सब्जी उगान का अवसर मिलेगा। सब्जी की खेती से भी किसानो को त्वरित लाभ भी होता है। इससे देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी आमूलचूल परिवर्तन होगा।

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