12/08/2025
पटना पारस हॉस्पिटल गोलीकांड: तौसीफ बादशाह के उभार और बिहार में अपराधियों की नई पौध
पिछले दिनों पटना के पारस अस्पताल में हुई नृशंस हत्या के मामले में वीडियो फुटेज से सामने आया चेहरा- तौसीफ बादशाह, अब पूरे सोशल मीडिया पर चर्चाओं का केंद्र बन गया है। जिस तरह 90 के दशक में उत्तर प्रदेश के कुख्यात गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ल का नाम अचानक सुर्खियों में आया था, वैसे ही आज तौसीफ बादशाह का नाम अपराध की दुनिया में तेजी से फैल रहा है। सोशल मीडिया पर उसके समर्थक उसे बादशाह और रियल हीरो जैसे नामों से संबोधित कर रहे हैं, उसका महिमामंडन कर रहे हैं, जैसे कभी श्रीप्रकाश शुक्ल को किया जाता था।
तौसीफ बादशाह का आपराधिक सफर और परिवार
तौसीफ बादशाह बिहार के शेखपुरा जिले का निवासी बताया जाता है। उसके खिलाफ हत्या, फिरौती, रंगदारी से लेकर आर्म्स एक्ट के कई मामले दर्ज हैं। उसका गैंग पश्चिम व मध्य बिहार के कई जिलों में सक्रिय है। तौसीफ की गिनती उभरते हुए खूंखार अपराधियों में हो रही है, जिसका नेटवर्क फेसबुक, व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म्स के जरिए बिहार-बिहार के युवाओं में फैलता जा रहा है।
कहा जाता है कि तौसीफ का परिवार भी अपराध से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा रहा है। उसके चाचा और पिता पर भी कई आपराधिक आरोप हैं। तौसीफ की गैंग ने हाल के वर्षों में जमीन कब्जा, ठेकेदारी विवाद, एवं सुपारी किलिंग जैसे मामलों में शामिल होकर अपना दबदबा बढ़ाया है। इसके साथ ही उसका नाम पटना से लेकर शेखपुरा, नालंदा, जहानाबाद, और नवादा तक फैले कई गैंगवार में भी सामने आ चुका है। स्थानीय पुलिस के लिए ये गैंग बड़ा सिरदर्द बनते जा रहे हैं क्योंकि इन्हें राजनीतिक संरक्षण के आरोप भी लगते रहे हैं।
तात्कालिक घटना में तौसीफ बादशाह पुलिस और अस्पताल की सख्त सुरक्षा को धता बताते हुए खुलेआम कैद हुआ। खास बात यह रही कि घटना के वक्त उसने अपना चेहरा नहीं ढंका, न ही किसी डर या घबराहट के लक्षण दिखाए। इससे साफ पता चलता है कि घटना पूरी तरह मैनेज्ड थी और अपराधियों को पूरा भरोसा था कि उन पर कोई आँच नहीं आएगी।
बिहार में ऐसी घटनाएं सिर्फ अपराध की बर्बरता नहीं, बल्कि अपराधियों के बढ़ते आत्मविश्वास और मैनेजमेंट की पोल खोलती हैं। सोशल मीडिया पर अपराधियों के पोस्टर, स्टोरी और वीडियो तेजी से वायरल होते हैं, जिससे अपराध और गैंग कल्चर का ग्लैमराइज़ेशन होता दिख रहा है। 90 के दशक में जैसे श्रीप्रकाश शुक्ल की बहसों के केंद्र में वेब सीरीज रंगबाज बनी, आज वही कहानी तौसीफ और उसके गिरोह के साथ दोहराई जा रही है जिसमें लोगों का ध्यान अपराध से ज्यादा उसकी मर्दानगी और रुतबा पर केंद्रित हो रहा है।
सबसे बड़ा सवाल पुलिस के मैनेजर तक पहुंचने का है। अपराध के बाद वीडियो में साफ दिखा कि किस तरह तौसीफ और उसके सहयोगी बेखौफ होकर वारदात को अंजाम देते हैं और चलते बनते हैं। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि किन-किन साजिशकर्ताओं और मैनेजरों की मदद से इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिया गया। फिलहाल पुलिस के लिए सबसे जरूरी चुनौती है कहां और कैसे तौसीफ को संरक्षण और सुविधा मिलती है, और उसका नेटवर्क किन-किन प्रशासनिक या राजनीतिक आकाओं तक फैला है?
तौसीफ बादशाह जैसे अपराधियों के ग्लैमराईजेशन का युवा समाज पर बुरा असर पड़ रहा है। बेहतरीन संवाद, सोशल मीडिया शौर्य, और गैंगस्टर कंटेंट का आकर्षण बिहार के कई नौजवानों को अपराध की ओर प्रेरित कर रहा है। कानून की पकड़ को खुलेआम चुनौती मिल रही है, और अपराधी अब सिर्फ दबे-छुपे नहीं, बल्कि खुलेआम अपनी मौजूदगी दर्ज करवा रहे हैं।
बिहार के लिए तौसीफ बादशाह और उसकी गैंग का उभार गंभीर चिंता का विषय है। पुलिस प्रशासन और सरकार के सामने अब चुनौती है। मात्र अपराधियों को पकड़ना ही नहीं, बल्कि अपराध के महिमामंडन और उसकी संस्कृति को भी खत्म करना। चूंकि अपराधियों की मैनेजमेंट ताकत हर जगह दिख रही है, यह देखना होगा कि पुलिस आखिर इन प्रबंधन कर्ताओं पर कब तक शिकंजा कसती है। वरना सोशल मीडिया पर नए तौसीफ बादशाह आते रहेंगे और समाज में अपराध का खूंखार चेहरा बनता रहेगा।