30/07/2026
संघर्ष से शिखर तक: छात्र राजनीति से मुख्यमंत्री बनने तक डॉ. मोहन यादव की प्रेरक राजनीतिक यात्रा
2003 में टिकट मिला, अपनों के विरोध में कट गया... 10 वर्षों तक किया इंतजार, फिर जनता के विश्वास ने बनाया विधायक और आज संभाल रहे हैं मध्य प्रदेश की कमान
ABVP के छात्र नेता से मुख्यमंत्री तक का सफर, संघर्ष, संगठन और धैर्य की मिसाल
विशेष रिपोर्ट : शिवेंद्र तिवारी
भोपाल। राजनीति में सफलता केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य से न डिगने का नाम है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की राजनीतिक यात्रा इसी का जीवंत उदाहरण है। छात्र राजनीति से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले डॉ. यादव ने संगठन में वर्षों तक काम किया, टिकट कटने जैसी बड़ी राजनीतिक निराशा झेली, लेकिन हार नहीं मानी। संघर्ष जारी रखा और अंततः प्रदेश के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक पहुंचे।
आज वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे तीन दशक से अधिक का संगठनात्मक अनुभव, छात्र आंदोलनों का नेतृत्व, राजनीतिक धैर्य और जनता के बीच लगातार सक्रिय रहने का इतिहास जुड़ा है।
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छात्र राजनीति ने गढ़ा नेतृत्व का व्यक्तित्व
डॉ. मोहन यादव का राजनीतिक जीवन उज्जैन के छात्र आंदोलनों से शुरू हुआ। उच्च शिक्षा के दौरान वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े और छात्र हितों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाई। संगठन ने उन्हें नेतृत्व, अनुशासन, संवाद और संघर्ष की सीख दी। विश्वविद्यालय परिसर में उनकी पहचान एक सक्रिय छात्र नेता के रूप में बनने लगी।
ABVP में विभिन्न दायित्व निभाने के बाद वे भारतीय जनता युवा मोर्चा और भाजपा संगठन में सक्रिय हुए। संगठन ने उन्हें लगातार जिम्मेदारियां दीं और वे धीरे-धीरे प्रदेश भाजपा के प्रभावशाली नेताओं में शामिल होने लगे।
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2003 : जब टिकट मिलने के बाद भी बदल गया फैसला
वर्ष 2003 का विधानसभा चुनाव डॉ. मोहन यादव के राजनीतिक जीवन का सबसे चुनौतीपूर्ण अध्याय माना जाता है।
भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें उज्जैन की एक विधानसभा सीट से उम्मीदवार घोषित किया। लेकिन टिकट की घोषणा के बाद तत्कालीन विधायक शांतिलाल धाबई सहित पार्टी के भीतर विरोध शुरू हो गया। संगठन में बढ़ते असंतोष और चुनावी समीकरणों के बीच भाजपा नेतृत्व ने अंतिम समय में अपना फैसला बदल दिया।
घोषित प्रत्याशी होने के बावजूद डॉ. मोहन यादव का टिकट वापस ले लिया गया और शांतिलाल धाबई को चुनाव मैदान में उतार दिया गया।
राजनीतिक गलियारों में यह घटना लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रही।
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न नाराजगी... न बगावत, संगठन पर रखा भरोसा
अक्सर टिकट कटने के बाद नेताओं द्वारा पार्टी छोड़ने, बगावत करने या निर्दलीय चुनाव लड़ने की घटनाएं सामने आती हैं, लेकिन डॉ. मोहन यादव ने ऐसा कोई रास्ता नहीं चुना।
उन्होंने संगठन के निर्णय को स्वीकार किया और पहले की तरह कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय बने रहे। न कोई सार्वजनिक बयान, न कोई विरोध प्रदर्शन और न ही किसी प्रकार का राजनीतिक दबाव। उन्होंने संगठन को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया।
यही राजनीतिक परिपक्वता आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पूंजी साबित हुई।
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दस वर्षों का लंबा इंतजार और पहली जीत
करीब दस वर्षों तक संगठन में लगातार सक्रिय रहने के बाद वर्ष 2013 में भाजपा ने उन्हें उज्जैन दक्षिण विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया।
इस बार जनता ने उन पर विश्वास जताया और उन्होंने शानदार जीत दर्ज कर पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया।
यह जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं थी, बल्कि वर्षों के संघर्ष, धैर्य और संगठन के प्रति निष्ठा का प्रतिफल भी थी।
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लगातार बढ़ता गया राजनीतिक कद
पहली जीत के बाद डॉ. मोहन यादव ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
उन्होंने 2018 और 2023 के विधानसभा चुनावों में भी जीत दर्ज की। प्रदेश सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य करते हुए शिक्षा सुधार, विश्वविद्यालयों के विस्तार और नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में सक्रिय भूमिका निभाई।
उनकी संगठनात्मक क्षमता, प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक स्वीकार्यता को देखते हुए वर्ष 2023 में भाजपा विधायक दल ने उन्हें अपना नेता चुना और वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
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संगठन बना सबसे बड़ी ताकत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डॉ. मोहन यादव की सबसे बड़ी शक्ति उनका संगठनात्मक अनुभव रहा है। छात्र राजनीति से लेकर भाजपा संगठन तक उन्होंने हर स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ काम किया। यही कारण रहा कि टिकट कटने जैसी घटना भी उनके राजनीतिक सफर को रोक नहीं सकी।
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युवाओं के लिए प्रेरणा
डॉ. मोहन यादव की यात्रा युवाओं को यह संदेश देती है कि राजनीति में सफलता केवल पद प्राप्त करने से नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, अनुशासन, धैर्य और संगठन के प्रति समर्पण से मिलती है। छात्र राजनीति यदि सकारात्मक नेतृत्व और जनसेवा की भावना के साथ की जाए तो वही सफर मुख्यमंत्री पद तक भी पहुंचा सकता है।
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राजनीतिक सफर : एक नजर में
● छात्र जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से सक्रिय शुरुआत।
● छात्र आंदोलनों से भाजपा संगठन तक मजबूत पहचान।
● 2003 में विधानसभा टिकट मिला, लेकिन विरोध के चलते वापस लिया गया।
● संगठन नहीं छोड़ा, लगातार कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय रहे।
● 2013 में उज्जैन दक्षिण से पहली बार विधायक बने।
● 2018 और 2023 में दोबारा विधायक निर्वाचित हुए।
● उच्च शिक्षा मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।
● वर्ष 2023 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
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"संघर्ष, संगठन और धैर्य—यही डॉ. मोहन यादव की राजनीतिक यात्रा की सबसे बड़ी पहचान है।"
✍️ विशेष रिपोर्ट : शिवेंद्र तिवारी
विंध्य भारत दैनिक समाचार