03/06/2026
कब तक जलती रहेंगी ज़िंदगियाँ और हम सिर्फ संवेदनाएँ व्यक्त करते रहेंगे?
आज दिल्ली के मालवीय नगर स्थित Flourish Stay B&B में हुए भीषण अग्निकांड की खबर पढ़ी। 21 लोगों की मौत हो गई। दर्जनों लोग घायल हुए। कई लोग अपनी जान बचाने के लिए खिड़कियों से कूद गए। कुछ अपने परिवारों से आखिरी बार बात भी नहीं कर पाए।
खबर पढ़ते-पढ़ते मन अचानक उन चेहरों के बारे में सोचने लगा, जो कल तक जिंदा थे, सपने देख रहे थे, अपने घर लौटने की तैयारी कर रहे थे। किसी मां का बेटा, किसी बच्चे का पिता, किसी पत्नी का जीवनसाथी... कुछ ही मिनटों में सब कुछ खत्म हो गया।
लेकिन सच कहूं तो यह सिर्फ दिल्ली की कहानी नहीं है।
अभी कुछ ही दिन पहले मध्य प्रदेश के सीधी जिले में तीन मासूम भाई-बहन आग की भेंट चढ़ गए। वे बच्चे, जिनकी आंखों में भविष्य के सपने थे, जिनके जीवन की शुरुआत भी ठीक से नहीं हुई थी, वे जिंदा जल गए।
फिर दिल्ली में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रतिष्ठित संस्थान School of Planning and Architecture (SPA) के भवन में आग लगने की खबर आई। सौभाग्य से वहां कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए।
और अब दिल्ली का यह अग्निकांड...
तीन घटनाएं...
अलग-अलग स्थान...
अलग-अलग परिस्थितियां...
लेकिन एक सवाल समान—
क्या हम हादसों के बाद जागने वाला देश बन चुके हैं?
हर बार एक जैसी कहानी सामने आती है।
पहले आग लगती है।
फिर चीखें सुनाई देती हैं।
फिर मौतें होती हैं।
फिर प्रशासन सक्रिय होता है।
फिर जांच के आदेश दिए जाते हैं।
फिर मुआवजे की घोषणा होती है।
और कुछ दिनों बाद सब कुछ भुला दिया जाता है।
लेकिन जिन परिवारों ने अपने लोगों को खोया है, उनके लिए यह घटनाएं कभी पुरानी नहीं होतीं।
मैं सरकार से राजनीति नहीं, जवाबदेही मांगना चाहता हूं।
अगर सुरक्षा नियम मौजूद हैं, तो उनका पालन क्यों नहीं होता?
अगर निरीक्षण होते हैं, तो खामियां समय रहते क्यों नहीं पकड़ी जातीं?
अगर व्यवस्थाएं मजबूत हैं, तो बार-बार ऐसी त्रासदियां क्यों सामने आती हैं?
क्या नागरिकों की सुरक्षा केवल भाषणों और सरकारी दस्तावेजों तक सीमित रह गई है?
एक लोकतंत्र में सरकार का सबसे पहला दायित्व नागरिकों की सुरक्षा है। विकास, निवेश, नई योजनाएं और बड़े-बड़े दावे अपनी जगह हैं, लेकिन यदि लोग अपने घर, होटल, स्कूल, अस्पताल और सार्वजनिक भवनों में ही सुरक्षित नहीं हैं, तो विकास का अर्थ अधूरा रह जाता है।
आज दिल्ली में 21 लोग मारे गए हैं।
सीधी में तीन मासूम बच्चे मारे गए।
कल शायद किसी और शहर से ऐसी ही खबर आए।
और तब फिर हम दो मिनट का मौन रखेंगे, श्रद्धांजलि देंगे, सोशल मीडिया पर दुख व्यक्त करेंगे और आगे बढ़ जाएंगे।
लेकिन क्या कभी ऐसा दिन आएगा जब किसी हादसे के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले व्यवस्था जागेगी?
क्या कभी ऐसा होगा कि सुरक्षा नियम सिर्फ कागजों पर नहीं, जमीन पर भी दिखाई दें?
क्या कभी किसी मां को अपने बच्चे की जली हुई लाश की पहचान नहीं करनी पड़ेगी?
यही सवाल आज मेरे मन में है।
क्योंकि हादसे अचानक होते हैं, लेकिन उनकी पृष्ठभूमि अक्सर वर्षों की लापरवाही, अनदेखी और जवाबदेही की कमी से तैयार होती है।
आज दिल्ली के उन 21 लोगों को याद कीजिए।
सीधी के उन तीन मासूम बच्चों को याद कीजिए।
और फिर खुद से पूछिए—
क्या उनकी मौत सिर्फ एक दुर्घटना थी, या हमारी व्यवस्था के लिए एक चेतावनी?
अगर यह चेतावनी भी अनसुनी रह गई, तो आने वाले दिनों में शायद हम फिर किसी नई त्रासदी पर शोक व्यक्त कर रहे होंगे।
और तब सबसे बड़ा सवाल यही होगा—
आखिर हम हर हादसे के बाद दुखी तो होते हैं, लेकिन उससे पहले जागते क्यों नहीं?
✍️ रविकांत पटेल
मेरी कलम से...