Trisangam Public School Rewalsar

Trisangam Public School Rewalsar The Centre of Real Education

25/08/2026
24/08/2026

असली शिक्षा सुविधाओं के ढेर में नहीं, बल्कि इस बात में निहित है कि स्कूल बच्चे के भीतर जिज्ञासा, अनुशासन और संवेदना को कितना जगा पाता है। एक बेहतरीन शिक्षक पेड़ की छाँव के नीचे भी उत्कृष्ट शिक्षा दे सकता है, जबकि बिना मार्गदर्शन के एक हाई-टेक क्लासरूम भी केवल एक बंद कमरा बनकर रह जाता है।

24/08/2026

सच्ची शिक्षा उस लौ के समान होती है जो मुक की भाषा बन जाती है, मूढ़ के चित का आवरण खोल देती है, अक्षम की आत्मशक्ति जगा देती है और अपमानित को सम्मानित कर देती है।

हुनर की कद्र हर दौर में होती आई है,सच्चे ज्ञान ने ही दुनिया में पहचान बनाई है।हवाओं के भरोसे मत उड़, परिंदे भी परों से उ...
23/08/2026

हुनर की कद्र हर दौर में होती आई है,
सच्चे ज्ञान ने ही दुनिया में पहचान बनाई है।
हवाओं के भरोसे मत उड़, परिंदे भी परों से उड़ते हैं,
तू ज्ञान का दीप जला, रोशनी से ही रास्ते बनते हैं।
भाव: "शिक्षा का असली मकसद केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि चरित्र और सोच को समृद्ध बनाना है।"

मंज़िल से आगे बढ़ कर मंज़िल तलाश कर,मिल जाए तुझ को दरिया तो समंदर तलाश कर।हर शीशा टूट जाता है पत्थर की चोट से,पत्थर ही ट...
23/08/2026

मंज़िल से आगे बढ़ कर मंज़िल तलाश कर,
मिल जाए तुझ को दरिया तो समंदर तलाश कर।
हर शीशा टूट जाता है पत्थर की चोट से,
पत्थर ही टूट जाए वो शीशा तलाश कर।

23/08/2026

जब छात्रों के लिए प्रकृति के निकट संपर्क में रहना अनिवार्य बनाया जाए। वे प्रतिदिन ऐसे वातावरण में पलें-बसें जहाँ सभी जीवों की सेवा की जाती हो, पेड़ों का पालन-पोषण होता हो, चिड़ियों और जानवरों को खाना दिया जाता हो, और जहाँ वे पृथ्वी, जल और वायु के अकूत रहस्यों को महसूस करना सीख सकें। तो इसे वास्तविक शिक्षा और ज्ञान प्राप्ति कहा जायेगा तथा सच्ची मानवता की परिकल्पना की जा सकती है।

23/08/2026

युवा पीढी को संस्कारित करने लिए शिक्षा में भारतीय ज्ञान परम्परा का अध्ययन क्यों आवश्यक है?

युवा पीढ़ी को केवल साक्षर या व्यावसायिक रूप से दक्ष बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें 'संस्कारित' करना भी अति आवश्यक है। आधुनिक शिक्षा जहाँ हमें जीविकोपार्जन (Earning) के साधन सिखाती है, वहीं भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge Systems - IKS) हमें जीवन जीने की कला (Art of Living) सिखाती है।

शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा की आवश्यकता क्यों है?
चरित्र निर्माण एवं नैतिक मूल्य: केवल भौतिक प्रगति से समाज में अनुशासन और संवेदनशीलता नहीं आ सकती। भारतीय परंपरा ज्ञान को चरित्र और सदाचार से जोड़ती है।

आत्म-गौरव और जड़ों से जुड़ाव: जब युवा अपनी समृद्ध विरासत, विज्ञान, दर्शन और कला को समझेंगे, तो उनमें हीनभावना (Inferiority Complex) समाप्त होगी और अपनी संस्कृति के प्रति स्वाभिमान जागेगा।

समग्र कल्याण (Holistic Well-being): भारतीय चिंतन "वसुधैव कुटुम्बकम्" (समस्त संसार एक परिवार है) और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली पर बल देता है, जो युवाओं को स्वार्थ से ऊपर उठाकर समाज और प्रकृति से जोड़ता है।

शास्त्रोक्त श्लोक एवं दोहे
भारतीय साहित्य में शिक्षा, विद्या और चरित्र-निर्माण के महत्व को स्पष्ट करने वाले अनेक श्लोक और दोहे उपलब्ध हैं:

1. विद्या का वास्तविक उद्देश्य: चरित्र और मुक्ति
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥— (हितोपदेश)

अर्थ: विद्या विनय (नम्रता) प्रदान करती है, विनय से योग्यता आती है, योग्यता से धन मिलता है, धन से धर्म के कार्य होते हैं और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है।

सा विद्या या विमुक्तये।— (विष्णु पुराण 1.19.41)

अर्थ: वास्तविक विद्या वही है जो मनुष्य को अज्ञान, अहंकार और संकीर्णता के बंधनों से मुक्त करे।

2. केवल बौद्धिक ज्ञान बनाम व्यावहारिक आचरण
विद्याविहीनः पशुः।— (नीतिशतकम्)

अर्थ: बिना संस्कार और विवेक के मनुष्य पशु के समान होता है।

आचारः परमो धर्मः आचारः परमं तपः।
आचारः परमं ज्ञानम् आचारात् किं न साध्यते॥— (महाभारत)

अर्थ: उत्तम आचरण (संस्कार) ही परम धर्म है, परम तप है और परम ज्ञान है। सदाचार से दुनिया का कोई भी लक्ष्य साधा जा सकता है।

3. कबीर दास जी के प्रासंगिक दोहे
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥

अर्थ: केवल पुस्तकें रट लेने से कोई ज्ञानी या संस्कारित नहीं होता; जो मनुष्य प्रेम, करुणा और मानवीय मूल्यों को समझता है, वही सच्चा ज्ञानी है।

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

अर्थ: ज्ञान और गुण ही मुख्य हैं। बाहरी दिखावे की अपेक्षा आंतरिक विचारों और संस्कारों की परख होनी चाहिए।

4. संत तुलसीदास जी का विचार
दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छाड़िये, जब लग घट में प्राण॥

अर्थ: संस्कारित शिक्षा की पहली शर्त दया और करुणा है। धर्म का मूल दया है और अहंकार सभी बुराइयों की जड़ है।

निष्कर्ष: शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश युवाओं को केवल 'प्रोफेशनल' ही नहीं, बल्कि एक 'संवेदनशील एवं जिम्मेदार नागरिक' बनाता है।

23/08/2026

शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा की आवश्यकता क्यों है?
चरित्र निर्माण एवं नैतिक मूल्य: केवल भौतिक प्रगति से समाज में अनुशासन और संवेदनशीलता नहीं आ सकती। भारतीय परंपरा ज्ञान को चरित्र और सदाचार से जोड़ती है।

आत्म-गौरव और जड़ों से जुड़ाव: जब युवा अपनी समृद्ध विरासत, विज्ञान, दर्शन और कला को समझेंगे, तो उनमें हीनभावना (Inferiority Complex) समाप्त होगी और अपनी संस्कृति के प्रति स्वाभिमान जागेगा।

समग्र कल्याण (Holistic Well-being): भारतीय चिंतन "वसुधैव कुटुम्बकम्" (समस्त संसार एक परिवार है) और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली पर बल देता है, जो युवाओं को स्वार्थ से ऊपर उठाकर समाज और प्रकृति से जोड़ता है।

23/08/2026

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥ (ऋग्वेद १०.१९१.४)
अर्थ: तुम्हारे संकल्प एक समान हों, तुम्हारे हृदय समान हों और तुम्हारे मन एक समान होकर सोचें। जिससे तुम सब मिलकर एक साथ उन्नति कर सको।
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