23/08/2026
युवा पीढी को संस्कारित करने लिए शिक्षा में भारतीय ज्ञान परम्परा का अध्ययन क्यों आवश्यक है?
युवा पीढ़ी को केवल साक्षर या व्यावसायिक रूप से दक्ष बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें 'संस्कारित' करना भी अति आवश्यक है। आधुनिक शिक्षा जहाँ हमें जीविकोपार्जन (Earning) के साधन सिखाती है, वहीं भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge Systems - IKS) हमें जीवन जीने की कला (Art of Living) सिखाती है।
शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा की आवश्यकता क्यों है?
चरित्र निर्माण एवं नैतिक मूल्य: केवल भौतिक प्रगति से समाज में अनुशासन और संवेदनशीलता नहीं आ सकती। भारतीय परंपरा ज्ञान को चरित्र और सदाचार से जोड़ती है।
आत्म-गौरव और जड़ों से जुड़ाव: जब युवा अपनी समृद्ध विरासत, विज्ञान, दर्शन और कला को समझेंगे, तो उनमें हीनभावना (Inferiority Complex) समाप्त होगी और अपनी संस्कृति के प्रति स्वाभिमान जागेगा।
समग्र कल्याण (Holistic Well-being): भारतीय चिंतन "वसुधैव कुटुम्बकम्" (समस्त संसार एक परिवार है) और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली पर बल देता है, जो युवाओं को स्वार्थ से ऊपर उठाकर समाज और प्रकृति से जोड़ता है।
शास्त्रोक्त श्लोक एवं दोहे
भारतीय साहित्य में शिक्षा, विद्या और चरित्र-निर्माण के महत्व को स्पष्ट करने वाले अनेक श्लोक और दोहे उपलब्ध हैं:
1. विद्या का वास्तविक उद्देश्य: चरित्र और मुक्ति
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥— (हितोपदेश)
अर्थ: विद्या विनय (नम्रता) प्रदान करती है, विनय से योग्यता आती है, योग्यता से धन मिलता है, धन से धर्म के कार्य होते हैं और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है।
सा विद्या या विमुक्तये।— (विष्णु पुराण 1.19.41)
अर्थ: वास्तविक विद्या वही है जो मनुष्य को अज्ञान, अहंकार और संकीर्णता के बंधनों से मुक्त करे।
2. केवल बौद्धिक ज्ञान बनाम व्यावहारिक आचरण
विद्याविहीनः पशुः।— (नीतिशतकम्)
अर्थ: बिना संस्कार और विवेक के मनुष्य पशु के समान होता है।
आचारः परमो धर्मः आचारः परमं तपः।
आचारः परमं ज्ञानम् आचारात् किं न साध्यते॥— (महाभारत)
अर्थ: उत्तम आचरण (संस्कार) ही परम धर्म है, परम तप है और परम ज्ञान है। सदाचार से दुनिया का कोई भी लक्ष्य साधा जा सकता है।
3. कबीर दास जी के प्रासंगिक दोहे
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
अर्थ: केवल पुस्तकें रट लेने से कोई ज्ञानी या संस्कारित नहीं होता; जो मनुष्य प्रेम, करुणा और मानवीय मूल्यों को समझता है, वही सच्चा ज्ञानी है।
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥
अर्थ: ज्ञान और गुण ही मुख्य हैं। बाहरी दिखावे की अपेक्षा आंतरिक विचारों और संस्कारों की परख होनी चाहिए।
4. संत तुलसीदास जी का विचार
दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छाड़िये, जब लग घट में प्राण॥
अर्थ: संस्कारित शिक्षा की पहली शर्त दया और करुणा है। धर्म का मूल दया है और अहंकार सभी बुराइयों की जड़ है।
निष्कर्ष: शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश युवाओं को केवल 'प्रोफेशनल' ही नहीं, बल्कि एक 'संवेदनशील एवं जिम्मेदार नागरिक' बनाता है।