28/05/2026
महिम्न: पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिर: ।
अथावाच्य: सर्व: स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवाद: परिकर: ।।1।।
अतीत: पन्थानं तव च महिमा वाड्मनसयो –
रतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
स कस्य स्तोतव्य: कतिविधगुण: कस्य विषय:
पदे त्वर्वाचीने पतति न मन: कस्य न वच: ।।2।।
यह शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (Shiva Mahimnah Stotra) के शुरुआती दो सबसे प्रसिद्ध और सुंदर श्लोक हैं। गंधर्वराज पुष्पदंत द्वारा रचित इस स्तोत्र में भगवान शिव की महिमा का अत्यंत गहरा और तार्किक वर्णन किया गया है।
इन दोनों श्लोकों का सरल और गहरा अर्थ नीचे दिया गया है:
श्लोक 1: महिम्न: पारं ते परमविदुषो...
अर्थ:
हे हर (दुखों को हरने वाले शिव)! यदि आपकी महिमा का पार (अंत) न जानकर की जाने वाली स्तुति अनुचित है, तो ब्रह्मा आदि देवताओं की वाणी भी आपके विषय में असमर्थ (कम) है। क्योंकि आपकी महिमा का पूरा अंत तो कोई भी नहीं जानता।
लेकिन, यदि अपनी-अपनी बुद्धि और क्षमता के अनुसार की गई स्तुति को सही माना जाए, तो मेरा यह स्तुति करने का प्रयास भी पूरी तरह से दोषरहित है। अपनी मति के अनुसार तो हर कोई आपकी स्तुति करता है, इसलिए मैं भी आपकी स्तुति करने के लिए तैयार हुआ हूँ।
• मुख्य भाव: भगवान की महिमा अनंत है, उसे पूरी तरह शब्दों में बांधना असंभव है। लेकिन अगर कोई सच्चे दिल से अपनी बुद्धि के अनुसार उन्हें पुकारता है, तो ईश्वर उस प्रयास को स्वीकार करते हैं।
श्लोक 2: अतीत: पन्थानं तव च महिमा...
अर्थ:
आपकी महिमा मन और वाणी के मार्ग से परे है (अर्थात न तो मन से वहाँ तक सोचा जा सकता है और न ही शब्दों में पूरी तरह व्यक्त किया जा सकता है)। यहाँ तक कि वेद (श्रुति) भी आपके स्वरूप का सीधा वर्णन न कर पाने के कारण 'नेति-नेति' (ऐसा नहीं, ऐसा नहीं) कहकर चकित रह जाते हैं।
ऐसे अनंत रूप वाले, अनगिनत गुणों वाले आपको भला कौन पूरी तरह समझ सकता है? और आपकी स्तुति कैसे की जा सकती है? लेकिन जब बात आपके साकार या आधुनिक रूप (सगुण रूप) की आती है, तो भला ऐसा कौन है जिसका मन और जिसकी वाणी आपकी ओर आकर्षित न हो?
• मुख्य भाव: ईश्वर का वास्तविक स्वरूप निराकार और असीम है, जहाँ वेद भी मौन हो जाते हैं। लेकिन जब वे कल्याणकारी रूप में सामने होते हैं, तो हर किसी का मन और वाणी उनकी स्तुति करने के लिए खुद-ब-खुद खिंची चली आती है।
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