SANJU Digital Creater

"दो ही उद्देश्य हैं मेरे जीवन के, प्रभु आपको पाना है या आपका हो जाना है"

जरा कल्पना कीजिए... यदि पूरी सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी से कोई पूछ बैठे कि "आप कौन हैं?" तो उनके मन पर क्या बीतेगी? जिस...
13/07/2026

जरा कल्पना कीजिए... यदि पूरी सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी से कोई पूछ बैठे कि "आप कौन हैं?" तो उनके मन पर क्या बीतेगी? जिस देवता के एक दिन में युगों का समय बीत जाता है, जिसकी रचना में असंख्य लोक और प्राणी बसते हैं, यदि उसी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लग जाए तो उसका अहंकार किस तरह चूर-चूर होगा? द्वारका में एक समय ठीक ऐसा ही हुआ था। यह कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की ऐसी दिव्य लीला थी जिसने ब्रह्मांडों के उस रहस्य को उजागर किया जिसे आज आधुनिक विज्ञान मल्टीवर्स या मल्टी यूनिवर्स कहकर समझने की कोशिश करता है। यह कथा केवल ब्रह्मा जी के अहंकार के टूटने की नहीं, बल्कि उस अनंत सत्य की है जो बताता है कि ईश्वर की सृष्टि हमारी कल्पना से भी कहीं अधिक विशाल और असीम है।

एक समय की बात है। ब्रह्मा जी अपने ब्रह्मलोक में विराजमान थे। उन्होंने असंख्य जीवों, ग्रहों, नक्षत्रों और लोकों की रचना की थी। युगों से वे सृष्टि संचालन का कार्य कर रहे थे। धीरे-धीरे उनके मन में एक सूक्ष्म अहंकार जन्म लेने लगा। यह अहंकार बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन इतना अवश्य था कि उन्हें लगने लगा कि इस विशाल सृष्टि में उनके समान कोई दूसरा नहीं है। वे स्वयं को एकमात्र ब्रह्मा और संपूर्ण सृष्टि का अकेला रचयिता समझने लगे। तभी उनके मन में विचार आया कि क्यों न स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के पास जाकर अपने स्थान और महत्व की पुष्टि की जाए। यह सोचकर वे तुरंत द्वारका नगरी की ओर प्रस्थान कर गए।

जब ब्रह्मा जी द्वारका पहुंचे तो वहां के वैभव को देखकर भी आश्चर्यचकित रह गए। सोने से सजे महल, चमकते हुए प्रांगण, दिव्य सुगंध और हर ओर गूंजता हुआ श्रीकृष्ण का नाम। वे सीधे राजमहल के द्वार पर पहुंचे और द्वारपाल से बोले, "जाओ, भगवान श्रीकृष्ण से कहो कि ब्रह्मा उनसे मिलने आए हैं।" द्वारपाल ने जाकर श्रीकृष्ण को संदेश सुनाया। लेकिन भीतर से जो उत्तर आया, उसे सुनकर स्वयं ब्रह्मा जी भी स्तब्ध रह गए। श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए केवल एक प्रश्न पूछा, "कौन से ब्रह्मा आए हैं?"

यह सुनते ही ब्रह्मा जी के मन में हलचल मच गई। उन्होंने सोचा शायद द्वारपाल ने संदेश ठीक से नहीं पहुंचाया होगा। उन्होंने फिर कहा, "जाकर कहो कि चार मुखों वाले ब्रह्मा आए हैं, जो इस ब्रह्मांड के सृष्टिकर्ता हैं।" द्वारपाल ने फिर वही संदेश भीतर पहुंचाया। इस बार श्रीकृष्ण ने उन्हें अंदर आने की अनुमति दे दी। लेकिन जैसे ही ब्रह्मा जी राजसभा में प्रवेश किए, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके सामने जो दृश्य था, उसे देखकर उनका समस्त अहंकार एक ही क्षण में बिखरने वाला था।

सभा में केवल वे अकेले ब्रह्मा नहीं थे। वहां असंख्य ब्रह्मा उपस्थित थे। किसी के दस मुख थे, किसी के सौ मुख। किसी के एक हजार मुख थे तो किसी के लाखों मुख। कुछ ब्रह्मा इतने विशाल थे कि उनकी दिव्य आभा पूरी सभा को प्रकाशित कर रही थी। हर ब्रह्मा अपने-अपने ब्रह्मांड का स्वामी था। सभी भगवान श्रीकृष्ण के सामने नतमस्तक खड़े थे। यह दृश्य देखकर चार मुखों वाले ब्रह्मा जी के शरीर में कंपन होने लगा। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि जिस पद पर उन्हें इतना गर्व था, वह तो अनंत ब्रह्मांडों में से केवल एक छोटे से ब्रह्मांड का दायित्व मात्र है।

ब्रह्मा जी का सिर झुक गया। उनके भीतर का सारा अहंकार पलभर में समाप्त हो गया। कांपते हुए स्वर में उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा, "प्रभु, यह कैसी लीला है? मैं तो स्वयं को संपूर्ण सृष्टि का एकमात्र ब्रह्मा समझता था।" श्रीकृष्ण मुस्कुराए। उनके चेहरे पर करुणा और ज्ञान की दिव्य आभा थी। उन्होंने कहा, "ब्रह्मा, यह सृष्टि उतनी छोटी नहीं है जितनी तुम समझते हो। अनंत ब्रह्मांड हैं और प्रत्येक ब्रह्मांड का अपना एक ब्रह्मा है। तुम उनमें से केवल एक हो।"

फिर श्रीकृष्ण ने वह महान रहस्य बताया जिसे सुनकर ब्रह्मा जी की आंखें आश्चर्य से फैल गईं। भगवान बोले, "मेरे स्वरूप भी अनेक स्तरों पर कार्य करते हैं। महाविष्णु वह स्वरूप हैं जिनकी एक श्वास से असंख्य ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं और एक श्वास के साथ ही विलीन हो जाते हैं। उन प्रत्येक ब्रह्मांड में गर्भोदकशायी विष्णु प्रवेश करते हैं और वहीं से एक-एक ब्रह्मा की उत्पत्ति होती है। फिर क्षीरोदकशायी विष्णु प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा बनकर निवास करते हैं। इसलिए मैं केवल एक लोक में नहीं, हर ब्रह्मांड, हर जीव और हर कण में उपस्थित हूं।"

श्रीकृष्ण के मुख से यह दिव्य ज्ञान सुनकर ब्रह्मा जी की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। उन्हें पहली बार समझ आया कि ईश्वर की महिमा का कोई अंत नहीं है। जो स्वयं को महान समझता है, वह वास्तव में ईश्वर की अनंत लीला का एक छोटा सा अंश मात्र है। वे तुरंत श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़े और बोले, "प्रभु, मुझे क्षमा करें। मैं अपने पद और अपनी शक्ति पर गर्व करने लगा था। आज आपने मुझे मेरा वास्तविक स्थान दिखा दिया।"

भगवान श्रीकृष्ण ने प्रेमपूर्वक उन्हें उठाया और कहा, "ब्रह्मा, ज्ञान वहीं जन्म लेता है जहां अहंकार समाप्त होता है। जब तक मनुष्य स्वयं को सबसे बड़ा समझता है, तब तक वह सत्य से दूर रहता है। लेकिन जिस दिन उसका अहंकार टूट जाता है, उसी दिन उसके भीतर वास्तविक ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है।"

उस दिन द्वारका की उस दिव्य सभा में केवल ब्रह्मा जी का अहंकार नहीं टूटा था, बल्कि संसार के लिए एक महान संदेश भी प्रकट हुआ था। यह संदेश था कि ईश्वर की सृष्टि अनंत है, उनकी शक्ति असीम है और उनके सामने सबसे महान व्यक्ति भी एक छोटा सा अंश मात्र है। यही सनातन धर्म का वह गहरा रहस्य है जो हमें सिखाता है कि ब्रह्मांड कितना भी विशाल क्यों न हो, उसके पीछे एक ही परम सत्य कार्य कर रहा है और वह सत्य है भगवान की अनंत लीला। जय श्री कृष्ण। 🙏🚩
🕉️ 🙏 एक विनम्र निवेदन 🙏 🕉️
अगर मेरी इस पोस्ट से
आपके मन में भक्ति जगी हो
या भगवान श्री हरि का नाम आपके होंठों पर आया हो,
तो एक लाइक ज़रूर करें।
अगर आपको लगा कि यह पोस्ट
किसी और को प्रेरणा दे सकती है,
तो कमेंट में "जय श्री हरि" लिखें 💬
और शेयर जरूर करें ताकि
भगवान का नाम हर कोने तक पहुँचे 🌍🙏

आपका एक छोटा सा क्लिक,
किसी की आस्था को मजबूत बना सकता है।
जय श्री हरि नारायण 🙏

ऐसी ही और भक्तिभाव से भरी पोस्ट्स और वीडियोज़ देखने के लिए हमारे फेसबुक पेज
‘संजय गिरी श्री हरि नारायण का सेवक’ को Like और Follow जरूर करें।
साथ ही हमारा व्हाट्सएप चैनल भी ज्वॉइन करें — लिंक आपको हमारे फेसबुक पेज पर मिल जाएगा।
जय श्री हरि नारायण!
धन्यवाद!
वीडियो देखने के लिए क्लिक करें

https://www.facebook.com/sanjay.giri.9210/videos/3697905996918465/?sfnsn=wiwspmo

प्राचीन समयमें  #सदन नामक कसाई जातिके एक भक्त हो गये हैं। बचपनसे भगवन्नाम-जप और हरिकीर्तन इन्हें प्रिय था। भगवान्का नाम ...
13/07/2026

प्राचीन समयमें #सदन नामक कसाई जातिके एक भक्त हो गये हैं। बचपनसे भगवन्नाम-जप और हरिकीर्तन इन्हें प्रिय था। भगवान्का नाम तो इनकी जीभपर सदा ही नाचता रहता था। यद्यपि ये जातिसे कसाई थे, फिर भी इनका हृदय दयासे पूर्ण था। जीव-वधके नामसे ही इनका शरीर काँपने लगता था।

आजीविकाके लिये और कोई उपाय न होनेसे दूसरोंके यहाँसे मांस लाकर बेचा करते थे, स्वयं अपने हाथसे पशु वध नहीं करते थे। इस काममें भी इनका मन लगता नहीं था, पर मन मारकर जाति-व्यवसाय होनेसे करते थे। सदा नाम-जप, भगवान्के गुणगान और लीलामय पुरुषोत्तमके चिन्तनमें लगे रहते थे। सदनका मन श्रीहरिके चरणोंमें रम गया था। रात दिन वे केवल 'हरि-हरि' करते रहते थे।

भगवान् अपने भक्त से दूर नहीं रहा करते। भक्तको जैसे उनके बिना चैन नहीं, वैसे ही उन्हें भी भक्तके बिना चैन नहीं। सदनके घरमें भगवान् शालग्रामरूपसे विराजमान थे। सदनको इसका पता नहीं था। वे तो शालग्रामको पत्थरका एक बाट समझते थे और उनसे मांस तौला करते थे।

एक दिन एक साधु सदनकी दूकानके सामनेसे जा रहे थे। दृष्टि पड़ते ही वे शालग्रामजीको पहचान गये। मांस विक्रेता कसाईके यहाँ अपवित्र स्थलमें शालग्रामजीको देखकर साधुको बड़ा क्लेश हुआ। सदनसे माँगकर वे शालग्रामको ले गये। सदनने भी प्रसन्नतापूर्वक साधुको अपना वह चमकीला बाट दे दिया।

साधु बाबा कुटियापर पहुंचे। उन्होंने विधिपूर्वक शालग्रामजीकी पूजा की; परंतु भगवान्‌को न तो पदार्थोंकी अपेक्षा है न मन्त्र या विधिकी। वे तो प्रेमके भूखे हैं, प्रेमसे रोझते हैं। रातमें उन साधुको स्वप्रमें भगवान्ने कहा- 'तुम मुझे यहाँ क्यों ले आये? मुझे तो अपने भक्त सदनके घरमें ही बड़ा सुख मिलता था। जब वह मांस तौलनेके लिये मुझे उठाता था, तब उसके शीतल स्पर्शसे मुझे अत्यन्त आनन्द मिलता था।

जब वह ग्राहकोंसे बातें करता था, तब मुझे उसके शब्द बड़े मधुर स्तोत्र जानपड़ते थे। जब वह मेरा नाम लेकर कीर्तन करता, नाचने लगता था, तब आनन्दके मारे मेरा रोम-रोम पुलकित हो जाता था। तुम मुझे वहीं पहुँचा दो। मुझे सदनके बिना एक क्षण कल नहीं पड़ती।'

साधु महाराज जगे। उन्होंने शालग्रामजीको उठाया और सदनके घर जाकर उसे दे आये। साथ ही उसको भगवत्कृपाका महत्त्व भी बता आये। सदनको जब पता लगा कि उनका यह बटखरा तो भगवान् शालग्राम हैं, तब उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हुआ। वे मन-ही-मन कहने लगे' देखो, मैं कितना बड़ा पापी हूँ।

मैंने भगवान्‌को निरादरपूर्वक अपवित्र मांसके तराजूका बाट बना रखा। प्रभो! अब मुझे क्षमा करो।' अब सदनको अपने व्यवसायसे घृणा हो गयी। वे शालग्रामजीको लेकर पुरुषोत्तमक्षेत्र श्रीजगन्नाथपुरीको चल पड़े।

मार्ग में सन्ध्या समय सदनजी एक गाँवमें एक गृहस्थके घर ठहरे। उस घरमें स्त्री-पुरुष दो ही व्यक्ति थे। स्त्रीका आचरण अच्छा नहीं था। वह अपने घर ठहरे हुए इस स्वस्थ, सुन्दर, सबल पुरुषपर मोहित हो गयी।

आधी रातके समय सदनजीके पास आकर वह अनेक प्रकारकी अशिष्ट चेष्टाएँ करने लगी। सदनजी तो भगवान्के परम भक्त थे। उनपर कामको कोई चेष्टा सफल न हुई। वे उठकर, हाथ जोड़कर बोले—'तुम तो मेरी माता हो। अपने बच्चेकी परीक्षा मत लो, मा! मुझे तुम आशीर्वाद दो ।'

भगवान्‌के सच्चे भक्त पर स्त्रीको माता ही देखते हैं। स्त्रीका मोहक रूप उनको भ्रममें नहीं डालता। वे हड्डी, मांस, चमड़ा, मल-मूत्र, थूक पीवको पुतलीको सुन्दर माननेकी मूर्खता कर ही नहीं सकते; परंतु जो कामके वश हो जाता है, उसकी बुद्धि मारी जाती है। वह न सोच-समझ पाता, न कुछ देख पाता। वह निर्लज्ज और निर्दय हो जाता है।

उस कामातुरा स्त्रीने समझा कि मेरे पतिके भयसे ही यह मेरी बात नहीं मानता। वह गयी और तलवार लेकर सोते हुए अपने पतिका सिर उसने काट दिया। कामान्ध कौन-सा पाप नहीं कर सकता। अब वह कहने लगी- प्यारे। अब डरो मत। मैंने अपनेखूसट दूर पतिका सिर काट डाला है। हमारे सुखका कण्टक हो गया। अब तुम मुझे स्वीकार करो।'

सदन भयसे काँप उठे। स्त्रीने अनुनय-विनय करके जब देख लिया कि उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं हो सकती, तब द्वारपर आकर छाती पीट-पीटकर रोने लगी। लोग उसका रुदन सुनकर एकत्र हो गये।

उसने कहा- 'इस यात्रीने मेरे पतिको मार डाला है और यह मेरे साथ बलात्कार करना चाहता था।' लोगोंने सदनको खूब भला-बुरा कहा, कुछने मारा भी; पर सदनने कोई सफाई नहीं दी। मामला न्यायाधीशके पास गया। सदन तो अपने प्रभुकी लीला देखते हुए अन्ततक चुप ही बने रहे। अपराध सिद्ध हो गया। न्यायाधीशकी आज्ञासे उनके दोनों हाथ काट लिये गये।

सदनके हाथ कट गये, रुधिरकी धारा चलने लगी; उन्होंने इसे अपने प्रभुकी कृपा ही माना। उनके मनमें भगवान्के प्रति तनिक भी रोष नहीं आया। भगवान्‌के सच्चे भक्त इस प्रकार निरपराध कष्ट पानेपर भी अपने स्वामीकी दया ही मानते हैं।

भगवन्नामका कीर्तन करते हुए सदन जगन्नाथपुरीको चल पड़े। उधर पुरीमें प्रभुने पुजारीको स्वप्नमें आदेश दिया- 'मेरा भक्त सदन मेरे पास आ रहा है। उसके हाथ कट गये हैं। पालकी लेकर जाओ और उसे आदरपूर्वक ले आओ।' पुजारी पालकीलिवाकर गये और आग्रहपूर्वक सदनको उसमें बैठाकर ले आये।

सदनने जैसे ही श्रीजगन्नाथजीको दण्डवत् करके कीर्तनके लिये भुजाएँ उठायीं, उनके दोनों हाथ पूर्ववत् ठीक हो गये। प्रभुकी कृपासे हाथ ठीक तो हुए, पर मनमें शङ्का बनी ही रही कि वे क्यों काटे गये। भगवान् के राज्यमें कोई निरपराध तो दण्ड पाता नहीं। रात में स्वप्रमें भगवान्ने सदनजीको बताया- 'तुम पूर्वजन्ममें काशी में सदाचारी विद्वान् ब्राह्मण थे।

एक दिन एक गाय कसाईके घेरेसे भागी जाती थी। उसने तुम्हें पुकारा। तुमने कसाईको जानते हुए भी गायके गलेमें दोनों हाथ डालकर उसे भागनेसे रोक लिया। वही गाय वह स्त्री थी और कसाई उसका पति था। पूर्वजन्मका बदला लेनेके लिये उसने उसका गला काटा। तुमने भयातुरा | गायको दोनों हाथोंसे पकड़कर कसाईको सौंपा था, इस पापसे तुम्हारे हाथ काटे गये। इस दण्डसे तुम्हारे पापका नाश हो गया।"

सदनने भगवान्की असीम कृपाका परिचय पाया। वे भगवत्प्रेममें विह्वल हो गये। बहुत कालतक नाम कीर्तन, गुण-गान तथा भगवान्‌के ध्यानमें तल्लीन रहते हुए उन्होंने पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास किया और अन्तमें श्रीजगन्नाथजीके चरणोंमें देह त्यागकर वे परमधाम पधारे।

जय जय श्री राम कृष्ण हरि विठ्ठल केशव 🌷 🙏 ❤️ ⚜️

सत्य संकल्प सच्चिदानंद परमधाम सर्वशक्तिमान भगवान श्री कृष्णचंद्र जू महाराज की जय 🙏❤️

🕉️ 🙏 एक विनम्र निवेदन 🙏 🕉️
अगर मेरी इस पोस्ट से
आपके मन में भक्ति जगी हो
या भगवान श्री हरि का नाम आपके होंठों पर आया हो,
तो एक लाइक ज़रूर करें।
अगर आपको लगा कि यह पोस्ट
किसी और को प्रेरणा दे सकती है,
तो कमेंट में "जय श्री हरि" लिखें 💬
और शेयर जरूर करें ताकि
भगवान का नाम हर कोने तक पहुँचे 🌍🙏

आपका एक छोटा सा क्लिक,
किसी की आस्था को मजबूत बना सकता है।
जय श्री हरि नारायण 🙏

ऐसी ही और भक्तिभाव से भरी पोस्ट्स और वीडियोज़ देखने के लिए हमारे फेसबुक पेज
‘संजय गिरी श्री हरि नारायण का सेवक’ को Like और Follow जरूर करें।
साथ ही हमारा व्हाट्सएप चैनल भी ज्वॉइन करें — लिंक आपको हमारे फेसबुक पेज पर मिल जाएगा।
जय श्री हरि नारायण!
धन्यवाद!
वीडियो देखने के लिए क्लिक करें

https://www.facebook.com/sanjay.giri.9210/videos/3697905996918465/?sfnsn=wiwspmo

"प्रिया-प्रियतम प्रेम"श्याम एक दिन हँसकर बोले सुनो राधिका प्यारी,आज बताओ, मै सुन्दर या तुम अति सुन्दर नारी ?असमंजस में प...
10/07/2026

"प्रिया-प्रियतम प्रेम"

श्याम एक दिन हँसकर बोले सुनो राधिका प्यारी,

आज बताओ, मै सुन्दर या तुम अति सुन्दर नारी ?

असमंजस में पड़ी राधिका कौन अधिक रुचिकारी,

दिन जैसी सफेद उजली में श्याम रात अंधियारी।

मैं गोरी माखन सी कोमल श्याम सुरतिया कारी, पर कैसे कह दूँ मैं प्रियतम कारी सूरत तिहारी। हंसकर बोली जगतसुन्दरी सुनो बात बनवारी, मैं कच्चे फल सी सफेद तुम पकी जमुनिया प्यारी।

सुन राधा की चातुर बतियाँ मगन हुए त्रिपुरारी, बोले सुन बृजभान दुलारी तुम अति सुंदर नारी।

तुम ही जगत सुंदरी माया तुम त्रिलोक में न्यारी, जिस जिह्वा पर नाम तेरा वो मुझे है सबसे प्यारी।

"जय जय श्री राधे"

श्री राधा जी के नाम की महिमा अनंत है

राधा नाम कोई साधारण नाम नहीं, यह स्वयं में ही महामंत्र है। जिन्होंने राधे राधे कहना शुरू कर दिया, उनके जीवन में कृपा अपने आप उतरने लगती है।

भगवान कृष्ण भी जिनके चरणों की सेवा करते हैं, शिव जी, विष्णु जी, इंद्र देव और वरुण देव भी जिनके नाम का आश्रय लेने वाले भक्त के साथ चलते हैं... वो हैं हमारी प्यारी श्री राधारानी।

बस एक बार श्रद्धा से पुकारो - "राधे राधे" - फिर देखो लीला कैसी होती

!भक्ति की स्वरूपिणी

भक्ति की पराकाष्ठाः राधा जी स्वयं भक्ति का स्वरूप मानी जाती हैं। उनके चरणों की वंदना करना, दिव्य प्रेम की ऊँचाई तक पहुँचने का मार्ग है।

कृष्ण प्रेम का प्रवेश द्वारः शास्त्रों में कहा गया है कि श्रीकृष्ण तक पहुँचने का सर्वोत्तम मार्ग राधा रानी की कृपा से ही संभव है। अतः उनके चरणों में शरणागत होना मुक्ति और प्रेम प्राप्ति का साधन है।

🕉️ 🙏 एक विनम्र निवेदन 🙏 🕉️
अगर मेरी इस पोस्ट से
आपके मन में भक्ति जगी हो
या भगवान श्री हरि का नाम आपके होंठों पर आया हो,
तो एक लाइक ज़रूर करें।
अगर आपको लगा कि यह पोस्ट
किसी और को प्रेरणा दे सकती है,
तो कमेंट में "जय श्री हरि" लिखें 💬
और शेयर जरूर करें ताकि
भगवान का नाम हर कोने तक पहुँचे 🌍🙏

आपका एक छोटा सा क्लिक,
किसी की आस्था को मजबूत बना सकता है।
जय श्री हरि नारायण 🙏

ऐसी ही और भक्तिभाव से भरी पोस्ट्स और वीडियोज़ देखने के लिए हमारे फेसबुक पेज
‘संजय गिरी श्री हरि नारायण का सेवक’ को Like और Follow जरूर करें।
साथ ही हमारा व्हाट्सएप चैनल भी ज्वॉइन करें — लिंक आपको हमारे फेसबुक पेज पर मिल जाएगा।
जय श्री हरि नारायण!
धन्यवाद!
वीडियो देखने के लिए क्लिक करें

https://www.facebook.com/sanjay.giri.9210/videos/3697905996918465/?sfnsn=wiwspmo

पुरानी बात है एक सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था। सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था। जो भी जरुरी काम हो सेठ हमेशा...
10/07/2026

पुरानी बात है एक सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था। सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था। जो भी जरुरी काम हो सेठ हमेशा उसी व्यक्ति से कहता था। वो व्यक्ति भगवान का बहुत बड़ा भक्त था l वह सदा भगवान के चिंतन भजन कीर्तन स्मरण सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था।

एक दिन उस ने सेठ से श्री जगन्नाथ धाम यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा- भाई ! "मैं तो हूं संसारी आदमी हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूं जिसके कारण कभी तीर्थ गमन का लाभ नहीं ले पाता। तुम जा ही रहे हो तो यह लो १०० रुपए मेरी ओर से श्री जगन्नाथ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना।" भक्त सेठ से सौ रुपए लेकर श्री जगन्नाथ धाम यात्रा पर निकल गया।

कई दिन की पैदल यात्रा करने के बाद वह श्री जगन्नाथ पुरी पहुंचा। मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत सारे संत, भक्त जन, वैष्णव जन, हरि नाम संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं। सभी की आंखों से अश्रु धारा बह रही है। जोर-जोर से हरि बोल, हरि बोल गूंज रहा है। संकीर्तन में बहुत आनंद आ रहा था। भक्त भी वहीं रुक कर हरिनाम संकीर्तन का आनंद लेने लगा।

फिर उसने देखा कि संकीर्तन करने वाले भक्तजन इतनी देर से संकीर्तन करने के कारण उनके होंठ सूखे हुए हैं वह दिखने में कुछ भूखे भी प्रतीत हो रहे हैं। उसने सोचा क्यों ना सेठ के सौ रुपए से इन भक्तों को भोजन करा दूँ।

उसने उन सभी को उन सौ रुपए में से भोजन की व्यवस्था कर दी। सबको भोजन कराने में उसे कुल ९८ रुपए खर्च करने पड़े। उसके पास दो रुपए बच गए उसने सोचा चलो अच्छा हुआ दो रुपए जगन्नाथ जी के चरणों में सेठ के नाम से चढ़ा दूंगा l

जब सेठ पूछेगा तो मैं कहूंगा पैसे चढ़ा दिए। सेठ यह तो नहीं कहेगा १०० रुपए चढ़ाए। सेठ पूछेगा पैसे चढ़ा दिए मैं बोल दूंगा कि, पैसे चढ़ा दिए। झूठ भी नहीं होगा और काम भी हो जाएगा।

भक्त ने श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिए मंदिर में प्रवेश किया श्री जगन्नाथ जी की छवि को निहारते हुए अपने हृदय में उनको विराजमान कराया। अंत में उसने सेठ के दो रुपए श्री जगन्नाथ जी के चरणो में चढ़ा दिए। और बोला यह दो रुपए सेठ ने भेजे हैं।

उसी रात सेठ के पास स्वप्न में श्री जगन्नाथ जी आए आशीर्वाद दिया और बोले सेठ तुम्हारे ९८ रुपए मुझे मिल गए हैं यह कहकर श्री जगन्नाथ जी अंतर्ध्यान हो गए। सेठ जाग गया सोचने लगा मेरा नौकर तौ बड़ा ईमानदार है,

पर अचानक उसे क्या जरुरत पड़ गई थी उसने दो रुपए भगवान को कम चढ़ाए ? उसने दो रुपए का क्या खा लिया ? उसे ऐसी क्या जरूरत पड़ी ? ऐसा विचार सेठ करता रहा।

काफी दिन बीतने के बाद भक्त वापस आया और सेठ के पास पहुंचा। सेठ ने कहा कि मेरे पैसे जगन्नाथ जी को चढ़ा दिए थे ? भक्त बोला हां मैंने पैसे चढ़ा दिए। सेठ ने कहा पर तुमने ९८ रुपए क्यों चढ़ाए दो रुपए किस काम में प्रयोग किए।

तब भक्त ने सारी बात बताई की उसने ९८ रुपए से संतो को भोजन करा दिया था। और ठाकुरजी को सिर्फ दो रुपए चढ़ाये थे। सेठ सारी बात समझ गया व बड़ा खुश हुआ तथा भक्त के चरणों में गिर पड़ा और बोला- "आप धन्य हो आपकी वजह से मुझे श्री जगन्नाथ जी के दर्शन यहीं बैठे-बैठे हो गए l

सन्तमत विचार- भगवान को आपके धन की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान को वह ९८ रुपए स्वीकार है जो जीव मात्र की सेवा में खर्च किए गए और उस दो रुपए का कोई महत्व नहीं जो उनके चरणों में नगद चढ़ाए गए...

इस कहानी का सार ये है कि.........
भगवान को चढ़ावे की जरूरत नही होती जी
सच्चे मन से किसी जरूरतमंद की जरूरत को पूरा कर देना भी .....
भगवान को भेंट चढ़ाने से भी कहीं ज्यादा अच्छा होता है जी..!!!

हम उस परमात्मा को क्या दे सकते हैं.....जिसके दर पर हम ही भिखारी हैं...
🕉️ 🙏 एक विनम्र निवेदन 🙏 🕉️
अगर मेरी इस पोस्ट से
आपके मन में भक्ति जगी हो
या भगवान श्री हरि का नाम आपके होंठों पर आया हो,
तो एक लाइक ज़रूर करें।
अगर आपको लगा कि यह पोस्ट
किसी और को प्रेरणा दे सकती है,
तो कमेंट में "जय श्री हरि" लिखें 💬
और शेयर जरूर करें ताकि
भगवान का नाम हर कोने तक पहुँचे 🌍🙏

आपका एक छोटा सा क्लिक,
किसी की आस्था को मजबूत बना सकता है।
जय श्री हरि नारायण 🙏

ऐसी ही और भक्तिभाव से भरी पोस्ट्स और वीडियोज़ देखने के लिए हमारे फेसबुक पेज
‘संजय गिरी श्री हरि नारायण का सेवक’ को Like और Follow जरूर करें।
साथ ही हमारा व्हाट्सएप चैनल भी ज्वॉइन करें — लिंक आपको हमारे फेसबुक पेज पर मिल जाएगा।
जय श्री हरि नारायण!
धन्यवाद!
वीडियो देखने के लिए क्लिक करें

https://www.facebook.com/sanjay.giri.9210/videos/3697905996918465/?sfnsn=wiwspmo

07/07/2026
क्षीर सागर में भगवान विष्णु शेष शैया पर विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रही हैं । विष्णुजी के एक पैर का अंग...
07/07/2026

क्षीर सागर में भगवान विष्णु शेष शैया पर विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रही हैं । विष्णुजी के एक पैर का अंगूठा शैया के बाहर आ गया और लहरें उससे खिलवाड़ करने लगीं ।
क्षीरसागर के एक कछुवे ने इस दृश्य को देखा और मन में यह विचार कर कि मैं यदि भगवान विष्णु के अंगूठे को अपनी जिव्ह्या से स्पर्श कर लूँ तो मेरा मोक्ष हो जायेगा,यह सोच कर उनकी ओर बढ़ा ।
उसे भगवान विष्णु की ओर आते हुये शेषनाग ने देख लिया और कछुवे को भगाने के लिये जोर से फुँफकारा । फुँफकार सुन कर कछुवा भाग कर छुप गया ।
कुछ समय पश्चात् जब शेषजी का ध्यान हट गया तो उसने पुनः प्रयास किया । इस बार लक्ष्मीदेवी की दृष्टि उस पर पड़ गई और उन्होंने उसे भगा दिया ।
इस प्रकार उस कछुवे ने अनेकों प्रयास किये पर शेष नाग और लक्ष्मी माता के कारण उसे सफलता नहीं मिली । यहाँ तक कि सृष्टि की रचना हो गई और सत्युग बीत जाने के बाद त्रेता युग आ गया ।
इस मध्य उस कछुवे ने अनेक बार अनेक योनियों में जन्म लिया और प्रत्येक जन्म में भगवान की प्राप्ति का प्रयत्न करता रहा । अपने तपोबल से उसने दिव्य दृष्टि को प्राप्त कर लिया था ।
कछुवे को पता था कि त्रेता युग में वही क्षीरसागर में शयन करने वाले विष्णु राम का और वही शेषनाग लक्ष्मण का व वही लक्ष्मीदेवी सीता के रूप में अवतरित होंगे तथा वनवास के समय उन्हें गंगा पार उतरने की आवश्यकता पड़ेगी । इसीलिये वह भी केवट बन कर वहाँ आ गया था ।
एक युग से भी अधिक काल तक तपस्या करने के कारण उसने प्रभु के सारे मर्म जान लिये थे, इसीलिये उसने रामजी से कहा था कि मैं आपका मर्म जानता हूँ ।
संत श्री तुलसीदासजी भी इस तथ्य को जानते थे, इसलिये अपनी चौपाई में केवट के मुख से कहलवाया है कि
“कहहि तुम्हार मरमु मैं जाना”।
केवल इतना ही नहीं, इस बार केवट इस अवसर को किसी भी प्रकार हाथ से जाने नहीं देना चाहता था । उसे याद था कि शेषनाग क्रोध कर के फुँफकारते थे और मैं डर जाता था ।
अबकी बार वे लक्ष्मण के रूप में मुझ पर अपना बाण भी चला सकते हैं, पर इस बार उसने अपने भय को त्याग दिया था, लक्ष्मण के तीर से मर जाना उसे स्वीकार था पर इस अवसर को खो देना नहीं ।
इसीलिये विद्वान संत श्री तुलसीदासजी ने लिखा है -
( हे नाथ ! मैं चरणकमल धोकर आप लोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा; मैं आपसे उतराई भी नहीं चाहता । हे राम ! मुझे आपकी दुहाई और दशरथजी की सौगंध है, मैं आपसे बिल्कुल सच कह रहा हूँ । भले ही लक्ष्मणजी मुझे तीर मार दें, पर जब तक मैं आपके पैरों को पखार नहीं लूँगा, तब तक हे तुलसीदास के नाथ ! हे कृपालु ! मैं पार नहीं उतारूँगा । )
तुलसीदासजी आगे और लिखते हैं -
केवट के प्रेम से लपेटे हुये अटपटे वचन को सुन कर करुणा के धाम श्री रामचन्द्रजी जानकी और लक्ष्मण की ओर देख कर हँसे । जैसे वे उनसे पूछ रहे हैं- कहो, अब क्या करूँ, उस समय तो केवल अँगूठे को स्पर्श करना चाहता था और तुम लोग इसे भगा देते थे पर अब तो यह दोनों पैर माँग रहा है !
केवट बहुत चतुर था । उसने अपने साथ ही साथ अपने परिवार और पितरों को भी मोक्ष प्रदान करवा दिया । तुलसीदासजी लिखते हैं -.

चरणों को धोकर पूरे परिवार सहित उस चरणामृत का पान करके उसी जल से पितरों का तर्पण करके अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्र को गंगा के पार ले गया ।
उस समय का प्रसंग है ... जब केवट भगवान् के चरण धो रहे है ।
बड़ा प्यारा दृश्य है, भगवान् का एक पैर धोकर उसे निकलकर कठौती से बाहर रख देते है, और जब दूसरा धोने लगते है,
तो पहला वाला पैर गीला होने से जमीन पर रखने से धूल भरा हो जाता है,
केवट दूसरा पैर बाहर रखते है, फिर पहले वाले को धोते है, एक-एक पैर को सात-सात बार धोते है ।
फिर ये सब देखकर कहते है,
प्रभु, एक पैर कठौती में रखिये दूसरा मेरे हाथ पर रखिये, ताकि मैला ना हो ।
जब भगवान् ऐसा ही करते है । तो जरा सोचिये ... क्या स्थिति होगी , यदि एक पैर कठौती में है और दूसरा केवट के हाथों में,
भगवान् दोनों पैरों से खड़े नहीं हो पाते बोले - केवट मैं गिर जाऊँगा ?
केवट बोला - चिंता क्यों करते हो भगवन् !.
दोनों हाथों को मेरे सिर पर रख कर खड़े हो जाईये, फिर नहीं गिरेंगे ,
जैसे कोई छोटा बच्चा है जब उसकी माँ उसे स्नान कराती है तो बच्चा माँ के सिर पर हाथ रखकर खड़ा हो जाता है, भगवान् भी आज वैसे ही खड़े है ।
भगवान् केवट से बोले - भईया केवट ! मेरे अंदर का अभिमान आज टूट गया...
केवट बोला - प्रभु ! क्या कह रहे है ?.
भगवान् बोले - सच कह रहा हूँ केवट, अभी तक मेरे अंदर अभिमान था, कि .... मैं भक्तों को गिरने से बचाता हूँ पर..
आज पता चला कि, भक्त भी भगवान् को गिरने से बचाता है ,
जै राम जी की।।

॥श्रीहरिः ॥

अब तक जो समय बीत गया, सो बीत गया, अब समय व्यर्थ मत गँवावो। विचार करो, वह दिन आनेवाला है जब यह सब छूट जायगा। वह दिन आयेगा। कब आयेगा, इसका पता नहीं, क्योंकि मौत की कभी छुट्टी नहीं होती। इसीलिए भगवान् का भजन करें। प्रत्येक समय राम! राम ! राम! करें और सेवा करें। बस फिर बेड़ा पार है !

---

🕉️ 🙏 एक विनम्र निवेदन 🙏 🕉️
अगर मेरी इस पोस्ट से
आपके मन में भक्ति जगी हो
या भगवान श्री हरि का नाम आपके होंठों पर आया हो,
तो एक लाइक ज़रूर करें।
अगर आपको लगा कि यह पोस्ट
किसी और को प्रेरणा दे सकती है,
तो कमेंट में "जय श्री हरि" लिखें 💬
और शेयर जरूर करें ताकि
भगवान का नाम हर कोने तक पहुँचे 🌍🙏

आपका एक छोटा सा क्लिक,
किसी की आस्था को मजबूत बना सकता है।
जय श्री हरि नारायण 🙏

ऐसी ही और भक्तिभाव से भरी पोस्ट्स और वीडियोज़ देखने के लिए हमारे फेसबुक पेज
‘संजय गिरी श्री हरि नारायण का सेवक’ को Like और Follow जरूर करें।
साथ ही हमारा व्हाट्सएप चैनल भी ज्वॉइन करें — लिंक आपको हमारे फेसबुक पेज पर मिल जाएगा।
जय श्री हरि नारायण!
धन्यवाद!
वीडियो देखने के लिए क्लिक करें

https://www.facebook.com/sanjay.giri.9210/videos/3697905996918465/?sfnsn=wiwspmo

04/07/2026

I got over 10 reactions on one of my posts last week! Thanks everyone for your support! 🎉

कर्म का फलएक बार की कथा है, देवऋषि नारद और ऋषि अंगिरा कहीं जा रहे थे। रास्ते में उनकी नजर एक मिठाई की दुकान पर पड़ी। दुक...
01/07/2026

कर्म का फल

एक बार की कथा है, देवऋषि नारद और ऋषि अंगिरा कहीं जा रहे थे। रास्ते में उनकी नजर एक मिठाई की दुकान पर पड़ी। दुकान के नजदीक ही झूठी पतलों का ढेर लगा हुआ था। उस झूठन को खाने के लिए जैसे ही एक कुत्ता आता है, बैसे ही उस दुकान का मालिक उसको जोर से डन्डा मारता है। डन्डे की मार खा कर कुत्ता चीखता हुआ वहाँ से चला जाता है। ये दृश्य देख कर, देवऋषि को हंसी आ गयी। ऋषि अंगिरा ने उन से हंसी का कारण पूछा, नारद बोले: हे ऋषिवर ! यह दुकान पहले एक कन्जूस व्यक्ति की थी। अपनी जिंदगी में उसने बहुत सारा पैसा इकट्ठा किया। और इस जन्म में वो कुत्ता बन कर पैदा हुआ और यह दुकान मालिक उसी का पुत्र है, देखें ! जिस के लिए उस ने बेशुमार धन इकट्ठा किया। आज उसी के हाथों से, उसे जूठा भोजन भी नहीं मिल सका। कर्मफल के इस खेल को देखकर मुझे हंसी आ गई। मनुष्य को अपने शुभ और अशुभ करमों का फल जरूर मिलता है। बेशक इस लिए उसे जन्मों-जन् यात्रा क्यों न करनी पड़े।

01/07/2026

🙏🙏बांके बिहारी लाल की जय🙏🙏

बिहारी जी के चार लड्डू

बहुत समय पहले की बात है वृन्दावन में श्रीबाँके बिहारी जी के मन्दिर में रोज पुजारी जी बड़े भाव से सेवा करते थे। वे रोज बिहारी जी की आरती करते, भोग लगाते और उन्हें शयन कराते और रोज चार लड्डू भगवान के बिस्तर के पास रख देते थे। उनका यह भाव था कि बिहारी जी को यदि रात में भूख लगेगी तो वे उठ कर खा लेंगे। और जब वे सुबह मन्दिर के पट खोलते थे तो भगवान के बिस्तर पर प्रसाद बिखरा मिलता था। इसी भाव से वे रोज ऐसा करते थे।

एक दिन बिहारी जी को शयन कराने के बाद वे चार लड्डू रखना भूल गए। उन्होंने पट बन्द किए और चले गए। रात में करीब एक-दो बजे, जिस दुकान से वे बूंदी के लड्डू आते थे, उन बाबा की दुकान खुली थी। वे घर जाने ही वाले थे तभी एक छोटा सा बालक आया और बोला बाबा मुझे बूंदी के लड्डू चाहिए। बाबा ने कहा - लाला लड्डू तो सारे ख़त्म हो गए। अब तो मैं दुकान बन्द करने जा रहा हूँ। वह बोला आप अंदर जाकर देखो आपके पास चार लड्डू रखे हैं। उसके हठ करने पर बाबा ने अंदर जाकर देखा तो उन्हें चार लड्डू मिल गए क्यों कि वे आज मन्दिर नहीं गए थे। बाबा ने कहा पैसे दो। बालक ने कहा मेरे पास पैसे तो नहीं हैं और तुरन्त अपने हाथ से सोने का कंगन उतारा और बाबा को देने लगे। तो बाबा ने कहा - लाला पैसे नहीं हैं तो रहने दो, कल अपने बाबा से कह देना, मैं उनसे ले लूँगा। पर वह बालक नहीं माना और कंगन दुकान में फेंक कर भाग गया।

सुबह जब पुजारी जी ने पट खोला तो उन्होंने देखा कि बिहारी जी के हाथ में कंगन नहीं है। यदि चोर भी चुराता तो केवल कंगन ही क्यों चुराता। थोड़ी देर बाद ये बात सारे मन्दिर में फैल गई। जब उस दुकान वाले को पता चला तो उसे रात की बात याद आई। उसने अपनी दुकान में कंगन ढूंढा और पुजारी जी को दिखाया और सारी बात सुनाई। तब पुजारी जी को याद आया कि रात में, मैं लड्डू रखना ही भूल गया था। इसलिए बिहारी जी स्वयं लड्डू लेने गए थे। यदि भक्ति में भक्त कोई सेवा भूल भी जाता है तो भगवान अपनी तरफ से पूरा कर लेते हैं। श्रीजी

🙏🙏जय जय श्री राधे🙏🙏
🙏🙏बांके बिहारी लाल की जय🙏🙏

Address

SOLANI PURAM
Roorkee Management Institute Area
247667

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when SANJU posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share