Gita Ki Kahaniyan

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"भगवान श्रीकृष्ण के अनमोल उपदेशों को Adobe Animate CC से बनाए आकर्षक कार्टून एनिमेशन में ✨
रोज एक नया उपदेश सीखें | Geeta Saar | Moral Stories | Spiritual Growth 🙏"

10/09/2026
09/09/2026

जेब क्या खाली हो गई 😭😭😭.....

05/09/2026

कृष्ण जी के सामने सब समान हैं
सदैव 🙏अकेले खड़े 💪 रहने का साहस ♥️देना.......
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29/08/2026

अगर इसे नहीं सुनो जी तो पछताओ गे। राधे राधे 🙏🙏🙏🙏
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🤔 अगर अच्छा लगे तो😍Comment में राधे राधे 🙏 जरूर लिखे ❤️
28/08/2026

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एक समय महर्षि अष्टावक्र ने राजा जनक के आत्मज्ञान की परीक्षा लेने के लिए एक बहुत ही अद्भुत लीला रची थी, जिसे "मिथिला दहन"...
28/08/2026

एक समय महर्षि अष्टावक्र ने राजा जनक के आत्मज्ञान की परीक्षा लेने के लिए एक बहुत ही अद्भुत लीला रची थी, जिसे "मिथिला दहन" (मिथिला का जलना) की कथा के नाम से जाना जाता है।अद्वैत वेदांत के व्यावहारिक स्वरूप को समझाने वाली यह कथा इस प्रकार है:- सभा में अन्य संन्यासियों की ईर्ष्याराजा जनक को अष्टावक्र जी का सबसे प्रिय और श्रेष्ठ शिष्य माना जाता था। सभा के अन्य साधु और संन्यासी इस बात से ईर्ष्या करते थे। वे सोचते थे, "हम सब कुछ छोड़कर जंगलों में तपस्या कर रहे हैं, फिर भी गुरु जी इस महल में रहने वाले राजा को सबसे श्रेष्ठ मानते हैं।" महर्षि अष्टावक्र उनके मन की बात जान गए और उन्होंने जनक के ज्ञान की परीक्षा लेने का निर्णय लिया। एक दिन जब महर्षि अष्टावक्र सभा में उपदेश दे रहे थे, तभी उन्होंने अपनी माया से एक दृश्य उत्पन्न किया। एक सेवक दौड़ता हुआ आया और चिल्लाया, "ऋषिवर! बाहर कुटिया में आग लग गई है और आप सभी के कपड़े और कमंडल जल रहे हैं!"साधुओं की प्रतिक्रिया: यह सुनते ही सभी त्यागी और संन्यासी उपदेश बीच में ही छोड़कर अपने लंगोट, झोले और कमंडल बचाने के लिए बाहर की तरफ भागे। परन्तु राजा जनक चुपचाप अपनी जगह पर बैठे रहे और शांत भाव से गुरु का मुख देखते रहे। उन्हें अपनी किसी भी वस्तु के नष्ट होने का कोई भय नहीं था। कुछ समय बाद सभी साधु अपने जले हुए कमंडल लेकर दुःखी मन से वापस लौटे। महर्षि अष्टावक्र ने अपनी माया का दूसरा चरण शुरू किया। कुछ ही क्षणों में एक दूसरा सैनिक हांफते हुए राजसभा में आया और बोला, "महाराज! गजब हो गया! महल के मुख्य द्वार पर भीषण आग लग गई है और वह तेजी से पूरी मिथिला नगरी की ओर बढ़ रही है। सब कुछ जलकर राख हो रहा है!"यह सुनकर सभा में हाहाकार मच गया। सभी साधु राजा जनक की ओर देखने लगे कि अब इस राजा का अहंकार टूटेगा, क्योंकि इसका इतना बड़ा साम्राज्य, खजाना और परिवार सब जलने वाला है। ऐसी विनाशकारी खबर सुनने के बाद भी राजा जनक के चेहरे पर न तो कोई शिकन आई और न ही वे अपनी जगह से हिले। उन्होंने अत्यंत शांत और गंभीर स्वर में कहा:"मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे किञ्चन दह्यते।"(अर्थात: यदि पूरी मिथिला नगरी भी जलकर राख हो जाए, तो भी मेरा (आत्मा का) कुछ भी नहीं जल रहा है।)राजा जनक जानते थे कि वे शरीर या इस साम्राज्य के मालिक नहीं हैं। साम्राज्य प्रकृति का है, आग प्रकृति की है, और वे केवल इन सब बदलावों को देखने वाले 'साक्षी' हैं। जो चीज़ उनकी है ही नहीं, उसके जलने का दुःख कैसा?परीक्षा का परिणाम राजा जनक का यह अडिग आत्मज्ञान देखकर सभी संन्यासियों के सिर शर्म से झुक गए। उन्हें समझ आ गया कि सच्चा वैराग्य कपड़ों को छोड़ने या जंगल में रहने से नहीं आता, बल्कि मन के भीतर की अनासक्ति (detachment) से आता है। अष्टावक्र जी ने सिद्ध कर दिया कि जनक महलों में रहकर भी सच्चे संन्यासी थे।अष्टावक्र गीता का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी शांत कैसे रहा जाए।

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28/08/2026

जय श्री कृष्ण

25/08/2026

अपने दोष .......
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22/08/2026

काँटो को दोष देना.......
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10/08/2026

Jai shri vishnu baghwan

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