05/03/2026
हम जिसे जियोपॉलिटिक्स कहते हैं, वह असल में चंद ताकतवर लोगों की ईगो का खेल है बस।
■ ईरान के भीतर युवा आबादी बदलाव चाहती है, लेकिन वहां की सत्ता को बाहरी दुश्मन चाहिए ताकि वे घरेलू विद्रोह को दबा सकें। यह युद्ध उनके लिए अपनी गद्दी बचाने का एक ढाल है।
■ अमेरिका शांति की बात तो करता है, लेकिन उसका मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स तभी फलता-फूलता है जब दुनिया के किसी कोने में मिसाइलें गिरती हैं। उनके लिए मध्य पूर्व एक प्रयोगशाला है, जहाँ वे अपने नए हथियारों का परीक्षण करते हैं।
■ चीन शांति का दूत बनकर सऊदी और ईरान की दोस्ती कराना चाहता है, ताकि अमेरिका का प्रभाव कम हो। वहीं रूस चाहता है कि दुनिया यूक्रेन को भूलकर मिडिल-ईस्ट की आग में उलझी रहे।
जब गद्दी पर बैठे लोग डरने लगते हैं, तो वे और ज्यादा क्रूर हो जाते हैं। और इस क्रूरता की कीमत वो आम इंसान चुकाता है जिसे लगता है कि वो सुरक्षित है।
माने यह शतरंज है, जहाँ मोहरे हम और आप जैसे आम लोग हैं
■ भारत आज एक ऐसी कश्ती में सवार है जो दो तूफानों के बीच से रास्ता बना रही है। हमारी विदेश नीति अब साधु वाली नहीं रही, वह सर्वाइवल की हो गई है।
हमें युद्ध से डर नहीं लगता, हमें 100 $ प्रति बैरल तेल से डर लगता है। अगर तेल महंगा हुआ, तो भारत के मध्यम वर्ग की कमर टूट जाएगी। हमारी सरकार की असली चुनौती यह है कि वह अमेरिका को नाराज़ किए बिना रूस और ईरान से अपने रिश्ते कैसे बचाए रखे।
हम पर्दे के पीछे उन देशों को समझा रहे हैं कि अगर युद्ध बढ़ा, तो भारत अपना हाथ खींच लेगा, और भारत का साथ छोड़ना आज किसी भी बड़ी शक्ति के लिए आर्थिक सुसाइड जैसा ही है।
■ युद्ध की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि लोग मरते हैं, बल्कि यह है भी है कि जो बच जाते हैं, वे भी जीते जी मर जाते हैं।
जब कोई मिसाइल गिरती है, तो वह केवल ईंट-पत्थर नहीं गिराती, वह एक परिवार की दशकों की विरासत को धूल में मिला देती है।
शरणार्थियों की कतारें केवल सरहदें पार नहीं करतीं, वे अपने स्वाभिमान को नीलाम होते देखती हैं। किसी दूसरे देश के कैंप में रोटी की लाइन में खड़ा व्यक्ति और क्या सोचता होगा?
चाहे रूस जीते, अमेरिका या ईरान विजेता के हाथ में केवल राख का ढेर लगेगा।
■ पर्शिया (ईरान) के ही सूफी संतों ने कभी कहा था कि इंसान के भीतर का अंधकार ही बाहर की दुनिया में आग लगाता है।
सच में आज हम तकनीक में इतने आगे निकल गए कि मंगल तक पहुँच सकते हैं, लेकिन रूहानी तौर पर हम आज भी उसी गुफा में खड़े हैं जहाँ पत्थर उठाकर अपने भाई का सिर फोड़ देना ही समाधान लगता है।
हम चाँद की शीतलता की बातें करते हैं और ज़मीन को सूरज से ज्यादा गर्म कर देते हैं।
जब कोई मां अपने बच्चे के कफन को अपनी गोद में लेकर बैठती है, तो उस समय न कोई डॉलर बड़ा होता है, न दीन,
होता है तो देश और केवल एक सन्नाटा,वो सन्नाटा जो आने वाली नस्लों से पूछेगा कि क्या तुम्हारी तरक्की की कीमत मेरा लहू था?
ईश्वर करे कि ये मशालें जलाने वाले लोग समझ सकें कि आग जब लगती है, तो हवा ये नहीं पूछती कि किसका घर ईरानी है और किसका अमेरिकी,
जलती तो बस इंसानियत है।
कभी-कभी सोचता हूँ,अगर सरहदें मिटा दी जाएँ तो क्या दुश्मनी भी मिट जाएगी,या फिर हम नई सरहदें अपने दिलों में बना लेंगे।।
संत रामपाल जी महाराज जी ही वर्तमान में वे महापुरुष है जो इन आपदाओं से मनुष्य को बचा सकते हैं।
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