19/12/2025
“100 मीटर से ऊँची पहाड़ी को ही अरावली माना जाएगा”—सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने अरावली संरक्षण की समझ को बेहद संकुचित कर दिया है। अरावली सिर्फ़ कुछ ऊँची पहाड़ियों का नाम नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है, जो राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैला हुआ है।
अरावली वर्षा जल को रोककर भूजल का पुनर्भरण करती है, रेगिस्तान के विस्तार को रोकती है, जैव विविधता को आश्रय देती है और करोड़ों लोगों के लिए जलवायु सुरक्षा की ढाल है। केवल ऊँचाई के आधार पर इसकी पहचान तय करना वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और सामाजिक—तीनों दृष्टियों से खतरनाक है। इससे 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ, वन क्षेत्र और पारंपरिक जल स्रोत संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगे।
इस फैसले का सीधा लाभ खनन माफिया, रियल एस्टेट और कॉर्पोरेट हितों को मिलेगा, जो पहले से ही अरावली को खोखला कर चुके हैं। इसका नतीजा होगा—जल संकट, बढ़ता प्रदूषण, तापमान में वृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं का बढ़ता खतरा। यह केवल पर्यावरण का सवाल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जीवन के अधिकार का मुद्दा है।
अरावली को नक्शे की रेखाओं और मीटरों में नहीं, बल्कि उसकी पारिस्थितिक भूमिका के रूप में समझना होगा। अगर आज हमने अरावली को नहीं बचाया, तो कल शहर, गाँव और खेती—सब असुरक्षित होंगे।