01/06/2026
कागजी इंजीनियरिंग का मास्टरपीस : बिना पैर का नाला, 27 लाख का बंदरबाँट और वातानुकूलित निरीक्षण
जलालाबाद शाहजहांपुर,कहते हैं कि विकास अंधा होता है, लेकिन जलालाबाद नगर पालिका परिषद ने साबित कर दिया है कि विकास न केवल अंधा होता है, बल्कि वह बिना बेस (नींव) के भी खड़ा हो सकता है! आजाद नगर से गुनारा मोड़ तक बना 27 लाख का नाला आजकल इसी दिव्य इंजीनियरिंग का रोना रो रहा है। लाखों रुपये की तनख्वाह पाने वाले साहबान (जेई, अधिशाषी अधिकारी) ने ऑफिस के बंद कमरों में बैठकर ऐसा दिव्य निरीक्षण किया कि जनता के टैक्स का पैसा कागजों में बहता हुआ सीधे ठेकेदारों और साहबों की जेब के सुरक्षित गंतव्य तक पहुँच गया।
नगर पालिका की दरियादिली देखिए, इस नाले को मुकम्मल करने के लिए 4 लाख 99 हजार रुपये के तीन और 12 लाख रुपये का एक भारी-भरकम टेंडर निकाला गया। कांट और जलालाबाद के दो-दो भाग्यशाली ठेकेदारों को इस महान कार्य की जिम्मेदारी सौंपी गई। 12 लाख रुपये की सबसे बड़ी मलाई आमिर खां ठेकेदार के हिस्से आई, जिन्हें लगभग 250 मीटर नाला बनाना था।
चर्चा है कि आमिर मियां ने नाले का निर्माण इतनी अत्याधुनिक तकनीक से किया कि नीचे कंक्रीट का बेस तैयार करने की जहमत ही नहीं उठाई गई। पीले रंग की ईंटों का ऐसा खूबसूरत इस्तेमाल हुआ कि नाला बनने के साथ ही अपनी बदहाली पर आंसू बहाने लगा। निर्माण के वक्त जब जनता चिल्लाई, तो ईओ साहब ने बड़े ही दार्शनिक अंदाज में कहा था कि जेई साहब से जांच करवाएंगे...?तीन महीने बीत गए, जनता आज भी पूछ रही है कि हुजूर, वह जांच वाली फाइल न जाने किस चूहे के पेट में समा गई, जिसका सुराग खुद पालिका के कर्मचारी नहीं ढूंढ पा रहे हैं।
इस पूरे खेल में ईमानदारी का एक दुखद अध्याय भी शामिल है। एक ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उसने पहले ही साहबान को आगाह किया था कि हुजूर जब तक सड़क नहीं बनेगी, नाला बनाना सिर्फ पैसे की बर्बादी है। लेकिन साहब को सड़क या नाले से क्या सरोकार? उन्हें तो 27 लाख रुपये की कागजी खानापूर्ति का बंदरबाँट करना था। लिहाजा, धूप में बाहर निकलने के बजाय दफ्तर की वातानुकूलित हवा में बैठकर ही सारे निरीक्षण पूरे कर लिए गए। यदि इस नाले की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच हो जाए, तो कई रसूखदार चेहरों की कालिख सरेआम उजागर होना तय है।
जिस नाले को मोहल्ले वासियों की जिंदगी आसान करने के लिए बनाया जाना था, वह अब उनके लिए जी का जंजाल बन चुका है। पालिका के महान इंजीनियरों ने नाला तो बना दिया, लेकिन पानी के निकास की व्यवस्था करना भूल गए। नतीजा यह है कि घरों का गंदा पानी नाले में ही थम गया है। मानसून की दस्तक हो चुकी है। एक-दो तेज बारिश होते ही यह नाला उफनेगा और गंदा पानी लोगों के बेडरुम तक सैर करेगा। यही नहीं, नाले के वीआईपी मेहमान—जहरीले कीड़े और सांप—अब सीधे लोगों के घरों में प्रवेश कर रहे हैं। पालिका प्रशासन ने जनता को प्राकृतिक आवास का अद्भुत अहसास करा दिया है।
जलालाबाद नगर पालिका के भ्रष्टाचार की कहानियां आए दिन अखबारों की सुर्खियां बनती हैं, लेकिन क्या मजाल कि जिला प्रशासन से लेकर स्थानीय प्रशासन तक कोई उंगली भी उठा दे! जब तक कुर्सी पर समाजवादी पार्टी के चेयरमैन शकील खां का जलवा है, तब तक जांच और कार्रवाई की हिम्मत जुटा पाना सिस्टम के बस की बात नहीं दिखती।
सूत्र बताते हैं कि इस चेयरमैन के सिर पर सत्ता पक्ष के ही एक बहुत बड़े कद्दावर नेता का अभयस्त हाथ है। इसी मजबूत संरक्षण के चलते पूरी नगर पालिका विकास का रास्ता भूलकर भ्रष्टाचार के एक्सप्रेस-वे पर दौड़ रही है। अब जनता यह पूछ रही है कि आखिर सत्ता पक्ष का वह कौन सा रहनुमा है, जिसने विपक्षी चेयरमैन को ढाल बनाकर पूरे नगर को दुर्दशा के दलदल में धकेल दिया है? लखनऊ के गलियारों में बैठे हुक्मरान क्या इस तमाशे पर अपनी चुप्पी तोड़ेंगे, या जलालाबाद की जनता ऐसे ही नरकीय जीवन जीने को अभिशप्त रहेगी?