09/10/2025
मन की आदत ही डांवाडोल होना है। मन यानी डांवाडोल होना। अभी ऐसा, अभी ऐसा। पल भर कुछ, पल भर कुछ। क्षण में क्रुद्ध, क्षण में करुणा से भरा। क्षण में प्रेम बह रहा, क्षण में घृणा उठ आई। फूल अभी फूल था, अब कांटा हो गया। कांटा अभी कांटा था, अब फूल हो गया। मन ऐसा ही चलता है। कभी थिर नहीं होता। थिर हो जाए तो मर जाए। अथिरता में ही उसका जीवन है।
और मन अथिर रहने के लिए हर चीज को खंडों में बांट देता है, हर चीज को दो में तोड़ देता है, तभी तो अथिर रह सकता है। अगर एक ही हो तो फिर अथिर कैसे होगा? इसलिए मन द्वंद्व बनाता है। मन द्वंद्वात्मक है। रात और दिन एक हैं; रात और दिन दो नहीं हैं; लेकिन मन दो कर लेता है। गर्मी-सर्दी एक हैं, इसीलिए तो एक ही थर्मामीटर से तुम दोनों को नाप पाते हो; लेकिन मन दो कर लेता है। सफलता-असफलता एक हैं, एक ही सिक्के के दो पहलू; लेकिन मन दो कर लेता है। जन्म और मृत्यु एक हैं, लेकिन मन दो कर लेता है। जिस दिन जन्मे, उसी दिन से मरना शुरू हो गया। जन्म की प्रक्रिया मृत्यु की प्रक्रिया है।
जरा गौर से देखो, अस्तित्व एक है, लेकिन मन हर जगह दो कर लेता है। मन ऐसे ही है जैसे तुमने कांच का प्रिज्म देखा! कांच के प्रिज्म से सूरज की किरण को गुजारो; एक किरण, प्रिज्म से गुजरते ही सात हिस्सों में बंट जाती है, सात रंगों में टूट जाती है। ऐसे ही तो इंद्रधनुष बनता है। इंद्रधनुष हवा में लटकी हुई पानी की बूंदों के कारण बनता है। हवा में पानी की बूंदें लटकी होती हैं वर्षा के दिनों में और सूरज की किरणें उन पानी की बूंदों से गुजरती हैं। हवा के मध्य में लटकी हुई पानी की बूंदें प्रिज्म का काम करती हैं और सूरज की किरणें सात हिस्सों में टूट जाती हैं। और तुम एक सुंदर इंद्रधनुष आकाश में छाया हुआ देखते हो।
ऐसे ही मन है। मन हर चीज को दो में तोड़ देता है। मन से कोई भी चीज गुजारो, वह दो हो जाती है। प्रेम और घृणा एक ही ऊर्जा के नाम हैं, मन दो कर देता है। मित्रता और शत्रुता एक ही घटना के दो नाम हैं, मन दो कर देता है। मन की तो आदत ऐसी--
एक रात उजली है, एक रात काली है,
एक बनी मातम तो दूसरी दिवाली है।
एक सजी दुल्हन सी चांदनी लुटाती है,
एक दबे घावों को फिर-फिर सहलाती है।
एक रात तड़पाती जेठ की दुपहरी है,
एक रात वंशी की गुंजित स्वरलहरी है।
एक मुखर प्याला है, एक मूक हाला है,
एक बनी पतझर तो दूजी हरियाली है।
एक लिए प्रियतम को मिलन गीत गाती है,
एक विरह स्मृति सी मन को तड़पाती है।
एक रात दीपक सी ज्योति जगमगाती है,
एक अंधकार पिए भावना जगाती है।
एक रात आहों की, एक रात भावों की,
एक जहर ज्वाला तो एक सुधा प्याली है।
एक रात रो-रो कर शबनम बिखराती है,
एक शरद पूनम में डूबी मदमाती है।
एक रात सपनों की लोरियां सजाती है,
एक रात दर्दीली नींद चुरा जाती है।
एक रात क्रंदन हैं, एक रात मधुबन है,
एक रात मस्ती तो एक पीर वाली है।
एक रात गाती है ऊंचे प्रासादों में,
एक रात रोती है गंदे फुटपाथों में।
रात वही होती है, हर बात वही होती है,
रंग बदल कर केवल जीवन को धोती है।
एक रात बचपन है, एक रात यौवन है,
एक जरा झंझा तो एक मृत्यु व्याली है।
एक है, लेकिन दो होकर मालूम पड़ रहा है। इधर दूल्हे की बारात सज रही और उधर किसी की अरथी उठ रही। ये दो घटनाएं नहीं हैं; यह एक ही घटना है। यह सजती बारात, यह उठती अरथी--एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यह मान, यह अपमान।
और मन दो करके फिर डांवाडोल होता है। जब दो हो गए तो यह करूं कि वह करूं! ऐसा करूं कि वैसा करूं! फिर हर चीज में खंडित हो जाता है मन।
महेंद्र, ऐसा कुछ तुम्हारा ही मन नहीं है। सबका मन ऐसा है। मन का ऐसा स्वभाव है।
तुम कहते हो: ‘बड़ी डांवाडोल स्थिति में हूं।’
जब तक मन को पकड़े रहोगे, डांवाडोल स्थिति रहेगी। साक्षी बनो! चुनो ही मत, सिर्फ देखो। सिर्फ मन के खेल देखो। मन के जटिल खेल पहचानो।
और धीरे-धीरे, साक्षी में जैसे ही ठहर जाओगे, वैसे ही मन का द्वंद्व विदा हो जाएगा। मन विदा हो जाएगा। सारा डांवाडोलपन चला जाएगा। चंचलता विलीन हो जाएगी। अथिरता खो जाएगी। तुम थिर हो जाओगे। और थिर होने में आनंद है। थिरता परमात्मा का स्वाद है।
आज इतना ही।
अमी झरत बिगसत कंवल-ओशो
प्रवचन-८