31/10/2025
🐜 “छोटी-सी चींटी का बड़ा इरादा”
जंगल के एक कोने में एक छोटी-सी चींटी रहती थी।
हर रोज़ वह अपने घर के लिए एक बड़ा-सा दाना उठाकर लाती।
रास्ता आसान नहीं था—पत्थर, गड्ढे, फिसलन, तेज हवा… सब कुछ!
एक दिन दाना इतना बड़ा था कि वह उठाते ही फिसलकर दूर जा गिरा।
पास में बैठी तितली हंसकर बोली—
“छोटी-सी जान से इतना भार नहीं उठाया जाएगा, छोड़ दे!”
चींटी ने खुद को सम्भाला, धूल झाड़ी और मुस्कुराकर बोली—
“मैं हार तभी मानूँगी,
जब मैं कोशिश करना छोड़ दूँगी।”
वह फिर से दाना उठाती, गिरती, फिसलती…
लेकिन हर बार उठती और आगे बढ़ती रही।
जंगल के सारे जानवर देखते रहे—
किसी ने मज़ाक उड़ाया, किसी ने दया की,
लेकिन चींटी ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया।
घंटों बाद…
आखिरकार वह दाना अपने घर तक लेकर पहुँच गई!
सारे जानवर हैरान थे।
तितली चुप… शर्मिंदा।
चींटी ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—
“जीत हमेशा उसी की होती है,
जो गिर-गिरकर भी उठता रहता है।
हार तब होती है जब इंसान खुद से कह दे— अब नहीं!”