Khubinews

Khubinews News paper

28/12/2025

सीकर। राजस्थान के सीकर में कांग्रेस की ओर से एक बड़ी रैली का आयोजन किया गया। यह रैली 'अरावली बचाओ-मनरेगा बचाओ' अभियान के तहत निकाली गई, जिसमें केंद्र और राज्य की सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन किया गया। रैली का आयोजन प्रदेश कांग्रेस कमेटी के आह्वान पर किया गया था। इसमें बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ आमजन और महिलाएं भी शामिल हुईं। रैली की शुरुआत शहर स्थित बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा से हुई। यहां कार्यकर्ताओं ने अंबेडकर को पुष्पांजलि अर्पित की। इसके बाद बांग्लादेश में हाल ही में हुई हिंसा में मारे गए हिंदू समुदाय के लोगों और छात्रों की स्मृति में दो मिनट का मौन रखा गया। इसके पश्चात कार्यकर्ताओं ने “अरावली बचाओ–राजस्थान बचाओ” और “मनरेगा बचाओ” के नारे लगाते हुए शहर में मार्च किया। रैली बजरंग कांटा और सिल्वर जुबली रोड से होते हुए कल्याण सर्किल पहुंची, जहां सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर प्रदर्शन किया गया। रैली में सीकर विधायक राजेंद्र पारीक, फतेहपुर विधायक हाकम अली खान, निवर्तमान नगर परिषद सभापति जीवण खां और जिला कांग्रेस अध्यक्ष सुनीता गठाला प्रमुख रूप से मौजूद रहे। नेताओं के साथ सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया और सरकार की नीतियों के खिलाफ आक्रोश जताया।
सीकर विधायक राजेंद्र पारीक ने रैली को संबोधित करते हुए कहा कि अरावली पर्वतमाला केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की जीवन रेखा है। उन्होंने बताया कि अरावली पर्यावरण संतुलन बनाए रखने, वर्षा को प्रभावित करने, हरियाली को संरक्षित करने और मरुस्थलीकरण को रोकने में अहम भूमिका निभाती है। पारीक ने चेतावनी दी कि सुप्रीम कोर्ट की नई गाइडलाइन के तहत 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली करीब एक लाख अठारह हजार पहाड़ियां अरावली की परिभाषा से बाहर हो सकती हैं, जिससे उनमें खनन की अनुमति मिल जाएगी। इससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचेगा और राजस्थान में रेगिस्तान तेजी से फैल सकता है। उन्होंने कहा कि भाजपा पुरानी बातों को उठाकर जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रही है, जबकि असली सवाल यह है कि वर्तमान सरकार अरावली को बचाने के लिए क्या कर रही है।
जिला कांग्रेस अध्यक्ष सुनीता गठाला ने अपने संबोधन में कहा कि अरावली राजस्थान की आत्मा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार एक ओर पर्यावरण संरक्षण की बातें करती है और दूसरी ओर बड़े पैमाने पर खनन को बढ़ावा दे रही है।
उन्होंने कहा कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों में खनन की अनुमति मिलने से बहुत कम पहाड़ियां ही सुरक्षित बचेंगी, जिससे जलवायु परिवर्तन का खतरा और बढ़ जाएगा। उन्होंने सरकार से मांग की कि अरावली को पूरी तरह बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की जाए।
कांग्रेस नेताओं ने मनरेगा का नाम बदलने का भी विरोध किया। उनका कहना था कि मनरेगा गरीब और मजदूर वर्ग की आजीविका का प्रमुख साधन है और इसका नाम बदलना मजदूरों के अधिकारों के साथ अन्याय है। प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने संकल्प लिया कि जब तक सरकार अपनी नीतियों में बदलाव नहीं करती, तब तक अरावली और मनरेगा को बचाने का आंदोलन जारी रहेगा। रैली शांतिपूर्ण रही, लेकिन सरकार के खिलाफ विरोध का संदेश साफ तौर पर दिया गया।

28/12/2025

धोखे से शुरू हुआ सात जन्मों का बंधन, एक दिन भी नहीं चला; पुणे की अदालत का बड़ा फैसला
हिंदू धर्म में शादी को सात जन्मों का अटूट बंधन माना जाता है, लेकिन पुणे से एक ऐसा मामला सामने आया है जहां यह पवित्र रिश्ता 24 घंटे भी नहीं टिक सका। शादी के मंडप से उठते ही एक नवविवाहित जोड़े ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और महज चंद घंटों के भीतर ही तलाक की अर्जी दे दी।

यह मामला एक लव मैरिज का था। महिला और पुरुष दोनों की मुलाकात हुई और प्यार परवान चढ़ा। शादी से पहले पति ने खुद को एक डॉक्टर बताया था। चूंकि महिला भी पेशे से डॉक्टर थी, इसलिए उसे लगा कि दोनों का भविष्य और विचार एक जैसे होंगे। इसी भरोसे के साथ दोनों ने भव्य समारोह में सात फेरे लिए।मर्चेंट नेवी में काम करता है युवक
शादी की रस्मों के बाद जब यह जोड़ा एकांत में था, तब पति ने एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा किया जिसने पत्नी के पैरों तले जमीन खिसका दी। पति ने स्वीकार किया कि वह डॉक्टर नहीं है, बल्कि मर्चेंट नेवी में काम करता है। उसने यह भी बताया कि अपनी ड्यूटी के कारण उसे साल में करीब 6 महीने तक घर और परिवार से दूर समुद्र में रहना पड़ता है।पेशे और जीवनशैली को लेकर बोले गए इस बड़े झूठ को महिला बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसे लगा कि जिस रिश्ते की शुरुआत ही धोखे से हुई हो, वह कभी सफल नहीं हो सकता। उसने तुरंत अलग होने का फैसला किया और अगले ही दिन अदालत में तलाक की याचिका दायर कर दी। हालांकि अर्जी तुरंत दी गई थी, लेकिन कानूनी औपचारिकताओं के कारण प्रक्रिया में 18 महीने का समय लगा। अब पुणे की अदालत ने आधिकारिक तौर पर उनके तलाक पर मुहर लगा दी है।

साप्ताहिक खूबी न्यूज, सीकर की और से आप सभी को दीपावाली की हार्दिक शुभकामनाऐं।प्रकाशक एवं मुद्रक व सम्पादक
31/10/2024

साप्ताहिक खूबी न्यूज, सीकर की और से आप सभी को दीपावाली की हार्दिक शुभकामनाऐं।

प्रकाशक एवं मुद्रक व सम्पादक

31/10/2024

दिवाली का दिवालियापन

दिवाली है। वैसे दिवाली का क्रेज़ बच्चों में था। अब उन्हें पहनने के लिए नए कपड़े, फोड़ने के लिए पटाखे, और चलाने के लिए फुलझड़ियां चाहिए। खाने के लिए दूध, मावे और चीनी की मिठाई चाहिए। अब तो दिवाली आते ही ग्रीन ट्रिब्यूनल वालों का रोना शुरू हो जाता है। AQI इंडेक्स एकदम सेंसेक्स की तरह उछलने लगता है। सुप्रीम कोर्ट हरकत में आ जाता है। पटाखे और फुलझड़ियां बेचारे गोदामों में घुटन में जीने को मजबूर हो रहे हैं। उधर आदमी AQI के बढ़ने की सूचना के साथ ही घुटन महसूस करने लगता है। प्रदूषण का धुआँ ठंडे बस्ते में बैठ जाता है। अब दिवाली के एक महीने पहले और बाद तक जो भी प्रदूषण होगा, उसमें दोषारोपण पराली पर नहीं, वह जले या न जले, दोषारोपण तो पटाखों पर ही होगा। आम आदमी को टैक्स स्लैब में छूट नहीं मिलेगी, लेकिन बाजार में छूटों का पूरा पंडाल सजाया गया है। आप बिना टैक्स की छूट के भी इन छूटों का लाभ लेकर दिखाइए। दिवाली पर छूटों की बौछार चारों तरफ गले फाड़-फाड़ कर चिल्ला रही है। कोई आपके घर में फ्रिज, टीवी, वाशिंग मशीन, मोबाइल, जूसर, मिक्सर सब बदलना चाहता है। दिवाली आएगी, तब आएगी, दिवाली की आड़ में दिवालियापन की दरकार बहुत पहले आ जाती है।

ऑफिसों में फाइल दबाए कर्मचारी राहत महसूस करते हैं। अब "दिवाली के बाद" का बहाना सरपट दौड़ेगा - "अब चक्कर लगाइए, साहब छुट्टी पर हैं...यार, आप दिवाली बाद आइए...इतनी सारी पेंडिंग लीव पड़ी है, साहब भी क्या करें...लेप्स हो जाएँगी। एनकैश करने साहब छुट्टियाँ बिताने बाहर गए हैं। छोटे बाबूजी को भी बोनस मिला है, तो वे भी परिवार के साथ निकल गए हैं। अब आप भी दिवाली मनाइए इत्मीनान से। दिवाली बाद आना।

लेकिन बाबूजी, दिवाली मनाएंगे कैसे अंधेरे में? घर का कनेक्शन कट कर रखा है। बिजली के बिल में गड़बड़ी थी, सुधार करवाने के लिए फाइल लगवा रखी है। आज दो महीने हो गए।"

"लेकिन क्या करें साहब भी, उनकी भी तो दिवाली है, भाई...। सबको अपनी-अपनी दिवाली मनाने की पड़ी है।"

मजदूर को मजदूरी दिवाली के बाद मिलेगी। क्या करें सेठ जी, पाँच दिन फैक्ट्री बंद रहेगी... उसकी भरपाई भी तो करनी है। फिर दिवाली सामने है, भला लक्ष्मी जी को ऐसे ही दूसरों के हाथों में कैसे जाने दें? लक्ष्मी जी को हर किसी ऐरे-गैरे नत्थू के हाथ में कैसे पकड़ा दें, बताइए?"

टीवी वाले और अखबार वाले नकली का रोना रोने शुरू कर देते हैं। नकली मावे की धर पकड़ शुरू हो जाती है। "कहाँ है मावा...मावा कहीं नजर नहीं आता...बस अधिकारी की भी दिवाली अच्छी-खासी मनाने का ध्यान रखते हैं सब मावा बेचने वाले। फूड इंस्पेक्टर की दिवाली तो नकली मावा पकड़ने से मनती है।" अरे, जब देश में नकली नेता चल सकते हैं, नकली वादे चल सकते हैं, तो नकली मावा क्यों नहीं? नकली मावे की धरोहर में कितनों का रोजगार है। देखो, तब न्यूज़ वालों को न्यूज़ मिलती है। रिकॉर्ड ब्रेकिंग न्यूज़, डिबेट होती है। नकली के साथ असली माल रखा जाता है...असली माल की कीमत एकदम बढ़ जाती है। नकली आम जनता के लिए और असली नेता व अधिकारियों के लिए...इस दिवाली सबको कुछ न कुछ देकर जाएगी...गरीब को बीमारी, तो अमीर की जेब भारी।

नकली होगा तभी तो असली की पहचान होगी। लोग असली ढूंढ़ने निकलेंगे, दीया-सलाई लेकर। असली के चार गुना दाम देंगे। सोहन पापड़ी भी इतना कुछ झेलने के बावजूद भाव खा रही है। क्यों? क्योंकि उसका मुकाबला नकली मावे की मिठाई से है। क्या करें, गर्ग साहब! लाना तो हम देसी घी की शुद्ध मिठाई ही चाहते थे इस बार, लेकिन क्या करें? आपको तो पता ही है...देसी घी के नाम पर क्या गड़बड़झाला हो रहा है...इसलिए सबसे सुरक्षित है सोहन पापड़ी। वरना सोहन पापड़ी की हालत तो आप जानते ही हैं। सरकारी अस्पतालों से भी बदतर है। घर में एक बार आ जाए तो ऐसे पड़े रहते हैं जैसे सरकारी अस्पताल के पुराने बिस्तर। सोहन पापड़ी हमें बताती है कि जो आज तुम्हारे पास है, कल किसी और के पास होगा। परसों किसी और के पास हो सकता है। घूम-घूमकर तुम्हारे पास हो आ जाए। यही जीवन चक्र है। दिवाली मुझे भी मनानी है, कैसे मनाऊँ? कई लोगों को उधार दे रखा है। मांगने जाता हूँ तो उनकी शक्ल मुझे घूरने लगती है। कहते हैं, "तुम्हें औकात नहीं है यार, दिवाली सर पर है। देखो, दिवाली के बाद यार, आप तो जानते हैं, लक्ष्मी दीवाली पर बाहर नहीं जाने देती।"

मैंने कहा, "भाई, हम भी दिवाली मना लेते, यार अपना ही तो मांग रहे हैं। तुम्हारे भाग्य की लक्ष्मी थोड़े ही मांग रहे हैं।"

दिवाली का असली मजा तो दिवाली के बाद ही है। डंप माल सस्ते में मिल जाता है। दिवाली की बची-खुची मिठाई सस्ते में मिल जाती है। जले हुए पटाखे और फूलझड़ियाँ भी अगर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा रखी हो, तो दिवाली के बाद ही फोड़ोगे ना? अब रोज-रोज दिवाली नहीं होती। फिर एक दिन आँसुओं का रोना - जब जेब में पैसा हो तब मना लो दिवाली, जेब खाली तो काहे की दिवाली?

30/10/2024

राजेंद्र गुढ़ा का विवादित बयान, बोले- 'संविधान में कहां लिखा है कि पाकिस्तान जिंदाबाद नहीं बोल सकते'

राजस्थान में 7 सीटों पर होने जा रहे हैं उपचुनाव के प्रचार जोरों पर चल रहा है. इस बीच नेताओं के बयान भी आ रहे हैं. झुंझुनू सीट से निर्दलीय प्रत्याशी राजेंद्र गुढ़ा का एक विवादित बयान सामने आया है जहां पर उन्होंने 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारों को लेकर कहा कि देश के संविधान में कहां लिखा है कि 'पाकिस्तान जिंदाबाद' नहीं बोल सकते'. उनके बयान के बाद अब सियासी माहौल गर्माया हुआ है.

'पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे क्यों नहीं लग सकते?'
झुंझुनू सीट से राजेंद्र गुढ़ा निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. उन्होंने अपने बयान में कहा 'भारत में पाकिस्तान की एंबेसी है वहां पर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं और पाकिस्तान में भारत की एंबेसी है. भारत जिंदाबाद के नारे लगाते हैं तो देश में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे क्यों नहीं लग सकते? कौन से संविधान में इनकी मनाही की गई है?''

पूर्ववर्ती गहलोत सरकार में मंत्री रहे राजेंद्र गुढ़ा के बयान पहले भी चर्चा में रहे हैं. कुछ दिन पहले उन्होंने एक जाति विशेष के अधिकारी और नेताओं को टारगेट किया था और कहा था कि झुंझुनू में सिर्फ एक ही जाति के नेता और अधिकारी क्यों है.

पहले पुलिस अधिकारी को धमका चुके हैं
कुछ दिन पहले भी उन्होंने एक पुलिस अधिकारी को धमकी दी थी. लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि पुलिस अधिकारी वर्दी पहनकर दादागीरी कर रहे हैं. उन्होंने कहा था कि वर्दी खोलकर आ जाओ. 60 सेकंड नहीं लगेंगे. अगर लगा तो समझ लेना मैंने अपनी का मां का दूध नहीं पीया है.

कौन हैं राजेंद्र गुढ़ा?
राजेंद्र गुढ़ा पिछली अशोक गहलोत सरकार में मंत्री रहे हैं. हालांकि उस समय वो उदयपुरवाटी से निर्दलीय विधायक थे. बाद में राजस्थान की सियासत में 'लाल डायरी' की काफी चर्चा रही. यह डायरी अशोक गहलोत के करीबी धर्मेंद्र राठौड़ की थी, जिसमें वो अपनी रोज़मर्रा की एक्टिविटी लिखते थे. गुढ़ा ने दावा किया था कि धर्मेंद्र राठौड़ के घर सीबीआई छापे के दौरान उन्होंने और कांग्रेस नेता धीरज गुर्जर ने राठौड़ के आवास पर जाकर 'लाल डायरी' वहां से निकाल ली थी.

बाद में राजेंद्र गुढ़ा ने गहलोत सरकार पर भ्र्ष्टाचार के आरोप लागए थे. जिसके बाद उनको मंत्री पद से बर्खास्त कर दिया गया था. उन्होंने कथित 'लाल डायरी' विधानसभा में भी लहराई थी. जिसके बाद गुढ़ा ने कांग्रेस विधायकों पर आरोप लगाए थे कि उन्होंने उनके साथ मारपीट करके वो डायरी छीन ली.

30/10/2024

भाजपा का चुनावी दांव, उपचुनाव के बीच गाय को राज्य माता का दर्जा देने की तैयारी, जानिए कैसे?

जयपुर: राजस्थान की सात विधानसभा सीटों पर होने जा रहे उपचुनाव को लेकर भाजपा अब बड़ा दांव खेलने वाली है। जानकारी मिली है कि महाराष्ट्र की तर्ज पर राजस्थान सरकार भी गाय को राज्य माता का दर्जा देने की तैयारी कर रही है। महाराष्ट्र सरकार पूर्व में गाय को राज्य माता का दर्जा दे चुकी है। अब भजनलाल सरकार भी महाराष्ट्र सरकार के फैसले का अध्ययन कर रही है। सुनने में आया है कि अधिकारियों ने विधिक राय भी ले ली है। अब जल्द ही गाय को राज्य माता का दर्जा दिए जाने का ऐलान हो सकता है। राजस्थान में उपचुनाव की प्रक्रिया चल रही है। नामांकन दाखिल हो चुके हैं और 13 नवंबर को मतदान होना है। इससे पहले राज्य सरकार बड़ा फैसला ले सकती है।

कई विधायक लिख चुके मुख्यमंत्री को पत्र
भाजपा शासित राज्यों में गाय को राज्य माता का दर्जा देने की मांग कई महीनों से उठ रही है। महाराष्ट्र सरकार ने बड़ी पहल करते हुए गाय को राज्य माता घोषित किया तो राजस्थान में भी यह मांग जोर पकड़ने लगी। राजस्थान के कई विधायकों ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को पत्र लिखा है। पत्र लिखने वालों में पूर्व गोपालन मंत्री ओटाराम देवासी, भाजपा के मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग, विधायक गोपाल शर्मा, बाल मुकुंदाचार्य, निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी सहित करीब 40 विधायक शामिल है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी विधायकों की मांग से सहमत है। वे खुद गाय को राज्य माता का दर्जा देने के मूड में है। विधायकों के पत्रों का जवाब देते हुए वे कह चुके हैं कि 'गाय हमारी आस्था का विषय है और सरकार इसको लेकर सजग है। गौमाता को राजमाता का दर्जा देने के लिए सरकार परीक्षण करवा रही है और जल्द ही कोई फैसला लिया जाएगा।'

महाराष्ट्र सरकार के फैसले का अध्ययन करा रहे हैं
गोपालन मंत्री जोराराम कुमावत का कहना है कि महाराष्ट्र सरकार ने गाय को राज्य माता घोषित किया है। वहां की सरकार के फैसले का अध्ययन किया जा रहा है। इसके लिए राजस्थान के वरिष्ठ अधिकारियों को जिम्मा दिया गया है। मंत्री जोराराम का कहना है कि हमने गायों के आवारा पशु कहने पर पाबंदी लगा दी है। राज्य सरकार नंदी गौशाला को 12 महीने का आर्थिक योगदान और बाकी सभी गौशालाओं को नौ महीने का आर्थिक योगदान दे रही है।

गो तस्करी पर लगेगा अंकुश
मंत्री जोराराम कुमावत का कहना है कि गाय को राज्य माता का दर्जा मिलने के बाद गोवंश की तस्करी पर अंकुश लगेगा। गोवंश के अवैध परिवहन पर भी कई तरह के प्रतिबंध लग जाएंगे। राजस्थान में गोवंश की तस्करी के कई मामले सामने आते रहे हैं जिससे राज्य की छवि भी खराब होती है। इस पर रोक लगाने के लिए सरकार जल्द ही बड़ा फैसला लेने वाली है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से ऊंट को राज्य पशु घोषित किए जाने के बाद उसके परिवहन और वध पर अंकुश लगा है। उसी तरह गोवंश की तस्करी और वध पर प्रतिबंध लगेगा।

स्कूली पाठ्यक्रम में भी शामिल होगा गाय का पाठ
शिक्षा मंत्री मदन दिलावर का कहना है कि बच्चों और युवाओं को गाय की उपयोगिता के बारे ज्यादा से ज्यादा जानकारी दिए जाने के प्रयास कर रहे हैं। कक्षा पांचवी के पाठ्यक्रम में गाय का चेप्टर जोड़ने पर विचार चल रहा है। गाय का दूध कितना उपयोगी है, गोमूत्र और गोबर की क्या उपयोगिता है। गाय हमारे लिए कितनी उपयोगी है। इस तरह की सभी जानकारियां बच्चों को मिलनी चाहिए।

30/10/2024

अयोध्या दीपोत्सव : सरकार का विश्व रिकॉर्ड और गरीबों का संघर्ष

अयोध्या का दीपोत्सव हर साल बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है, जहां लाखों दीये जलाकर एक नया विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया जाता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति और परंपराओं की एक झलक प्रदान करता है। परंतु, इस भव्यता के पीछे कई बार सामाजिक विषमताएं भी उजागर हो जाती हैं।

दीपों का बचा तेल और गरीबी का संघर्ष
रिपोर्टों के अनुसार, कुछ गरीब लोग दीपों के बचे हुए तेल को इकट्ठा करके उससे अपना खाना पकाने का प्रयास करते हैं। यह स्थिति न केवल गरीबी की गहराई को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि कैसे समाज के एक वर्ग को बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।

पुलिस की कठोर कार्रवाई
इस दुःखद स्थिति में और भी ज्यादा चिंता का विषय यह है कि कथित तौर पर पुलिस ने इन गरीब लोगों को डंडों से मारकर भगाया। यह कार्रवाई सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।

सामाजिक सवाल और चुनौतियां
अयोध्या के दीपोत्सव में कितने दीये जलाए जाते हैं?
अयोध्या के दीपोत्सव में प्रतिवर्ष लाखों दीये जलाकर एक नया विश्व रिकॉर्ड बनाया जाता है।
दीयों के बचे तेल का उपयोग करने की मजबूरी क्यों?
आर्थिक तंगी और गरीबी के कारण कुछ लोगों को इस तेल का उपयोग करने की मजबूरी होती है।
पुलिस की कठोर कार्रवाई के पीछे का कारण क्या हो सकता है?
यह कठोर कार्रवाई शायद व्यवस्था के अनुपालन की दृष्टि से की गई हो, परंतु इसके पीछे का सही कारण जानने के लिए विस्तृत जांच की आवश्यकता है।
इस घटना का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है?
इस तरह की घटनाएं समाज में विषमताओं को उजागर करती हैं और समाजिक संवेदनशीलता के प्रति सवाल खड़े करती हैं।
इस प्रकार की समस्याओं का समाधान कैसे किया जा सकता है?
समाधान के लिए आर्थिक विकास, सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क, और शिक्षा के विकास पर जोर देना होगा।
निष्कर्ष
अयोध्या के दीपोत्सव और इससे जुड़ी सामाजिक विषमताएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि एक ओर जहां उत्सव मनाने के लिए सरकार के पास संसाधन हैं, वहीं दूसरी ओर समाज का एक बड़ा हिस्सा बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है।मजा तो तब आता, जब इन गरीबों के पेट भरे होते और वे खुशी से अपने घरों के बाहर दीए जलाकर विश्व रिकॉर्ड बना रहे होते।

30/10/2024

नरक चतुर्दशी की रात क्यों जलाया जाता है यम का दीपक? यहां जानें महत्व

इस साल 30 अक्तूबर को छोटी दिवाली का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन भी दिवाली की ही तरह दीपक जलाने की परंपरा है। लोग रात के समय यम का दीपक जलाते हैं, इसलिए इस दिन को नरक चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। नरक चतुर्दशी की रात यम का दीपक जलाने से अकाल मृत्यु या किसी भी अनहोनी का खतरा टल जाता है। इसे "यम दीपदान" भी कहा जाता है, जो कार्तिक मास की चतुर्दशी तिथि पर किया जाता है। इसे मृत्यु के बाद नरक में जाने से बचने का उपाय भी माना जाता है।

क्यों जलाया जाता है यम का दीया?
नरक चतुर्दशी के दिन यम का दीपक जलाने के पीछे यह मान्यता है, कि इससे मृत्यु के भय का नाश हो जाता है और पूरे परिवार पर यमराज जी की कृपा बनी रहती है। छोटी दिवाली के दिन दीपदान करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन यमराज की पूजा करने से घर का वातावरण अच्छा बना रहता है। साथ ही पितरों का आशीर्वाद भी बना रहता है।

कब जलाया जाता है यम का दीपक?
यम का दीपक नरक चतुर्दशी की रात सूर्यास्त के बाद जलाया जाता है। इस दीपक को घर के मुख्य द्वार पर एक रखा जाता है। यह दीया मिट्टी का होता है। इस दीप में सरसों का तेल डालकर उसे दक्षिण दिशा की ओर रखना चाहिए। मान्यता है कि यह दीपक जलाने से यमराज प्रसन्न होते हैं। साथ ही घर में सुख-समृद्धि भी आती है।

30/10/2024

दलबदल की राजनीति को खारिज करने का वक्त

महाराष्ट्र में चुनाव-प्रचार अब ज़ोरों पर है। अपनी-अपनी जीत का दावा तो सब कर रहे हैं, पर मतदाता जितायेगा किसे, यह अभी भविष्य के गर्भ में ही है। चुनाव परिणाम को लेकर दावे और प्रतिदावे तो अब भी हो रहे हैं, पर ‘चुनावों के पंडित’ कहलाने वाले चुनाव परिणाम के बारे में इस बार कुछ ठोस कहने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं। कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस, ये चार दल मुख्यतः हुआ करते थे पहले मैदान में, इस बार इन दलों की संख्या छह है– शिवसेना और राष्ट्रवादी दोनों इस बार बंटे हुए हैं। अब मैदान में दो शिवसेना हैं और दो राष्ट्रवादी। यह स्थिति बड़ा कारण है चुनाव परिणाम को लेकर फैल रहे असमंजस का। सवाल सिर्फ पार्टियों के बंटने का नहीं है, व्यक्तियों का बंटना ज़्यादा घाल-मेल करने वाला है।

यूं तो हर दल यह दावा करता है कि उसके पास अपनी नीतियां हैं, अपनी विचारधारा है, ‘जनता की सेवा’ करने का अपना तरीका है, पर देश में चुनाव-दर-चुनाव यह बात लगातार स्पष्ट होती रही है कि हमारे राजनीतिक दलों का उद्देश्य सत्ता के लिए राजनीति करना ही रह गया है। नीतियों और सिद्धांतों की बात तो सब करते हैं पर निगाह सबकी ‘कुर्सी’ पर ही टिकी रहती है। सत्ता पाने के लिए हमारे राजनेता कुछ भी करने-कहने के लिए तैयार दिखते हैं।

वैसे सिद्धांतों की राजनीति का नकार कोई नयी बात नहीं है। दशकों पहले हरियाणा में ‘आया राम, गया राम’ की राजनीति शुरू हुई थी। एक तरह की राजनीतिक अराजकता-सी फैलती गयी उसके बाद। ऐसा नहीं है कि इस दल बदलू राजनीति के खतरों से देश अनभिज्ञ था। कोशिशें भी हुईं इस स्थिति से उबरने की। राजनीति में नैतिकता के स्थान को लेकर विमर्श भी होते रहे, कानून भी बने, पर सत्ता की दौड़ में राजनीतिक शुचिता के लिए स्थान लगातार कम होता गया। युद्ध और प्यार में सब कुछ जायज़ है की तर्ज पर राजनीति में भी सब कुछ जायज़ मान लिया गया है। इसी का परिणाम है कि आज की राजनीति में नैतिकता के लिए कोई स्थान नहीं बचा। चुनावों के दौरान, और चुनावों के लिए मची आपाधापी में हम इस पतन के उदाहरण लगातार देख रहे हैं। यह अपने आप में कम पीड़ा की बात नहीं है, पर मतदाता की असहायता देख कर पीड़ा और बढ़ जाती है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि देश के मतदाता ने समय-समय पर अपनी जागरूकता और ताकत का परिचय और परिणाम भी दिया है। आपातकाल घोषित करने वाली सरकार को देश के मतदाता ने जिस तरह से नकारा था, वह उसकी ताकत का प्रमाण है, उसकी जागरूकता का स्पष्ट उदाहरण है। राज्यों के चुनाव में भी ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं। लेकिन, भ्रष्ट, दलबदलू सिद्धांतहीन राजनीति को नकारने का जो परिणाम होना चाहिए, वह अक्सर नहीं दिखाई देता। यह पीड़ा की बात है, और चिंता की भी। यह चिंता राजनेता नहीं करेंगे। उनका स्वार्थ इस स्थिति के बने रहने में है। स्थिति को बदलने की आवश्यकता तो मतदाता को है। वह इस आवश्यकता को समझते हुए भी अक्सर न समझने की मुद्रा अपना लेता है।

टिकटों के बंटवारे को लेकर आज महाराष्ट्र में जिस तरह की स्थिति दिखी है, वह अपने आप में कोई नयी स्थिति नहीं है। बहुत देखा है इस स्थिति को मतदाता ने। देखा ही नहीं, सहा है, कहा जाना चाहिए। पर क्यों सहे मतदाता इस स्थिति को?

बड़ी बेशर्मी के साथ हमारे राजनेता अपना पाला बदल लेते हैं। शरद पवार ने टिकट नहीं दिया तो अजित पवार के पाले में चले जाएंगे; उद्धव ठाकरे की पार्टी से चुनाव लड़ने का टिकट नहीं मिला तो शिंदे की पार्टी दे देगी; भाजपा के नेतृत्व ने किसी की उम्मीदवारी का दावा स्वीकार नहीं किया तो कांग्रेस का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। किसी को कांग्रेस नकारती है तो भाजपा बांहें फैला कर उसका स्वागत कर लेगी। महाराष्ट्र का यह सच देश के बाकी राज्यों का सच भी है। इस सच का निहितार्थ सत्ता के लालच के संदर्भ में ही समझा जा सकता है।

सत्ता के लिए कुछ भी किया जा सकता है, किया जा रहा है। लेकिन सत्ता के लिए विचारधारा की जिस तरह आज बलि दी जा रही है, वह जनतांत्रिक मूल्यों और आदर्शों की धज्जियां उड़ाना ही है। आज़ादी प्राप्त करने के कुछ अर्सा बाद तक स्थिति ऐसी या इतनी बुरी नहीं थी। हमारे पास ऐसे नेता थे जो नीतियों और मूल्यों की राजनीति में विश्वास करते थे। तब एक सीमा तक हमारी राजनीति तीन हिस्सों में बंटी हुई थी– वामपंथी, दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी। तब हमारा मतदाता इतना शिक्षित नहीं था, जितना आज है। पर राजनीति के इस विभाजन को वह समझता था। तब हमारे नेताओं को अपनी छवि की, शायद, ज़्यादा चिंता थी। आज स्थिति बदल गयी है। नेता भले ही यह कहता रहे कि ‘यह पब्लिक है सब जानती है’ पर मानता वह यही है कि पब्लिक को बरगलाया जा सकता है। इसीलिए जब चाहे कोई ‘आयाराम गयाराम’ बन जाता है और सब जानने का दावा करने वाली पब्लिक यह खेल देखकर हंसती रह जाती है।

पर बात हंसने की नहीं है। पीड़ा देने वाली बात है यह। मतदाता का कर्तव्य है कि वह आयाराम गयाराम की राजनीति में विश्वास करने वाले प्रत्याशियों से पूछे कि उनके आचरण को अस्वीकार क्यों न किया जाये? क्यों न पूछा जाये कि वह मतदाता को इतना कमज़ोर क्यों समझते हैं कि कुछ भी करना-कहना अपना अधिकार मान लेते हैं? और यह सवाल मतदाता को अपने आप से भी पूछना चाहिए कि वह अक्सर नेताओं के हाथ का खिलौना क्यों बन जाता है?

एक बात जो और उभर कर सामने आयी है, वह अपनी संतानों को नेताओं द्वारा राजनीतिक उत्तराधिकार देने की है। यह सिर्फ महाराष्ट्र का सच नहीं है कि अधिकतर बड़े नेता अपनी संतानों को राजनीति में ‘फिट’ करना चाह रहे हैं। यहां भी वे इस बात की कोई परवाह नहीं करते कि उनके इस कार्य को अनैतिक माना जायेगा। राजनीतिज्ञ की संतान का राजनीति में आना कतई ग़लत नहीं है। ग़लत तो यह है कि राजनेता अपनी गद्दी को विरासत में देना अपना अधिकार समझने लगे हैं। और नेता-संतानें भी पिता की गद्दी पर अपना अधिकार समझती हैं। नेताओं और उनकी संतानों का यह कथित अधिकार अनैतिक है। जनतंत्र हर एक को अपनी योग्यता-क्षमता प्रमाणित करने का अवसर देता है। पर यह क्षमता-योग्यता विरासत में नहीं मिलती। यह बात हमारे राजनेताओं और मतदाताओं, दोनों को प्रमाणित करनी होती है। रातो-रात पाला बदलना जहां एक ओर व्यक्ति की सत्ता-लोलुपता को उजागर करता है वहीं सिद्धांतहीन राजनीति उस खतरे का भी संकेत देती है जो जनतांत्रिक व्यवस्था और सोच के सामने आ खड़ा हुआ है। इस खतरे का अहसास और मुकाबला, राजनेताओं को नहीं, जनता को करना है। जनता यानी मैं और आप। हमें अपने आप से पूछना होगा कि क्या हम इस मुकाबले के लिए तैयार हैं?

29/10/2024

स्कूली बच्चों से भरी बस सीकर में पलटी, उदयपुरवाटी से जयपुर शैक्षणिक भ्रमण पर जा रहे थे बच्चे

सीकर : सीकर जिले के खंडेला थाना इलाके में जयपुर-झुंझुनूं मार्ग पर भोजपुर गांव के नजदीक सोमवार को स्कूली बच्चों से भरी बस अचानक पलट गई. बच्चे उदयपुरवाटी से जयपुर शैक्षिक भ्रमण पर जा रहे थे. इस दौरान अचानक बस अनियंत्रित हो गई. बस के पलटने से चारों तरफ चीख-पुकार मच गई.

इस दौरान आसपास के लोगों ने स्कूल बस में सवार स्कूली बच्चों को जैसे तैसे बस से बाहर निकाला और खंडेला के राजकीय उप जिला अस्पताल को पहुंचाया, जहां सभी का प्राथमिक उपचार किया गया. दुर्घटना में सभी बच्चे सकुशल बताए जा रहे हैं.

हालांकि एक महिला को गंभीर चोटें जरूर आई है. उदयपुरवाटी में संचालित एक निजी स्कूल के बच्चे बस में सवार होकर जयपुर शैक्षिक भ्रमण पर जा रहे थे. इस दौरान भोजपुर स्टैंड के पास बस अनियंत्रित हो गई और सड़क किनारे खेत में जाकर पलट गई.

29/10/2024

खाचरियावास बोले- गायों को शब्दों की नहीं चारे-पानी की जरूरत:बीजेपी सरकार सिर्फ वोटों के लिए नाटक कर रही है; गायों की बड़ी तादाद में हो रही हैं मौत

जयपुर : कांग्रेस नेता पूर्व मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने कहा कि उपचुनाव की हार के डर से राजस्थान की भाजपा सरकार भूख और प्यास से मर रही गायों को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाने की बजाय सिर्फ शब्दों से गायों का पेट भरना चाहती है। खाचरियावास ने कहा कि जयपुर सहित पूरे राजस्थान में भाजपा सरकार आने के बाद गायों की बड़ी तादाद में मौत हो रही हैं, भूख के कारण गाय प्लास्टिक खाकर मर रही है, गायों को बचाने वाला कोई नहीं है। रोजाना गायों को पकड़कर जिस ढंग से बेदर्दी से ट्रकों में घुसा जा रहा है, उससे रोजाना गायों की मौत हो रही है। भाजपा सरकार गायों के लिए निराश्रित और बेसहारा शब्द लागू करके उनकी भूख नहीं मिटा सकती क्योंकि गायों को चारे और पानी चाहिए लेकिन भाजपा की सरकार को चारे और पानी में कोई इंटरेस्ट नहीं है।

उन्होंने कहा- भाजपा की सरकार सिर्फ वोटों के लिए नाटक कर रही है। उन्होंने पूर्ववर्ती गहलोत सरकार के कामों को गिनाते हुए कहा- गायों को बचाने के लिए कांग्रेस की सरकार ने एक अलग विभाग बनाया और गोशालाओं को करोड़ों रुपए की मदद की। वहीं आज बीजेपी की सरकार हमारे समय में एक और दो गाय पालने की छूट देने को खत्म करके उन लोगों को परेशान कर रही है, जो गाय पालते हैं। जो लोग शहर में गाय पालते हैं उनके मकान के कनेक्शन काट दिए जाते हैं। गाय को घरों से जब्त कर कर लिया जाता है। गाय पकड़ने के बाद उसको छोड़ने की भाजपा सरकार ने कोई व्यवस्था नहीं की है। जिससे गायों के बछड़े तड़प तड़प के मर जाते हैं। गायों और बछड़ों की मौत के लिए भाजपा सरकार जिम्मेदार है।

प्रतापसिंह ने कहा- भाजपा सरकार को गायों के लिए शब्दों का मायाजाल बचाने की बजाए चारे पानी और रखरखाव की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए। जिससे गायों की मौत को रोका जा सकें। मैं भाजपा सरकार से इतना ही चाहता हूं कि भाजपा सरकार नाटक बंद करें क्योंकि पूरे राजस्थान में लंपी बीमारी फैल रही है गायों को लंपी बीमारी से बचने के लिए सरकार कोई कदम नहीं उठा रही है। हमारे समय में गायों में जब लंपी फैला था तब हमने करोड़ों रुपए खर्च करके लंपी बिमारी को खत्म करने के लिए बड़ा अभियान चलाया था। ख़ाचरियावास ने कहा कि प्रदेश और देश की गायों को शब्दों से कोई मतलब नहीं है, उन्हें चारा और पानी चाहिए सरकार को गायों का शब्दों से पेट भरने की बजाय गाय के लिए चारे और पानी की व्यवस्था करनी चाहिए।

29/10/2024

राजस्थान: सरकारी स्कूलों से गोधरा कांड पर पाठ वाली किताब समेत चार पुस्तकें वापस लेने का आदेश

नई दिल्ली: भाजपा शासित राजस्थान में 2002 के गोधरा कांड और उसके बाद की घटनाओं पर आधारित एक पाठ्यपुस्तक उन चार पुस्तकों में शामिल है जिन्हें कथित तौर पर विद्यालयों से वापस मंगाया जा रहा है. एक महीने पहले ही इन्हें राज्य के सरकारी स्कूलों में वितरित किया गया था.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद ने 21 अक्टूबर को जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे स्कूलों से कक्षा 9 से 12 तक की – ‘जीवन की बहार’ और ‘चिट्टी’ – ‘एक कुत्ता और उसका जंगल फार्म’, तथा कक्षा 11 और 12 की ‘अदृश्य लोग’ – ‘उम्मीद और साहस की कहानियां’ और ‘जीवन की बहार’ पाठ्यपुस्तकों की सभी प्रतियां वापस मंगाने को कहें.

स्कूल के प्रधानाचार्यों को सभी चार पुस्तकों की प्रतियां अपने-अपने ब्लॉक स्तर के कार्यालयों में एकत्र करके जमा करानी होंगी. आदेश में कहा गया है कि कागज और छपाई की गुणवत्ता का परीक्षण करने के लिए ‘जीएसएम जांच’ की जाएगी, तथा कथित तकनीकी कमियों के कारण इसे वापस मंगाया गया है.

अखबार के अनुसार, एक निजी संगठन ने 2023-24 में पुस्तकालय अनुदान के माध्यम से सभी चार पुस्तकों को प्रकाशित किया. इन किताबों में अदृश्य लोग-उम्मीद और साहस की कहानियां के अध्यायों में से एक- ‘नौ लंबे साल’ शीर्षक से है, जो गोधरा नरसंहार की प्रतिक्रिया पर दोबारा गौर करता है.

इसमें कहा गया है, ‘गुजरात सरकार ने दावा किया था कि गोधरा ट्रेन अग्निकांड में आतंकवादी साजिश थी, लेकिन यह कभी साबित नहीं हुआ. उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय और यहां तक ​​कि विशेष अदालतें भी इस निष्कर्ष पर पहुंचीं कि घटना में कोई आतंकवादी साजिश नहीं थी और तीनों संदिग्धों (जिन्होंने नौ साल जेल में बिताए) ने कोई अपराध नहीं किया है.’

अध्याय में यह भी उल्लेख किया गया है कि कारसेवकों के नरसंहार के बाद ‘चेहरे ढके हुए सिविल ड्रेस में पुलिस मालिन बस्ती में गई…और परिवारों को कोई स्पष्टीकरण दिए बिना 14 युवकों को गिरफ्तार कर लिया.’

मालूम हो कि गुजरात के गोधरा में 27 फरवरी, 2002 को अयोध्या से ‘कारसेवकों’ को लेकर लौट रही साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगा देने के कारण 59 लोगों की मौत हो गई थी, जिसके बाद राज्य में दंगे भड़क उठे थे, जिसमें 1,200 से अधिक लोग मारे गए थे, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के थे.

इस बीच, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा, ‘राजस्थान में शिक्षा के नाम पर ‘नफरत फैलाने, जहर फैलाने’ और ‘नफरती भाषा’ सिखाने के लिए कौन जिम्मेदार है? शिक्षा मंत्री बच्चों में नफरत फैलाने के लिए अधिकारियों पर दबाव बना रहे हैं और जनता की गाढ़ी कमाई के 30 करोड़ रुपये का इस्तेमाल नियमों के खिलाफ किताबें खरीद रहे हैं.’

उन्होंने कहा कि नैतिक शिक्षा की जगह अनैतिकता की हदें पार की जा रही हैं. मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा से अपेक्षा है कि बच्चों में बांटी जा रही इस सामग्री की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए.

Address

Khubi News
Sikar
332001

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Khubinews posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Khubinews:

Share

Category