08/09/2026
2026 के आत्मनिर्भर भारत में दिल्ली के सत्य निकेतन में 40 साल पुरानी 5 मंजिला अवैध इमारत ढहने से कई मासूम छात्रों की मौत हुई, जबकि घटना के 12 घंटे बाद भी 50% से अधिक मलबा नहीं हटाया जा सका था।
दिल्ली नगर निगम के रिकॉर्ड संख्या 402/2018 के अनुसार इस 100 वर्ग गज के रिहायशी प्लॉट पर केवल 2 मंजिलों की अनुमति थी, परंतु स्थानीय भाजपा विधायक के संरक्षण में मालिक ने बिना किसी बीम या पिलर के 3 अतिरिक्त अवैध मंजिलें खड़ी कर 5 मंजिला अवैध पीजी बना दिया।
दिल्ली मास्टर प्लान 2021 के नियम 15.3 के अनुसार 100% रिहायशी क्षेत्र में बिना फायर एनओसी (फायर एक्ट 2010 की धारा 33) के कमर्शियल पीजी चलाना पूर्णतः गैर-कानूनी था, फिर भी एमसीडी द्वारा पूर्व में सील की गई इस बिल्डिंग की सील को राजनीतिक प्रभाव से गैर-कानूनी रूप से खोल दिया गया।
देश की राजधानी में जहां एम्स के मुर्दाघर में विभिन्न राज्यों से आए छात्रों के शव पड़े थे, वहीं घटना की रात 12 बजे भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन विपक्ष को कोसते हुए राजनीतिक वीडियो पोस्ट करने में व्यस्त थे, जो वर्तमान सत्ता की संवेदनहीनता को उजागर करता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में नामांकित 4.5 लाख से अधिक छात्रों के लिए कुल 20 हॉस्टल उपलब्ध हैं जिनकी कुल क्षमता 9,000 छात्रों से भी कम है, यानी 98% यानी 4,41,000 छात्र सरकारी हॉस्टल सुविधाओं से वंचित हैं।
इसी कमी का फायदा उठाकर सत्य निकेतन, मुखर्जी नगर और करोल बाग जैसे क्षेत्रों में 15,000 से अधिक गैर-कानूनी पीजी चल रहे हैं, जो प्रति छात्र औसतन 12,000 से 18,000 रुपये प्रति माह वसूल कर प्रति वर्ष 2,500 करोड़ से अधिक का काला कारोबार करते हैं।
इस अवैध सिंडिकेट से पीजी माफिया प्रति माह करोड़ों रुपये का चंदा एकत्र कर हॉस्टल निर्माण की प्रक्रियाओं को बाधित करता है ताकि छात्रों को महंगे निजी आवासों में रहने पर मजबूर किया जा सके।
ऐतिहासिक तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो 1947 से 2014 के मध्य कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में उच्च शिक्षा के अवसंरचनात्मक ढांचे का व्यापक निर्माण किया गया था।
जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल (1947-1964) में शिक्षा पर केंद्रीय आवंटन को कुल बजट के 0.6% से बढ़ाकर 2.4% किया गया था, जिसके तहत 1951 में 50 करोड़ रुपये के शुरुआती परिव्यय से आईआईटी खड़गपुर तथा बाद में 1956 में 4.8 करोड़ रुपये की लागत से एम्स नई दिल्ली की स्थापना हुई।
इसके पश्चात 1969 में 12 करोड़ रुपये के शुरुआती आवंटन से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) अधिनियम पारित हुआ, जिसके अंतर्गत 1970 से 1980 के बीच 45 करोड़ रुपये की लागत से झेलम, सतलुज, कावेरी और रावी जैसे 18 भव्य हॉस्टलों का निर्माण कराया गया, जिनमें 8,000 से अधिक छात्रों के लिए न्यूनतम शुल्क पर सुरक्षित आवासीय व्यवस्था सुनिश्चित की गई।
इसके अतिरिक्त 1966 से 1989 के दौरान इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के प्रशासनों द्वारा 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की गई, जिसके तहत शिक्षा बजट को जीडीपी के 3.5% तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया था।
इस अवधि में 550 नवोदय विद्यालयों की स्थापना हेतु 1,200 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया और देश भर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 300 से अधिक नए सरकारी हॉस्टलों का निर्माण 350 करोड़ रुपये की लागत से संपन्न कराया गया।
दिल्ली विश्वविद्यालय में 1970 और 1980 के दशकों में इंटरनेशनल यूथ हॉस्टल, मेघदूत और ढाका कॉम्प्लेक्स जैसे 12 बड़े हॉस्टल परिसर स्थापित किए गए, जिन पर तत्कालीन दरों के अनुसार लगभग 28 करोड़ रुपये का व्यय किया गया था और जहां आज भी हजारों छात्र सुरक्षित वातावरण में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
इसके विपरीत 2014 से 2024 के मध्य भाजपा सरकार के कार्यकाल में शिक्षा अवसंरचना पर बजटीय आवंटन में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है।
1968 के कोठारी आयोग द्वारा अनुशंसित जीडीपी के 6% शिक्षा बजट के मानक के मुकाबले 2014-2024 के दौरान यह आवंटन औसतन केवल 2.8% से 3.1% के बीच सीमित रहा, जिससे सरकारी हॉस्टल निर्माण प्रक्रिया ठप्प पड़ गई।
यूडीआईएसई+ (UDISE+) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2014 से 2023 के बीच देश भर में 60,000 से अधिक सरकारी प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों को 'मर्जर' के नाम पर बंद कर दिया गया, जबकि दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू में पिछले 10 वर्षों में नए केंद्रीय हॉस्टलों की निर्माण दर में 0% की वृद्धि दर्ज की गई।
2014 के बाद देश के विभिन्न कोचिंग और शैक्षणिक हबों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी के कारण दर्जनों छात्रों को अपनी जान गंवानी पड़ी है।
जुलाई 2024 में ओल्ड राजेंद्र नगर स्थित Rau's IAS कोचिंग के अवैध बेसमेंट में नाले का पानी भरने से 3 यूपीएससी अभ्यर्थियों की डूबने से मृत्यु हुई, जो दिल्ली जल बोर्ड और एमसीडी के नालों की 5 वर्षों से सफाई न होने का परिणाम था।
जून 2023 में मुखर्जी नगर के संस्कृति कोचिंग सेंटर में आग लगने की घटना में 60 से अधिक छात्र खिड़कियों से कूदने पर मजबूर हुए क्योंकि इमारत में केवल 1 निकास द्वार था, और मई 2019 में सूरत के तक्षशिला कॉम्प्लेक्स में आग लगने से 22 छात्रों की मृत्यु हुई थी क्योंकि 4 मंजिला इमारत पर बिना अनुमति प्लास्टिक डोम बनाया गया था।
वर्ष 2014 से 2024 के बीच देश के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों और कोचिंग केंद्रों में अवसंरचनात्मक विफलताओं, आग लगने की घटनाओं और अवैध निर्माण ढहने के कारण 140 से अधिक छात्रों की असमय मौत दर्ज की गई है।
इस दौरान दिल्ली, कोटा और प्रयागराज जैसे प्रमुख शिक्षा केंद्रों में चलने वाले 35,000 से अधिक कोचिंग संस्थानों और पीजी में से 82% के पास वैध नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC 2016) का सुरक्षा प्रमाणपत्र या फायर एनओसी उपलब्ध नहीं है।
इसके बावजूद इन असुरक्षित परिसरों पर कोई कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई न होना सीधे तौर पर नगर निकायों और सत्ताधारी तंत्र की मिलीभगत और नीतिगत विफलता का प्रमाण है।
शिक्षा व्यवस्था को निजी माफियाओं के हाथ में सौंपने और आवासीय बजट में कटौती करने की नीतियों का ही परिणाम है कि आज छात्र असुरक्षित जर्जर इमारतों में रहने को विवश हैं।
1947 से 2014 के बीच निर्मित मजबूत संस्थागत ढांचों की तुलना में पिछले दशक की नीतियां केवल विज्ञापनों और निजीकरण तक सीमित रही हैं।
जब तक शिक्षा और छात्र सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए पारदर्शी नीतियां और सार्वजनिक निवेश पुनस्थापित नहीं किया जाएगा, तब तक 'विश्वगुरु' के दावे ज़मीनी हकीकत से परे ही रहेंगे।
विक्रम सिंह ...✍️