23/11/2025
चलो मैं नक्सली सही, पर मैंने जल जंगल जमीन के लिए लड़ाई लड़ी है और तुम देशभक्त सही पर तुम्हारी तरह नेताओं के गुलाम नहीं हैं।
“मैं हिड़मा जंगल की अग्नि व मिट्टी की गोद में जन्म लिया था, जहाँ हवा भी आज़ादी की भाषा बोलती थी,
जहाँ नदी के सुरों में पूर्वजों का संगीत था,
और जंगल मेरा पहला विद्यालय।
पर तुम्हें क्या पता उस जीवन का,
जिसे तुमने सिर्फ़ “विकास” कहकर लूट लिया।
जिसके बदले हमें दर्द, विस्थापन और मरते हुए पेड़ों का साया मिला।
मेरा आदिवासी होना ही काफी था मुझे संदिग्ध कहकर मारने के लिए, नक्सली, मुखबिर, अपराधी साबित करने के लिए कितने झूठ गढ़ लिए तुमने अपनी लूट को सच दिखाने के लिए।
हज़ारों साल पुराना था मेरा ज्ञान, अलिखित था मेरा संविधान,
प्रकृति मेरे हक़ में थी, और मैं प्रकृति के साथ था महान।
पर जल-जंगल-ज़मीन पर जब तुम्हारी नज़र पड़ी
तो मेरे नाम पर “विकास” लिखकर
लूट की कहानी शुरू हुई।
तुम शहर बसाते गए और मेरी दुनिया उजड़ती गई।
मैं पेड़ों को बचाता रहा और तुमने एक-एक कर
उन्हें मौत का सौदा बना दिया।
मैंने नदियों के साथ जीना सीखा था, तुमने उन्हें जहर का गट्ठर बना दिया।
मैंने धूप में छांव ढूँढी थी, तुमने जंगल ही जला दिया।
पर सुनो...
मैं टूटा नहीं हूँ।
मैं बिखरा नहीं हूँ।
मैं हिड़मा हूँ..!
वो आग जो राख में भी सांस लेती है।
वो चीख जो जंगलों में दुबारा जन्म लेती है।
वो प्रतिरोध जो हज़ारों साल के इतिहास से ताकत लेता है।
जंगल मेरा था, मेरी माटी मेरी थी,
आज भी है…
और कल भी रहेगी—
क्योंकि मैं मरूँगा नहीं,
मैं हर आदिवासी की सांसों में जीवित रहूंगा।
मेरी मिट्टी का, मेरी पहचान का,
मेरी लड़ाई का नाम—हिड़मा है।
#आदिवासी #हिड़मा